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सर्वकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

पृष्ठ 22, कुल 616 में से

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पृष्ठ 22

अ० १ ] शारीरस्थानम् ७
अंगुल्यंगुष्ठतलजस्तंत्रीवीणानखोद्भवः ।
दृष्टः शब्दो यथा बुद्धिर्दृष्टा संयोगजा तथा ॥ ३४ ॥
कार्य, इन्द्रिय और विषयों के बहुत भेद होने से बुद्धिया भी बहुत प्रकार
की हैं। इनमें एक एक बुद्धि आत्मा का मन से, मन का इन्द्रियों से और
इन्द्रियों का विषय के साथ सयोग होने से उत्पन्न होती हैं। जिस प्रकार शब्द
मध्यमांगुलि, अगुष्ठ, हथेली तन्त्री (तात), वीणा और नख के सयोग से
उत्पन्न होता है, उसी प्रकार प्रत्यक्ष ज्ञान भी आत्मा, इन्द्रिय, मन और विषय
के सन्निकर्ष से उत्पन्न होता है ॥ ३३-३४ ॥
बुद्धीन्द्रियमनोर्थाना विद्याद्योगधरं परम् ।
चतुर्विंशक इत्येष राशिः पुरुषसंज्ञकः ॥ ३५ ॥
बुद्धि, इन्द्रिय, मन और विषय इन के संयोग को शरीर रूप से धारण
करने वाला इनसे पृथक् 'अव्यक्त' आत्मा है। पाच महाभूत, पाच विषय,
दस इन्द्रिय, मन, बुद्धि, अहकार और महान् इन चौबीस तत्त्वों का राशि
समूह को 'पुरुष' कहते है ॥ ३५ ॥
रजस्तमोभ्यां युक्तस्य संयोगोऽयमनन्तवान् ।
ताभ्यां निराकृताभ्यां तु सत्त्ववृद्ध्या निवर्तते ॥ ३६ ॥
रज और तम से युक्त पुरुष का यह सयोग अन्त वाला नही होता,
लगातार चलता ही रहता है। सत्त्व के प्रबल होने पर संसार बन्धन के
कारणरूप रज और तम के हटने पर यह सयोग भी समाप्त हो जाता है। यही
पुरुष का मोक्ष है ॥ ३६ ॥
अत्र कर्मफलं चात्र ज्ञानं चात्र प्रतिष्ठितम् ।
अत्र मोहः सुखं दुःख जीवितं मरणं स्वता ॥ ३७ ॥
एवं यो वेद तत्त्वेन स वेद प्रलयोदयौ ।
पारम्पर्यं चिकित्सा च ज्ञातव्य यच्च किंचन ॥ ३८ ॥
पुरुष आत्मा — अदृष्ट (कर्म), कर्मफल, ज्ञान, अज्ञान, अनुकूल एवं प्रति-
कूल वेदनायें, जन्म, मरण, मेरी स्त्री, मेरा पुत्र आदि ममत्व ये सब बाते इसी
राशिसंज्ञक शरीरपुरुष में प्रतिष्ठित हैं। जो पुरुष इन सब बातों को यथार्थ रूप
से जानता है, वह प्रलय (प्रकृति का महत् आदि में लय) एव उदय (उत्पत्ति)
इन दोनों को जानता है। वह वेदनाओं के पारम्पर्य सम्बन्ध और चिकित्सा को
भी जानता है। इसके अतिरिक्त इस पुरुष में और भी जो कुछ जानने योग्य
होता है वह उस सब को जानता है ॥३७-३८॥