चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 18, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० १] शारीरस्थानम् ३
कारणं वेदनानां किं किमधिष्ठानमुच्यते ।
क्व चैता वेदना सर्वा निवृत्ति यान्त्यशेषतः ॥ १३ ॥
सर्ववित्सर्वसंन्यासी सर्वसंयोगनिःसृतः ।
एकः प्रशान्तो भूतात्मा कैर्लिङ्गैरुपलभ्यते ॥ १४ ॥
वेदनाओं का क्या कारण है ? वेदनाओं का आश्रय क्या है ? ये सब
वेदनाए किस अवस्था में शान्त हो जाती है ? सर्वज्ञ, सर्वसन्यासी, सब प्रकार
के संयोगों से मुक्त, प्रशान्त, भूतात्मा किन लक्षणों से जाना जाता है ? अग्नि-
वेश के ये तेईस प्रश्न हैं ॥१३-१४॥
इत्यग्निवेशस्य वचः श्रुत्वा मतिमतां वरः ।
सर्वं यथावत्प्रोवाच प्रशान्तात्मा पुनर्वसुः ॥ १५ ॥
खादयश्चेतनाषष्ठा धातवः पुरुषः स्मृतः ।
चेतनाधातुरप्येकः स्मृतः पुरुषसंज्ञकः ॥ १६ ॥
पुनश्च धातुभेदेन चतुर्विंशतिकः स्मृतः ।
मनो दशेन्द्रियाण्यर्थाः प्रकृतिश्चाष्टधातुकी ॥ १७ ॥
बुद्धिमानों मे श्रेष्ठ, प्रशान्त चित्त वाले पुनर्वसु आत्रेय ने अग्निवेश के इन
प्रश्नों को सुनकर क्रम से सबका यथोचित उत्तर दिया—आकाश, वायु, अग्नि,
जल, पृथिवी और चेतना ( मन सहित आत्मा ) ये छः धातु 'पुरुष' शब्द से
कहे जाते हैं, १एक अकेले प्रकृति आदि से पृथक् चेतना धातु को भी पुरुष
शब्द से कहते है । [ यह साख्य मत का पुरुष चिकित्सा का विषय नहीं है,
चिकित्सां का विषय तो प्रथम प्रकार का पुरुष ही है ] । फिर धातु भेद से
चौबीस राशियों को भी 'पुरुष' शब्द से कहा है । मन, पाच ज्ञानेन्द्रिय, पाच
कर्मेन्द्रिय, पाच अर्थ—शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध ये १६, अव्यक्त, महान्
अहकार और पञ्चमहाभूत ये आठ प्रकृतिया हैं, इस प्रकार से चौबीस तत्त्व
हैं२ । [ ये चौबीस तत्त्व अचेतन है और पुरुष चेतन३ है । यही पुरुष भोक्त
है । लंगड़े और अन्धे के समान इनका सयोग होने से सृष्टि उत्पन्न
होती है४ ] ॥१५-१७॥
१ यह वैशेषिक मत से कहा ।
२ मूलप्रकृतिरविकृतिर्महदाद्या प्रकृतिविकृतय सप्त ।
षोडशकस्तु विकारो न प्रकृतिर्न विकृतिः पुरुषः ॥ सा० का ३ ॥
३ तस्मात् तत्संयोगादचेतन चेतनावदिव लिङ्गम् ॥ सा० का० २० ॥
४. पङ्ग्वन्धवदुभयोरपि सयोगस्तत्कृतः सर्गः ॥ सांख्य का० २१ ॥