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सर्वकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

पृष्ठ 29, कुल 616 में से

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पृष्ठ 29

१४ चरकसंहिता [ अ० १
प्राणापानौ निमेषाद्या जीवनं मनसो गतिः ।
इन्द्रियान्तरसञ्चारः प्रेरणं धारणं च यत् ॥ ७० ॥
देशान्तरगतिः स्वप्ने पञ्चत्वग्रहणं तथा ।
दृष्टस्य दक्षिणेनाक्ष्णा सव्येनावगमस्तथा ॥ ७१ ॥
इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं प्रयत्नश्चेतना धृतिः ।
बुद्धिः स्मृतिरहङ्कारो लिङ्गानि परमात्मनः ॥ ७२ ॥
यस्मात्समुपलभ्यन्ते लिङ्गान्येतानि जीवतः ।
न मृतस्यात्मलिङ्गानि तस्मादाहुर्महर्षयः ॥ ७३ ॥
पुरुष के लक्षण-शरीर से अतिरिक्त आत्मा के लक्षण प्राण (शरीर में
श्वास लेना) और अपान (श्वास पुनः छोड़ना) अर्थात् वायु की ऊर्ध्व और
अधोगति होना, उन्मेष-निमेष, जीवन, शरीर की वृद्धि, क्षत और भग्न का
संरोहण कार्य, मन का अभिमत विषय में गमन, एक इन्द्रिय को छोड़ कर दूसरी
इन्द्रिय में मन का जाना, इन्द्रियों को विषय में प्रवृत्त करना, देह को धारण
करना, स्वप्नावस्था में देशान्तर में जाना, मृत्यु का ज्ञान कर लेना, दायें आंख
ने देखे पदार्थ का बायें आंख से ग्रहण करना, इच्छा (स्वार्थ या परार्थ को प्राप्त
करने की चाह), द्वेष (अनिष्ट पदार्थ को त्यागने की इच्छा), सुख (आत्मा
के अनुकूल वेदनीय), दुःख (प्रतिकूल वेदनीय), प्रयत्न, उत्साह, चेतना, धृति
(धैर्य), बुद्धि (ज्ञान), स्मृति और अहंकार ये परम अर्थात् सर्वोपरि आत्मा
के लक्षण हैं। १ये प्राण आदि समस्त लक्षण जीवित पुरुष में ही उपलब्ध होते
हैं, मृत पुरुष में आत्मा के ये चिह्न नहीं मिलते, इसलिये महर्षियों ने प्राण,
अपान आदि सब को आत्मा का लक्षण कहा है ॥७०-७३॥
शरीरं हि गते तस्मिन् शून्यागारमचेतनम् ।
पञ्चभूतावशेषत्वात् पञ्चत्वं गतमुच्यते ॥ ७४ ॥
इस चेतन आत्मा के शरीर से चले जाने पर शरीर शून्य घर की भांति चेतना
से रहित हो जाता है। इस शरीर में केवल पांच भूत ही शेष रह जाते हैं, इस
लिए शरीर को पञ्चत्व को प्राप्त हुआ कहते हैं ॥ ७४ ॥
अचेतनं क्रियावच्च मनश्चेतयिता परः ।
युक्तस्य मनसा तस्य निर्दिश्यन्ते विभोः क्रियाः ॥ ७५ ॥
चेतनावान् यतश्चात्मा ततः कर्ता निरुच्यते ।
अचेतनत्वाच्च मनः क्रियावदपि नोच्यते ॥ ७६ ॥
१ प्राणापाननिमेषोन्मेषजीवनमनोगतीन्द्रियान्तरविकाराः सुखदुःखेच्छाद्वेष-
प्रयत्नाश्चात्मनो लिङ्गानि । वैशेषिक० ३ । २ । ४ ।