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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

२३६ चरकसंहिता [ अ० १६
प्रमेह बीस प्रकार के हैं । शुक्लमह, शुक्रमेह, शीतमेह, शनैर्मेह, सिकतामेह,
लालामेह, उदकमेह, इक्षुमेह, सान्द्रमेह, सान्द्रप्रसादमेह ये दस प्रमेह कफजन्य,
क्षारमेह, कालमेह, नीलमेह, लोहितामेह, मंजिष्ठामेह, हरिद्रामेह ये छः प्रमेह
पित्तजन्य, वसामेह, मज्जामेह, हस्तिमेह और मधुमेह ये चार प्रमेह वातजन्य हैं ।
इस प्रकार से बीस प्रकार के प्रमेह हैं । योनिरोग बीस प्रकार के यथा वातिकी,
पैत्तिकी, श्लैष्मिकी और सान्निपातिकी ये चार और बाकी सोलह दोषवातादि,
दूष्य रक्तादि इनके संसर्ग से तथा प्रकृति निर्देश से होते हैं यथा—रक्तयोनि,
अरजस्का, अचरणा, अतिचरणा, प्राक् चरणा,,उपप्लुता, परिप्लुता, उदावर्तिनी,
कर्णिनी, पुत्रघ्नी, अन्तर्मुखी, सूचीमुखी, शुष्का, वामिनी, षण्डयोनि और महा-
योनि ये बीस प्रकार के योनिरोग हैं। यहां पर केवल रोगों की नाम गणना ही
की गई है, आगे विस्तार से यथास्थान कहेंगे ॥ ४ ॥
सर्वएव विकारा निजा नान्यत्र वातपित्तकफेभ्यो निर्वर्तन्ते, यथा
हि शकुनिः सर्वं दिवसमपि परिपतन् स्वां छायां नातिवर्तते,तथा स्वधा-
तुवैषम्यनिमित्ताः सर्वविकारा वातपित्तकफात्रातिवर्तन्ते, वातपित्त-
श्लेष्मणां पुनः स्थान-संस्थान-प्रकृति-विशेषानभिसमीक्ष्य तदात्मकानपि
च सर्वविकारांस्तानेवोपद्दिशन्ति बुद्धिमन्त इति ॥ ५ ॥
कहे या न कहे हुए सब प्रकार के रोग (शारीरिक रोग) वात पित्त कफ
को छोड़कर नहीं हो सकते । वातपित्त कफ के कारण ही सब शारीरिक रोग होते
हैं । जिस प्रकार कि सारे दिन भर उड़ता रहने पर भी पक्षी अपनी छाया का
अतिक्रमण (उल्लंघन) नहीं कर सकता, उसी प्रकार शरीर के धातुओं
की विषमता से उत्पन्न होनेवाले सब रोग बात पित्त और कफ को नहीं छोड़
सकते । बात, पित्त और कफ ही स्थान (रसादि बस्ति आदि), संस्थान
(आकृति लक्षण), प्रकृति (कारण) इनकी विशेषताओं को देखकर, एवं
वातादि जन्य सब विकारों को इन्हीं से उत्पन्न उक्तबुद्धिमान् कहते हैं ॥ ५ ॥
भवतश्चात्र—
स्वधातुवैषम्यनिमित्तजा ये विकारसङ्घा बहवः शरीरे ।
न ते पृथक् पित्तकफानिलेभ्य आगन्तवस्त्वेव ततो विशिष्टाः ॥६॥
आगन्तुरन्वेति निजंविकारं निजस्तथाऽऽगन्तुमपि प्रवृद्धः ।
तत्रानुबन्धं प्रकृतिं च सम्यक् ज्ञात्वा ततः कर्म समारभेत ॥७॥
प्रायः जितने रोग शरीर के अन्दर शरीर की धातुओं की विषमता से उत्पन्न
होते हैं, वे पित्त, कफ और वायु से पृथक् नहीं होते । आगन्तुक रोग इन वात
पित्त, कफ से पृथक् हैं ।

अ० २० ] सूत्रस्थानम् २३७

अ० २० ] सूत्रस्थानम् २३७
निज (स्वतःशरीर में उत्पन्न हुए) रोग को आगन्तुज रोग अनुयान करता
है। इसी प्रकार आगन्तुज (अभिघातजन्य) रोग के पीछे (कारण को लेकर),
निज (अर्थात् शारीरिक लक्षणों से लक्षित) रोग भी हो जाता है। जैसे चोट
लगने के पीछे ज्वर हो जाता है इसलिये अनुबन्धन (अप्रधान, मुख्य) और
प्रकृति (मूल कारण को भली प्रकार जानकर चिकित्साकर्म आरम्भ करना
चाहिये ॥ ६-७॥
तत्र श्लोकौ —विंशकाश्चैककाश्चैव त्रिकाश्चोक्तास्त्रयस्त्रयः ।
द्विकाश्चाष्टौ चतुष्काश्च दश द्वादश पञ्चकाः ॥ ८ ॥
चत्वारश्चाष्टका वर्गाः षट्कौ द्वौ सप्तकास्त्रयः ।
अष्टोदरीये रोगाणामध्याये संप्रकाशिताः ॥ ९ ॥
इस 'अष्टोदरीय' नामक अध्याय में बीस प्रकार के तीन, एक प्रकार के
तीन, तीन प्रकार के तीन, दो प्रकार के आठ, चार प्रकार के दस, बारह
प्रकार के पांच, चार प्रकार के आठ छः प्रकार के दो और सात प्रकार के
तीन रोग कहे हैं ॥८-९॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने रोगचतुष्के
अष्टोदरीयो नामैकोनविंशोऽध्यायः ॥ १९ ॥
—-•-—
विंशोऽध्यायः ।
━•━
अथातो महारोगाध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
अब इसके आगे महारोगाध्याय नामक अध्याय का व्याख्यान करेंगे- जैसा
भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥२॥
चत्वारो रोगा भवन्ति—आगन्तु-वात-पित्त-श्लेष्म-निमित्ताः । तेषां
चतुर्णामपि रोगाणां रोगत्वमेकविधं, रुक्सामान्यात् । द्विविधा पुनः
प्रकृतिरेषां, आगन्तु-निज-विभागात् । द्विविधं चैषामधिष्ठानं, मनःशरीर-
विशेषात् । विकाराः पुनरेषामपरिसंख्येयाः, प्रकृत्यधिष्ठान-लिङ्गायतन-
विकल्प-विशेषात् , तेषामपरिसंख्येयत्वात् ॥ ३ ॥
मूलानि तु खल्वागन्तोन॑ख-दशन-पतनाभिचाराभिशापभिषङ्ग-
व्यध-बन्ध-पीडनरज्जु-दहन-मन्त्राशनि-भूतोपसर्गादीनि. निजस्य तु मुखं
वात-पित्तश्लेष्मणां वैषम्यम् ॥ ४ ॥

२३८ चरकसंहिता [ अ० २०
द्वयोस्तु खल्वागन्तुनिजयोः प्रेरणमसात्म्येन्द्रियार्थसंयोगः, प्रज्ञा-
पराधः, परिणामश्चेति ॥ ५ ॥
सर्वेऽपि तु खल्वेतेऽभिप्रवृद्धाश्चत्वारो रोगाः परस्परमनुबध्नन्ति, न
चान्योन्यसंदेहमापद्यन्ते ॥ ६ ॥
आगन्तुर्हि व्यथापूर्वसमुत्पन्नो जघन्यं वातपित्तश्लेष्मणां वैषम्यमा-
पादयति, निजे तु वातपित्तश्लेष्माणः पूर्वं वैषम्यमापद्यन्ते, जघन्यं
व्यथामभिनिर्वर्तयन्ति ॥ ७ ॥
तेषां त्रयाणामपि दोषाणां शरीरे स्थानविभाग उपदेक्ष्यते, तद्यथा—
बस्तिः पुरीषाधानं कटिः सक्थिनी पादावस्थीनि च वातस्थानानि,
तत्रापि पक्वाशयो विशेषेण वातस्थानं, स्वेदो रसो लसीका रुधिरमामा-
शयश्च पित्तस्थानानि, तत्राप्यामाशयो विशेषेण पित्तस्थानं, उरः शिरो
ग्रीवा पर्वाण्यामाशयो मेदश्च श्लेष्मणः स्थानानि, तत्राप्युरो विशेषेण
श्लेष्मणः स्थानम् ॥ ८ ॥
सर्वशरीरचरास्तु वातपित्तश्लेष्माणो हि सर्वस्मिन् शरीरे कुपिता-
कुपिताः शुभाशुभानि कुर्वन्ति--प्रकृतिभूताः शुभान्युपचय-बल-वर्ण-
प्रसादादीनि, अशुभानि पुनर्विऋतिमापन्नानि विकारसंज्ञकानि ॥ ९ ॥
तत्र विकारः—सामान्यजा, नानात्मजाश्च । तत्र सामान्यजाः पूर्व-
मष्टोदरीये व्याख्याताः, नानात्मजांस्त्विहाध्यायेऽनुव्याख्यास्यामः,
तद्यथा—अशीतिर्वातविकाराः, चत्वारिंशत्पित्तविकाराः विंशतिः
श्लेष्मविकाराः ॥ १० ॥
रोग चार प्रकार के हैं आगन्तुज, वात, पित्त, कफजन्य, । इन चारों में
ही रुक्-पीड़ा सामान्य है, इसलिये एक प्रकार है, वेदना की समानता होने से ।
इन चारों प्रकार के रोगों की प्रकृति दो प्रकार की है; आगन्तुज और निज
शरीर में उत्पन्न होने वाले । इन रोगों के अधिष्ठान, आश्रय दो प्रकार के हैं,
मन और शरीर । किन्तु रोग असंख्य है । क्योंकि प्रकृति, कारण नाम आदि
अधिष्ठान ( दूष्य, रस, रक्तादि ), लिंग ( लक्षण ), आयतन ( बाह्य हेतु—दुष्ट
आहार-बिहार ) इनके भेद असंख्य हैं । इसलिये रोग भी अगणित प्रकार के हो
जाते हैं । आगन्तुज रोगों के मुख्य कारण दान्त का लगना, गिरना, अभिचार
( मारण आदि ), अभिशाप-शाप देना, अभिषङ्ग, अभिघात ( चोट का-
लगना ) वध ( मारना ), बन्धन ( बाँधना ), दबाना, रस्सी से बांधना,
जलाना, शस्त्र का लगना, बिजली का गिरना, ये सूक्ष्मभूत त्रस के उपद्रव
के कारण हैं । जिन शारीरिक जन्य रोगों के मुख्य कारण वात,

[अ० २० ] सूत्रस्थानम् २३६

[अ० २० ] सूत्रस्थानम् २३६

पित्त और कफ की विषमता है। इन दोनों (आगन्तुज और निज)
प्रकार के रोगों का मूल प्रेरक (प्रवृत्ति का) कारण असात्म्येन्द्रियार्थ-संयोग,
प्रज्ञापराध और परिणाम है। ये चारों प्रकार के रोग बढ़कर परस्पर एक दूसरे
में मिल जाते हैं। परन्तु तो भी सन्देह को उत्पन्न नहीं करते। परस्पर मिलने
पर भी लक्षण पृथक् पृथक् दीख पड़ते हैं। आगन्तुज रोग प्रथम शरीर के अन्दर
पीड़ा को उत्पन्न करता है और पीछे से वात, पित्त और कफ की विषमता को
उत्पन्न करता है। निज रोग प्रथम वात, पित्त, कफ की विषमता को उत्पन्न
करते हैं और फिर पीछे से पीड़ा को उत्पन्न करते हैं। तीनों ही दोषों का शरीर
में स्थान विभाग कहते हैं—यथा—बस्ति (मूत्राशय), पुरीषाधान (पक्वाशय),
कटि (कमर), सक्थिएं (जंघायें) और पांव की अस्थियां ये वायु के १स्थान
हैं। इनमें भी पक्वाशय विशेष करके वायु का स्थान है। पसीना, रस,
लसीका, रुधिर और आमाशय (का निचला भाग) ये पित्त के स्थान हैं।
इनमें भी आमाशय मुख्य करके पित्त का स्थान है। छाती, शिर, ग्रीवा, व
सन्धियां, आमाशय का (ऊपर का भाग) और मेद, ये कफ के स्थान हैं।
इनमें भी छाती विशेष करके कफ का स्थान है२। ये वात, पित्त, कफ तीनों
दोष सम्पूर्ण शरीर में गति करते हैं, और गति करते हुए कुपित या अकुपित
अवस्था में रहकर सम्पूर्ण शरीर में शुभ या अशुभ लक्षणों को उत्पन्न करते हैं।
यथा—प्रकृतिभूत स्वस्थरूप में रहकर शुभ लक्षणों को, यथा—उपचय (शरीर
की पुष्टि), बल-कान्ति की वृद्धि, वर्ण (कान्ति) की उज्ज्वलता और विकृत
(कुपित रूप) अशुभ लक्षणों (रोगों) को उत्पन्न करते हैं। विकार (रोग)
दो प्रकार के हैं—सामान्य और नानात्मज। सामान्य—वातादि दोष प्रत्येक
मिलकर जो रोग उत्पन्न करते हैं। नानात्मज—जब वातादि दोष परस्पर न
मिल कर स्वतन्त्ररूप से रोग उत्पन्न करते हैं। इनमें सामान्यज रोग पहिले
‘अष्टोदरीय’ अध्याय में कह दिये हैं और नानात्मज रोगों का इस अध्याय में
वर्णन करेंगे। यथा—अस्सी प्रकार के वात रोग, चालीस प्रकार के पित्तरोग और
बीस प्रकार के कफ रोग हैं ॥ ३-१० ॥
तत्राऽऽदौ वातविकाराननुव्याख्यास्यामः, तद्यथा—नखभेदश्च,
विपादिका च, पादशूलं च, पादभ्रंशश्च, पादसुप्तता च, वातखुड्डता च,

१ प्राण अपान भेद से वायु के स्थान अन्यत्र कहेंगे। यहां पर बताये हुए
स्थानों में इन दोषों के विकार प्रायः करके होते हैं, अतः इनकी गणना की है।
२ आमाशय के ऊर्ध्वभाग में पित्त और अधोभाग में कफ का स्थान है।

२४० चरकसंहिता [ अ० २०
गुल्फग्रहश्च, पिण्डिकोद्वेष्टनं च, गृध्रसी च, जानुभेदश्च, जानुविश्लेषश्च,
ऊरुस्तम्भश्च, ऊरुसादश्च, पाङ्गुल्यं च, गुदभ्रंशश्च, गुदार्तिश्च, वृषणोत्क्षे-
पञ्च, शेफःस्तम्भश्च, वङ्क्षणानाहश्च, श्रोणिभेदश्च, विड्भेदश्च,
उदावर्तश्च, खञ्जत्वं च, [कुब्जत्वं च,] वामनत्वं च, त्रिकग्रहश्च,
पृष्ठग्रहश्च, पार्श्वावमर्दश्च, उदरावेष्टश्च, हृन्मोहश्च, हृद्द्रवश्च, वक्ष-
उद्धर्षश्च, वक्षउपरोधश्च, (वक्षस्तोदश्च,) बाहुशोषश्च ग्रीवास्तम्भश्च,
मन्यास्तम्भश्च, कण्ठोद्ध्वंसश्च, हनुस्तम्भश्च, ओष्ठभेदश्च, (अक्षिभेदश्च,)
दन्तभेदश्च, दन्तशैथिल्यं च, मूकत्वं च (गद्गदत्वं च,) वाक्सङ्गश्च,
कषायास्यता च, मुखशोषश्च, अरसज्ञता च, [अगन्धज्ञता च, घ्राण-
नाशश्च,] कर्णशूलं च, अशब्दश्रवणं च, उच्चैःश्रुतिश्च, बाधिर्यं च,
वर्त्मस्तम्भश्च, वर्त्मसंकोचश्च, तिमिरं च, अक्षिशूलं च, अक्षिव्युदासश्च,
भ्रूव्युदासश्च, शङ्खभेदश्च, ललाटभेदश्च, शिरोरुक् च, केशभूमिस्र्फुटनं
च, अर्दितं च, एकाङ्गरोगश्च, सर्वाङ्गरोगश्च, [पक्षवधश्च,] आक्षेपकश्च
दण्डकश्च, श्रमश्च, भ्रमश्च, वेपथुश्च, जृम्भा च, विषादश्च, (हिक्का च),
अतिप्रलापश्च, ग्लानिश्च, रौक्ष्यं च, पारुष्यं च, श्यावारुणावभासता
च, अस्वप्नश्च, अनवस्थितत्वं चेत्यशीतिर्वातविकारा वातविकाराणा-
मपरिसंख्येयानामाविष्कृततमा व्याख्याताः ॥ ११ ॥
सबसे प्रथम वात रोगों को कहते हैं। यथा—नखों का टूटना, विपादिका
(पांव का फटना ), पादशूल (पांव की वेदना ), पादभ्रंश, पादसुप्तता (पांव
का सोना, ज्ञानशून्यता ), वातलक्षुका, गुल्फग्रह; पिण्डिकोद्वेष्टन (पिण्डलियों
में ऐंठन ), गृध्रसी, जानुभेद और जानु विश्लेष, ऊरुस्तम्भ, ऊरुसाद, पंगुता,
गुदभ्रंश, गुदार्ति, वृषणोत्क्षेप (अंडकोश का ऊपर खींचना ) शेफस्तम्भ ( शिश्न
में अकड़ाहट रहना ), वंक्षण में आनाह, श्रोणिभेद ( नितम्बों का फटना ),
विड्भेद (मलभेद ), उदावर्त्त, खञ्जत्व (लंगड़ापन ), कुब्जत्व (कुबड़ापन ),
वामनत्व (नाटापन ), त्रिकग्रह, पृष्ठग्रह. पार्श्वावमर्द (पसलियों की पीड़ा),
उदरावेष्टन (पेट में ऐंठन ), हृन्मोह (हृदय की मूर्छा ), हृद्द्रव (हृदय का
द्रवित या धड़कन अधिक होना ) वक्षःउद्धर्ष (छाती में पीड़ा ), वक्षोपरोध
(छाती का रुकजाना ), बाहुशोष (भुजा का सूखना ), ग्रीवास्तम्भ (ग्रीवा
का अकड़ना ), मन्यास्तम्भ (घाड़ की अकड़ाहट ), कण्ठोद्ध्वंस (स्वरभंग ),
हनुस्तम्भ (मुख का, जबड़ों का खुला रहना ), ओष्ठभेद (ओष्ठ की विदीर्णता)
दन्तभेद (दांतों का टूटना ), दन्तशैथिल्य (दांतों की शिथिलता ), मूकत्व
(गूंगापन ), वाक्संङ्ग (वाणी का रुकना ), मुख का कसैलापन, मुख की

शुष्कता, स्वाद का ज्ञान न होना, गन्धज्ञान का अभाव, घ्राणशक्ति का अभाव,
घ्राणशक्ति का नाश होना, कान में वेदना, शब्द का सुनाई न देना, ऊंचा
सुनाई देना, बहरापन, पलकों का स्तम्भ, पलकों का संकुचित होना, शंख,
कनपटी का फटना, माथे का फटना, शिरोवेदना, बालों की भूमि का फटना,
अर्दित वात, एकांग रोग, सर्वांग रोग, पक्षवध (पक्षाघात) आक्षेपक,
दण्डपतानक, थकान, चक्कर आना, कम्पन, जम्भाई, विषाद, चिन्ता, बहुत
प्रलाप, ग्लानि, रूक्षता, कर्कशता, लाल-लाल रङ्ग की चमक, नींद का न आना,
तिमिर (काच रोग), आँख में वेदना, आंख का पलटना, भुवों का संकुचित
होना और चित्त की अनवस्थितता, चंचलता (अस्थिरता) ये अस्सी वात
विकार हैं। वात विकार असंख्य हैं—यहाँ पर प्रधान प्रधान वात रोगों की
गणना की है ॥ ११ ॥
सर्वेष्वपि खल्वेतेषु वातविकारेषूक्तेष्वन्येषु चानुक्तेषु वायोरिद-
मात्मरूपमपरिणामि कर्मणश्च स्वलक्षणं, यदुपलभ्य तदवयवं वा
विमुक्तसंदेहा वातविकारमेवाध्यवस्यन्ति कुशलाः, तद्यथा—रौक्ष्यं
लाघवं वैशद्यं शैत्यं गतिरमूर्तत्वं चेति वायोरात्मरूपाणि, एवंविधत्वाच्च
कर्मणः स्वलक्षणमिदमस्य भवति तं तं शरीरावयवमाविशतः, तद्यथा—
स्रंस-भ्रंश-व्यासङ्ग-भेद-साद-हर्ष-तर्ष-वर्त-मर्द-कम्प-चाल-तोद-व्यथा-चे-
ष्टादीनि, तथा खर-परुष-विशद-सुषिर तारुण-कषाय-विरस-मुखशोष-
शूल-सुप्ति-संकोचन-स्तम्भन-खञ्जनादीनि च वायोः कर्माणि, तैरन्वितं
वातविकारमेवाध्यवस्येत् ॥ १२ ॥
तं मधुराम्ल-लवण-स्निग्धोष्णैरुपक्रमेत स्नेहस्वेदास्थापनानुवास-
ननस्तःकर्मभोजनाभ्यङ्गोत्सादन-परिषेकादिभिर्वातहरेर्मात्रां कालं च
प्रमाणीकृत्य; आस्थापनमनुवासनं तु खलु सर्वोपक्रमेभ्यो वाते प्रधान-
तमं मन्यन्ते भिषजः, तद्ध्यादित एव पक्वाशयमनुप्रविश्य केवलं
वैकारिकं वातमूलं छिनत्ति, तत्रावजिते वातेऽपि शरीरान्तर्गता वात-
विकाराः प्रशान्तिमापद्यन्ते, यथा वनस्पतेर्मूले छिन्ने स्कन्धशाखावरोह-
कुसुमफलपलाशादीनां नियतो विनाशस्तद्वत् ॥ १३ ॥
इन सब यहां पर कहे या न कहे हुए वातविकारों में वायु के अपने
स्वाभाविक (अन्य उपाधि से न हुए) कर्मों से, तथा अपने लक्षणों से वायु
को पहिचान कर वात के एक भाग को देखकर सन्देह रहित होकर कुशल
चिकित्सक बात रोग ही है ऐसा पहिचानते हैं। वे ये हैं यथा-रूक्षता, लघुता

२४२ चरकसंहिता [ अ० २०

(हल्कापन) विशदता, शीतलता, गति, अमूर्त्तत्व (अदृश्यत्व), ये वायु के स्वरूप हैं।
वायु के कर्मों से पहिचान-शरीर के जिस जिस अवयव में वायु आश्रय लेतो है,
वहां पर संस (खिसकना), भ्रंश (दूर खिसकना), विस्तार, अवसन्नता, हर्ष, प्यास,
मर्दन की पीड़ा, आवर्त्तन, हिलने की चुभने की पीड़ा, चेष्टा आदि कम्पन, कर्कशता,
कठोरता, पृथक्करण, छेद करना, लाल रंग, कषाय रस, मुख की विरसता,
मुख का शुष्क होना, दर्द, शून्यता, संकोच, स्तम्भन, खञ्जत्व ( लंगड़ापन )
आदि वायु के काम हैं। इन लक्षणों वाले को वातरोग ही जानना चाहिये।
इस वायु की मधुर, अम्ल, लवण, स्निग्ध, उष्ण क्रियाओं से चिकित्सा करनी
चाहिये। स्नेहन, स्वेदन, आस्थापन, अनुवासन, नस्य कर्म, भोजन, मर्दन,
उबटन लगाना, परिषेक-स्नान आदि वातनाशक कमों को मात्रा और काल का
विचार करके प्रयोग करना चाहिये। इन सब कर्मों में वैद्य लोग आस्थापन और
अनुवासन (बस्ति) को ही सब से श्रेष्ठ उपाय वायु के लिये मानते हैं। यह
शीघ्रता से पक्वाशय में पहुंचकर सम्पूर्ण रोगों को उत्पन्न करने वाले वायु को
जड़ से नष्ट कर देती है। ऐसी अवस्था में वायु के पूर्ण शान्त न होने पर भी
शरीर के अन्दर के वायुरोग शान्त हो जाते हैं, जैसे--वनस्पतियों के जड़ के
कट जाने पर लता, शाखा, अंकुर, फल, फूल पत्ते आदि का नाश
अवश्यंभावी है ॥ १२-१३ ॥
पित्तविकाराश्चत्वारिंशदत ऊर्ध्वं व्याख्यास्यन्ते; तद्यथा- ओषश्च,
प्लोषश्च, दाहश्च, दवथुश्च, धूमकश्च, अम्लकाश्च, विदाहश्च, अन्तर्दाहश्च,
[ अङ्गदाहश्च ], ऊष्माधिक्यं च, अतिस्वेदश्च, [ अङ्गस्वेदश्च, ] अङ्ग-
गन्धश्च, अङ्गावदरणं च, शोणितक्लेदश्च, मांसक्लेदश्च, त्वग्दाहश्च,
मांसदाहश्च, त्वगवदरणं च, चर्मावदरणं च, रक्तकोठाश्च, (रक्तविस्फो-
टाश्च,) रक्तपित्तं च, रक्तमण्डलानि च, हरितत्वं च, हारिद्रत्वं च,
नीलिका च, कक्षा च, कामला च, तिक्तास्यता च, ( लोहितगन्धास्यता
च,) पूतिमुखता च, तृष्णाया आधिक्यं च, अतृप्तिश्च. आस्यपाकश्च,
गलपाकश्च, अक्षिपाकश्च, गुदपाकश्च, मेढ्रपाकश्च, जीवादानं च, तमः-
प्रवेशश्च, हरित-हारिद्र-मूत्र-नेत्र-वर्चस्त्वं चेति चत्वारिंशत्पित्तविकाराः
पित्तविकाराणामपरिसंख्येयानामाविष्कृततमा व्याख्याता भवन्ति ॥१४॥
इसके आगे पित्तजन्य, विकारों की व्याख्या करते हैं-पित्त विकार-ओष
(पास में रखी अग्नि की आंच ), प्लोष (जलने के समान जलन), दाह
(जलना), दवथु (सब अंगों में जलने के समान धक्-धक् होना), धूमक (धूंयें
जैसा वमन आना), खट्टाश, जलन, शरीर के अन्दर दाह, अंगों में दाह, गरमी

अ० २० ] सूत्रस्थानम् २४३

अ० २० ] सूत्रस्थानम् २४३
की अधिकता, पसीने का अधिक आना, अंगों (बगल आदि) में पसीना आना,
अंगों से दुर्गन्ध आना, अंगों का फटना, रक्त में क्लिन्नता ( बदबू ) आना,
मांस की क्लिन्नता, त्वचा का जलना, मांस की जलन, त्वचा और मांस का
फटना, त्वचा के ऊपर के चर्म का फटना, लाल-लाल फुन्सियां (बर्रे के काटे
के समान ), रक्तपित्त (रक्तस्राव ), लाल-लाल धब्बे चकत्ते, हरा रंग हल्दी का
सा पीला रंग, नीलिका (झाई ), कक्ष्या ( बगल का मांस फटना ), कामला
मुख की कटुता, मुख से दुर्गन्ध आना, प्यास का अधिक लगना, भोजन में
अतृप्ति, मुख का पकना, गले का पकना, आंख का पकना, गुदा का पकना
शिश्न का पकना, प्राणों का नाश, और आंखों के सामने अन्धेरा रहना, मल-
मूत्र और आंख का हरा या पीला होना, ये चालीस पित्तजन्य रोग हैं। पित्त
विकार असंख्य हैं, यहां पर मुख्य रोगों की गणना की गई है ॥ १४ ॥
सर्वेष्वपि खल्वेतेषु पित्तविकारेष्वन्येषु चानुक्तेषु पित्तस्येदमात्मरूप-
मपरिणामि कर्मणश्च स्वलक्षणं, यदुपलभ्य तदवयवं वा विमुक्तसंदेहाः
पित्तविकारमेवाध्यवस्यन्ति कुशलाः । तद्यथा-औष्ण्यं तैक्ष्ण्यं लाघवम-
नतिस्नेहो वर्णश्च शुक्लारुणवर्जो गन्धश्च विस्रो रसौ च कटुकाम्लौ
पित्तस्याऽऽत्मरूपाणि, एवंविधत्वाच्च कर्मणः स्वलक्षणमिदमस्य भवति ।
तं तं शरीरावयवमाविशतः । तद्यथा-दाहौष्ण्यपाक-स्वेद-क्लेद-कोथ-
स्राव-रागा यथास्वं च गन्ध-वर्ण-रसाभिनिर्वर्तनं पित्तस्य कर्माणि, तैरन्वितं
पित्तविकारमेवाध्यवस्येत् ॥ १५ ॥
तं मधुर-तिक्त-कषाय-शीतैरुपक्रमैरुपक्रमेत स्नेह-विरेचन-प्रदेह-परि-
षेकाभ्यङ्गावगाहादिभिः पित्तहरैर्मात्रां कालं च प्रमाणीकृत्य, विरेचनं
तु सर्वोपक्रमेभ्यः पित्ते प्रधानतमं मन्यन्ते भिषजः, तद्ध्यादित एवाऽऽ-
माशयमनुप्रविश्य केवलं वैकारिकं पित्तमूलं चापकर्षति, तत्रावजिते
पित्तेऽपि शरीरान्तर्गताः पित्तविकाराः प्रशान्तिमापद्यन्ते, यथाऽग्नौ व्य-
पोढे केवलमग्निगृहं शीतीभवति तद्वत् ॥ १६ ॥
इन सब यहां कहे या नहीं कहे हुए पित्त विकारों को या उसके एक भाग
को स्वाभाविक रूप से ( किसी दूसरे दोष से न मिला होने पर ), कार्यों, एवं
पित्त के लक्षणों से पहिचानकर कुशल वैद्य लोग पित्त रोग ही है, ऐसा निश्चय
करते हैं। यथा गरमी, तीक्ष्णता, लघुता, चिकनास की अधिकता न होना,
सफेद और काले-लाल रंग को छोड़कर अन्यरंग, सड़ान्द (दुर्गन्ध युक्त )
कटु और खट्टा रस होना ये पित्त के लक्षण हैं। निम्न प्रकार के कर्मों से पित्त की
पहिचान होती है शरीर के जिस जिस अवयव में पित्त आश्रय लेता है, वहां कह

पर दाह, गरमी, पाक ( पकना ), पसीना, क्लिन्नता, सडांद, खज, स्राव, रंग
तथा पित्त के समान गन्ध, वर्ण और रस की उत्पत्ति होना ये पित्त के कर्म हैं ।
इन कार्यों से युक्त रोग को पित्त का विकार जानना चाहिये । इस पित्त को
शान्त करने के लिए मधुर, तिक्त, कषाय, शीत उपक्रमों से चिकित्सा करनी
चाहिये । पित्त नाशक स्नेह, विरेचन, प्रदेह, स्नान, मर्दन आदि कार्यों को
मात्रा एवं समय को देखकर प्रयोग करना चाहिये । पित्त को शान्त करने के
लिए वैद्य लोग विरेचन को ही सब से मुख्य साधन मानते हैं । यह जल्दी ही
आमाशय में प्रविष्ट होकर सम्पूर्ण पित्तविकार को जड़ से बाहर निकाल देता है ।
ऐसी अवस्था में पित्त के सम्पूर्ण शान्त न होने पर भी शरीरस्थ पित्तरोग ऐसे
ही शान्त हो जाते हैं जिस प्रकार की भट्टी से आग निकाल लेने पर भट्टी अपने
आप ठण्डी हो जाती है ॥ १६ ॥
श्लेष्मविकारांश्च विंशतिमत ऊर्ध्वं व्याख्यास्यामः, तद्यथा-
तृप्तिश्च, तन्द्रा च, निद्राया आधिक्यं च, स्तैमित्यं च, गुरुगात्रता च,
आलस्यं च, मुखमाधुर्यं च, मुखस्रावश्च, श्लेष्मोद्गिरणं च, मलस्याऽऽ-
धिक्यं च, कण्ठोपलेपश्च, बलासश्च हृदयोपलेपश्च, धमनी-प्रतिचयश्च,
गलगण्डश्च, अतिस्थौल्यं च, शीताग्निता च, उददर्दश्च, श्वेतावभासता
च, श्वेत-मूत्र-नेत्र-वर्चस्त्वं चेति विंशतिः श्लेष्मविकाराः श्लेष्मविका-
राणामपरिसंख्येयानामाविष्कृततमा व्याख्याताः ॥१७॥
कफजन्यरोग बीस हैं । उन का कहते हैं यथा-भोजन न करने पर भी
तृप्ति का अनुभव, तन्द्रा, नींद का अधिक आना, स्तैमित्य ( शरीर का गीले
वस्त्र से ढंपा प्रतीत होना ), शरीर का भारीपन, आलस्य आना, मुख की
मिठास, मुख से लाला बहना, कफ का वमन, शरीर से मल का अधिक निक-
लना, कफ का क्षय, हृदय का भरा रहना, कण्ठ का भरा रहना, धमनियों
का अवरोध, गलगण्ड, अतिस्थूल, मन्दाग्नि, उददर्द ( छपाकी ), श्वेत रंग
की प्रतीति, मूत्र मल और नेत्र में सफेदी, ये बीस कफजन्य रोग हैं । कफजन्य
विकार असंख्य हैं, परन्तु यहां पर प्रधान रोगों की गणना की है ॥१७॥
सर्वेष्वपि तु खल्वेतेषु श्लेष्मविकारेष्वन्येषु चानुक्तेषु श्लेष्मण इद-
मात्मरूपमपरिणामि कर्मणश्च स्वलक्षणं, यदुपलभ्य तदवयवं वा विमु-
क्तसंदेहाः श्लेष्मविकारमेवाध्यवस्यन्ति कुशलाः, तद्यथा-श्वैत्य-शैत्य-
स्नेह-गौरव-माधुर्य-मात्स्न्यानि श्लेष्मण आत्मरूपाणि, एवंविधत्वाच्च
कर्मणः स्वलक्षणमिदमस्य भवति तं तं शरीरावयवमाविशतः, तद्यथा-
श्वैत्य-शैत्य-कण्डू-स्थैर्य-गौरव-स्नेह-स्तम्भ-सुप्ति-क्लेदोपदेह-बन्ध-माधुर्य-

अ० २० ] सूत्रस्थानम् २४५

अ० २० ] सूत्रस्थानम् २४५
चिरकारित्वानि श्लेष्मणः कर्माणि, तैरन्वितं श्लेष्मविकारमेवाध्यव-
स्येत् ॥ १८ ॥
तं कटुक-तिक्त-कषाय-तीक्ष्णोष्ण-रूक्षैरुपक्रमैरुपक्रमेत स्वेदन-वमन-
शिरोविरेचन-व्यायामादिभिः श्लेष्महरैर्मात्रां कालं च प्रमाणीकृत्य, वमनं
तु सर्वोपक्रमेभ्यः श्लेष्मणि प्रधानतमं मन्यन्ते भिषजः, तद्ध्यादित
एवाऽऽमाशयमनुप्रविश्य केवलं वैकारिकं श्लेष्ममूलमपकर्षति, तन्नाव-
जिते श्लेष्मण्यपि शरीरान्तर्गताः श्लेष्मविकाराः प्रशान्तिमापद्यन्ते,
यथा—भिन्ने केदारसेतौ शालि-यव-षष्टिकादीन्यभिष्यन्दमानान्यम्भसा
प्रशोषमापद्यन्ते तद्वदिति ॥ १६ ॥
इन सब कफ की विकारों में कहे हुए या नहीं कहे हुए रोगों को या उसके
एक भाग को कफ के अपने स्वाभाविक रूप से, कार्यों से, लक्षणों से पहिचान
कर कुशल पुरुष सन्देहरहित होकर श्लेष्मविकार ही हैं ऐसा निश्चय करते हैं।
यथा चिकास, शीतलता, सफेदी, भारीपन, मधुरता, मसृणता (पिच्छलता),
ये कफ के रूप हैं। निम्न प्रकार के कार्यों से कफ की पहिचान होती है—
शरीर के अवयवों में प्रविष्ट होकर कफ सफेदी, शीतलता, खाज, स्थिरता,
भारीपन, चिकास, जड़ता, निष्क्रियता, क्लिन्नता, चिकनापन, अवरोध, मधुरता,
देर में कार्य करना ये कफ के कार्य हैं। इनके द्वारा कफ रोग को जानना
चाहिये। इस कफ को शान्त करने के लिये कटु, तिक्त, कषाय, तीक्ष्ण, गरम
और रूक्ष उपक्रमणों से चिकित्सा करनी चाहिये। मात्रा और समय के अनुसार
स्वेद, वमन, शिरोविरेचन, व्यायाम आदि श्लेष्मनाशक कार्यों का प्रयोग करे।
कफ को शान्त करने के लिये वैद्य वमन को ही सब से उत्तम साधन मानते हैं।
वमन जल्दी से आमाशय में पहुंच कर सम्पूर्ण वैकारिक कफ को जड़ समेत
बाहर कर देता है। इस कफ के पूर्ण रूप से शान्त न होने पर भी शरीर के
अन्दर के कफरोग शान्त हो जाते हैं। जिस प्रकार कि धान्य, जौ, सांठी पानी
से भरे होने पर खेत की मेंट के टूटने पर पानी से खुश्क हो जाते हैं, (सूख
जाते हैं), इसी प्रकार कफ के निकलने से रोग भी नष्ट होजाते हैं ॥ १८-१६॥
भवन्ति चात्र—रोगमादौ परीक्षेत ततोऽनन्तरमौषधम् ।
ततः कर्म भिषक्पश्चाज्ज्ञानपूर्वं समाचरेत् ॥ २० ॥
यस्तु रोगमविज्ञाय कर्माण्यरभते भिषक् ।
अप्यौषधविधानज्ञस्तस्य सिद्धिर्यदृच्छया ॥ २१ ॥
यस्तु रोगविशेषज्ञः सर्व-भैषज्य-कोविदः ।
देश-काल-प्रमाण-ज्ञस्तस्य सिद्धिरसंशयम् ॥ २२ ॥

२४६ चरकसंहिता [ अ० २१
सब से प्रथम रोग की परीक्षा करनी चाहिये, उसके पीछे औषध की परीक्षा,
इसके अनन्तर वैद्य ज्ञानपूर्वक चिकित्सा का आरम्भ करे। जो वैद्य, रोग की
परीक्षा द्वारा निश्चय किये बिना चिकित्सा कर्म आरम्भ कर देता है, भले ही
वह वैद्य औषधि के विधान को जानता हो, तो भी उसकी सफलता निश्चित
नहीं ( कभी हो जाती है, और कभी नहीं)। जो वैद्य रोगों को भली प्रकार
जानता है, इसी प्रकार औषधियों को भी जानता है, साथ में देश, काल और
प्रमाण को भी समझता है, उसकी सफलता निश्चित, अवश्यम्भावी है ॥२०-२२॥
तत्र श्लोकाः—संग्रहः प्रकृतिर्देशो विकारमुखमीरणम् ।
असंदेहोऽनुबन्धश्च रोगाणां संप्रकाशितः ॥ २३ ॥
दोषस्थानानि रोगाणां गणा नानात्मजाश्च ये ।
रूपं पृथक्त्वादोषाणां कर्म चापरिणामि यत् ॥ २४ ॥
पृथक्त्वेन च दोषाणां निर्दिष्टाः समुपक्रमाः ।
सम्यङ् महति रोगाणामध्याये तत्त्वदर्शिना ॥ २५ ॥
रोगों की संक्षिप्त संख्या, इनके स्थान और इनके साक्षात् अथवा प्रेरक
कारण, असन्देह, और अनुबन्ध, दोषों के स्थान, नानाप्रकार के रोगों की
गणना, दोषों के पृथक् पृथक् रूप, और स्वाभाविक कर्म, दोषों के पृथक्
पृथक् शान्ति के उपाय, इस महारोग अध्याय में तत्त्वदर्शि पुनर्वसु ने कह
दिये हैं ॥२३-२४॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने रोगचतुष्के
महारोगाध्यायो नाम विंशोऽध्यायः ॥ २० ॥
एकविंशोऽध्यायः ।
अथातोऽष्टौनिन्दितीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
इसके आगे 'अष्टौनिन्दितीय' नामक अध्याय का व्याख्यान करेंगे जैसा
भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ २ ॥
इह खलु शरीरमधिकृत्याष्टौ पुरुषा निन्दिता भवन्ति; तद्यथा—
अतिदीर्घश्चातिह्रस्वश्चाविलोमा चालोमा चातिकृष्णश्चातिगौरश्चातिस्थू-
लश्चातिकृशश्चेति ॥ ३ ॥
इस लोक में शरीर के सम्बन्ध में ( मन के सम्बन्ध में अधार्मिक आदि
इन से भिन्न हैं ) आठ पुरुष निन्दित माने जाते हैं । यथा १. अतिदीर्घ २.

अ० २१ ] सूत्रस्थानम् २४७

अ० २१ ] सूत्रस्थानम् २४७
अतिह्रस्व, ३. अतिलोमा ( बहुत बालों वाला ), ४. अलोमा ( एक दम बाल
रहित ) ५. अतिकृष्ण ( बहुत काला ) ६. अतिगौर, ७. अतिस्थूल ( बहुत
मोटा ) और ८. अतिकृश ( बहुत पतला ) ॥ ३ ॥
तत्रातिस्थूलकृशयोर्भूय एवापरे निन्दितविशेषा भवन्ति; अतिस्थूल-
स्य तावदायुषो ह्रासो जरोपरोधः कृच्छ्रव्यवायता .दौर्बल्यं दौर्गन्ध्यं
स्वेदाबाधः क्षुदतिमात्रं पिपासातियोगश्चेति भवन्त्यष्टौ दोषाः। तदति-
स्थौल्यमतिसंपूरणाद् गुरु-मधुर-शीत-स्निग्धोपयोगादव्यायामादव्यवा-
यादिवास्वप्नाद्धर्षनित्यत्वादचिन्तनाद् बीजस्वभावाच्चोपजायते। तस्या-
तिमात्रं मेदस्विनो मेद एवापचीयते न तथेतरे धातवः, तस्मादस्याऽऽयुषो
ह्रासः; शैथिल्यात् सौकुमार्याद् गुरुत्वाच्च मेदसां जरोपरोधः, शुक्रबहु-
त्वाद् मेदसाऽऽवृतमार्गत्वाच्च कृच्छ्रव्यवायता, दौर्बल्यमसमत्वाद्धातूनां,
दौर्गन्ध्यं मेदोदोषान्मेदसः स्वभावोत्स्वेदलत्वाच्च, मेदसः श्लेष्मसंस-
र्गाद्विष्यन्दित्वाद् बहुत्वान्द्व्यायामासहत्वाच्च स्वेदाबाधः, तीक्ष्णाग्नि-
त्वात्प्रभूतकोष्ठवायुत्वाच्च क्षुदतिमात्रं पिपासातियोगश्चेति ॥ ४ ॥
इन आठों पुरुषों में भी अतिस्थूल और अतिकृश ये दोनों पुरुष विशेष
रूप से निन्दित हैं। इनमें अतिस्थूल पुरुष की आयु छोटी होती है, उसे बुढ़ापे
जल्दी आ घेरता है, मैथुन में कठिनता, निर्बलता, शरीर में दुर्गन्ध, पसीना
बहुत आता है, भूख और प्यास खूब अधिक लगती है, ये आठ दोष होते हैं।
यह अतिस्थूलता अधिक भोजन करने से, गुरु, मधुर, शीत, स्निग्ध पदार्थों के
सेवन से, व्यायाम न करने से, सम्भोग न करने से, दिन में सोने से, नित्य खुश
( बेफ़िक्र ) रहने से, चिन्ता न करने से, माता पिता के स्थूल होने से उत्पन्न
होती है। अतिस्थूल पुरुष के शरीर में मेद के बढ़े होने पर आगे मेद ही बढ़ता
जाता है और अन्य धातु नहीं बढ़ते। इसलिये ( विषम धातु होने से ) आयु
छोटी होती है, मेद के शिथिल, सुकुमार और भारी होने से बुढ़ापे का जल्दी
आना, शुक्र के कम होने से, मेद के द्वारा शुक्र बाह्य स्रोतों के रुक जाने से
मैथुन में कठिनाई; धातुओं के विषम होने से दुर्बलता, मेद के दोष से, मेद के
स्वभाव से तथा पसीने के अधिक आने से दुर्गन्ध, मेद के श्लेष्मा के साथ
मिलने से, सड़ने से, बहुत होने से, भारी होने से और परिश्रम को न सह सकने
के कारण पसीने का बहुत आना, अग्नि के प्रबल होने से और कोष्ठ में वायु
की अधिकता से भूख अधिक और बहुत प्यास लगती है ॥ ४ ॥
भवन्ति चात्र—मेदसाऽऽवृतमार्गत्वाद्वायुः कोष्ठे विशेषतः ।
चरन् संधुक्षयत्यग्निमाहारं शोषयत्यपि ॥ ५ ॥

७८ चरकसंहिता [अ० २१
तस्मात्स शीघ्रं जरयत्याहारं चातिकाङ्क्षति ।
विकारांश्चाश्नुते घोरान् कांश्चित्कालव्यतिक्रमात् ॥६॥
एतावुषद्रवकरौ विशेषादग्निमारुतौ ।
एतौ हि दहतः स्थूलं वनदावो वनं यथा ॥ ७ ॥
मेदस्यतीव संवृद्धे सहसैवानिलादयः ।
विकारान् दारुणान् कृत्वा नाशयन्त्याशु जीवितम् ॥ ८ ॥
मेदोमांसातिवृद्धत्वाच्चलस्फिगुदरस्तनः ।
अयथोपचयोत्साहो नरोऽतिस्थूल उच्यते ॥ ६ ॥
इति मेदस्विनो दोषा हेतवो रूपमेव च ।
निर्दिष्टं, वक्ष्यते वाच्यमतिकार्श्येऽप्यतः परम् ॥ १० ॥
मेद के द्वारा स्रोतों के रुक जाने पर वायु कोष्ठ का आश्रय लेकर गति
करता है, इससे अग्नि को बढ़ाता ( तेज करता है ) है, और भोजन को शुष्क
करता है। इसलिये अग्नि आहार को शीघ्र जीर्ण कर देती है और अन्य
आहार को चाहती है। आहार काल के अतिक्रमण होने से भयानक रोगों को
उत्पन्न करती है। ये अग्नि और वायु विशेष रूप से उपद्रव करने वाले हैं।
जिस प्रकार की जंगल की आग बन को जला देती है, उसी प्रकार ये वायु
और अग्नि मोटे व्यक्ति को जला देते हैं। मेद के बहुत बढ़ने पर एक दम से
वायु, पित्त, कफ, भयानक रोगों को उत्पन्न करके जीवन का नाश शीघ्रता से
कर देते हैं। मेद के अति बढ़ने से मनुष्य के नितम्ब, उदर और स्तन थल-थल
करने लगते हैं। शरीर का आकार और उत्साह शक्ति नष्ट हो जाते हैं। ऐसे
पुरुष को अतिस्थूल कहते हैं। ये मेदस्वी पुरुष के दोष, कारण और लक्षण
कह दिये इसके आगे अतिकृश व्यक्ति के लक्षण कहते हैं ॥ ५-१० ॥
सेवा-रूक्षान्न-पानानां लङ्घनं प्रमिताशनम् ।
क्रियातियोगः शोकश्च वेग-निद्रा-विनिग्रहः ॥११॥
रूक्षस्योद्वर्तनं स्नानमभ्यासः प्रकृतिर्जरा ।
विकारानुशयः क्रोधः कुर्वन्त्यतिकृशं नरम् ॥१२॥
व्यायाममतिसौहित्यं क्षुत्पिपासामहौषधम् ।
कृशो न सहते तद्वदतिशीतोष्णमैथुनम् ॥ १३ ॥
प्लीहा कासः क्षयः श्वासो गुल्मार्शांस्युदराणि च ।
कृशं प्रायोऽभिधावन्ति रोगाश्च ग्रहणीगताः ॥१४॥
शुष्क-स्फिगुदर-ग्रीवो धमनी-जाल-सन्ततः ।

अ० २१ ] सूत्रस्थानम २५६

अ० २१ ] सूत्रस्थानम २५६
त्वगस्थिशेषोऽतिकृशः स्थूलपर्वा नरो मतः ॥१५॥
सततव्याधितावेतावतिस्थूलकृशौ नरौ ।
सततं चोपचर्यौ हि कर्षणैर्बृंहणैरपि ॥१६॥
स्थौल्यकार्श्ये वरं कार्श्यं समोपकरणौ हि तौ ।
यद्युभौ व्याधिरागच्छेत्स्थूलमेवातिपीडयेत् ॥१७॥
रूक्ष खान पान के सेवन से, उपवास से थोड़ा खाने से, स्नेहन,
स्वेदन वमन, विरेचन आदि क्रियाओं के अतियोग से, शोक से, मल-मूत्र
के उपस्थित वेगों को अथवा नींद के उपस्थित वेग को रोकने से, स्नेह
मर्दन किये बिना उबटन लगाकर स्नान ( नित्य प्रति ) करने से, स्वभाव
से, बुढ़ापे से, रोगों के कारण ( रोग की कमजोरी में ) उत्पन्न कमजोरी
में, मिथ्याहार-विहार से, क्रोध से पुरुष बहुत कृश हो जाता है। परिश्रम,
अतिशय पेट भर के खाना, भूख, प्यास और बलवान् औषध, बहुत
सर्दी, बहुत गरमी और मैथुन इनको कृश पुरुष सहन नहीं कर सकता। प्लीहा
कास, क्षय, श्वास, गुल्म, अर्श, उदर-रोग, और ग्रहणी रोग ( आमाशय आंत्र
रोग ) प्रायः करके कृश ( निर्बल ) पुरुष को शीघ्र चिपटते हैं। नितम्ब, उदर
और ग्रीवा शुष्क हो जाते हैं, शरीर पर धमनियों के जाल दीखने लगते हैं,
त्वचा और अस्थियों का ही ढांचा बन जाता है, ग्रन्थियां मोटी-मोटी हो जाती हैं,
ऐसे पुरुष को 'अतिकृश' कहते हैं। ये अतिस्थूल और अतिकृश पुरुष सदा
रोगी रहते हैं। इसलिए कर्षण से ( स्थूल की ) और बृंहण से ( कृश पुरुष की)
सदा परिचर्या करनी चाहिये। स्थूलता और कृशता में कृशता श्रेष्ठ है, क्योंकि
यदि दोनों को एक ही समान चिकित्सा से साध्य व्याधि हो जाय तो स्थूल पुरुष
ही अधिक पीड़ित होगा ( क्योंकि स्थूल पुरुष का यदि संतर्पण किया जाय तो
स्थूलता बढ़ती है, अपतर्पण करे तो वह सहन नहीं कर सकता, क्योंकि जाठराग्नि
बढ़ी होती है ) ॥११-१७॥
सम-मांस-प्रमाणस्तु समसंहननो नरः ।
दृढेन्द्रियत्वादू व्याधीनां न बलेनाभिभूयते ॥ १८ ॥
क्षुत्पिपासातपसहः शीत-व्यायाम-संस्सहः ।
समपक्ता समजरः सम-मांस-चयो मतः ॥ १६ ॥
जिस पुरुष की मांस पेशियां प्रमाण में उन्नत हैं और शरीर का संघटन
ठीक प्रकार से है, इन्द्रियां बलवती हैं, वह पुरुष रोगों के बल से भी हार नहीं
मानता। जो पुरुष भूख, प्यास, धूप का सहन कर सके, शीत, व्यायाम को

[Page Header: २५० चरकसंहिता [ अ० २१ ]

भली प्रकार सहन करले, न कम और न अधिक, भोजन को जीर्ण करने वाला
हो, जिसको बुढापा ठीक समीप पर आये, वह पुरुष समान उपचय अर्थात्
उचित शरीर की बनावट का होता है ॥ १८-१९ ॥
गुरु चातर्पणं चेष्टं स्थूलानां कर्षणं प्रति ।
कृशानां बृंहणार्थं च लघु संतर्पणं च यत् ॥ २० ॥
वातघ्नान्यन्नपानानि श्लेष्म-मेदो-हराणि च ।
रूक्षोष्णा बस्तयस्तीक्ष्णा रूक्षाण्युद्वर्तनानि च ॥ २१ ॥
गुडूची-भद्र-मुस्तानां प्रयोगस्त्रैफलस्तथा ।
तक्रारिष्टप्रयोगस्तु प्रयोगो माक्षिकस्य च ॥ २२ ॥
विडङ्गानागरं क्षारः काल-लोह-रजो मधु ।
यवामलकचूर्णं च प्रयोगः श्रेष्ठ उच्यते ॥ २३ ॥
बिल्वादिपञ्चमूलस्य प्रयोगः क्षौद्रसंयुतः ।
शिलाजतुप्रयोगस्तु साग्निमन्थरसः परः ॥ २४ ॥
प्रशातिका प्रियङ्गुश्च श्यामाका यवका यवाः ।
जूर्णाह्वाः कोद्रवा मुद्गाः कुलत्थाश्चक्रमूद्रकाः ॥ २५ ॥
आढकीनां च बीजानि पटोलामलकैः सह ।
भोजनार्थं प्रयोज्यानि पानं चानु मधूदकम् ॥ २६ ॥
अरिष्टांश्चानुपानार्थे मेदो-मांस-कफापहान् ।
अतिस्थौल्यविनाशाय संविभज्य प्रयोजयेत् ॥ २७ ॥
प्रजागरं व्यवायं च व्यायामं चिन्तनानि च ।
स्थौल्यमिच्छन् परित्यक्तुं क्रमेणाभिप्रवर्धयेत् ॥ २८ ॥
स्थूल पुरुषों को कृश बनाने के लिये गुरु (भारी) और अपतर्पण क्रिया
(यथा शहद भारी होने से अग्नि को कम करता है और अपतर्पण होने से मेद
को कम करता है) उचित है। कृश पुरुषों को मोटा करने के लिये लघु एवं
सन्तर्पण क्रिया करनी चाहिये । अतिस्थूल की चिकित्सा —
वातनाशक खान पान, कफ और मेदनाशक आहार, रूखी एवं गरम
बस्तियां, तीक्ष्ण, रूक्ष उबटन का मलना, गिलोय, नागर मोथा, इनका, या
त्रिफला का क्वाथ देना, तक्रारिष्ट का प्रयोग अथवा मधु का उपयोग, बायबिडंग,
सोंठ, क्षार, कान्त लोह-भस्म को शहद के साथ, जौ और आंवले का चूर्ण,
इनका प्रयोग उत्तम है। बिल्व, अरणी, सोना पाठ, काश्मरी, पाटना इनके
क्वाथ में मधु प्रक्षेप करके पीना, अग्निमन्थ (अरणी) के रस के साथ शिलाजीत

अ० २१] सूत्रस्थानम् २५१

अ० २१] सूत्रस्थानम् २५१
का उपयोग, प्रशान्तिक (नीवार धान्य), प्रियंगु, श्यामाक (सांवाक), क्षुद्रजव,
जौ, कँगनी, कोदों धान्य, मूंग, कुलथी, जंगली मूंग, अरहर की दाल, परवल,
आंवला इनके साथ खाने के लिये देवे; और पीने के लिये पानी में शहद मिला
के देना चाहिये। अनुपान के लिये मेद, मांस और कफ को नष्ट करने वाले
अरिष्टों को अतिस्थूलता नाश करने के लिये प्रयोग करना चाहिये। स्थूलता
का नाश करने की इच्छा वाले पुरुष को, रात में जागना, मैथुन, परिश्रम
करना, चिन्ता करना इनको क्रम से शनैः शनैः बढ़ाना चाहिये ॥ २०-२८ ॥
स्वप्नो हर्षः सुखा शय्या मनसो निर्वृतिः शमः ।
चिन्ता-व्यवाय-व्यायाम-विरामः प्रियदर्शनम् ॥ २९ ॥
नवान्नानि नवं मद्यं ग्राम्यानूपौदका रसाः ।
संस्कृतानि च मांसानि दधि सर्पिः पयांसि च ॥ ३० ॥
इक्षवः शालयो मांसा गोधूमा गुडवैकृतम् ।
बस्तयः स्निग्धमधुरास्तैलाभ्यङ्गश्च सर्वदा ॥ ३१ ॥
स्निग्धमुद्वर्तनं स्नानं गन्धमाल्यनिषेवणम् ।
शुक्लवासो यथाकालं दोषाणामवसेचनम् ॥ ३२ ॥
रसायनानां वृष्याणां योगानामुपसेवनम् ।
हत्वाऽतिकार्श्यमादत्ते नृणामुपचयं परम् ॥ ३३ ॥
अचिन्तनाच्च कार्याणां ध्रुवं संतर्पणेन च ।
स्वप्नप्रसङ्गाच्च नरो वराह इव पुष्यति ॥ ३४ ॥
कृश रोग की चिकित्सा—रात में और दिन में सोना, सदा प्रसन्न रहना,
आराम, गद्देदार पलंग पर सोना, बैठना, मनकी बेफिकरी, शान्ति, चिन्ता न
करना, सम्भोग का न करना, श्रम न करना और इच्छित वस्तुओं का दर्शन,
नये अन्न, नया मद्य, ग्राम्य और जलचर प्राणियों के मांस का रस, संस्कृत
(अच्छी प्रकार बनाये) मांस, दही, घी और दूध, गन्ने, चावल (लाल चावल)
मांस, गेहूँ, गुड़ से बनी वस्तुएं, स्निग्ध और मधुर बस्तियां, सर्वदा तैल मर्दन
स्निग्ध उबटन, स्नान, सुगन्ध और माला का धारण करना, सफेद वस्त्र, समय समय
पर वातादि दोषों का बाहर निकालना, रसायन एवं वाजीकरण-योगों का सेवन
करने से कृशता दूर होकर पुष्टि, बल (मोटापा) आता है। कार्यों की चिन्ता
न करने (बेफिक्री) से, नित्य प्रति सन्तर्पण क्रिया द्वारा और रात दिन सोने
से मनुष्य सूअर की तरह पुष्ट हो जाता है ॥ २९-३४ ॥
यदा तु मनसि क्लान्ते कर्मात्मानः क्लमान्विताः ।

२५२ चरकसंहिता [ अ० २१
विषयेभ्यो निवर्तन्ते तदा स्वपिति मानवः ॥ ३५ ॥
निद्रायत्तं सुखं दुःखं पुष्टिः कार्श्यं बलाबलम् ।
वृषता क्लीबता ज्ञानमज्ञानं जीवितं न च ॥ ३६ ॥
अकालेऽतिप्रसङ्गाच्च न च निद्रा निषेविता ।
सुखायुषी पराकुर्यात्कालरात्रिरिवापरा ॥ ३७ ॥
सैव युक्ता पुनर्युङ्क्ते निद्रा देहं सुखायुषा ।
पुरुषं योगिनं सिद्ध्या सत्या बुद्धिरिवाऽऽगता ॥ ३८ ॥
गीताध्ययन-मद्य-स्त्री-कर्म-भाराध्व-कर्षिताः ।
अजीर्णिनः क्षताः क्षीणा वृद्धा बालास्तथाऽबलाः ॥ ३९ ॥
तृष्णातीसारशूलार्ताः श्वासिनो हिक्किनः कृशाः ।
पतिताभिहतोन्मत्ताः क्लान्ता यानप्रजागरैः ॥ ४० ॥
क्रोध-शोक-भय-क्लान्ता दिवास्वप्नोचिताश्च ये ।
सर्व एते दिवास्वप्नं सेवेरन् सार्वकालिकम् ॥ ४१ ॥
धातुसाम्यं तथा ह्येषां बलं चाप्युपजायते ।
श्लेष्मा पुष्णाति चाङ्गानि स्थैर्यं भवति चाऽऽयुषः ॥ ४२ ॥
जब मन से संयुक्त आत्मा निष्क्रिय हो जाती है, इन्द्रियां क्रियारहित हो
जाती हैं ( रूप, रसादि विषयों से हट जाती है ), तब पुरुष सो जाता है ।
यदि विधिपूर्वक नींद का सेवन किया जाय तो, सुख, शरीर की पुष्टि, बल,
पुरुषत्व ज्ञान और जीवन नींद के अधीन हैं और यदि निद्रा का विधि से सेवन
न किया जाय तो दुःख, कृशता, बलनाश, क्लीबता, अज्ञान, और मरण ये नींद
के अधीन हैं । इसलिये सुख चाहने वाले पुरुष को चाहिये कि दूसरी प्रलय
रात्रि के समान अकाल ( दिन में या सन्ध्याकाल में ) सोना, या बहुत सोना
छोड़ दे । ये नींद के मिथ्यायोग हैं । यदि निद्रा उचित रूप में सेवन की जाय
तो शरीर को सुख और आयु से ऐसे ही युक्त करती है जिस प्रकार योगी पुरुष
को सिद्धि से तत्त्वज्ञान प्राप्त होता है ।
गीत गाने से कृशपुरुष, पढ़ने से कृश, मद्यपान करने वाले स्त्री-सेवा
करने वाले, वमन विरेचनादि कर्म में, मार्ग चलने से कृश हुए, अतिसार आदि
से कृश, अजीर्ण रोगी, उरक्षत रोगी, क्षीण (जिनके रस रक्तादि धातु क्षीण) हों,
वृद्ध, बालक, स्त्रियां ( कमज़ोर ) तृणारोगी, शूल से पीड़ित, श्वास से कृश,
ऊपर से गिरे, चोट लगे हुए, उन्मत्त ( धतूरा आदि खाने से ), थके हुए,
सवारी करने से, रात में जागने से, क्रोध, शोक, भय से निष्क्रिय पुरुषों को दिन में
सोना उचित है । ये ऊपर लिखे पुरुष सब कालों में दिन में सो सकते हैं ।

दिन में सोने से इनके विषम धातु सम होते हैं, बल बढ़ता है, कफ अंगों को
पुष्ट करता है और आयु स्थिर होती है * ॥ ३५-४२ ॥
ग्रीष्मे चाऽऽदानरूक्षाणां वर्धमाने च मारुते ।
रात्रीणां चातिसङ्क्षेपाद्दिवास्वप्नः प्रशस्यते ॥ ४३ ॥
ग्रीष्मवर्ज्येषु कालेषु दिवास्वप्नात्प्रकुप्यतः ।
श्लेष्मपित्ते, दिवास्वप्नस्तस्मात्तेषु न शस्यते ॥ ४४ ॥
मेदस्विनः स्नेहहित्याः श्लेष्मलाः श्लेष्मरोगिणः ।
दूषीविषार्ताश्च दिवा न शयीरन् कदाचन ॥ ४५ ॥
हलीमकः शिरः शूलं स्तैमित्यं गुरुगात्रता ।
अङ्गमर्दोऽग्निनाशश्च प्रलेपो हृदयस्य च ॥ ४६ ॥
शोथारोचक-हल्लास-पीनसार्द्धावभेदकाः ।
कोठोऽरुः पिडकाः कण्डूस्तन्द्रा कासो गलामयाः ॥ ४७ ॥
स्मृति-बुद्धि-प्रमोहश्च संरोधः स्रोतसां ज्वरः ।
इन्द्रियाणामसामर्थ्यं विष-वेग-प्रवर्तनम् ॥ ४८ ॥
भवेन्नॄणां दिवास्वप्नस्याहितस्य निषेवणात् ।
तस्माद्धिताहितं स्वप्नं बुद्ध्वा स्वप्यात्सुखं बुधः ॥ ४९ ॥
रात्रौ जागरणं रूक्षं स्निग्धं प्रस्वपनं दिवा ।
अरूक्षमनाभिष्यन्दि त्वासीनप्रचलायितम् ॥ ५० ॥
देहवृत्तौ यथाऽऽहारस्तथा स्वप्नः सुखो मतः ।
स्वप्नाहारसमुत्थे च स्थौल्यकार्यं विशेषतः ॥ ५१ ॥
ग्रीष्म ऋतु आदान काल एवं रूक्ष है, इस समय वायु बढ़ती है, और
रातें बहुत छोटी होती हैं, इसलिये दिन में सोना उत्तम है। ग्रीष्म ऋतु को
छोड़कर और ऋतुओं में सोने से कफ और पित्त विकृत होते हैं, इसलिये इन
समयों में दिन के समय सोना ठीक नहीं है। मेदस्वी, नित्य स्नेह का सेवन करने
वाले, कफप्रकृति, कफरोगी, और दूषी विष से पीड़ित पुरुष दिन में खास कर
कभी भी न सोयें । दिन में सोने से हलीमक, शिरोवेदना, अंगों में भारीपन, अंगों

  • नींद का स्थान कहां है ? यह तो कहना कठिन है, परन्तु जब मन या
    मन से युक्त आत्मा मस्तिष्क की पंचम जवनिका ( Fifth Ventrical ) में
    पहुंच जाती है तब पुरुष को नींद आती है। इस जवनिका के साथ किसी भी
    ज्ञानतन्तु का सम्बन्ध नहीं है। इसी से कहा है—"स्वप्नश्च निरिन्द्रियप्रदेशे
    मनोऽवस्थानम्” ॥

२४४ चरकसंहिता [ अ० २१
को गीले वस्त्र से ढांपने की भांति प्रतीति, अंगों का टूटना, जाठराग्नि की क्षीणता,
हृदय का कफ से लिप्त होना, सूजन, अरुचि, वमनेच्छा, पीनस, आधा सीसी, कोठ
(बर्रें के काटे के भांति), फुन्सियां, खाज, तन्द्रा, आलस्य, कास, गले के रोग
स्मृति नाश, बुद्धिनाश, मूर्च्छा, स्रोतों का अवरोध, ज्वर, इन्द्रियों में असमर्थता,
विष के वेग का जोर (फिर से चढ़ना) ये लक्षण अहितकारी निद्रा अर्थात्
दिन में सोने से उत्पन्न होते हैं। इसलिये बुद्धिमान् मनुष्य को चाहिये कि अहि-
तकारी नींद का त्याग करे, और हितकारी नींद का सेवन करे इससे सुख होगा।
रात्रि में जागने से शरीर में रूक्षता और दिन में सोने से स्निग्धता बढ़ती है।
और बैठे-बैठे सोना न तो रूक्षता उत्पन्न करता है, न अभिष्यन्द अर्थात् स्निग्धता
उत्पन्न करता है। शरीर के धारण के लिये जिस प्रकार भोजन सुखकारक होता
है, उसी प्रकार नींद भी आवश्यक है। इसलिये स्थूलता और कृशता मुख्य
रूप से आहार और निद्रा पर अवलम्बित है ॥ ४३-५१ ॥
अभ्यङ्गोत्सादनं स्नानं ग्राम्यानूपौदका रसाः ।
शाल्यन्नं सदधि क्षीरं स्नेहो मद्यं मनःसुखम् ॥ ५२ ॥
मनसोऽनुगुणा गन्धाः शब्दाः संवाहनानि च ।
चक्षुषस्तर्पणं लेपः शिरसो वदनस्य च ॥ ५३ ॥
स्वास्तीर्णं शयनं वेश्म सुखं कालस्तथांचितः ।
आनयन्त्यचिरान्निद्रां प्रनष्टा या निमित्ततः ॥ ५४ ॥
तैलमर्दन, उबटन, स्नान, ग्राम्य या जलचर प्राणियों का मांस रस,
चावल, दही, दूध, स्नेह (घी-तैल) मद्य, मन की प्रिय वस्तुएं, मनोनुकूल
सुगन्धि, शब्द और संवाहन (मसाज, मुट्ठी भरना), आँखों का तर्पण, शिर
और मुख, शरीर पर चन्दनादि का लेप, अच्छा बिछा पलंग, सुन्दर घर तथा
उचित समय ये वस्तुएं कारण से नष्ट हुई नींद को शीघ्र ही उत्पन्न कर
देती हैं * ॥५२-५४॥
कायस्य शिरसश्चैव विरेकश्छर्दनं भयम् ।
चिन्ता क्रोधस्तथा धूमो व्यायाम रक्तमोक्षणम् ॥ ५५ ॥
उपवासोऽसुखा शय्या सत्त्वौदार्यं तमोजयः ।
निद्राप्रसङ्गमहितं वारयन्ति समुत्थितम् ॥ ५६ ॥

  • यदि मस्तिष्क में स्थित निद्रा को नियमित करने वाला केन्द्र नष्ट कर
    दिया जाय या चोट आदि से नष्ट हो जाय अथवा विक्षत हो जाय तो पुरुष
    को नींद का आना असम्भव हो जाता है। जब तक मस्तिष्क में यह केन्द्र ठीक
    है तभी तक यह चिकित्सा फलवती हो सकती है ।

अ० २१ ] सूत्रस्थानम् २५५

अ० २१ ] सूत्रस्थानम् २५५
शरीर का विरेचन, शिरो-विरेचन, बमन, भय, चिन्ता, क्रोध, कहानी
सुनना, मैथुन रक्त मोक्षण (शिरावेध), उपवास, दुःखदायक बिस्तर, सत्त्व
गुण की अधिकता, तमोगुण का जय (योगाभ्यास से होती है), ये कारण नींद
को नहीं आने देते। इसलिए अहित, अवाञ्छनीय नींद को रोकने के लिये स्वस्थ
पुरुष को इन्हें बर्तना चाहिये ॥५५-५६॥
एत एव च विज्ञेया निद्रानाशस्य हेतवः ।
कार्यं कालो विकारश्च प्रकृतिर्वायुरेव च ॥ ५७ ॥
निद्रानाश के दूसरे कारण—कार्य में फंसा रहना, काल (बुढ़ापा), विकार,
शूल दर्द होना, स्वभाव से ही नींद कम आना, वायु, उन्माद रोग या वातरोग
आदि निद्रानाश के कारण हैं ॥ ५७ ॥
तमोभवा श्लेष्मसमुद्भवा च मनः-शरीरश्रम-संभवा च ।
आगन्तुकी व्याध्यनुवर्तिनी च रात्रिस्वभाव-प्रभवा च निद्रा ॥५८॥
रात्रिस्वभावप्रभवा मता या तां भूतधात्रीं प्रवदन्ति निद्राम् ।
तमोभवामाहुरघस्य मूलं शेषं पुनर्व्याधिषु निर्दिशन्ति ॥५९॥
नींद छः प्रकार की हैं यथा—तमोजन्या, निद्रा कफ से उत्पन्न मन और
शरीर के थकने से 'आगन्तुकी रोग (सन्निपात ज्वर आदि) उत्पन्न होने वाली
रात्रि के स्वभाव के कारण उत्पन्न होने वाली निद्रा । इन छः प्रकार की निद्रा
में जो निद्रा रात्रि-स्वभाव के कारण उत्पन्न होती है उसको भूतधात्री अर्थात्
धाय के समान प्राणियों को पोषण करने वाली कहते हैं, और तमोगुण से उत्पन्न
निद्रा पाप अधर्म का मूल है, शेष निद्राओं की गिनती रोगों में की जाती है ।
तत्र श्लोकाः—निन्दिताः पुरुषास्तेषां यौ विशेषेण निन्दितौ ।
निन्दिते कारणं दोषास्तयोर्निन्दितभेषजम् ॥ ६० ॥
येभ्यो यदा हिता निद्रा येभ्यश्चाप्यहिता यदा ।
अतिनिद्रानिद्रयोश्च भेषजं यद्गुणा च सा ॥ ६१ ॥
या या यथाप्रभावा च निद्रा तत्सर्वमत्रिजः ।
अष्टौनिन्दितसंख्याते व्याजहार पुनर्वसुः ॥६२॥
निन्दित पुरुष, इनमें जो दो (स्थूल और कृश) अधिक निन्दित, निन्दित
होने का का कारण, दोनों के दोष, औषध, जिनके लिये निद्रा हितकारी है,
जिनके लिये अहितकारी, अति नींद और नींद के न आने की औषध और
जिस कारण से नींद आती है, जिसजिस प्रकार से उत्पन्न होती है, इन सब
बातों को आत्रेय ऋषि ने 'अष्टौ निन्दित' नामक अध्यायमें कह दिया ॥६०-६२॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने योजनाचतुष्के
अष्टौनिन्दितीयो नाम एकविंशतितमोऽध्यायः ॥२१॥