चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 265, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० २१ ] सूत्रस्थानम् २४७
अतिह्रस्व, ३. अतिलोमा ( बहुत बालों वाला ), ४. अलोमा ( एक दम बाल
रहित ) ५. अतिकृष्ण ( बहुत काला ) ६. अतिगौर, ७. अतिस्थूल ( बहुत
मोटा ) और ८. अतिकृश ( बहुत पतला ) ॥ ३ ॥
तत्रातिस्थूलकृशयोर्भूय एवापरे निन्दितविशेषा भवन्ति; अतिस्थूल-
स्य तावदायुषो ह्रासो जरोपरोधः कृच्छ्रव्यवायता .दौर्बल्यं दौर्गन्ध्यं
स्वेदाबाधः क्षुदतिमात्रं पिपासातियोगश्चेति भवन्त्यष्टौ दोषाः। तदति-
स्थौल्यमतिसंपूरणाद् गुरु-मधुर-शीत-स्निग्धोपयोगादव्यायामादव्यवा-
यादिवास्वप्नाद्धर्षनित्यत्वादचिन्तनाद् बीजस्वभावाच्चोपजायते। तस्या-
तिमात्रं मेदस्विनो मेद एवापचीयते न तथेतरे धातवः, तस्मादस्याऽऽयुषो
ह्रासः; शैथिल्यात् सौकुमार्याद् गुरुत्वाच्च मेदसां जरोपरोधः, शुक्रबहु-
त्वाद् मेदसाऽऽवृतमार्गत्वाच्च कृच्छ्रव्यवायता, दौर्बल्यमसमत्वाद्धातूनां,
दौर्गन्ध्यं मेदोदोषान्मेदसः स्वभावोत्स्वेदलत्वाच्च, मेदसः श्लेष्मसंस-
र्गाद्विष्यन्दित्वाद् बहुत्वान्द्व्यायामासहत्वाच्च स्वेदाबाधः, तीक्ष्णाग्नि-
त्वात्प्रभूतकोष्ठवायुत्वाच्च क्षुदतिमात्रं पिपासातियोगश्चेति ॥ ४ ॥
इन आठों पुरुषों में भी अतिस्थूल और अतिकृश ये दोनों पुरुष विशेष
रूप से निन्दित हैं। इनमें अतिस्थूल पुरुष की आयु छोटी होती है, उसे बुढ़ापे
जल्दी आ घेरता है, मैथुन में कठिनता, निर्बलता, शरीर में दुर्गन्ध, पसीना
बहुत आता है, भूख और प्यास खूब अधिक लगती है, ये आठ दोष होते हैं।
यह अतिस्थूलता अधिक भोजन करने से, गुरु, मधुर, शीत, स्निग्ध पदार्थों के
सेवन से, व्यायाम न करने से, सम्भोग न करने से, दिन में सोने से, नित्य खुश
( बेफ़िक्र ) रहने से, चिन्ता न करने से, माता पिता के स्थूल होने से उत्पन्न
होती है। अतिस्थूल पुरुष के शरीर में मेद के बढ़े होने पर आगे मेद ही बढ़ता
जाता है और अन्य धातु नहीं बढ़ते। इसलिये ( विषम धातु होने से ) आयु
छोटी होती है, मेद के शिथिल, सुकुमार और भारी होने से बुढ़ापे का जल्दी
आना, शुक्र के कम होने से, मेद के द्वारा शुक्र बाह्य स्रोतों के रुक जाने से
मैथुन में कठिनाई; धातुओं के विषम होने से दुर्बलता, मेद के दोष से, मेद के
स्वभाव से तथा पसीने के अधिक आने से दुर्गन्ध, मेद के श्लेष्मा के साथ
मिलने से, सड़ने से, बहुत होने से, भारी होने से और परिश्रम को न सह सकने
के कारण पसीने का बहुत आना, अग्नि के प्रबल होने से और कोष्ठ में वायु
की अधिकता से भूख अधिक और बहुत प्यास लगती है ॥ ४ ॥
भवन्ति चात्र—मेदसाऽऽवृतमार्गत्वाद्वायुः कोष्ठे विशेषतः ।
चरन् संधुक्षयत्यग्निमाहारं शोषयत्यपि ॥ ५ ॥