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सर्वकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

पृष्ठ 270, कुल 639 में से

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पृष्ठ 270

२५२ चरकसंहिता [ अ० २१
विषयेभ्यो निवर्तन्ते तदा स्वपिति मानवः ॥ ३५ ॥
निद्रायत्तं सुखं दुःखं पुष्टिः कार्श्यं बलाबलम् ।
वृषता क्लीबता ज्ञानमज्ञानं जीवितं न च ॥ ३६ ॥
अकालेऽतिप्रसङ्गाच्च न च निद्रा निषेविता ।
सुखायुषी पराकुर्यात्कालरात्रिरिवापरा ॥ ३७ ॥
सैव युक्ता पुनर्युङ्क्ते निद्रा देहं सुखायुषा ।
पुरुषं योगिनं सिद्ध्या सत्या बुद्धिरिवाऽऽगता ॥ ३८ ॥
गीताध्ययन-मद्य-स्त्री-कर्म-भाराध्व-कर्षिताः ।
अजीर्णिनः क्षताः क्षीणा वृद्धा बालास्तथाऽबलाः ॥ ३९ ॥
तृष्णातीसारशूलार्ताः श्वासिनो हिक्किनः कृशाः ।
पतिताभिहतोन्मत्ताः क्लान्ता यानप्रजागरैः ॥ ४० ॥
क्रोध-शोक-भय-क्लान्ता दिवास्वप्नोचिताश्च ये ।
सर्व एते दिवास्वप्नं सेवेरन् सार्वकालिकम् ॥ ४१ ॥
धातुसाम्यं तथा ह्येषां बलं चाप्युपजायते ।
श्लेष्मा पुष्णाति चाङ्गानि स्थैर्यं भवति चाऽऽयुषः ॥ ४२ ॥
जब मन से संयुक्त आत्मा निष्क्रिय हो जाती है, इन्द्रियां क्रियारहित हो
जाती हैं ( रूप, रसादि विषयों से हट जाती है ), तब पुरुष सो जाता है ।
यदि विधिपूर्वक नींद का सेवन किया जाय तो, सुख, शरीर की पुष्टि, बल,
पुरुषत्व ज्ञान और जीवन नींद के अधीन हैं और यदि निद्रा का विधि से सेवन
न किया जाय तो दुःख, कृशता, बलनाश, क्लीबता, अज्ञान, और मरण ये नींद
के अधीन हैं । इसलिये सुख चाहने वाले पुरुष को चाहिये कि दूसरी प्रलय
रात्रि के समान अकाल ( दिन में या सन्ध्याकाल में ) सोना, या बहुत सोना
छोड़ दे । ये नींद के मिथ्यायोग हैं । यदि निद्रा उचित रूप में सेवन की जाय
तो शरीर को सुख और आयु से ऐसे ही युक्त करती है जिस प्रकार योगी पुरुष
को सिद्धि से तत्त्वज्ञान प्राप्त होता है ।
गीत गाने से कृशपुरुष, पढ़ने से कृश, मद्यपान करने वाले स्त्री-सेवा
करने वाले, वमन विरेचनादि कर्म में, मार्ग चलने से कृश हुए, अतिसार आदि
से कृश, अजीर्ण रोगी, उरक्षत रोगी, क्षीण (जिनके रस रक्तादि धातु क्षीण) हों,
वृद्ध, बालक, स्त्रियां ( कमज़ोर ) तृणारोगी, शूल से पीड़ित, श्वास से कृश,
ऊपर से गिरे, चोट लगे हुए, उन्मत्त ( धतूरा आदि खाने से ), थके हुए,
सवारी करने से, रात में जागने से, क्रोध, शोक, भय से निष्क्रिय पुरुषों को दिन में
सोना उचित है । ये ऊपर लिखे पुरुष सब कालों में दिन में सो सकते हैं ।