चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० १२ । सूत्रस्थानम् १५३
करना,चारो युगोका संहार करनेवाले बादल,सूर्य,अग्नि एवं वायु की सृष्टि करना
इत्यादि होते हैं ।
वह भगवान् वायु उत्पत्ति के कारण हैं, अविनाशी हैं, एवं
प्राणियों का उत्पादक तथा नाशक हैं । सुख एवं दुःख को देने वाला, मृत्यु,
यम, नियन्ता, प्रजापति, अदिति, विश्वकमो, विश्वरूप सर्वग (व्यापक),
सम्पूर्ण नियमों, कर्मों तथा शरीरों को बनाने वाला सभी वस्तुओं का विधाता,
सूक्ष्म, व्यापक, विष्णु पृथ्व्यादिलोकों को आक्रमण करने वाला भगवान्
वायु ही हैं ॥ ८ ॥
तच्छ्रुत्वा वार्योविद्वचो मरीचिरुवाच-यद्यप्येवमेतत्किमर्थ-
स्यास्य वचने विज्ञाने वा सामर्थ्यमस्ति भिषग्विद्यायां, भिषग्विद्यां
चाधिकृत्यैयं कथा प्रवृत्तेति ॥ ९ ॥
वार्योविदि के वचन को सुनकर भगवान् मरीचि ने कहा, यद्यपि आपने
जो कहा है वह ठीक है तथापि आयुर्वेद में इस विषय को कहना या जानना
निष्प्रयोजन है यहां तो केवल चिकित्सा सम्बन्धी ही कथा हो रही है ॥ ९ ॥
वार्योविद उवाच — भिषक् पवनमतिबलमतिपरुषमतिशीघ्र-
कारिणमात्ययिकं चेन्नानुनिशम्येत्, सहसा प्रकुपितमतिप्रयतः कथमप्रेऽ-
भिरक्षितुमभिधास्यति प्रागेवैनमत्त्ययभयादिति । वायोर्यथार्था स्तुति-
रपि भवत्यारोग्याय बलवर्णवृद्धये वर्चस्वित्वायोपचयाय ज्ञानोपपत्तये
परमायुःप्रकर्षाय चेति ॥ १० ॥
वार्योविद बोले—चिकित्सा-शास्त्र में वायु बहुत बलवान्, बहुत कठोर,
अति शीघ्रकारी अतिचपल; अति दुःखदायक है, यदि ऐसा ज्ञात न हो तो,
सहसा वायु के कुपित होने पर, वैद्य किस प्रकार से उसको बिना जाने पहिले
ही इससे बचने को कहेगा । वायु के विषय में यथार्थ रूप में कहना, जानना,
स्तुति करना भी आरोग्यलाभ, बल, कान्ति, तेज, शक्ति को बढ़ाने, ज्ञान वृद्धि
करने और दीर्घतम आयु को प्राप्त करने और बढ़ाने के लिये है ॥ १० ॥
मरीचिरुवाच—अग्निरेव शरीरे पित्तान्तर्गतः कुपिताकुपितः शुभा-
शुभानि करोति, तद्यथा-पक्तिमपक्तिं दर्शनमदर्शनं मात्राममात्रत्वमूष्मणः
प्रकृति-विकृति-वर्णं शौर्यं भयं क्रोधं हर्षं मोहं प्रसादमित्येवमादीनि
चापराणि द्वन्द्वानीति ॥ ११ ॥
मरीचि बोले—शरीर में स्थित पित्त के अन्दर पहुंची हुई अग्नि ही कुपित
और अकुपित अवस्था में शुभ एवं अशुभ कर्मों को (क्रमशः) करती है ।
१५४ चरकसंहिता [ अ० १२
यथा—कुपित न होने पर पचन क्रिया को (भ्राजक पित्त ), स्वाभाविक रंग
को (रंजक पित्त ), शौर्य, हर्ष, प्रसाद प्रसन्नता को (साधक अग्नि ) उत्पन्न
करती है। कुपित होने पर, पाचन क्रिया की जड़ता, मन्द दृष्टि, उष्णता को
अयोग्य प्रमाण में, विकृत वर्ण, भय, क्रोध, मूर्च्छा उत्पन्न करता है। इसी
प्रकार कुपित और अकुपित अवस्थाओं में पित्त अन्य द्वन्द्वों को भी उत्पन्न
करता है ॥ ११ ॥
तच्छ्रुत्वा मरीचिवचः काप्य उवाच-सोम एव शरीरे श्लेष्मान्त-
र्गतः शुभाशुभानि करोति, तद्यथा-दार्ढ्यं शैथिल्यमुपचयं कार्श्यमुत्साह-
मालस्यं वृषतां क्लीबतां ज्ञानमज्ञानं बुद्धिं मोहमेवमादीनि चापराणि
द्वन्द्वानीति ॥ १२ ॥
मरीचि ऋषि के वचन सुनकर काप्य बोले—शरीरस्थ कफ में सोम (जल
तत्त्व) पहुंच कर कुपित और अकुपित अवस्था में शुभ एव अशुभ कर्मों को
करता है। अकुपित अवस्था मे—शरीर की दृढ़ता वृद्धि, कार्यों में उत्साह,
पुरुषत्व, ज्ञान, बुद्धि आदि को उत्पन्न करता है। कुपित होने पर शरीर का
ढीलापन, निर्बलता, आलस्य, नपुंसकता, मूढ़ता मूर्च्छा आदि उत्पन्न करता
है। इस प्रकार कुपित और अकुपित अवस्था मे दूसरे द्वन्द्वों को भी उत्पन्न
करता है ॥१२॥
तच्छ्रुत्वा काप्यवचो भगवान् पुनर्वसुरात्रेय उवाच-सर्व एव
भवन्तः सम्यगाहुरन्यत्रैकान्तिकवचनात्, सब एव खलु वातपित्त-
श्लेष्माणः प्रकृतिभूताः पुरुषमव्यापन्नेन्द्रियं बल-वर्ण-सुखोपपन्नमायुषा
महतोपपादयन्ति सम्यगेवाऽऽचरिता धर्मार्थकामा इव निःश्रेयसेन
महतोपपादयन्ति पुरुषमिह चामुष्मिंश्च लोके, विकृतास्त्वेवं महता
विपर्ययेणोपपादयन्ति ऋतवस्त्रय इव विकृतिमापन्ना लोकमशुभेनो-
पघातकाले इति ॥ १३ ॥
काप्य ऋषि के वचनों को सुनकर पुनर्वसु आत्रेय बोले—आप सबने जो
कुछ कहा वह सब ठीक है। परन्तु आपने जो यह कहा कि अकेला वायु या
अकेला पित्त अथवा अकेला कफ ही कुपित और अकुपित अवस्था में सब
शुभ-अशुभ कर्म करते हैं—यह वचन व्यभिचरित होने से ठीक नहीं है। सब
ही वात पित्त कफ (तीनो ) अकुपित अर्थात् स्वास्थ्यावस्था में प्रकृति युक्त,
स्वस्थ इन्द्रिययुक्त पुरुष को, बल, वर्ण, सुख और दीर्घायुष्य प्रदान करते हैं।
जिस प्रकार कि उचित रूप में सेवन किये हुए धर्म, अर्थ और काम पुरुष को
अ० १३ ] सूत्रस्थानम् १५५
अ० १३ ] सूत्रस्थानम् १५५
इस लोक में और परलोक में बड़े भारी कल्याण से युक्त करते हैं, जिस प्रकार
की विकृत हुई तीनों ऋतुएं ( शीत, ग्रीष्म और वर्षा ) संसार को प्रलयकाल
में कष्टों से पीड़ित करते हैं । इसी प्रकार कुपित हुए वात पित्त और कफ पुरुष
को बड़े भारी विपरीत बल, वर्ण, सुख से हीन तथा अल्पायु बनाते हैं ॥ १३ ॥
तदृषयः सर्व एवानुमेनिरे वचनमात्रेयस्य भवगतोऽभिननन्दु-
श्चेति ॥ १४ ॥
भवति चात्र ।
तदात्रेयवचः श्रुत्वा सर्व एवानुमेनिरे ।
ऋषयोऽभिननन्दुश्च यथेन्द्रवचनं सुराः ॥ १५ ॥
भगवान् आत्रेय के कथन को सब ऋषियों ने अनुमोदन किया । जिस
प्रकार कि देवता इन्द्र के वचनों को सराहते हैं, इस प्रकार ऋषियों ने आत्रेय
के वचनों की प्रशंसा की ॥ १४-१५ ॥
तत्र श्लोकौ-गुणाः षड् द्विविधो हेतुर्विविधं कर्म यत्पुनः ।
वायोश्चतुर्विधं कर्म पृथक्च कफपित्तयोः ॥ १६ ॥
महर्षीणां मतिर्या या पुनर्वसुमतिश्च या ।
कलाकलीये वातस्य तत्सर्वं संप्रकाशितम् ॥ १७ ॥ इति ।
वायु के छः गुण, दो प्रकार के कारण कुपित और अकुपित, वायु के नाना
प्रकार के कर्म; कफ और पित्त के पृथक् कर्म, महर्षियों एवं पुनर्वसु आत्रेय
की संमति, ये सब इस 'वात-कलाकलीय' अध्याय में सम्पूर्ण रूप में कह दिया ।
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने स्वस्थवृत्तचतुष्के
वातकलाकलीयो नाम द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥
इति निर्देशचतुष्कस्तृतीयः ॥ ३ ॥
त्रयोदशोऽध्यायः ।
अथातः स्नेहाध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
इसके आगे स्नेह-अध्याय का व्याख्यान करेंगे जैसा भगवानात्रेय ने
कहा था ॥ १-२ ॥
१५६ चरकसंहिता [ अ० १३
सांख्यैः संख्यातसंख्येयैः सहाऽऽसीनं पुनर्वसुम् ।
जगद्धितार्थं पप्रच्छ वह्निवेशः स्वसंशयम् ॥ ३ ॥
जिन तत्त्वज्ञानी लोगों ने जानने योग्य बातों को भली प्रकार जान लिया
था ऐसे मुनियों के साथ बैठे हुए पुनर्वसु आत्रेय से, ऋषि अग्निवेश ने अपने
सन्देह को जगत् के कल्याण के लिये पूछा ॥ ३ ॥
कियोनयः, कति स्नेहाः, के च स्नेहगुणाः पृथक् ।
कालानुपानं के, कस्य, कति, काश्च विचारणाः ॥ ४ ॥
कति मात्राः कथंमाना; का च केषूपदिश्यते ।
कश्च केभ्यो हितः स्नेहः, प्रकर्षः स्नेहने च कः ॥ ५ ॥
स्नेह्याः के, के न च स्निग्धाः, स्निग्धातिस्निग्धलक्षणम् ।
किं पानात्प्रथमं, पीते जीर्णे किं च हिताहितम् ॥ ६ ॥
के मृदु-क्रूर-कोष्ठाः, का व्यापदः, सिद्धयश्च काः ।
अच्छे संशोधने चैव स्नेहे का वृत्तिरिष्यते ॥ ७ ॥
विचारणाः केषु योज्या विधिना केन तत् प्रभो ! ।
स्नेहस्यामितविज्ञान ! शाखमिच्छामि वेदितुम् ॥ ८ ॥
स्नेहों के उत्पत्ति स्थान कौन से हैं ! स्नेह कितने हैं ! पृथक् पृथक् प्रत्येक
स्नेह के गुण क्या हैं ! प्रत्येक स्नेह का समय, अनुपान क्या है ? विचारणाएं
कितने प्रकार की हैं ! मात्रायें कितनी हैं ! उनका परिमाण क्या है ? और कौन
सा परिमाण किसके लिये कहा गया है ? कौनसा स्नेह किस के लिये हितकारी
है ! स्नेहन में कौन से स्नेह उत्तम हैं ! स्नेह के योग्य कौन हैं ! स्नेह के
अयोग्य कौन हैं ? अस्निग्ध और अतिस्निग्ध के लक्षण क्या हैं ? स्नेहपान से
पूर्वं क्या पीना और क्या नहीं पीना चाहिये ? स्नेह के जीर्ण होने पर क्या पीना
हितकारी और क्या अहितकारी है ? मृदु, क्रूर, कोष्ठ वाले कौन हैं ? स्नेह से
कौन से रोग उत्पन्न होते हैं ? उनका उपचार क्या है ? संशमन, संशोधन और
स्नेहन में कैसे बर्ताव से रहें ? किन २ पुरुषों में विचारणा किस विधि से प्रयोग
करनी चाहिये ? हे प्रभो ! स्नेह सम्बन्धी अनन्त ज्ञान को जानने की मेरी
इच्छा है ॥ ४-८ ॥
अथ तत्संशयच्छेत्ता प्रत्युवाच पुनर्वसुः ।
स्नेहानां द्विविधा सौम्य ! योनिः स्थावर-जङ्गमा ॥ ९ ॥
तिलः प्रियालाभिषुकौ बिभीतकश्चित्राभयरण्ड-मधूक-सर्षपाः ।
कुसुम्भ-बिल्वारुक-मूलकातसी-निकोतकाक्षोड-करञ्ज-शिग्रुकाः ॥ १० ॥
अ० १३ ] सूत्रस्थानम १५७
अ० १३ ] सूत्रस्थानम १५७
स्नेहाश्रयाः स्थावरसंज्ञिनास्तथा स्युर्जङ्गमा मत्स्यमृगाः सपक्षिणः ।
तेषां दधि-क्षीर घृतामिषं वसा स्नेहेषु मज्जा च तथापदिश्यते ॥ ११ ॥
अग्निवेश के सन्देह को दूर करने वाले भगवान् पुनर्वसु ने उत्तर दिया—
स्नेहो के उत्पत्ति स्थान दो प्रकार के हैं; स्थावर और जंगम । इनमें—तिल,
पियाल, (चिरोंजी फल) अभिषुक (चिलगोज़ा), बहेड़ा, चीता, हरड़ बड़ी,
ऐरण्ड, महुवा, सरसों, कुसुम्भ, बेलगिरी, भिलावा, मूलक, अलसी, निकोटक,
अलरांट, नाटा करंजुआ, सोहांजन ये स्नेह के स्थावर उत्पत्ति स्थान हैं।
मछलियों, मृग (पशु), पक्षी एवं उनका दूध, दही, घृत, माँस वसा और
मज्जा ये स्नेह के जंगम उत्पत्ति स्थान कहे हैं ॥ ६-११ ॥
सर्वेषां तैलजातानां तिलतैलं प्रशस्यते ।
बलार्थे स्नेहने चाम्यमेरण्डं तु विरेचने ॥ १२ ॥
सर्पिस्तैलं वसा मज्जा सर्वस्नेहात्तमा मताः ।
एभ्यश्चंवोत्तमं सर्पिः संस्कारस्यानुवर्तनात् ॥ १३ ॥
सब प्रकार के तैलों में तिल का तैल श्रेष्ठ है। बल और मृदुता लाने के
लिये तिल का तैल सब में श्रेष्ठ है और विरेचन के लिये एरण्ड का तैल सर्व-
श्रेष्ठ है। सब प्रकार के स्नेहों में घी, तैल, वसा और मज्जा ये चार श्रेष्ठ हैं।
इन चारो में भी घी सबसे श्रेष्ठ है; क्योंकि यह अन्य पदार्थों का गुण अपन में
ले लेता है ॥ १२-१३ ॥
घृतं पित्तानिलहरं रसशुक्रौजसां हितम् ।
निर्वापणं मृदुकरं स्वर-वर्ण-प्रसादनम् ॥ १४ ॥
घी वात और पित्त का नाशक है, रस, शुक्र और ओज को बढ़ाता है,
बढ़ी हुई उष्णिमा को शान्त करता है, शरीर मे कोमलता पैदा करता है, स्वर
और कान्ति को बढ़ाता है ॥ १४ ॥
मारुतघ्नं न च श्लेष्मवर्धनं बलवर्धनम् ।
त्वच्यमुष्णं स्थिरकरं तैलं योनिविशोधनम् ॥ १५ ॥
तैल वायु नाशक, परन्तु कफ को नहीं बढ़ाता, बलवर्धक, त्वचा के लिये
हितकारी, उष्णवीर्य, उष्णगुण, शरीर को स्थिर (टिकाऊ) बनाने वाला एवं
स्त्री-जननेंद्रिय (गर्भाशय) का शोधन करने वाला है, (तिल तैल में ये गुण
विशेष रूप से हैं) ॥ १५ ॥
विद्ध-भग्नाहत भ्रष्ट-योनि-कर्ण-शिरोरुजि ।
पौरुषोपचये स्नेहे व्यायामे चेष्यते वसा ॥ १६ ॥
१५८ चरकसंहिता [ अ० १३
भाले आदि से बिंधने चोट लगाकर अस्थि आदि के टूटने चोट लगने,
योनि की भ्रंशता ( गर्भाशय आदि अंगों की स्थान च्युति ), कर्ण रोग, शिरो
रोग, पुरुषत्व बढ़ाने, शरीर को चिकना करने और व्यायाम अर्थात् शारीरिक
श्रम में वसा ( चर्बी ) हितकारी है ॥ १६ ॥
बल-शुक्र-रस-श्लेष्म-मेदो मज्ज-विवर्धनः ।
मज्जा विशेषतोऽस्थ्नां च बलकृत्स्नेहने हितः ॥ १७ ॥
बल, शुक्र, रस, कफ, मेद और मज्जा को बढ़ाती है । विशेषकर
अस्थियों की शक्ति बढ़ाती एवं शरीर को चिकना बनाने में विशेष रूप से
हितकारी है ॥ १७ ॥
सर्पिः शरदि पातव्यं, वसा मज्जा च माधवे ।
तैलं प्रावृषि, नात्युष्णशीते स्नेहं पिबेन्नरः ॥ १८ ॥
वातपित्ताधिके रात्रावुष्णे चापि पिबेन्नरः ।
श्लेष्माधिके दिवा शीते पिबेच्चामलभास्करे ॥ १९ ॥
घी शरद् ऋतु ( आश्विन-कार्तिक ) में, चर्बी और मज्जा वसन्त ऋतु
( फाल्गुन-चैत्र ) में और तैल वर्षाकाल (श्रावण-भाद्रपद ) में सेवन करना
चाहिये । अति उष्ण काल (ग्रीष्म ) अथवा आते शीतकाल ( हेमन्त ) में
स्नेह नहीं पीना चाहिये । तीव्र व्याधि में, ग्रीष्म ऋतु में, रात्रि के समय; वात
और पित्त की अधिकता होने पर स्नेह पी लेना चाहिये । कफप्रधान व्याधि में
शीतकाल के अन्दर (हेमन्त-शिशिर ऋतु में ) मध्याह्न समय में दिन के समय
स्नेहपान करना चाहिये ॥ १८-१९ ॥
अत्युष्णे वा दिवा पीतो वातपित्ताधिकेन वा ।
मूर्च्छां पिपासामुन्मादं कामलां वा समीरयेत् ॥ २० ॥
शीते रात्रौ पिबेत्स्नेहं नरः श्लेष्माधिकोऽपि वा ।
आनाहमरुचिं शूलं पाण्डुतां वा समृच्छति ॥ २१ ॥
जलमुष्णं घृते पेयं, यूषम्तैलेऽनुशस्यते ।
वशामज्ज्ञोस्तु मण्डः स्यात्सर्वेषूष्णमथाम्बु वा ॥ २२ ॥
वातप्रधान या पित्तप्रधान रोगी ग्रीष्म ऋतु में या दिन के समय यदि
स्नेहपान करता है तो मूर्छा, प्यास, उन्माद अथवा कामला रोग उत्पन्न हो
जाते हैं । कफप्रधान रोगी यदि शीत ऋतु में या रात्रि के समय स्नेहपान करता
है तो उसे अफरा, अरुचि, शूल-पीड़ा या पाण्डुरोग उत्पन्न हो जाता है । घी
पीने के उपरान्त गरम जल, तैल के उपरान्त यूष और वसा एवं मज्जा के
अ० १३ ] सूत्रस्थानम् १६६
अ० १३ ] सूत्रस्थानम् १६६
उपशान्त मण्ड ( माड ) पीना उत्तम है । अथवा सब ( घी, तैल, वसा और
मज्जा ) के पीछे गरम पानी पीना श्रेयस्कर है ॥ २०-२२ ॥
स्नेह की विचारणाएं—
ओदनश्च विलेपी च रसो मांसं पयो दधि ।
यवागूः सूपशाकौ च यूषः काम्बलिकः खडः ॥ २३ ॥
सक्तवस्तिलपिष्टं च मद्यं लेहास्तथैव च ।
भक्ष्यमभ्यञ्जनं बस्तिस्तथा चोत्तरबस्तयः ॥ २४ ॥
गण्डूषः कर्णतैलं च नस्यं कर्णाक्षिपूरणम् ।
चतुर्विंशतिरित्येताः स्नेहस्य प्रविचारणाः ॥ २५ ॥
स्नेह की विचारणा ( उपयोग-प्रयोग विधि ) २४ चौबीस प्रकार की है ।
जैसे—( १ ) ओदन—चावल पांच गुणे जल में पकानां, ( २ ) विलेपी
अर्थात् दरकच किये चावलों को चार गुणे जल में पकाने से बहुत मांडयुक्त
यवागू बनता है ( ३ ) रस ( मांस रस ) ठीक तरह से पका मांस, ( ४ )
यवागू ( दरकच किये चावलों को छः गुणे जल में पकाने से मांड युक्त द्रव
हो ) । ( ५ ) सूप—दाल को १६ या १४ या १८ गुणे जल में पका कर
चतुर्थांश शेष रखें, ( ६ ) शाक, ( ७ ) यूष—अन्न को दल कर १४ या १८
गुणे जल में पकावे आधा पानी शेष रखे । काम्बलिक, खड, सत्तू, तिलपिष्ट
( तिलकुट या खल ) मदिरा, चाटन, भक्ष्य, ( मालपूआ, पूरणपोली आदि ),
अभ्यंजन मालिश, बस्ति, उत्तर बस्ति, गण्डूष ( गराले ), अर्थात् मुख में तैल
का रखना, कान मे तैल डालना, नस्य कर्म, नेत्र के अन्दर स्नेह प्रदान करके
आंख की तृप्ति करना, यह स्नेह की चौबीस प्रकार की प्रविचारणा अर्थात्
सेवन विधि है* ॥ २३-२५ ॥
अच्छपेयस्तु यः स्नेहो न तामाहुर्विचारणाम् ।
स्नेहस्य स भिषग्दृष्टः कल्पः प्राथमकल्पिकः ॥ २६ ॥
शुद्ध स्नेहपीने को 'विचारणा' नहीं कहते । यह तो स्नेह का सर्व प्रथम
श्रेष्ठ रूप है । इसके पीछे प्रकृति, देह, दोष आदि देखकर पाचन शक्ति की
विवेचना करके ओदन आदि सेवन विधि करनी चाहिये ॥ २६ ॥
रसश्चार्णहितः स्नेहः समास-व्यास-योगिभिः ।
षड्भिर्द्विषाष्टधा संख्यां प्राप्नोत्येकश्च केवलः ॥ २७ ॥
एवमेषा चतुःषष्टिः स्नेहानां प्रविचारणाः ।
- प्रविचार्यतं अवचार्येतऽनुकल्पेनाप्युज्यतेऽनयेति प्रविचारणा ।
१६० चरकसंहिता [ अ० १३
ओकत्तू-व्याधि-पुरुषान् प्रयोज्या जानता भवेत् ॥ २७ ॥
छः रसों ( मधुर अम्ल, लवण, तिक्त, कटु और कषाय ) के परस्पर मिलने
से ६३ प्रकार के भेद हो जाते हैं । इन तिरसठ भेदों के साथ जब स्नेह मिलता
है, तो वह भी ६३ प्रकार का हो जाता है और जब किसी भी रस के साथ न
मिलकर शुद्ध स्नेह रूप में ही रहता है, तब एक भेद होता है । इस एक प्रकार
को भी मिलाकर स्नेह के ६४ प्रकार हो जाते हैं । इस प्रकार से स्नेह की
विचारणा अर्थात् सेवन विधि ६४ ( चौंसठ ) प्रकार की है । ( ओक )
सात्म्य, ऋतु और रोग-बल आदि का विचार करके सेवन विधि का प्रयोग
करना चाहिये ॥ २७-२८ ॥
स्नेह की मात्रा—
अहोरात्रमहः कृत्स्नमर्धाहं च प्रतीक्षते ।
प्रधाना मध्यमा ह्रस्वा स्नेहमात्रा जरां प्रति ॥ २९ ॥
इति तिस्रः समुद्दिष्टा मात्रा स्नेहस्य मानतः ।
तासां प्रयोगान्वक्ष्यामि पुरुषं पुरुषं प्रति ॥ ३० ॥
स्नेह की मात्रा तीन प्रकार की है । प्रधान, मध्यम और ह्रस्व । इनमें जो
स्नेह की मात्रा रात और दिन ( २४ घण्टे ) में जीर्ण होती है, वह स्नेह की
प्रधान मात्रा है और जो सारे दिन भर ( १२ घण्टे ) में जीर्ण होती है वह
मध्यम, और जो आधे दिन ( ६ घण्टे ) में जीर्ण होती है वह स्नेह की ह्रस्व
मात्रा है । ये मात्राएं स्नेह के जीर्ण होने के समय के अनुसार हैं । इस प्रकार
से स्नेह की मात्रा और मान कह दिया है ॥ २९-३० ॥
अब प्रत्येक पुरुष के लिये स्नेह के प्रयोगों को कहते हैं—
प्रभूतस्नेहनित्या ये क्षुत्पिपासासहा नराः ।
पावकश्चोत्तमो येषां ये चोत्तमा बले ॥ ३१ ॥
गुल्मिनः सर्पदष्टाश्च विसर्पोपहताश्च ये ।
उन्मत्ताः कृच्छ्रमूत्राश्च गाढवर्चस एव च ॥ ३२ ॥
पिबेयुरुत्तमां मात्रां, तस्याः पाने गुणान् शृणु ।
विकारान् शमयत्येषा शीघ्रं सम्यक्प्रयोजिता ॥ ३३ ॥
दोषानुहर्षिणी मात्रा सर्वमार्गानुसारिणी ।
बल्या पुनर्नवकरी शरीरेन्द्रियचेतसाम् ॥ ३४ ॥
“तक्रे कपित्थ चाङ्गेरीमरिचाजाजिचित्रकैः । सूपः खण्डयूषोऽयं काम्बलिको
मतः ॥ दध्यम्लो लवण-स्नेह-तिलमाषान्वितः शृतः ॥”
अ० १३ ] ११ सूत्रस्थानम् १६१
अ० १३ ] ११ सूत्रस्थानम् १६१
जो मनुष्य नित्य प्रति विशेष रूप में स्नेह का व्यवहार करते हैं, भूख
और प्यास को न सहन कर सकने वाले, उत्तम बलवान् जठराग्नि वाले, श्रेष्ठ
शारीरिक बल वाले, गुल्मरोगी, सर्पविषाक्रान्त रोगी, वीसर्प रोगी, पागल,
मूत्रकृच्छ्र रोगी और जिनका मल सूखा रहता है, वे स्नेह की उत्तम मात्रा का
पान करें । स्नेह की प्रधान मात्रा के पीने का गुण सुनो—यदि मात्रा को भली
प्रकार से प्रयोग किया जाये तो उपरोक्त समस्त रोग मिट जाते हैं। वह शरीर
के दोषों को खींच कर बाहर कर देती है, शरीर के सब भागों में ऊपर, नीचे,
तिरछे सब जगह फैल जाती है। वह बलवर्द्धक एवं शरीर, इन्द्रिय और चित्त
को फिर से हरा भरा बना देती है ॥ ३१-३४ ॥
मध्यम मात्रा—
अरुष्का स्फोट-पिडका-कण्डू-पामाभिरर्दिताः ।
कुष्ठिनश्च प्रमीढाश्च वातशोणितिकाश्च ये ॥ ३५ ॥
नातिबह्वाशिनश्चैव मृदुकोष्ठास्तथैव च ।
पिबेयुमध्यमां मात्रां मध्यमाश्चापि ये बले ॥ ३६ ॥
मात्रैषा मन्दविभ्रंशा न चातिबलहारिणी ।
सुखेन च स्नेहयति शोधनार्थे च युज्यते ॥ ३७ ॥
गांठें, फोड़े, फुन्सियां, खाज, पामा, कुष्ठरोगी, प्रमेही, अतिमूत्ररोगी,
वातरक्तरोगी, अधिक न खाने वाले, न कम खाने वाले, मृदुकोष्ठ वाले,
(जिनको दूध से भी विरेचन हो जाता है ), और मध्यम बल वाले व्यक्ति
स्नेह की मध्यम मात्रा का पान करें । यह मध्यममात्रा मृदु-विरेचक, थोड़ा
कष्ट करने वाली, एवं बल को बहुत नहीं घटाती, सुखपूर्वक सरलता से
शरीर को कोमल कर देती है, इसीलिये शरीर को शोधन करने के लिये
हितकारी है ॥ ३५-३७ ॥
ह्रस्व मात्रा—
ये तु वृद्धाश्च बालाश्च सुकुमाराः सुखोचिताः ।
रिक्तकोष्ठत्वमहितं येषां मन्दाग्नयश्च ये ॥ ३८ ॥
ज्वरातीसार-कासाश्च येषां चिरसमुत्थिताः ।
स्नेहमात्रां पिबेयुस्ते ह्रस्वां ये चावरा बले ॥ ३६ ॥
परिहारे सुखा चैषा मात्रा स्नेहनबृंहणी ।
वृष्या बल्या निराबाधा चिरं चाप्यनुवर्तते ॥ ४० ॥
वृद्ध, बालक, कोमल, नाजुक प्रकृति के, ऐश की जिन्दगी बसर करने
१६२ चरकसंहिता [ अ० १३
वाले, खाली पेट रहने से जिनके पेट में दर्द होने लगता है, मन्दाग्नि, निर्बल
जाठराग्नि वाले, जिनको ज्वर, अतीसार, कास पुराना बहुत दिनों का हो,
और निर्बल, अल्प शारीरिक बल वाले व्यक्ति स्नेह की ह्रस्व मात्रा लेवें । यह
मात्रा जीर्ण होने में सरल है, सुखपूर्वक पच जाती है । शरीर को चिकना करती
एवं बल बढ़ाती है । पुरुषत्वकारक, बलकारक, निरापद, एवं देर तक सेवन
व्यवहार में लाई जा सकती है ॥ ३८-४० ॥
कौनसा स्नेह किस के लिये हितकारी है—
वात-पित्त-प्रकृतयो वात-पित्त-विकारिणः ।
चक्षुष्कामाः क्षताः क्षीणा वृद्धा बालास्तथाऽबलाः ॥ ४१ ॥
आयुःप्रकर्षकामाश्च बल-वर्ण-स्वराथिनः ।
पुष्टिकामाः प्रजाकामाः सौकुमार्यार्थिनश्च ये ॥ ४२ ॥
दीप्त्योजः-स्मृति-मेधाग्नि-बुद्धीन्द्रिय-बलार्थिनः ।
पिबेयुः सर्पिरातश्च दाह-शस्त्र-विषाग्निभिः ॥ ४३ ॥
जिनकी प्रकृति वात-पित्त हो, वात-पित्त के रोगी, उत्तम दृष्टि चाहने वाले.
उरःक्षत रोग से क्षीण, निर्बल, वृद्ध, बालक, निर्बल मनुष्य, आयु की वृद्धि की
कामना करने वाले, बल, वर्ण, कान्ति, स्वर को चाहने वाले, शरीर पुष्टि के
इच्छुक, संतति की चाह वाले, सुकुमारता, कोमलता के इच्छुक, तेज, ओज,
स्मृति, बुद्धि, अग्नि, धारण करने की शक्ति और इन्द्रिय बल को चाहने वाले
और आग, जल, शस्त्र, विष से आक्रान्त रोगी घी का सेवन करें ॥ ४१-४३ ॥
प्रवृद्ध-श्लेष्म-मेदस्काश्चल-स्थूल-गलोदराः ।
वात-व्याधिभिराविष्टा वात-प्रकृतयश्च ये ॥ ४४ ॥
बलं तनुत्वं लघुतां दृढतां स्थिरगात्रताम् ।
स्निग्ध-श्लक्ष्ण-तनुत्वक्त्वं ये च काङ्क्षन्ति देहिनः ॥ ४५ ॥
कृमिकोष्ठाः क्रूरकोष्ठास्तथा नाडीभिरर्दिताः ।
पिबेयुः शीतले काले तैलं तैलोचिताश्च ये ॥ ४६ ॥
जिनमें कफ की या चर्बी की अधिकता हो, जिनका पेट या गर्दन मोटी
और ढीली हो, वात रोगों से पीड़ित, वात प्रकृति के, जो बल, पतलापन,
हलकापन, मजबूती, शरीर की स्थिरता ( संघटन ), चिकनापन, और त्वचा
की कोमलता चाहते हैं, कृमिरोग से आक्रान्त, क्रूर कोष्ठ वाले ( जिनको तीव्र
विरेचन से प्रभाव होता है ), नाड़ीव्रण से आक्रान्त और जिनको तैल सेवन
अ० १३ ] सूत्रस्थानम् १६३
अ० १३ ] सूत्रस्थानम् १६३
करने का अभ्यास है वे शीतकाल ( हेमन्त शिशिर ) में दिन के समय तैल
का पान करें ॥४४-४६॥
वातातपसहा ये च रूक्षा भाराध्वकर्शिताः ।
संशुष्क-रेतो-रुधिरा निष्पीत-कफ-मेदसः ॥ ४७ ॥
अस्थि-सन्धि-शिरा-स्नायु-मर्म-कोष्ठ-महारुजः ।
बलवान्मारुतो येषां खानि चाऽऽवृत्य तिष्ठति ॥ ४८ ॥
महच्चाग्निबलं येषां वसा-सात्म्याश्च ये नराः ।
तेषां स्नेह्यितव्यानां वसापानं विधीयते ॥ ४९ ॥
वायु और धूप को सहन करने वाले, रूक्ष प्रकृति, भार के उठाने या मार्ग
चलने वाले, परिश्रम के कारण जो निर्बल हो गये, जिनका वीर्य या रक्त सूख
गया है; कफ क्षीण हो, मेद क्षीण हो, जिनको अस्थि; सन्धि-शिरा, स्नायु मर्म
कोष्ठ के भयानक रोग हों, जिनकी इन्द्रियों को बलवान् वायु घेरे रहता है,
जिनका अग्निबल-जाठराग्नि बलवान् हो, और जो वसा सेवन करने के
अभ्यासी हों, ऐसे पुरुष स्नेहन करने के लिये वसा (चर्बी) का पान करें ॥४७-४६।
दीप्ताग्नयः क्लेशसहा घस्मराः स्नेहसेविनः ।
वातार्ताः क्रूर-कोष्ठाश्च स्नेह्या मज्जानमाप्नुयुः ॥ ५० ॥
जिनकी जाठराग्नि दीप्त है, जो क्लेश को सहन कर सकते हों, खूब खाने
वाले, स्नेहसेवन के अभ्यासी; वात रोगी और क्रूरकोष्ठ वाले व्यक्तियों को मज्जा
द्वारा स्नेहन करना चाहिये ॥५०॥
येभ्यो येभ्यो हितो यो यः स्नेहः स परिकीर्तितः ।
स्नेहनस्य प्रकर्षो तु सप्तरात्रं त्रिरात्रकौ ॥ ५१ ॥
जिन जिन पुरुषों के लिये जो जो स्नेह हितकारी हैं, उनके लिये उसी स्नेह
का उपदेश किया है। स्नेह की सेवन विधि दो प्रकार की है । एक सात रात
की और दूसरी तीन रात की । इनमे क्रूरकोष्ठ व्यक्तियों के लिये सात रात, और
मृदुकोष्ठ व्यक्ति के लिये तीन रात हैं* ॥५१॥
स्वेद्याः शोधयितव्याश्च रूक्षा वातविकारिणः ।
व्यायाम-मद्य-स्त्रीनित्याः स्नेह्याः स्युर्ये च चिन्तकाः ॥ ५२ ॥
स्नेहन के योग्य व्यक्ति—जो व्यक्ति स्वेद देने या संशोधन के योग्य हैं;
*जैसा आगे कहेंगे "त्र्यहावरं सप्तदिनं परन्दु स्निग्धो नरः स्वेदयितव्य इष्टः ।
नातः परं स्नेहनमादिशन्ति" ।
१६४ चरकसंहिता [ अ० १३
रूक्षप्रकृति, वातरोगी, नित्य व्यायामसेवी, नित्य मद्यसेवी, नित्य स्त्रीसेवी, और
जो चिन्ता (शोक) करते रहते हैं; वे व्यक्ति स्नेहन के योग्य हैं ॥ ५२ ॥
स्नेह के अयोग्य व्यक्ति—
संशोधनार्हते येषां रूक्षणं संप्रवक्ष्यते ।
न तेषां स्नेहनं शस्तमुत्सन्न-कफ-मेदसाम् ॥ ५३ ॥
अभिष्यण्यानन गुदा नित्यं मन्दाग्नयश्च ये ।
तृष्णा मूर्च्छा-परीताश्च गर्भिण्यस्तालु-शोषिणः ॥ ५४ ॥
अन्नद्विषश्छर्दयन्तो जठरामय-गरादिताः ।
दुर्बलाश्च प्रतान्ताश्च स्नेहम्लाना मदातुराः ॥ ५५ ॥
न स्नेह्या वर्तमानेषु न नस्तावस्तिकर्मसु ।
स्नेहपानात्प्रजायन्ते तेषां रोगाः सुदारुणाः ॥ ५६ ॥
संशोधन किये बिना जिनका रूक्षण करना कहा जायेगा; उनको; जिनका
कफ और मेद बढ़ा हो, जिनके नाक, मुख और गुदा से स्राव होता हो, जिनको
सदा मन्दाग्नि रहती हो, प्यास और मूर्च्छा से आक्रान्त, गर्भवती, तालुकण्ठ
जिनका सूखता हो; भोजन से अरुचि करने वाले, वमन करते हुए, उदर रोगी
या विष से आक्रान्त, दुर्बल, ग्लानि करने वाले (कच्चे दिल के, घृणा करने
की प्रकृति के), स्नेह के पीने में जो प्रसन्न नहीं होते, घृणा करते हैं और मद
(नशे) से ग्रस्त व्यक्तियों को और नस्य कर्म एवं अनुवासन बस्ति जिन्होंने
ली हो उनको स्नेहन नहीं देना चाहिये । यदि इनको स्नेह पिलाया जायगा तो
भयानक रोग उत्पन्न हो जायेंगे । रूक्षण के योग्य—'अभिष्यन्दा महादोषा
मर्मस्था व्याधयश्च ये । ऊरुस्तम्भ-प्रभृतयो रूक्षणीया निदर्शिताः' ॥ ५३-५६ ॥
अस्निग्ध, स्निग्ध और अतिस्निग्ध के लक्षण—
पुरीषं ग्रथितं रूक्षं, वायुरप्रगुणो, मृदुः ।
पक्ता, खरत्वं रौक्ष्यं च गात्रस्यास्निग्धलक्षणम् ॥ ५७ ॥
जिसका मल बंधा हुआ, रूक्षता वायु अपनी प्रकृति में न हो, जाठराग्नि
मन्द हो, शरीर में कर्कशता रूखापन हो, तो समझे कि स्नेहन-क्रिया ठीक
नहीं हुई ॥ ५७ ॥
वातानुलोम्यं दीप्तोऽग्निर्वर्चः स्निग्धमसंहतम् ।
मार्दवं स्निग्धता चाङ्गे स्निग्धानामुपजायते ॥ ५८ ॥
वायु की अनुकूलता, जाठराग्नि का बढ़ना (भूख का लगना), मल
अ० १३ ] सूत्रस्थानम् १६५
अ० १३ ] सूत्रस्थानम् १६५
चिकना और पतला, अंगों में कोमलता और चिकनापन हो, तो समझना चाहिये
कि उचित रूप में स्नेहन हुआ है ॥ ५८ ॥
पाण्डुता गौरवं जाड्यं पुरीषस्याविपक्वता ।
तन्द्रीररुचिरुत्क्लेशः स्यादतिस्निग्धलक्षणम् ॥ ५६ ॥
पाण्डुता (पीलापन, निस्तेज वर्ण), शरीर में भारीपन, आलस्य, मल
का भली प्रकार पाक न होना, अरुचि, सुस्ती, वमन की इच्छा ये अतिस्निग्ध
के लक्षण हैं ॥ ५६ ॥
द्रवोष्णमनभिष्यन्दि भोज्यमन्नं प्रमाणतः ।
नातिस्निग्धमसंकीर्णं श्वः स्नेहं पातुमिच्छता ॥ ६० ॥
पिबेत्संशमनं स्नेहमन्नकाले प्रकाङ्क्षितः ।
स्नेह से पूर्व लेने योग्य हितकारी पदार्थ—स्नेह पान करने की इच्छावाले
व्यक्ति को चाहिये कि स्नेह पाने से पहिले दिन, द्रव, और गरम, जो कफकारक
न हो, अतिस्निग्ध, अतिविकार युक्त, असंकीर्ण ऐसे भोजन को मात्रा से खावे,
जो दो तीन वस्तुओं को मिलाकर न बनाया गया हो और अगले दिन जब
भोजन के समय आकांक्षा हो तब संशमन स्नेह का ही पान करे ॥ ६० ॥
शुद्धयर्थं पुनराहारे नष्टे जीर्णे पिबेन्नरः ॥ ६१ ॥
संशोधन के उद्देश्य से स्नेह पान करने के लिये रात्रि का भोजन जीर्ण
होने पर प्रातःकाल स्नेहपान करे ॥ ६१ ॥
उष्णोदकोपचारी स्याद् ब्रह्मचारी क्षपाशयः ।
शकृन्मूत्रानिलोद्गारानुदीर्णांश्च न धारयेत् ॥ ६२ ॥
व्यायाममुच्चैर्वचनं क्रोध-शोकौ हिमातपौ ।
वर्जयेदप्रवातं च सेवेत शयनासनम् ॥ ६३ ॥
स्नेहं पीत्वा नरः स्नेहं प्रतिभुञ्जान एव च ।
स्नेहमिथ्योपचाराद्धि जायन्ते दारुणा गदाः ॥ ६४ ॥
स्नेहनकाल में हित अहित—पीने, स्नान, शौच आदि कार्यों में गरम
पानी का व्यवहार करे, मैथुन को छोड़ दे। रात्रि में सोये, दिन में न सोये
रात में न जागे, उपस्थित हुए मल, मूत्र, वायु और डकार के वेगों को न
रोके । व्यायाम-श्रम, और जोर से या अधिक भाषण, क्रोध, शोक, सरदी या
गरमी न सहे । खुली-वायु में वायु के सामने न बैठे और न सोये । स्नेह को
पीने के पीछे इन कार्यों का पालन करे । स्नेह पीने के पीछे पुनः स्नेह पान
करने पर, स्नेह पीकर, भोजन आदि में दूसरी बार स्नेह युक्त पदार्थ खाने से,
स्नेह के मिथ्यायोग से भयानक रोग उत्पन्न हो जाते हैं ॥६२–६४॥
१६६ चरकसंहिता [ अ० १३
मृदुकोष्ठस्त्रिरात्रेण स्निह्यत्यच्छोपसेवया ।
स्निह्यति क्रूरकोष्ठस्तु सप्तरात्रेण मानवः ॥ ६५ ॥
मृदुकोष्ठ वाला व्यक्ति स्नेह का अच्छपान करके तीन रात्रि तक सेवन
करने पर स्निग्ध हो जाता है। क्रूरकोष्ठ वाला व्यक्ति स्नेह का सात दिन
अच्छपान करके स्निग्ध होता है ॥ ६५ ॥
गुडमिक्षुरसं मस्तु क्षीरमुल्लाडितं दधि ।
पायसं कृसरं सर्पिः काश्मर्य-त्रिफला-रसम् ॥ ६६ ॥
द्राक्षारसं पीलुरसं जलमुष्णमथापि वा ।
मद्यं वा तरुणं पीत्वा मृदुकोष्ठो विरिच्यते ॥ ६७ ॥
गुड़, गन्ने का रस, मस्तु (दही का द्रव्य भाग), दूध, बिलोई हुई दही
(मट्ठा), खीर, खिचड़ी, घी, गम्भारो का रस, त्रिफला (हरड़, बहेड़े, आंवले
का रस), अंगूर का रस, पीलू का रस, गरम जल, नवीन मदिरा (पुरानी
नहीं), इनको पीने से मृदुकोष्ठ, व्यक्तियों को विरेचन हो जाता है। अर्थात्
जिनको इन वस्तुओं के सेवन से विरेचन हो जाय, वह मृदुकोष्ठ होता है।६६-६७।
विरेचयन्ति नैतानि क्रूरकोष्ठं कदाचन ।
भवति क्रूरकोष्ठस्य ग्रहणीयत्युल्बणानिला ॥ ६८ ॥
इन पदार्थों से 'क्रूरकोष्ठ' वाले व्यक्ति को कभी विरेचन नहीं होता।
क्योंकि 'क्रूरकोष्ठ' व्यक्ति की ग्रहणी (नाड़ी) अति प्रबल वायुवाली
होती है ॥ ६८ ॥
उदीर्णपित्ताऽल्पकफा ग्रहणी मन्दमारुता ।
मृदुकोष्ठस्य तस्मात्स सुविरेच्यो नरः स्मृतः ॥ ६९ ॥
मृदुकोष्ठ की ग्रहणी और पित्त प्रवल एवं मन्दकफ तथा अल्पवायु
युक्त है। इसलिये गुड़ आदि से उसे विरेचन हो जाता है ॥ ६९ ॥
स्नेह की व्यापत्तियां—
उदीर्णपित्ता ग्रहणी यस्य चाग्निवलं महत् ।
भस्मीभवति तस्याऽऽशु स्नेहः पीतोऽग्नितेजसा ॥ ७० ॥
स जग्ध्वा स्नेहमात्रां तामोजः प्रक्षारयन् बली ।
स्नेहाग्निरुत्तमां तृष्णां सोपसर्गामुदीरयेत् ॥ ७१ ॥
नालं स्नेहसमुद्भूत्य शमायान्नं सुगुर्वपि ।
स चेत्सुशीतं सलिलं नाऽऽसादयति दह्यते ॥ ७२ ॥
यथैवाऽऽशीविषः कक्षमध्यगः स्वविषाग्निना ।
अ० १३ ] सूत्रस्थानम् १६७
अ० १३ ] सूत्रस्थानम् १६७
जिसको ग्रहणी (अग्नि का अधिष्ठान-भूमि) प्रबल पित्तवाली हो (कफ
और वायु से युक्त न हो), और जिसका अग्निबल बढ़ा होता है, उस पुरुष
का पिया हुआ स्नेह अग्नि के तेज से शीघ्र भस्म हो जाता है। यह महा-
बलवान् जाठराग्नि पीये हुए स्नेह को जीर्ण करके फिर बलवान् बनकर ओज
को घटाती हुई, उपद्रवों से युक्त प्रबल प्यास को पैदा कर देती है। ऐसी
अवस्था में स्नेह के कारण बहुत बढ़ी हुई जाठराग्नि को शान्त करने के लिये
गुरु भोजन भी समर्थ नहीं होता। इसलिये स्नेहपान से प्रबल अग्नि वाले पुरुष
को यदि शीतल जल पीने के लिये नहीं दिया जाय तो वह इसी अग्नि से जलने
लगता है। जिस प्रकार कि घास फूस या कांटों के बीच में फंसा हुआ सांप
अपनी अग्नि रूपी अपने विष से स्वयं जलने लगता है और दुगुने क्रोध से
फुंकारें मारता है ॥ ७०-७२ ॥
व्यापत्तियों के उपाय कहते हैं—
अजीर्णे यदि तु स्नेहे तृष्णा स्याच्छर्दयेद्भिषक् ॥ ७३ ॥
शीतोदकं पुनः पीत्वा भुक्त्वा रूक्षान्नमुल्लिखेत् ।
न सर्पिः केवलं पित्तं पेयं सामे विशेषतः ॥ ७४ ॥
सर्वं ह्यनुरजेद्देहं हत्वा संज्ञां च मारयेत् ।
यदि स्नेह के पान में अजीर्णावस्था अर्थात् स्नेह के जीर्ण न हुए बिना
ही प्यास लगने लगे तब वैद्य स्नेह को वमन से बाहर करा देवे। इसके पीछे
शीतल जल और रूक्ष भोजन कराके फिर वमन करा देवे। इसलिये केवल
पित्त की प्रधानता में, विशेष कर आम सहित पित्त विकार में घी नहीं पीना
चाहिये। क्योंकि पित्त के तीक्ष्ण गुणवाला होने से सम्पूर्ण देह में व्याप्त होने
वाला घी रूप स्नेह सारे शरीर में फैल जायगा। शरीर में फैलकर उसको पीला
कर देता और चेतना नाश करके प्राण नाश कर देता है ॥ ७३-७४ ॥
तन्द्रा सोत्क्लेश आनाहो ज्वरः स्तम्भो विसंज्ञता ॥ ७५ ॥
कुष्ठानि कण्डूः पाण्डुत्वं शोफाशांस्यरुचिस्तृषा ।
जठरं ग्रहणीदोषः स्तेमित्यं वाक्संनिग्रहः ॥ ७६ ॥
शूलमामप्रदोषाश्च जायन्ते स्नेहविभ्रमात् ।
तत्राप्युल्लेखनं शस्तं स्वेदः कालप्रतीक्षणम् ॥ ७७ ॥
प्रति प्रांते व्याधिबलं बुद्ध्वा संस्रसनमेव च ।
तक्रारिष्टप्रयोगश्च रूक्ष-पानान्न-सेवनम् ॥ ७८ ॥
मूत्राणां त्रिफलायाश्च स्नेह-व्यापत्ति-भेषजम् ।
१६८ चरकसंहिता [ अ० १३
तन्द्रा (आलस्य), उत्क्लेश (वमन की इच्छा), आनाह (अफरा)
ज्वर, स्तम्भ (शरीर की जड़ता), संज्ञानाश, कुष्ठ, खाज, पाण्डुता, शोथ,
अर्श, अरुचि, प्यास, मरोड़ा, ग्रहणी रोग, स्तैमित्य (अंगों का गीले कपड़े में
लिपटने का सा भान होना, वा ऐंठन), वाणी का बन्द हो जाना, उदरशूल,
आमदोष, स्नेह के मिथ्यायोग के ये लक्षण हैं। इन लक्षणों के होने पर भी वमन
कराना चाहिये, स्वेद देना चाहिये, समय की प्रतीक्षा करनी (स्नेह दोष के
क्षय होने तक भोजन नहीं करना) चाहिये, प्रत्येक व्याधि का बल विचार
करके जो व्याधि संशमन योग्य हो उसका संशमन करना चाहिये। इसी प्रकार
'तक्रारिष्ट' का प्रयोग, रूक्ष (सूखा) खान-पान देना आठों प्रकार के मूत्रों
और त्रिफला का सेवन करना स्नेह जन्य रोगों की चिकित्सा है ॥ ७५-७८ ॥
रोग होने के कारण—
अकाले चाहितश्चैव मात्रया न च योजितः ॥ ७९ ॥
स्नेहो मिथ्योपचाराच्च व्यापद्येतातिसेवितः ।
स्नेह लेने के ठीक समय पर स्नेह न लेने से, जो स्नेह जिस पुरुष के
लिये हितकारी नहीं है उसके सेवन से, उचित मात्रा में न लेने से, स्नेह के
मिथ्या, अनुचित उपयोग से, और स्नेह के अति सेवन से स्नेह जन्य विकार
उत्पन्न होते हैं ॥ ७९ ॥
स्नेहात्प्रस्कन्दनं जन्तुस्त्रिरात्रोपरतः पिबेत् ॥ ८० ॥
स्नेहवद् द्रवमुष्णं च त्र्यहं भुक्त्वा रसौदनम् ।
एकाहोपरतस्तद्वद्भुक्त्वा प्रच्छर्दनं पिबेत् ॥ ८१ ॥
स्नेह पान के पीछे पुरुष तीन रात तक ठहरे। इन तीन दिनों में स्नेह
मिश्रित द्रव, उष्ण मांस रस युक्त भात खाकर विरेचन लेवे। एक दिन जिसने
आराम किया ऐसा पुरुष पहिले की भांति भोजन करके वमन (कारक द्रव्य)
पीये ॥ ८०-८१ ॥
स्याच्चसंशोधनार्थायै वृत्तिः स्नेहे विरिक्तवत् ।
संशमन के उद्देश्य से स्नेहपान करने में विरेचन लिये हुए के समान
व्यवहार करना चाहिये ।
विचारणा का प्रयोग—
स्नेहद्विषः स्नेहनित्या मृदुकोष्ठाश्च ये नराः ॥ ८२ ॥
कृशासहा मद्यनित्यास्तेषामिष्टा विचारणा ।
लाव-तित्तिर-मायूर-हांस-वाराह-कौक्कुटाः ॥ ८३ ॥
अ० १३ ] सूत्रस्थानम् १६६
अ० १३ ] सूत्रस्थानम् १६६
गव्या जौरभ्र मात्स्याश्च रसाः स्युः स्नेहने हिताः ।
यव-कोल-कुलत्थाश्च स्नेहाः सगुडशर्कराः ॥ ८४ ॥
दाडिमं दधि सव्योषं रस-संयोग-संग्रहः ।
जो मनुष्य स्नेह से द्वेष करते हों, जो नित्य प्रति स्नेह का व्यवहार करते
हों, मृदुकोष्ठ वाले, कष्ट को सहन न करने वाले, जो नित्य मदिरासेवी हों,
उनमें विचारणा का प्रयोग करना चाहिये । प्रयोग करने की विधि कहते हैं—
बटेर, मोर, हंस, सुअर, मुर्गा, हाथी, बकरा, मेंढा और मछली इनके मांसों का
रस स्नेहन क्रिया में हितकारा है । इन मांसों का संस्कार करने के लिये जौ,
बेर, कुलथी, घी या तेल, गुड़, शक्कर अनारदाना, दही, सोंठ, काली मिर्च,
पिप्पली, ये यथायोग्य मिलाने चाहियें ॥ ८२-८४ ॥
स्नेहयन्ति तिलाः पूर्वं जग्धाः सस्नेहफाणिताः ॥ ८५ ॥
कृशराश्च बहुस्नेहास्तिलकाम्बलिकस्तथा ।
घी में (स्नेह में) भून कर बनाये हुए तिलकुट को भोजन से पूर्व खाने
से शरीर का स्नेहन करते हैं । इसी प्रकार बहुत स्नेह वाली खिचड़ी तथा
तिल युक्त 'काम्बलिक अर्थात् यूष'—भोजन से पूर्व खाने से शरीर का स्नेहन
करते हैं ॥ ८५ ॥
फाणितं शृङ्गवेरं च तैलं च सुरया सह ॥ ८६ ॥
पिवेदूक्षो भृतैर्मासैर्जीर्णेऽश्नीयाच्च भोजनम् ।
फाणित (आधा पका गन्ने का रस, राब), अदरख, और तैल इन तीनों
को एक करके, शराब में मिलाकर रूक्ष व्यक्ति पीये । इसके जीर्ण होने पर भुने
हुए मांस से भोजन खाये ॥ ८६ ॥
तैलं सुराया मण्डेन वसां मज्जानमेव वा ॥ ८७ ॥
पिवेत्सफाणितं क्षीरं नरः स्निह्यति वातिकः ।
वातप्रकृति का मनुष्य मद्य, या मण्ड के साथ तैल, वसा या मज्जा को
मिलाकर पीये तो स्नेहन होता है । वात प्रकृति का आदमी राब के साथ दूध
को पीये तो भी स्नेहन होता है ॥ ८७ ॥
धारोष्णं स्नेहसंयुक्तं पीत्वा सशर्करं पयः ॥ ८८ ॥
नरः स्निह्यति पीत्वा वा सरं दध्नः सफाणितम् ।
धारोष्ण, ताजे दुहे हुए दूध को शर्करा एवं घी के साथ पीने से शरीर का
तुरन्त स्नेहन होता है । अथवा राब के साथ दही की मलाई खाने से भी
स्नेहन तुरन्त होता है ॥ ८८ ॥
१७० चरकसंहिता [अ० १३
पाञ्चप्रसृतिकी पेया पायसो माषमिश्रकः ॥ ८९ ॥
क्षीरसिद्धो बहुस्नेहः स्नेहयेदचिरात्ररम् ।
सर्पिस्तैल-वसा-मज्जा-तण्डुल-प्रसृतैः शृता ॥ ९० ॥
पाञ्चप्रसृतिकी पेया पेया स्नेहनमिच्छता ।
आगे कही जाने वाली 'पांचप्रसृतिका पेया' को पीकर मनुष्य शीघ्र ही
स्निग्ध बन जाता है । उड़दों को चावलों में मिलाकर घी आदि स्नेह में खूब
भून कर दूध में पकाई (घी से युक्त) खीर जल्दी ही स्निग्ध कर देती है।
पांचप्रसृति की पेया-घी, तैल, वसा, मज्जा और चावल प्रत्येक आठ आठ तोले
लेकर छः गुने जल में पकावे । इसका नाम 'पाञ्चप्रसृतिकी पेया' है। स्नेहन
की इच्छा करने वाले व्यक्ति को इसका सेवन करना चाहिये ॥८९-९०॥
ग्राम्यानूपौदकं मांसं गुडं दधि पयस्तिलान् ।
कुष्ठी शोथी प्रमेही च स्नेहने न प्रयोजयेत् ॥ ९१ ॥
स्नेहैर्यथास्वं तान् सिद्धैः स्नेहयेदविकारिभिः ।
पिप्पलीभिर्हरीतक्या सिद्धैस्त्रिफलयाऽपि वा ॥ ९२ ॥
कुष्ठ रोगी, शोथ (सोज) रोगी, प्रमेह रोगी-इनके स्नेहन के लिए ग्राम्य
निन्दित मांस, जलीय मांस, गुड़, दही, दूध और तिल इनका प्रयोग नहीं करना
चाहिये। क्योंकि ये वस्तुयें इनको बढ़ाती हैं। इन रोगियों के लिये, इन रोगों
को नाश करने वाली औषधियों से सिद्ध किये हुए घृत आदि स्नेह, एवं इन
रोगियों के लिये विकार न करने वाले स्नेहों से इनकी चिकित्सा करनी
चाहिये । अथवा पिप्पली के कल्क या हरीतकी (हरड़) के कल्क अथवा
त्रिफला के कल्क द्वारा सिद्ध घृतादि स्नेह द्वारा कुष्ठ-रोगी, शोथ-रोगी, प्रमेह-
रोगी का स्नेहन करना चाहिये ॥ ९१-९२ ॥
द्राक्षाऽमलक-यूषाभ्यां दध्ना चाम्लेन साधयेत् ।
व्योषगर्भं भिषक् स्नेहं पीत्वा स्निह्यति तन्नरः ॥ ९३ ॥
द्राक्षायूष, आंवले का यूष, और खट्टी दही (ये मिलित चार भाग) सोंठ,
मरिच और पिप्पली (मिलित एक भाग) इनका कल्क डाल कर उचित मात्रा
से घृत सिद्ध करना चाहिये। इस घृत के पान करने से मनुष्य का स्नेहन
होता है ॥ ९३ ॥
यव-कोल-कुलत्थानां रसाः क्षीरं सुरा दधि ।
क्षारः सर्पिश्च तत्सिद्धं स्नेहनीयं घृतोत्तमम् ॥ ९४ ॥
जौ, बेर, कुलथी, प्रत्येक का क्वाथ (रस), दूध, दही और मद्य, क्षार
अ० १३ ] सूत्रस्थानम् १७१
अ० १३ ] सूत्रस्थानम् १७१
और घी, इनको मिला कर घी सिद्ध करना चाहिये । यह स्नेहन के लिये
श्रेष्ठ है ॥ ६४ ॥
तैल-मज्ज-वसा-सर्पिर्बदर-त्रिफला-रसैः ।
योनि-शुक्र-प्रदोषेषु साधयित्वा प्रयोजयेत् ॥ ६५ ॥
तैल, वसा, मज्जा, घी, बेर और त्रिफला ( हरड़, बहेड़ा, आंवला ) इनका
रस ( क्वाथ ) में ( पृथक् २ वा मिलित चारों स्नेह सिद्ध करने चाहिये ) । यह
स्नेह योनिरोग और वीर्यरोगों में स्नेहन कार्य के लिये उपयोगी हैं ॥६५॥
गृह्णात्यम्बु यथा वस्त्रं प्रस्रवत्यधिकं यथा ।
तथाऽग्निर्जीर्यति स्नेहं तथा स्रवति चाधिकम् ॥ ६६ ॥
जिस प्रकार वस्त्र पानी का उचित मात्रा का ही ग्रहण करता है और
अधिक पानी निकल जाता है; इसी प्रकार अग्नि स्नेह की योग्य मात्रा को ही
जीर्ण करतो है, अधिक मात्रा निकल जाती है ॥६६॥
यथा वाऽक्लेद्य मृत्पिण्डमासिक्तं त्वरया जलम् ।
स्रवति संस्रते स्नेहस्तथा त्वरितसेवितः ॥ ६७ ॥
लवणोपहिताः स्नेहाः स्नेहयन्त्यचिरान्नरम् ।
तद्ध्यभिष्यन्द्यरूक्षं च सूक्ष्ममुष्णं व्यवायि च ॥ ६८ ॥
स्नेहमग्रे प्रयुञ्जीत ततः स्वेदमन्तरम् ।
स्नेहस्वेदोपपन्नस्य संशोधनमतरेत् ॥ ६६ ॥
जिस प्रकार मिट्टी के ढेले पर जल्दी से गिरा हुआ बहुतसा पानी, ढेले को
गीला करके बह जाता है, और ढेला गलने लगता है, उसी प्रकार जल्दी से
अधिक मात्रा में पिया स्नेह जल्दी से गुदा मार्ग से बाहर बह जाता है । जितने
भी स्नेह कहे हैं, वे सब सैन्धव-लवण के साथ सेवन करने से मनुष्य को शीघ्र
ही स्निग्ध कर देते हैं । क्योंकि नमक अभिष्यन्दि, ( द्रवकारक ) अरूक्ष, सूक्ष्म,
उष्ण और व्यवायी गुण वाला है । ❉ संशोधन करने से पूर्व स्नेहन करना
चाहिये । इसके पीछे स्वेदन करना चाहिये । स्नेह और स्वेदन कर चुकने पर
पीछे संशोधन अथवा संशमन चिकित्सा करनी चाहिये ॥६७-६६॥
❉ अभिष्यन्दि होने से दोषसमूह को तोड़ता है । रूक्ष न होने से स्नेहन
करता है । सूक्ष्म होने से शरीर के सूक्ष्म भागों में घुस जाता है । गरम होने से
पिये हुए स्नेह को शीघ्र जीर्ण करता है । व्यवायी होने से स्नेह के साथ सारे
शरीर में फैल जाता है ।
स्नेहाः स्नेहविधिः कृत्स्नो व्यापत् सिद्धिः सभेषजा ।
१७२ चरकसंहिता [ अ० १४
तत्र श्लोकः ।
स्नेहाः स्नेहविधिः कृत्स्नो व्यापत् सिद्धिः सभेषजा ।
यथाप्रश्नं भगवता व्याहृतं चान्द्रभागिना ॥ १०० ॥
स्नेहों के प्रकार, सम्पूर्ण स्नेहविधि, स्नेह की व्यापत्तियाँ और उनकी
भेषज-औषध समेत सिद्धि भगवान् पुनर्वसु आत्रेय ने अग्निवेश के प्रश्नानु-
सार सब कह दी ॥१००॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने कल्पनाचतुष्के
स्नेहाध्यायो नाम त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥
चतुर्दशोऽध्यायः ।
अथातः स्वेदाध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
अब (स्नेह कर्म के उपरान्त) स्वेद सम्बन्धी अध्याय का व्याख्यान करते
हैं, जैसा भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ २ ॥
अतः स्वेदाः प्रवक्ष्यन्ते यैर्यथावत्प्रयोजितैः ।
स्वेदसाध्याः प्रशाम्यन्ति गदा वातकफात्मकाः ॥ ३ ॥
अब स्वेद विधियों का उपदेश करेंगे, जिनका उचित प्रकार से करने पर
स्वेदन से शान्त होने वाले, वात-कफ-जन्य रोग शान्त हो जाते हैं ॥ ३ ॥
स्नेहपूर्वं प्रयुक्तेन स्वेदेनाऽऽवर्जितेऽनिले ।
पुरीष-मूत्र-रेतांसि न सज्जन्ति कथञ्चन ॥ ४ ॥
पहले स्नेहन कार्य करके वायु को शमन कर लेने पर शरीर में मल, मूत्र
और वीर्य ये किसी भी प्रकार रुके नहीं रहते ॥ ४ ॥
शुष्काण्यपि हि काष्ठानि स्नेहस्वेदोपपादनैः ।
नमयन्ति यथान्यायं किं पुनर्जीवतो नरान् ॥ ५ ॥
सूखे हुए काठ (बांस आदि लकड़ियां) भी स्नेहन और स्वेदन द्वारा
मन के अनुसार मोड़ी या सांधी की जा सकती हैं, फिर जीवित (रसयुक्त और
कोमल) मनुष्यों को वैद्य क्या स्नेहन और स्वेदन द्वारा इच्छानुसार परिवर्तित
नहीं कर सकेगा ? ॥ ५ ॥
रोगर्तु-व्याधितापेक्षो नात्युष्णोऽतिमृदुर्न च ।