सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

पृष्ठ 181, कुल 639 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 181

अ० १३ ] सूत्रस्थानम् १६३
करने का अभ्यास है वे शीतकाल ( हेमन्त शिशिर ) में दिन के समय तैल
का पान करें ॥४४-४६॥
वातातपसहा ये च रूक्षा भाराध्वकर्शिताः ।
संशुष्क-रेतो-रुधिरा निष्पीत-कफ-मेदसः ॥ ४७ ॥
अस्थि-सन्धि-शिरा-स्नायु-मर्म-कोष्ठ-महारुजः ।
बलवान्मारुतो येषां खानि चाऽऽवृत्य तिष्ठति ॥ ४८ ॥
महच्चाग्निबलं येषां वसा-सात्म्याश्च ये नराः ।
तेषां स्नेह्यितव्यानां वसापानं विधीयते ॥ ४९ ॥
वायु और धूप को सहन करने वाले, रूक्ष प्रकृति, भार के उठाने या मार्ग
चलने वाले, परिश्रम के कारण जो निर्बल हो गये, जिनका वीर्य या रक्त सूख
गया है; कफ क्षीण हो, मेद क्षीण हो, जिनको अस्थि; सन्धि-शिरा, स्नायु मर्म
कोष्ठ के भयानक रोग हों, जिनकी इन्द्रियों को बलवान् वायु घेरे रहता है,
जिनका अग्निबल-जाठराग्नि बलवान् हो, और जो वसा सेवन करने के
अभ्यासी हों, ऐसे पुरुष स्नेहन करने के लिये वसा (चर्बी) का पान करें ॥४७-४६।
दीप्ताग्नयः क्लेशसहा घस्मराः स्नेहसेविनः ।
वातार्ताः क्रूर-कोष्ठाश्च स्नेह्या मज्जानमाप्नुयुः ॥ ५० ॥
जिनकी जाठराग्नि दीप्त है, जो क्लेश को सहन कर सकते हों, खूब खाने
वाले, स्नेहसेवन के अभ्यासी; वात रोगी और क्रूरकोष्ठ वाले व्यक्तियों को मज्जा
द्वारा स्नेहन करना चाहिये ॥५०॥
येभ्यो येभ्यो हितो यो यः स्नेहः स परिकीर्तितः ।
स्नेहनस्य प्रकर्षो तु सप्तरात्रं त्रिरात्रकौ ॥ ५१ ॥
जिन जिन पुरुषों के लिये जो जो स्नेह हितकारी हैं, उनके लिये उसी स्नेह
का उपदेश किया है। स्नेह की सेवन विधि दो प्रकार की है । एक सात रात
की और दूसरी तीन रात की । इनमे क्रूरकोष्ठ व्यक्तियों के लिये सात रात, और
मृदुकोष्ठ व्यक्ति के लिये तीन रात हैं* ॥५१॥
स्वेद्याः शोधयितव्याश्च रूक्षा वातविकारिणः ।
व्यायाम-मद्य-स्त्रीनित्याः स्नेह्याः स्युर्ये च चिन्तकाः ॥ ५२ ॥
स्नेहन के योग्य व्यक्ति—जो व्यक्ति स्वेद देने या संशोधन के योग्य हैं;
*जैसा आगे कहेंगे "त्र्यहावरं सप्तदिनं परन्दु स्निग्धो नरः स्वेदयितव्य इष्टः ।
नातः परं स्नेहनमादिशन्ति" ।