चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 187, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० १३ ] सूत्रस्थानम् १६६
गव्या जौरभ्र मात्स्याश्च रसाः स्युः स्नेहने हिताः ।
यव-कोल-कुलत्थाश्च स्नेहाः सगुडशर्कराः ॥ ८४ ॥
दाडिमं दधि सव्योषं रस-संयोग-संग्रहः ।
जो मनुष्य स्नेह से द्वेष करते हों, जो नित्य प्रति स्नेह का व्यवहार करते
हों, मृदुकोष्ठ वाले, कष्ट को सहन न करने वाले, जो नित्य मदिरासेवी हों,
उनमें विचारणा का प्रयोग करना चाहिये । प्रयोग करने की विधि कहते हैं—
बटेर, मोर, हंस, सुअर, मुर्गा, हाथी, बकरा, मेंढा और मछली इनके मांसों का
रस स्नेहन क्रिया में हितकारा है । इन मांसों का संस्कार करने के लिये जौ,
बेर, कुलथी, घी या तेल, गुड़, शक्कर अनारदाना, दही, सोंठ, काली मिर्च,
पिप्पली, ये यथायोग्य मिलाने चाहियें ॥ ८२-८४ ॥
स्नेहयन्ति तिलाः पूर्वं जग्धाः सस्नेहफाणिताः ॥ ८५ ॥
कृशराश्च बहुस्नेहास्तिलकाम्बलिकस्तथा ।
घी में (स्नेह में) भून कर बनाये हुए तिलकुट को भोजन से पूर्व खाने
से शरीर का स्नेहन करते हैं । इसी प्रकार बहुत स्नेह वाली खिचड़ी तथा
तिल युक्त 'काम्बलिक अर्थात् यूष'—भोजन से पूर्व खाने से शरीर का स्नेहन
करते हैं ॥ ८५ ॥
फाणितं शृङ्गवेरं च तैलं च सुरया सह ॥ ८६ ॥
पिवेदूक्षो भृतैर्मासैर्जीर्णेऽश्नीयाच्च भोजनम् ।
फाणित (आधा पका गन्ने का रस, राब), अदरख, और तैल इन तीनों
को एक करके, शराब में मिलाकर रूक्ष व्यक्ति पीये । इसके जीर्ण होने पर भुने
हुए मांस से भोजन खाये ॥ ८६ ॥
तैलं सुराया मण्डेन वसां मज्जानमेव वा ॥ ८७ ॥
पिवेत्सफाणितं क्षीरं नरः स्निह्यति वातिकः ।
वातप्रकृति का मनुष्य मद्य, या मण्ड के साथ तैल, वसा या मज्जा को
मिलाकर पीये तो स्नेहन होता है । वात प्रकृति का आदमी राब के साथ दूध
को पीये तो भी स्नेहन होता है ॥ ८७ ॥
धारोष्णं स्नेहसंयुक्तं पीत्वा सशर्करं पयः ॥ ८८ ॥
नरः स्निह्यति पीत्वा वा सरं दध्नः सफाणितम् ।
धारोष्ण, ताजे दुहे हुए दूध को शर्करा एवं घी के साथ पीने से शरीर का
तुरन्त स्नेहन होता है । अथवा राब के साथ दही की मलाई खाने से भी
स्नेहन तुरन्त होता है ॥ ८८ ॥