चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
१३४ चरकसंहिता [अ० ११
परमात्मा के केवल शरीर का बनाने वाला मानते हो तो तुम्हारे और हमारे
सिद्धान्त में कोई भेद नहीं। इसलिये आत्मा नित्य है, वह समय २ पर स्थूल
शरीर को छोड़कर परलोक में कर्मों का भोग करके भोग की समाप्ति पर और
भोग्य कर्म फलों के भोग के लिये पुनः उत्पन्न होता है ॥१४॥
न परीक्षा न परीक्ष्यं न कर्ता कारणं न च।
न देवा नर्षयः सिद्धाः कर्म कर्मफलं न च ॥ १५ ॥
नास्तिकस्यास्ति नैवाऽऽत्मा यदृच्छोपहतात्मनः ।
पातकेभ्यः परं चैतत्पातकं नास्तिकग्रहः ॥ १६ ॥
यदृच्छा भी जन्म का कारण नहीं है, क्योंकि यदृच्छावादी के मत में न
कोई परीक्षा (प्रमाण) है, और न कोई परीक्ष्य अर्थात् प्रमेय वस्तु है। इसलिये
माता, पिता, कन्या, बहिन, पत्नी, गुरु, वृद्ध, तपस्वी इत्यादि परीक्षणीय वस्तु
के अभाव में मनमाना आचार होना सम्भव है और कर्म भी नहीं है, जिसका
कि अच्छा या बुरा फल मिलेगा, इसलिये कर्म फल भी नहीं है। न कर्म का
कोई कर्त्ता है, जो कर्म करे। यह सब यदृच्छा से ही, बिना कारण होता है,
कारण के न होने से मनचाहा आचरण करने में कोई दोष नहीं होगा, इससे
गुरु, सिद्ध पुरुषों में पूज्यापूज्य भाव भी नहीं रहेगा। वह माता, कन्या आदि
में दारवत् बुद्धि कर सकेगा, इसलिये जिसका आत्मा यदृच्छावाद से नष्ट हो
जाता है ऐसे नास्तिक का आत्मा नहीं रहता। अतः नास्तिक होना सब पातकों
से बड़ा पातक है ॥ १५-१६ ॥
तस्मान्मतिं विमुच्यैताममार्गप्रसृतां बुधः ।
सतां बुद्धिप्रदीपेन पश्येत्सर्वं यथातथम् ॥ १७ ॥ इति ।
इसलिये बुद्धिमान् को चाहिये कि उल्टे मार्ग में जाने वाली इस विपरीत
बुद्धि को छोड़ दे और सज्जन पुरुषों की बुद्धि रूप दीपक से सब वस्तुओं को
ठीक २ रूप में देखे ॥ १७ ॥
द्विविधमेव खलु सर्वं—सच्चासच्च, तस्य चतुर्विधा परीक्षा आप्तो-
पदेशः प्रत्यक्षमनुमानं युक्तिश्चेति ॥ १८ ॥
संसार में जो कुछ दीख पड़ता है, वह सब दो प्रकार का है, एक सत्
और दूसरा असत् । इस की परीक्षा चार प्रकार से होती है, १. आप्तोपदेश
२. प्रत्यक्ष ३. अनुमान और ४. युक्ति ।
आप्तास्तावत् —
रजस्तमोभ्यां निर्मुक्तास्तपो-ज्ञान-बलेन ये ।
येषां त्रैकालममलं ज्ञानमव्याहतं सदा ॥ १९ ॥
अ० ११ ] सूत्रस्थानम् १३५
अ० ११ ] सूत्रस्थानम् १३५
आप्ताः शिष्टा विबुद्धास्ते तेषां वाक्यमसंशयम् ।
सत्यं, वक्ष्यन्ति ते कस्मादसत्यं नीरजस्तमाः ॥ २० ॥
जो पुरुष तप और ज्ञान के बल से रजोगुण और तमोगुण से मुक्त हो
चुके हैं, केवल सत्त्व गुण ही जिन में रह गया है, उनका ज्ञान भूत, भविष्य
और वर्त्तमान तीनों कालों में विशुद्ध और कभी भी बाधित नहीं होता । ऐसे
पुरुष 'आप्त', 'शिष्ट' और 'विबुद्ध' होते हैं, इन के वाक्य बिना सन्देह के होते
हैं । ये पुरुष सदा सत्य ही कहेंगे, जो पुरुष रजस् और तमस् से रहित हैं वे
असत्य कैसे बोल सकते हैं ? ॥ १६-२० ॥
प्रत्यक्ष का लक्षण—
आत्मेन्द्रिय-मनोऽर्थानां संनिकर्षात्प्रवर्त्तते ।
व्यक्ता तदात्वे या बुद्धिः प्रत्यक्षं सा निरुच्यते ॥ २१ ॥
आत्मा, इन्द्रिय, मन और अर्थ ( पदार्थ ) इन चारों का एक साथ संयोग
होने से जो ज्ञान उत्पन्न होता है, उस को 'प्रत्यक्ष' कहते हैं ॥ २१ ॥
अनुमान—
प्रत्यक्षपूर्वं त्रिविधं त्रिकालं चानुमीयते ।
वह्निर्निगूढो धूमेन मैथुनं गर्भदर्शनात् ॥ २२ ॥
एवं व्यवस्यन्त्यतीतं, बीजात्फलमनागतम् ।
दृष्ट्वा बीजात्फलं जातमिहैव सदृशं बुधाः ॥ २३ ॥
प्रथम प्रत्यक्ष प्रमाण से देखकर तीन प्रकार से कार्य-लिंगानुमान, कारण-
लिंगानुमान और कार्य-कारण लिंगानुमान होता है, भूत, भविष्यत्, और
वर्त्तमान इन तीनों समय में परोक्ष का अनुमान किया जाता है । जैसे कि
छिपी अग्नि को धुंआ देखकर जानते हैं और गर्भ को देखकर मैथुन कर्म का
ज्ञान कर लेते हैं । इसी प्रकार से अतीत काल का ज्ञान अनुमान से कर लेते
हैं और जिस प्रकार बीज को देखकर अनागत फल का अनुमान हो जाता है,
जैसा बीज होता है, वैसा ही फल लगता है । इसी प्रकार भविष्य काल का भी
अनुमान से ज्ञान करते हैं ॥ २२-२३ ॥
युक्ति—
जल-कर्षण-बीजर्त्तु-संयोगात्सस्य-संभवः ।
युक्तिः षड्धातु-संयोगाद् गर्भाणां संभवस्तथा ॥ २४ ॥
मथ्य-मन्थन-मन्थान-संयोगादग्निसंभवः ।
युक्तियुक्ता चतुष्पाद-संपद्व्याधि-निबर्हणी ॥ २५ ॥
१३६ चरकसंहिता [ अ० ११
पानी, कर्षण ( हल चलाया हुआ खेत ), बीज और ऋतु इन चारों के
संयोग से अन्न उत्पन्न होता है। उत्तम क्षेत्र में समय पर उत्तम बीज पानी से
सींचकर बोने से अनाज होता है। इसलिये पृथ्वी, अप्, तेज, वायु और
आकाश एवं चेतना इन छः के संयोग से गर्भ का होना सम्भव है; यह
युक्ति है। इसी प्रकार 'मन्थ्य' अरणी का अधः काष्ठ (नीचे की लकड़ी), मन्थन
( मथने का डण्डा ) और ( मन्थान ) मथनी चलाने वाला कर्ता, इन तीनों
के संयोग से अग्नि उत्पन्न होना सम्भव है। इसी प्रकार चतुष्पाद ( चिकित्सा
के चारों अङ्ग की ) युक्ति से युक्त सम्पत् रोग को नाश करने वाली है। यदि
चिकित्सा के चारों अंग ठीक तरह से प्रयुक्त किये जायें, तो रोग मिटना
सम्भव है ॥ २४-२५ ॥
बुद्धिः पश्यति या भावान् बहु-कारण-योगजान् ।
युक्तिस्त्रिकाला सा ज्ञेया त्रिवर्गः साध्यते यया ॥ २६ ॥
एषा परीक्षा नास्त्यन्या यया सर्वं परीक्ष्यते ।
परीक्ष्यं सदसच्चैव तया चास्ति पुनर्भवः ॥ २७ ॥
जो बुद्धि बहुत प्रकार के कारणों से उत्पन्न पदार्थों को ज्ञान के लिए
देखती है उस बुद्धि को 'युक्ति' कहते हैं। यह दृष्टि तीनों कालों के विषय को
देखती है, इस युक्ति से त्रिवर्ग अर्थात् धर्म, अर्थ और काम तीनों पुरुषार्थ
सिद्ध होते हैं। यह चार प्रकार की ( आप्तोपदेश, प्रत्यक्ष, अनुमान और युक्ति )
परीक्षा है, इसमे भिन्न और परीक्षा नहीं है। इस चार प्रकार की परीक्षा से
सब कुछ सत्, असत्, भाव, अभाव जो कुछ ज्ञेय है, वह सब जाना जाता है।
सत् असत् की परीक्षा करके ही जाना गया है कि पुनर्भव होता है ॥ २६-२७ ॥
तत्राऽऽप्तागमस्तावद्वेदः, यश्चान्योऽपि कश्चिद्वेदादर्थादविपरीततः परी-
क्षकैः प्रणीतः शिष्टानुमतो लोकानुग्रह-प्रवृत्तः शास्त्र-वादः स चाऽऽप्तागमः ।
आप्तागमादुपलभ्यते-दान-तपो-यज्ञ-सत्याहिंसा-ब्रह्मचर्याण्यभ्युदय-निः-
श्रेयस-कराणीति । न चानिवृत्त-सत्त्व-दोषाणामदोषैर पुनर्भवो धर्मद्वारेषू-
पदिश्यते । धर्मद्वारावहितैश्च व्यपगत-भय-राग-द्वेष-लोभ-मोह-मानैर्ब्रह्म-
परैराप्तैः कर्मविद्भिरनुपहत-सत्त्व-बुद्धि-प्रचारैः पूर्वैः पूर्वतरैर्महर्षिभिर्दिव्य-
चक्षुभिर्दृष्टोपदिष्टः पुनर्भव इति व्यवस्येदेवम् ॥ २८ ॥
आप्त पुरुषों का आगम वेद ( ऋग्, यजुः, साम और अथर्व ) हैं।
वेदों के सिवाय और भी कोई अन्य जो कि वेद के अर्थ के अनुकूल, परीक्ष-
से बनाया हुआ शिष्ट पुरुषों से अनुमत, जनसमाज के कल्याण के लिये प्रवृ-
अ० ११] सूत्रस्थानम् १३७
अ० ११] सूत्रस्थानम् १३७
जो अन्य ज्योतिष, व्याकरण, आयुर्वेद स्मृति आदि हैं, वे भी आप्नागम अर्थात्
शब्द प्रमाण हैं। आप्तागम से भी जाना जाता है कि ज्ञान, तप (द्वन्द्व-सहि-
ष्णुता), यज्ञ (अग्निहोत्रादि), सत्य अहिंसा, ब्रह्मचर्य्य आदि कर्म अभ्युदय
(इस लोक में कल्याण) और निःश्रेयस (परलोक में मङ्गल) करने वाले हैं।
मनोदोष, रजम् और तमस् जिन के शान्त नहीं हो गये उन रजोगुणी या तमो-
गुणी पुरुषों को अपुनर्भव नहीं कहा गया, अर्थात् रजोगुणी या तमोगुणी पुरुषों का
पुनर्जन्म होता है। ऐसा धर्म शास्त्रों में उपदेश किया गया है। धर्मशास्त्रों में
सावधान, राग, मोह, द्वेष, भय, लोभ, मोह, मान से रहित, ब्रह्मचारी, आप्त
विद्वान्, कर्म योग को जानने वाले, जिन के मन, बुद्धि एवं प्रचार (व्यवहार)
ठीक बने हुए हैं, ऐसे अति प्राचीन महर्षियों ने दिव्य चक्षुओं से देखकर
निश्चयपूर्वक पुनर्जन्म का उपदेश किया है, इसलिये उनका निश्चय सत्य
करके जाने ॥ २८ ॥
प्रत्यक्षमपि चोपलभ्यते-मातापित्राविसदृशान्यपत्यानि, तुल्यसंभ-
वानां वर्ण-स्वराकृति-सत्त्व-बुद्धि-भाग्यविशेषाः, प्रवरावर-कुल-जन्म,
दास्यैश्वर्यम्, सुखासुखमायुः, आयुषो वैषम्यम्, इहाकृतस्याप्राप्तिः, अशि-
क्षितानां च रुदित-स्तन-पान-हास-त्रासादीनां च प्रवृत्तिः, लक्षणोत्पत्तिः,
कर्मसामान्ये फलविशेषः, मेधा कचित्कचित्कर्मण्यमेधा, जातिस्मरणम्,
इहाऽऽगमनमितश्च्युतानां च भूतानां समदर्शने प्रियाप्रियत्वम् ॥२६॥
प्रत्यक्ष से भी जाना जाता है कि पुनर्जन्म है, माता पिता से विभिन्न
प्रकृति के पुत्र (रूपवान् माता पिता का काला पुत्र) होते हैं। एक ही माता
पिता के दो पुत्रों में सगे भाइयों में रंग, स्वर, आकृति, चेहरा, मन, ज्ञान और
भाग्य, प्रारब्ध भिन्न होते हैं, श्रेष्ठ और नीच कुल में जन्म होते हैं। किसी की
दासता और किसी की ऐश्वर्य-सम्पत्ति होती है, कोई सुख पूर्वक जिन्दगी
बसर करता है, कोई दुःख से जीवन व्यतीत करता है, आयु की विषमता, थोड़ा
जीना या अधिक देर जीना, यहां किए कर्म का फल न मिलना, पढ़े सीखे
बिना ही रोने, दुग्ध पान (स्तन्य पान), हँसने डरने आदि कार्यों में प्रवृत्ति
का होना, शरीर पर राज्यचिह्न या दारिद्र्यसूचक चिह्नों का होना, एक सदृश
काम करने पर भी फल में भिन्नता का रहना, कहीं पर बुद्धि का होना और
कहीं पर बुद्धि का न होना, जाति, पूर्व जन्म वृत्तान्त का स्मरण करना, यहां
से मरने पर फिर यहां आना, एक समान एक दृष्टि से देखने पर प्रिय एवं
अप्रिय, राग-द्वेष बुद्धि का उत्पन्न होना ये सब बातें पुनर्जन्म को सिद्ध करती हैं॥
१३८ चरकसंहिता [ अ० ११
अत एवानुमीयते—यत्स्वकृतमपरिहार्यमविनाशि पौर्वदेहिकं
दैवसंज्ञकमानुबन्धिकं कर्म, तस्यैतत्फलम्, इतश्चान्यद्भविष्यतीति ।
फलाद्बीजमनुमीयते, फलं च बीजात् ॥ ३० ॥
उपरोक्त बातों को देखकर ही अनुमान भी किया जाता है कि अपना किया
हुआ कर्म नहीं छोड़ा जा सकता, उसका विनाश नहीं हो सकता, पूर्व जन्म में
किया हुआ 'भाग्य' नामक आनुबन्धिक अर्थात् आत्मा के साथ परलोक में भी
निश्चित रूप से बँधा हुआ है । उसी का यह फल है जो कि माता पिता से
पुत्र भिन्न प्रकृति के उत्पन्न होते हैं इत्यादि । यहां किये कर्म से दूसरा जन्म
होगा, बीज से फल का अनुमान होता है, कर्म से पुनर्जन्म का और पुनर्जन्म
से कर्म का अनुमान होता है ॥ ३० ॥
युक्तिश्चैषा—षड्धातुसमुदायाद् गर्भजन्म, कर्तृकरणसंयोगात्
क्रिया, कृतस्य कर्मणः फलं नाकृतस्य, नाङ्कुरोत्पत्तिरबीजात्, कर्म-
सदृशं फलं नान्यस्माद्बीजादन्यस्योत्पत्तिरिति युक्तिः ॥ ३१ ॥
युक्ति भी है कि—पृथ्वी, अप्, तेज, वायु, आकाश और चेतना इन छः
धातुओं के समुदाय मिलने से गर्भ उत्पन्न होता है और कर्त्ता और करण
(साधन) के मिलने से क्रिया उत्पन्न होती है, कर्त्ता आत्मा, करण स्त्री पुरुष
उनके संयोग से गर्भाशय रूप क्षेत्र में जन्म होता है । किये हुए ही कर्म का
फल होता है, न किये हुए कर्म का फल नहीं होता । जिस प्रकार बिना बीज
के अंकुर उत्पन्न नहीं होता वैसे कर्म के अनुसार समान ही फल मिलता है
यथा—एक जाति के बीज से दूसरी जाति का फल उत्पन्न नहीं होता ॥ ३१ ॥
एवं प्रमाणैश्चतुर्भिरुपदिष्टे पुनर्भावे धर्मद्वारेष्ववदधीयेत, तद्यथा-
गुरुशुश्रूषायामध्ययने व्रतचर्यायां दारक्रियायामपत्योत्पादने भृत्यभरणेऽ-
तिथिपूजायां दानेऽनभिध्यायां तपस्यनसुआयां देहवाङ्मानसे कर्मण्य-
क्लिष्टे देहेन्द्रिय-मनोऽर्थ-बुद्ध्यात्म-परीक्षायां मनःसमाधाविति, यानि
चान्यान्यप्येवंविधानि कर्माणि सतामविगर्हितानि स्वर्ग्याणि वृत्तिपुष्टि-
कराणि विद्यात्तान्यारभेत कर्तुम् , तथा हि कुर्वन्निह चैव यशो लभते
प्रेत्य च स्वर्गमिति तृतीया परलोकैषणा व्याख्याता भवति ॥ ३२ ॥
इस प्रकार आप्तोपदेश, प्रत्यक्ष, अनुमान और युक्ति चारों प्रमाणों द्वारा
पुनर्जन्म के सिद्ध होने पर धर्म-साधन के मार्गों में चित्त लगावे । यथा—गुरु
माता, पिता, आचार्य की सेवा, अध्ययन-पठन में, ब्रह्मचर्य काय, मन, वाणी
से मैथुन त्याग, ब्रह्मचर्यपालन, विवाह कर्म में, सन्तानोत्पत्ति, आश्रित जन-
अ० ११] सूत्रस्थानम् १३६
अ० ११] सूत्रस्थानम् १३६
के पोषण में, अतिथि सत्कार में, यथाशक्ति दान देने में, दूसरे के धन को न
चाहने में, द्वन्द्व सुख-दुःख सहने में, दूसरे के गुणों में दोष न देखने में, शरीर
को बिना कष्ट पहुँचाये शरीर, वाणी और मन से कर्म करने में, देहपरीक्षा में,
इन्द्रिय परीक्षा, मन परीक्षा, विषय की परीक्षा, ज्ञान की परीक्षा, आत्म परीक्षा,
और मन की समाधि ( चित्तवृत्ति-निरोध ) में मन का लगाना ही धर्म मार्ग है।
और भी दूसरे इसी प्रकार के कर्म, सज्जनों से अनिन्दत, पूजित, स्वर्ग सुख को
देने वाले, जीवन पालन करने वाले हों, उनको करने का उद्योग करे, ऐसा
करने पर इहलोक में यश मिलता है और मरने पर स्वर्ग अर्थात् पुनर्जन्म में
सुख मिलेगा, इस प्रकार से तीसरी परलोकैषणा भी कह दी ॥ ३२ ॥
अथ खलु त्रय उपस्तम्भाः, त्रिविधं बलम्, त्रीण्यायतनानि, त्रयो
रोगाः, त्रयो रोगमार्गाः, त्रिविधा भिषजः, त्रिविधमौषधमिति ॥३३॥
तीन प्रकार के उपस्तम्भ अर्थात् शरीर को धारण करने वाले तत्त्व हैं, तीन
प्रकार के बल हैं, तीन कारण हैं। तीन प्रकार के रोग हैं, तीन रोगमार्ग हैं, तीन
प्रकार के चिकित्सक हैं, तीन प्रकार की औषध हैं ॥ ३३ ॥
त्रय उपस्तम्भा इति-आहारः, स्वप्नो, ब्रह्मचर्यमिति । एभिस्त्रिभिर्यु-
क्तियुक्तैरुपस्तब्धमुपस्तम्भैः शरीरं बलवर्णोपचयोपचितमनुवर्त्तते याव-
दायूःसंस्कारात् संस्कारमहितमनुपसेवमानस्य, य इहैवोपदेक्ष्यते ॥३४॥
तीन उपस्तम्भ तत्त्व जो शरीर को धारण करते हैं, आहार, स्वप्न और
ब्रह्मचर्य्य हैं। ये तीनों को युक्ति पूर्वक प्रयुक्त करने पर शरीर दृढ़, मजबूत
बल, वर्ण, पुष्टि से युक्त होता है, जब तक शरीर में धर्माधर्म आयु के बनाने
में कारण रहते हैं। इन तीनों उपस्तम्भों का उचित मात्रा में सेवन करना ही
आयु का कारण है। अहित वस्तुओं का सेवन न करना ही आयु में कारण है,
उन अहित वस्तुओं को यहीं पर कहेंगे ॥ ३४ ॥
त्रिविधं बलमिति सहजं कालजं युक्तिकृतं च । तत्र सहजं यच्छरी-
रसत्त्वयोः प्राकृतम्, कालकृतमृतुविभागजं वयःकृतं च, युक्तिकृतं पुन-
स्तद्यदाहारचेष्टायोगजम् ॥ ३५ ॥
तीन प्रकार का बल है-सहज, कालजन्य और युक्तिजन्य, इन में उत्पत्ति
समय ही शरीर और मन को गर्भाशय में मिलता है जो बल उसे सहज या
प्राकृतिक बल कहते हैं। कालजन्य ऋतुओं के विभागानुसार आहार-विहार के
द्वारा और बाल्य, यौवन और वृद्धावस्था में उत्पन्न बल। यौवनावस्था में बला-
६४० चरकसंहित! [ अ० ११
धिक्य रहता है । बलकारक आहार या चेष्टा विहार से जो बल उत्पन्न किया
जाता है वह युक्तिकृत है ॥ ३५ ॥
त्रीण्यायतनानीति अर्थानां कर्मणः कालस्य चातियोगायोग-मिथ्या-
योगाः । तत्रातिप्रभावाणां दृश्यानामतिमात्रं दर्शनमतियोगः, सर्वशोऽ-
दर्शनमयोगः, अतिसूक्ष्मातिश्लिष्टानिविप्रकृष्ट-रौद्र-भैरवाद्भुत द्विष-बीभ-
त्स-विकृतादि-रूप-दर्शनं मिथ्यायोगः । तथाऽतिमात्र-स्तनित-पटहोत्कृ-
ष्टादीनां शब्दानामतिमात्रं श्रवणमतियोगः, सर्वशोऽश्रवणमयोगः, परुषे-
ष्ट-विनाशापघात-प्रधर्षण भीषणादि-शब्द-श्रवणं मिथ्यायोगः । तथाऽ-
तितीक्ष्णोग्राभिष्यन्दिनां गन्धानामतिमात्रं घ्राणमतियोगः, सर्वशोऽघ्रा-
णमयोगः। पूति-द्विष्टामेध्य-क्लिन्न-विष-पवन-कुणप-गन्धादि घ्राणं मिथ्या-
योगः, तथा रसानामत्यादानमतियोगः, अनादानमयोगः, मिथ्यायोगो
राशि-वर्ज्येष्वाहार-विधि-विशेषायतनेषूपदेक्ष्यते; तथाऽतिशीतोष्णानां
स्पृश्यानां स्नानाभ्यङ्गोत्साधनादीनां चात्युपसेवनमतियोगः, सर्वशोऽनुप-
सेवनमयोगः,स्नानादीनां शीतोष्णादीनां च स्पृश्यानामानुपूर्व्योपसेवनं
विषम-स्थानाभिघाताशुचि-भूत-संसर्गादियश्चेति मिथ्यायोगः ॥ ३६ ॥
रोग के आयतन अर्थात् कारण तीन हैं, अर्थ, अर्थात् इन्द्रियों के
विषय कर्म और काल इन तीनों का अतियोग, अयोग और मिथ्यायोग ये तीन
रोगों के 'आयतन' हैं । बहुत चमकने वाले पदार्थ सूर्य आदि का देर तक
देखना चक्षु-इन्द्रिय का 'अतियोग' है, सर्वथा ही न देखना 'अयोग' है । बहुत
क्लेशदायक पदार्थ का देखना, बहुत दूर की वस्तु को देखना, रौद्र, भयानक-
डरावनी, अद्भुत, अप्रिय, बीभत्स और विकृत रूपों को देखना, आंख का
'मिथ्यायोग' है । इसी प्रकार बादल की घरघराहट को अधिक सुनना, ढोल या
नगाड़े की आवाज़ को बहुत सुनना, तार आदि के बहुत ऊँचे शब्द को अधिक
सुनना, कान का 'अतियोग' है । सर्वथा न सुनना 'अयोग' है । कठोर, पुत्र
धन आदि इष्ट वस्तुओं के नाश को सुनना, इष्ट वस्तु के मरण को सुनना, दुर्व-
चन, तिरस्कार सुनना, भयोत्पादक भयानक शब्दों का सुनना, श्रोत्रेन्द्रिय का
'मिथ्यायोग' है । अति तीव्र ( मरिच आदि ) गन्ध का सूंघना, उग्र, चमेली
आदि गन्ध का अधिक सूंघना, माल कंगनी आदि गन्ध का अधिक मात्रा में
सूंघना, नासा का 'अतियोग' है । सर्वथा न सूंघना नाक का 'अयोग' है, सड़ी
दुर्गन्धयुक्त, गली की अपवित्र जहरीली वायु, मुर्दे की गन्ध जैसी वस्तुओं का
सूंघना नाक का 'मिथ्यायोग' है । इसी प्रकार मधुर आदि रसों का अधिक
अ० ११ ] सूत्रस्थानम् १४१
अ० ११ ] सूत्रस्थानम् १४१
मात्रा में उपयोग रसनेन्द्रिय का 'अतियोग' है, सर्वथा रसों का न खाना अयोग
है। आगे विमान स्थान (अ० १) में कहे हुए प्रकृति, करण, संयोग, देश,
काल, उपयोग, संस्थोपयोक्तृ और राशि इन आठ में से राशि को छोड़कर शेष
सात के विरुद्ध आहार करने का नाम रसनेन्द्रिय का 'मिथ्यायोग' है। बहुत
ठण्डे बहुत गरम स्पर्श, बहुत अधिक स्नान, बहुत मालिश, बहुत उबटन
लगाना, त्वक्-इन्द्रिय का 'अतियोग' है। इनके बिल्कुल सेवन न करना
'अयोग' है, ऊंचे नीचे स्थान का, चोट घाव आदि और शव आदि अपवित्र
वस्तुओं का स्पर्श करना 'मिथ्यायोग' है ॥ ३६ ॥
तत्रैकं स्पर्शनमिन्द्रियमिन्द्रियाणा मिन्द्रियव्यापकं चेतः, समवायि स्प-
र्शनेनव्याप्तेर्व्यापकमपि च चेतः, तस्मात्सर्वेन्द्रियाणां व्यापकस्पर्शकृतो यो
भावविशेषः सोऽयमनुपशयात्तञ्चत्रिधस्त्रिविधविकल्पो भवत्यसात्म्येन्द्रि-
यार्थसंयोगः; सात्म्यार्थो ह्युपशयार्थः ॥ ३७ ॥
इन पांच ज्ञानेन्द्रियों में से एक स्पर्शन (त्वचा) इन्द्रिय शेष घ्राण, रसना,
चक्षु और कर्ण इन चार इन्द्रियों में और गुदा, लिंग, हाथ, पैर और वाणी में
भी व्यापक हैं और वह त्वग्-इन्द्रिय मन के साथ समवाय सम्बन्ध से संयुक्त है,
इसलिये त्वग् इन्द्रिय सब इन्द्रियों में फैली होने से और चित्त का इस त्वगिन्द्रिय
के साथ समवाय सम्बन्ध होने से मन भी व्यापक हो जाता है। इसलिये सब
इन्द्रियों में व्यापक स्पर्शनेन्द्रिय के साथ समवाय सम्बन्ध से जुड़ा हुआ मन,
आत्मा के अभीप्सित विषय को ग्रहण करने के लिये स्पर्शनेन्द्रिय द्वारा प्राप्त मार्ग
से, उस विषय को ग्रहण करने वाली इन्द्रिय तक पहुंच जाता है। इस से सब
इन्द्रियों में व्यापक त्वक् के स्पर्श से उत्पन्न जो अपने अपने विषय के ज्ञान
विशेष उत्पन्न होते हैं, वे शरीर के अनुकूल न होने पर, पांच प्रकार के होने पर
भी तीन प्रकार होते हैं । यथा ( १ ) 'असात्म्येन्द्रियार्थसंयोग' अर्थात् इन्द्रियों
का विषय के साथ अनुचित रूप से संयोग होना अतियोग, अयोग और मिथ्या-
योग इन तीन प्रकार का हो जाता है। सात्म्य का अर्थ उपशय है, शरीर के
जो अनुकूल पड़े वह 'सात्म्य' है ॥ ३७ ॥
कर्म वाङ्-मनः-शरीर-प्रवृत्तिः । तत्र वाङ्मनःशरीरातिप्रवृत्तिरति-
योगः, सर्वशोऽप्रवृत्तिरयोगः, वेग-धारणोदीरण-विषम-स्खलन-गमन-प-
तन-अङ्ग-प्रणिधानाङ्ग-प्रदूषण-प्रहार-मर्दन-प्राणोपरोध-संक्लेशानादिः शा-
रीरो मिथ्यायोगः । सूचकानृताकाल-कलहाप्रियाबद्धानुपचार-परुष-बच-
१४२ चरकसंहिता [अ० ११
नादिर्वाङ्मिथ्यायोगः। भय-शोक-क्रोध-लोभ-मोह-मानेर्ष्या-मिथ्यादर्श-
नादिर्मानसो मिथ्यायोगः॥ ३८॥
वाणी मन और शरीर इन की चेष्टा का नाम ‘कर्म' है, इन में वाणी, मन और
शरीर की अतिप्रवृत्ति का नाम 'अतियोग' है। इन की सर्वथा प्रवृत्ति न होना
'अयोग' है। वाणी, मल-मूत्रादि के उपस्थित वेगों को रोकना, अनुपस्थित
वेगों को बलपूर्वक बाहर निकालना, सम स्थान पर विषम (टेढ़ा-मेढ़ा) गिरना,
अनुचित रूप से चलना, ऊंचे स्थान से कूदना, अंगों को टेढ़ा-मेढ़ा करना,
अंगों को पीड़ित करना, खुजाना, दबाना आदि, अङ्गों पर दण्ड आदि से प्रहार
करना, अङ्गों को मर्दन करना, श्वास घोटना, श्वास बन्द करना, संक्लेश व्रत,
उपवास आदि, विषम नृत्य आदि कर्म भी शरीर के 'मिथ्यायोग' हैं। निन्दा,
चुगली, मिथ्या बोलना, बिना समय के बात करना, झगड़ा करना, जी को
दुःखाने वाला अप्रिय, असम्बद्ध, प्रतिकूल और कर्कश बोलना, वाणी का
'मिथ्यायोग' है। भय, शोक, चिन्ता, क्रोध, लोभ, मोह, अज्ञान, मान, अहंकार,
ईर्ष्या, मिथ्यादर्शन, नास्तिक्य बुद्धि ये मन के 'मिथ्यायोग' हैं॥ ३८॥
संग्रहेण चातियोगायोगवर्जं कर्म वाङ्-मनः-शरीरजमहितमनुप-
दिष्टं यत् तच्च मिथ्यायोगं विद्यात् ॥ ३६ ॥ इति त्रिविध-विकल्पं त्रिवि-
धमेव कर्म प्रज्ञापराध इति व्यवस्येत् ॥ ४० ॥
संक्षेप में—वाणी, मन और शरीर के जो अहितकारी और नहीं कहे हुए
कर्म हैं, जिनका अतियोग या अयोग में समावेश नहीं होता, वे सब 'मिथ्या-
योग' जानने चाहियें। वाणी, मन और शरीर इनके अतियोग अयोग और मिथ्या-
योग को 'प्रज्ञापराध' कहते हैं॥ ३६-४०॥
शीतोष्ण-वर्ष-लक्षणाः पुनर्हेमन्त-ग्रीष्म-वर्षाः संवत्सरः स कालः ।
तत्रातिमात्र-स्वलक्षणः कालः कालातियोगः, हीन-स्वलक्षणः कालः काला-
योगः, यथास्वलक्षण-विपरीतलक्षणस्तु कालः कालमिथ्यायोगः। कालः
पुनः परिणाम उच्यते ॥ ४१ ॥
हेमन्त और शिशिर शीत काल, वसन्त और ग्रीष्म उष्ण काल, वर्षा और
शरद् और वर्षा काल। इस प्रकार से हेमन्त, शिशिर, वसन्त, ग्रीष्म, वर्षा और
शरद् इन छः ऋतुओं वाला सम्वत्सर रूप काल, शीत, उष्ण और वर्षा के रूप
में तीन प्रकार का है। इन में अपने लक्षणों से अधिक हेमन्त आदि का होना
काल का 'अतियोग' है, शीतकाल में बहुत अधिक शीत, ग्रीष्म में बहुत अधिक
गरमी, वर्षा काल में बहुत अधिक बरसात पड़ना ये काल के 'अतियोग' हैं।
और हेमन्त आदि काल में अपने लक्षणों से कम शीत आदि का होना 'अयोग'
है। हेमन्त आदि काल में अपने लक्षणों से विपरीत लक्षणों का होना अर्थात्
शीत काल में वर्षा या गरमी पड़ना, गर्मियों में शीत या वर्षा होना, वर्षा काल
में शीत या गरमी पड़ना, काल का 'मिथ्यायोग' है। काल का ही दूसरा नाम
'परिणाम' है ॥ ४१ ॥
इत्यसात्म्येन्द्रियार्थसंयोगः प्रज्ञापराधः परिणामश्चेति त्रयस्त्रिविध-
विकल्पाः कारणं विकाराणाम्, समयोगयुक्तास्तु प्रकृतिहेतवो भवन्ति ॥
सर्वेषामेव भावानां भावाभावौ नान्तरेण योगायोगातियोगमिथ्या-
योगान् समुपलभ्येते । यथास्वयुक्त्यपेक्षिणौ हि भावाभावौ ॥ ४३ ॥
ये ऊपर कहे 'असात्म्येन्द्रियार्थ' 'प्रज्ञापराध' और 'परिणाम' ये तीनों अति-
योग, अयोग मिथ्यायोग के द्वारा सब रोगों के कारण बनते हैं। इन्द्रियार्थ
संयोग, बुद्धि-संयोग और काल-संयोग ये तीनों स्वास्थ्य के कारण बनते हैं।
क्योंकि सृष्टि के आरम्भ में जितने ही पदार्थ हैं, उनके दो ही स्वरूप हैं, एक
भाव दूसरा अभाव। अपने स्वरूप में रहने का नाम 'भाव' और अपने स्वरूप
से भिन्न दूसरे स्वरूप से रहना 'अभाव' है। ये दोनों (भाव और अभाव)
काल, बुद्धि और इन्द्रियार्थ संयोग के समयोग, अतियोग, अयोग और मिथ्या-
योग के बिना नहीं होते ॥ ४२-४३ ॥
त्रयो रोगा इति-निजागन्तुमानसाः। तत्र निजः शरीरदोष-समुत्थः,
आगन्तुर्भूत-विष-वाय्वग्नि-संप्रहारादि-समुत्थः, मानसः पुनरिष्टस्या-
लाभाल्लाभाच्चानिष्टस्योपजायते ॥ ४४ ॥
रोग तीन प्रकार के हैं, (१) निज जो अपने शरीर में उत्पन्न हैं, (२)
आगन्तुज और (३) मानस। इनमें (१) निज जो शरीर के दोष वात, पित्त,
कफ के कारण उत्पन्न होने वाले हैं। (२) आगन्तुज भूत, विष, स्थावर,
जंगम विष से जन्य, दुष्ट वायु से, आग से चोट आदि से उत्पन्न होने वाले
(३) इष्ट वस्तु के न मिलने और अनिष्ट वस्तु के मिल जाने से मानस रोग
उत्पन्न होते हैं ॥ ४४ ॥
तत्र बुद्धिमता मानस-व्याधि-परीतेनापि सता बुद्ध्या हिताहितम-
वेक्ष्यावेक्ष्य धर्मार्थकामानामहितानामनुपसेवने हितानां चोपसेवने
प्रयतितव्यम्, नह्यन्तरेण लोके त्रयमेतन्मानसं किञ्चिन्निष्पद्यते-सुखं वा
दुःखं वा, तस्मादेतच्चानुष्ठेयं, तद्विद्यावृद्धानां चोपसेवने प्रयतितव्यम्,
आत्म-देश-काल-बल-शक्ति-ज्ञाने यथावच्चेति ॥ ४५ ॥
१४४ चरकसंहिता [ अ० ११
बुद्धिमान् मनुष्य को चाहिये कि मानस व्याधि के रहते हुए भी लोभ,
काम, क्रोध, मोह के विपरीत, उत्तम बुद्धि से हित और अहित कार्यों का विचार
करते हुए, धर्म, अर्थ और काम इनके अहितकारक कार्यों को छोड़ने में, तत्पर,
एवं धर्म, अर्थ और काम के लिये हितकारी कार्यों को सेवन करने में प्रयत्नवान्
रहना चाहिये । क्योंकि संसार में धर्म अर्थ और काम तीनों के विना मनोज्ञ
सुख वा दुःख कुछ भी नहीं होता । इसलिये इन ( धर्म, अर्थ और काम ) के
हितकारी कार्यों का ग्रहण और अहितकारी कार्यों का त्याग करने में प्रयत्नशील
रहना चाहिये, इस के लिये विद्यावृद्ध पुरुषों का सेवन करना चाहिये । आत्म-
ज्ञान, देश-ज्ञान, काल-ज्ञान, बल-ज्ञान, और शक्ति ज्ञान के लिये उचित रीति से
प्रयत्न करना चाहिये ॥ ४५ ॥
भवति चात्र ।
मानसं प्रति भैषज्यं त्रिवर्गस्यान्ववेक्षणम् ।
तद्विद्यसेवा विज्ञानमात्मादीनां च सर्वशः ॥ ४६ ॥ इति ।
और इस प्रसङ्ग में एक श्लोक है औषध धर्म, अर्थ, काम ( त्रिवर्ग ) का
सेवन करना, धर्म, अर्थ काम इन को उपदेश करने वाले विद्यावृद्ध पुरुष की
सेवा करना, आत्मज्ञान, देश, काल, बल आदि का ज्ञान करना मानस रोगों
की औषध है ॥ ४६ ॥
त्रयो रोगमार्गा इति-शाखा, मर्मास्थिसन्धयः, कोष्ठश्च । तत्र शाखा
रक्तादयो धातवस्त्वक् च, स बाह्यो रोगमार्गः । मर्माणि पुनर्वस्ति-हृदय-
मूर्द्धादीनि, अस्थि-सन्धयोऽस्थि-संयोगाः, तत्रोपनिबद्धाश्च स्नायुकण्डराः,
स मध्यमो रोगमार्गः । कोष्ठः पुनरुच्यते महास्रोतः शरीरमध्यं महा-
निम्नमामपक्वाशयश्चेति पर्यायशब्दैस्तन्त्रे, स रोगमार्ग आभ्यन्तरः।४७।
रोगों के तीन मार्ग हैं, जैसे—( १ ) शाखा, ( २ ) मर्म, अस्थि-सन्धियां
और ( ३ ) कोष्ठ । इन में शाखा रक्त आदि छः धातु और त्वचा ये सात
बाह्य रोगमार्ग हैं, बस्ति ( मूत्राशय ), हृदय ( दिल ) और शिर, मस्तिष्क एक
सौ सात मर्म और अस्थि ( हड्डियां ), सन्धियां ( अस्थियों के जोड़ ), तथा इन
में बंधी हुई स्नायु और कण्डरायें ये 'मध्यम रोगमार्ग' हैं, यह दूसरा मार्ग है ।
शरीर के बीच में, बड़ा भारी स्रोत, बड़े भारी गड्ढे के तुल्य है, इस को आमाशय
या पक्वाशय के नाम से कहते हैं, यह तीसरा 'आभ्यन्तर रोगमार्ग' है ॥ ४७ ॥
तत्रगण्ड-पिडकाऽपची-चर्म-कीलाधि-मांस-मशक-कुष्ठ-व्यङ्गाद-
विकारा बहिर्मार्गजाश्च वीसर्प-श्वयथु-गुल्मार्शो-विद्रध्यादयः शाखानु
सारिणो भवन्ति रोगाः ॥ ४८ ॥
अ० ११ ] १० सूत्रस्थानम् १४५
अ० ११ ] १० सूत्रस्थानम् १४५
पक्ष-वध-पहापतान कार्दिन-शोष-राजयक्ष्मास्थि-मन्धि-शूळ-गुद-भ्रं-
शादयः शिरो-हृद्वस्ति-रोगादयश्च मध्यम-मार्गानुसारिणो भवन्ति रोगाः ॥
ज्वरातीसार-च्छद्यलमक-विषूचिका-कास-श्वास-हिक्काऽऽनाहोदर-
प्लीहादयोऽन्तर्मार्गजाश्च वीसर्प-श्वयथु-गुल्मार्शो-विद्रध्यादयः काष्ठ-मा-
र्गानुसारिणो भवन्ति रोगाः ॥ ५० ॥
इन में गण्ड ( शोथ, गलगण्ड रोग नहीं ), फुन्सी, अलजी, अरबी, चर्म,
कील, अधिमांस, मशक ( मस्से ), कुष्ठ, व्यंग, और अजगल्लिका आदि रोग
'बहिर्मार्ग' में होते हैं । वीसर्प, सूजन, गुल्म, अर्श, विद्रधि आदि रोग शाखानु-
सारी अर्थात् रक्तादि मार्गों के अनुसारी होते हैं । पक्षाघात, मन्याग्रह, अपतानक
अर्दित, शोष, राजयक्ष्मा, अस्थि शूल, सन्धिश्लूल, गुदभ्रंश आदि, हिक्का आदि
एवं शिरो रोग, हृदय रोग तथा वस्ति रोग और अण्ड वृद्धि भी ये मध्यम, 'मार्गा-
नुसारी' रोग हैं । ज्वर, अतीसार, छर्दि, अलमक, विषूचिका, ( हैजा ) कास,
श्वास, हिक्का, आनाह, उदर, प्लीहा, आदि रोग 'अन्तर्मार्ग' से उत्पन्न होते हैं ।
वीसर्प, सूजन, गुल्म, अर्श, और विद्रधि जो शाखानुसारी रोग हैं, वे काष्ठानु-
सारी होते हैं, (रक्तानुसारी रोग काष्ठानुसारी नहीं होते और कोष्ठानुसारा रोग
शाखानुसारी रोग नहीं होते ) ॥ ४८-५० ॥
त्रिविधा भिषज इति-
भिषक्छद्मचराः सन्ति सन्त्येके सिद्धसाधिताः ।
सन्ति वैद्यगुणैर्युक्ताःस्वावधा भिषजा भुवि ॥ ५१ ॥
भिषक् भी तीन प्रकार के होते हैं, १. छद्मचर, २. सिद्धसाधित और ३.
वैद्य गुणों से युक्त ये तीन प्रकार के चिकित्सक इस पृथ्वी पर मिलते हैं ॥५१॥
वैद्यभाण्डौषधैः पुस्तैः पल्लवैरवलोकनैः ।
लभन्ते ये भिषक्शब्दमज्ञास्ते प्रतिरूपकाः ॥ ५२ ॥
छद्मचर वैद्य का लक्षण—वैद्यों या औषधियों के बर्तन, पुस्त अर्थात्
मिट्टी या लोहे के बने मनुष्य के ढाँचे, पुस्तकों, पत्तों को देखने से जो मनुष्य
'भिषक्' शब्द प्राप्त करते हैं, वे वैद्यों के नकलचा ढोंगी मूर्ख हैं, वे त्याज्य हैं ।५२।
श्री-यश-ज्ञान-सिद्धानां व्यपदेशादतांदृधाः ।
वैद्यशब्दं लभन्ते ये ज्ञेयास्ते सिद्धसाधिताः ॥ ५३ ॥
सिद्धसाधित वैद्य — अन्य स्थान पर चिकित्सा कर्म में यश, ज्ञान, और सफ-
लता प्राप्त किये हुए वैद्यों के नाम से धोखा करके जो वैद्य बन जाते हैं, उनको
'सिद्धसाधित' वैद्य समझना । इनको भी छोड़ देना चाहिये ॥ ५३ ॥
प्रयोग-ज्ञान-विज्ञान-सिद्धि-सिद्धाः सुखप्रदाः ।
१४६ चरकसंहिता [ अ० ११
प्रयोग-ज्ञान-विज्ञान-सिद्धि-सिद्धाः सुखप्रदाः ।
जीविताभिसरा ये स्युर्वैद्यत्वं तेष्ववस्थितम् ॥ ५४ ॥
सद्वैद्य का लक्षण—औषध का, प्रयोग और शास्त्र का ज्ञान, लोक व्यव-
हार के जानने, प्रख्यात एवं रोगियों को सुखी करने वाले 'प्राणाभिसर' कहाते
हैं । इन्हीं पुरुषों में वैद्य का लक्षण विद्यमान है। उन्हीं को वैद्य कहना चाहिये ॥
त्रिविधमौषधमिति दैवव्यपाश्रयम्, युक्तिव्यपाश्रयम्, सत्त्वावज-
यश्च । तत्र दैवव्यपाश्रयं मन्त्रौषधि-मणि-मङ्गल-बल्युपहार-होम-नि-
यम-प्रायश्चित्तोपवास-स्वस्त्ययन-प्रणिपात-तीर्थगमनादि, युक्तिव्यपाश्रयं
पुनराहारौषधद्रव्याणां योजना । सत्त्वावजयः पुनरहितेभ्योऽर्थेभ्यो मनो-
विनिग्रहः ॥ ५५ ॥
औषध तीन प्रकार की है—दैवव्यपाश्रय, युक्तिव्यपाश्रय और सत्त्वावजय ।
इनमें दैव-व्यपाश्रय देव अर्थात् ईश्वर पर आश्रित औषध, मन्त्र, ओषधि, मणि,
मंगल, शुभ कर्म्म, नियम, प्रायश्चित्त, उपवास, स्वस्तिपाठ, नमस्कार तीर्थाटन
आदि हैं । युक्ति अर्थात् योग पर आश्रित औषध आहार एवं औषध द्रव्यों-
दोष नाशक पदार्थों की योजना । सत्त्वावजय—मन, को अहितकारक विषयों
से रोकना तीसरी प्रकार की औषध है ॥ ५५ ॥
शारीर-दोष प्रकोपे तु खलु शरीरमेवाऽऽश्रित्य प्रायस्त्रिविधमौषध-
मिच्छन्ति—अन्तःपरिमार्जनम्, बहिःपरिमार्जनम्, शस्त्रप्रणिधानं चेति ।
तत्रान्तःपरिमार्जनं यदन्तःशरीरमनुप्रविश्यौषधमाहार-जात-व्याधीन् प्र-
मार्ष्टि । यत्पुनर्बहिःस्पर्शमाश्रित्याभ्यङ्ग-स्वेद-प्रदेह-परिषेकोन्मर्दनाद्यैरा-
मयान् प्रमाष्टि तद्बहिःपरिमार्जनम् । शस्त्रप्रणिधानं पुनश्छेदन-भेदन-व्यध-
न-दारण-लेखनोत्पाटन-प्रच्छन-सीवनैषण-क्षार-जलौकसश्चेति ॥ ५६ ॥
शरीर के वात, पित्त, कफ इन दोषों के कुपित होने पर शरीर को ही
आश्रय करके तीन प्रकार की औषधों का विशेष रूप से व्यवहार करते हैं । जैसे
अन्तःपरिमार्जन, बहिःपरिमार्जन और शस्त्र-प्रणिधान । इनमें जो औषध
या आहार शरीर के अन्दर घुसकर उत्पन्न हुए रोगों को शान्त करता है वह
'अन्तःपरिमार्जन' है और जो शरीर के बाहर ही त्वचा पर अभ्यंग, स्वेद, प्रलेप,
परिषेक, उन्मर्दन ( मालिश ) आदि द्वारा रोगों को शान्त करता है, उसे 'बहिः
परिमार्जन' कहते हैं । छेदन ( दो करना ) भेदन ( आशय के अन्दर घुसना
व्यधन ( आशयों से भिन्न स्थान में भेदन करना ), दारण ( चीरना ), लेखन
( खुरचना ), उत्पाटन ( उखाड़ना ), प्रच्छन ( शस्त्र आदि से फाड़ना,
अ० ११ ] सूत्रस्थानम् १४७
अ० ११ ] सूत्रस्थानम् १४७
सीवन ( सीना ), एषण ( नाड़ी या गति व्रण को ढूंढना ), क्षार ( द्रव्यों को
भस्मकर क्षरण होने वाला सार भाग ), जलौका ( जोंक ) इनके उपयोग को
शस्त्र-प्रणिधान कहते हैं ॥ ५६ ॥
प्राज्ञो रोगे समुत्पन्ने बाह्येनाऽऽभ्यन्तरेण वा ।
कर्मणा लभते शम शस्त्रोपक्रमणेन वा ॥ ५७ ॥
बालस्तु खलु मोहाद्वा प्रमादाद्वा न बुध्यते ।
उत्पद्यमानं प्रथमं रोगं शत्रुमिवाबुधः ॥ ५८ ॥
अणुर्हि प्रथमं भूत्वा रोगः पश्चाद्विवर्धते ।
स जातमूलो मुष्णाति बलमायुश्च दुर्मतेः ॥ ५९ ॥
न मूढो लभते संज्ञां तावद्यावन्न पीड्यते ।
पांडितस्तु मति पश्चात्कुरुते व्याधिनिग्रहे ॥ ६० ॥
अथ पुत्रांश्च दारांश्च ज्ञातींश्चाऽऽहूय भाषते ।
सर्वस्वेनापि मे कश्चिद्भिषगानीयतामिति ॥ ६१ ॥
तथाविधं च कः शक्तो दुर्बलं व्याधिपीडितम् ।
कृशं क्षीणेन्द्रियं दीनं परित्रातुं गतायुषम् ॥ ६२ ॥
स त्रातारमनासाद्य बालस्त्यजति जीवितम् ।
गोधा लाङ्गूलबद्धेवाऽऽकृष्यमाणा बलीयसा ६३ ॥
तस्मात्प्रागेव रोगेभ्यो रोगेषु तरुणेषु वा ।
भेषजैः प्रतिकुर्वीत य इच्छेत्सुखमात्मनः ॥ ६४ ॥
बुद्धिमान् रोग के होने पर 'बहिःपरिमार्जन' अथवा 'अन्तःपरिमार्जन' या
'शस्त्र-क्रिया' से शान्ति प्राप्त करता है। परन्तु बाल, अनभिज्ञ पुरुष मोह वश
अथवा प्रमाद से उत्पन्न होते हुए रोग को पहिले से उसी प्रकार नहीं जानता;
जिस प्रकार मूर्ख अपने उत्पन्न होते हुए शत्रु को नहीं पहिचानता । रोग प्रथम
सूक्ष्म रूप में होता है, और पीछे बढ़ जाता है। बढ़ने पर इस रोग की जड़
जम जाती है, जड़ पकड़ लेने पर रोग मूढ़ व्यक्ति की आयु और बल दोनों को
हर लेता है । जब तक मनुष्य रोग से पीड़ित नहीं होता, तब तक प्रतीकार का
विचार नहीं करता और जब दुःखित हो जाता है, तब रोग के निराकरण
सोचा करता है। सब पुत्रों, स्त्रियों और जाति सम्बन्धियों को बुला कर कहता
है कि 'मेरा सर्वस्व देकर भी किसी वैद्य को लाओ' इस प्रकार के रोगग्रस्त,
दुर्बल, क्षीणेन्द्रिय, दीन, मरणासन्न व्यक्ति की कौन वैद्य रक्षा कर सकता है ?
वह मूढ़ रक्षा करने वाले को न पाकर प्राण त्याग देता है, जिस प्रकार पूंछ में
१४८ चरकसंहिता [ अ० १२
रस्सी से बँधी गोह बलवान पुरुष द्वारा खींचने पर मर जाती है—ऐसे ही वह
भी मर जाता है । इसलिये जो व्यक्ति सुख चाहे वह रोगों के उत्पन्न होने से
पूर्व, ( संचयावस्था में, रोगों की तरुणदशा में ) ही दोषों का औषधियों से
प्रतीकार करे ॥ ५७ ६४ ॥
तत्र श्लोकौ ।
एषणाश्चाप्युपस्तम्भा बलं कारणमामयाः ।
तिस्रैषणीये मार्गाश्च भिषजो भेषजानि च ॥ ६५ ॥
त्रित्वेनाष्टौ समुद्दिष्टाः कृष्णात्रेयेण धीमता ।
भावा भावेष्वसक्तेन येषु सर्वं प्रतिष्ठितम् ॥ ६६ ॥ इति । -
तिस्रैषणीय अध्याय में बुद्धिमान् ऋषि कृष्णात्रेयने तीन एषणायें, उपस्तम्भ,
बल, रोगों के कारण, रोगमार्ग, वैद्य, भेषज्य, औषध, इन आठों के तीन तीन
भेद कर कल्पना सहित उपदेश किये हैं ॥ ६५-६६ ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने निर्देशचतुष्के
तिस्रैषणीयो नामैकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥
द्वादशोऽध्यायः ।
अथातो वातकलाकलीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
इसके आगे 'वातकलाकलीय' नामक अध्याय का व्याख्यान करेंगे, जैसा
भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥
वातकलाकलज्ञानमधिकृत्य परस्परमतानि जिज्ञासमानाः समु-
पविश्य महर्षयः पप्रच्छुरन्योन्यं किंगुणो वायुः, किमस्य प्रकोपनम्,
उपशमनानि वाऽस्य कानि, कथं चैनमसंघातवन्तमनवस्थितमनासाद्य
प्रकोपनप्रशमनानि प्रकोपयन्ति प्रशमयन्ति वा, कानि चास्य कुपिता-
कुपितस्य शरीराशरीरचरस्य शरीरेषु चरतः कर्माणि बहिःशरीरेभ्यो
वेति ॥ ३ ॥
वायु के अंगांश विकल्पना के सम्बन्ध में महर्षि लोग एकत्र होकर परस्पर
एक दूसरे के मत जानने के लिये पूछने लगे कि—वायु के क्या गुण हैं ?
वायु को प्रकुपित करने वाले कौन से कारण हैं ? कुपित वायु को शान्त करने
अ० १२ ] सूत्रस्थानम् १४६
अ० १२ ] सूत्रस्थानम् १४६
वाली कौन सी वस्तुएं हैं ? और किस प्रकार से इस अमूर्त्त, अदृश्य एवं निरन्तर
गतिशील, चंचलस्वभाव वायु को बिना प्राप्त किये कुपित करने वाली वस्तुएं
इसे कैसे कुपित करती हैं, अथवा शान्त करने वाली वस्तुएं किस प्रकार से
इस को शान्त करती हैं ? और शरीर के अन्दर गति करने वाले एवं लोक में
चलने वाले, कुपित एवं अकुपित वायु के शरीर के अन्दर गति करते हुए
कौन २ से कर्म हैं, और शरीर के बाहर लोक में गति करते हुए इस के कौन
से कर्म होते हैं ? ॥ ३ ॥
अत्रोवाच कुशः साङ्कृत्यायनः-रूक्ष-लघु-शीत-दारुण-खर-विशदाः
षडिमे वातगुणा भवन्ति ॥ ४ ॥
इस प्रसङ्ग में ऋषि साङ्कृत्यायन कुश बोले—वायु के रूक्ष, लघु, शीत,
दारुण, खर, विशद ये छः गुण होते हैं ॥४॥
तच्छ्रुत्वा वाक्यं कुमारशिरा भरद्वाज उवाच—एवमेतद्यथा भग-
वानाह, एत एव वातगुणा भवन्ति, स त्वेवंगुणैर्द्रव्यैरेवंप्रभावैश्च
कर्मभिरभ्यस्यमानैर्वायुः प्रकोपमापद्यते, समानगुणाभ्यासो हि धातूनां
वृद्धिकारणमिति ॥ ५ ॥
इस को सुनकर ऋषि कुमारशिरा भरद्वाज बोले—“जिस प्रकार आपने
कहा, ठीक इसी प्रकार है । ये रूक्ष आदि छः गुण ही वायु के हैं, इसलिये इन
गुणों वाले पदार्थों इन गुण वाले प्रभावों और इन गुण वाले कर्मों के पुनः २
सेवन करने से वायु का प्रकोप होता है । क्योंकि धातुओं के समान गुण वाले
पदार्थों वा कर्मों के पुनः २ सेवन करने से धातुओं की वृद्धि होती है” ॥५॥
तच्छ्रुत्वा वाक्यं काङ्कायनो बाह्लीकभिषगुवाच—एवमेतद्यथा
भगवानाह, एतान्येव वातप्रकोपनानि भवन्ति, अतो विपरीतानि
खल्वस्य प्रशमनानि भवन्ति, प्रकोपनविपर्ययो हि धातूनां प्रशमकारण-
मिति ॥ ६॥
इस बात को सुनकर काङ्कायन नाम बाह्लीक (बलख़) देश के वैद्य बोले—
‘जिस प्रकार आपने कहा ठीक ऐसा ही है । ये ही कारण वात को कुपित करते
हैं । इनके विपरीत स्निग्ध, गुरु, उष्ण, मृदु, पिच्छिल, श्लक्ष्ण, स्थूल, स्थिर,
गुण वाले द्रव्य या इस प्रकार के कर्म इस कुपित वायु को प्रशमन करते हैं ।
क्योंकि कोपक वस्तुओं के कारणों के विपरीत गुण वाले द्रव्य धातुओं को शान्त
करते हैं’ ॥ ६ ॥
तच्छ्रुत्वा वाक्यं बडिशो धामार्गव उवाच—एवमेतद्यथा भगवा-
१५० चरकसंहिता [ अ० १२
नाह, एतान्येव वातप्रकोपप्रशमनानि भवन्ति, यथा ह्येनमसंघातनमव-
स्थितमनासाद्य प्रकोपप्रशमनानि प्रकोपयन्ति प्रशमयन्ति वा, तथाऽनु-
व्याख्यास्यामः। वातप्रकोपनानि खलु रूक्ष-लघु-शीत-दारुण-खर-विशद-
शुषिर-कराणि शरीराणाम्, तथाविधेषु शरीरेषु वायुराश्रयं, गत्वाऽऽप्या-
य्यमानः प्रकोपमापद्यते, वातप्रशमनानि पुनः स्निग्ध-गुरूष्ण-श्लक्ष्ण-
मृदु-पिच्छिल-घन-कराणि शरीराणाम्, तथाविधेषु शरीरेषु वायुरसञ्ज्य-
मानश्चरन् प्रशान्तिमापद्यते ॥ ७ ॥
कांकायन ऋषि के वचन सुनकर बडिश धामार्गव बोले—आपने जो कहा
सो ठीक ही कहा है। ये ही आपके कहे हुए कारण वायु को कुपित और
शान्त करने वाले होते हैं। जिस प्रकार कि इस सूक्ष्म एवं निरन्तर गतिशील
वायु को प्राप्त करके ये रूक्ष आदि गुण इस वायु को कुपित करते हैं,
तथा शान्त करते हैं इसकी व्याख्या करेंगे। वात को कुपित करने वाले द्रव्य
शरीर को रूक्ष लघु ठण्डा दारुण (कठिन) खरखरा विशद (जो
चिपचिपा न हो) और छिद्र युक्त कर देते हैं। रूक्ष लघु आदि
शरीर में आश्रय पाकर संचित हुआ वायु प्रकुपित हो जाता है।
वात को शान्त करने वाले द्रव्य एवं कर्म शरीर को स्निग्ध, गुरु, उष्ण (गरम),
श्लक्ष्ण, मृदु (कोमल), चिपचिपा, तथा गाढ़ा कर देते हैं। इस प्रकार के
शरीर में संचार करता हुआ वायु आश्रय न पाकर शान्त हो जाता है॥ ७॥
तच्छ्रुत्वा बडिशवचनमवितथमृषिगणैरनुमतमुवाच वार्योविदो
राजर्षिः-एवमेतत्सर्वमनपवादं यथा भगवानाह, यानि तु खलु वायोः
कुपिताकुपितस्य शरीराशरीरचरस्य शरीरेषु चरतः कर्माणि बहिः
शरीरेभ्यो वा भवन्ति, तेषामवयवान् प्रत्यक्षानुमानोपमानैः साध-
यित्वा नमस्कृत्य वायवे यथाशक्ति प्रवक्ष्यामः, वायुस्तन्त्र-यन्त्रधरः,
प्राणोदान-समान-व्यानापानात्मा, प्रवर्तकश्चेष्टानामुच्चावचानां, नियन्ता
प्रणेता च मनसः, सर्वेन्द्रियाणामुद्योजकः, सर्वेन्द्रियार्थानामभिवोढा,
सर्व-शरीर-धातु-व्यूह-करः, सन्धानकरः शरीरस्य, प्रवर्तको वाचः, प्रकृतिः
स्पर्श-शब्दयोः, श्रोत्रस्पर्शनयोर्मूलं, हर्षोत्साहयोर्योनिः, समीरणोऽग्नेः,
दोषसंशोषणः, क्षेप्ता बहिर्मलानां, स्थूलाणुस्रोतसां भेत्ता, कर्ता गर्भा-
कृतीनाम्, आयुषोऽनुवृत्ति-प्रत्यय-भूतो भवत्यकुपितः। कुपितस्तु खलु
शरीरे शरीरं नानाविधैर्विकारैरुपतपति बलवर्ण-सुखायुषामुपघाताय,
मनो व्याहर्षयति, सर्वेन्द्रियाण्युपहन्ति, विनिहन्ति गर्भान् विकृतिमा-
अ० १२ ] सूत्रस्थानम् १५१
अ० १२ ] सूत्रस्थानम् १५१
पादयत्यतिकालं धारयति, भय-शोक-मोह-दैन्यातिप्रलापाञ्जनयति,
प्राणांश्चोपरुणद्धि ।
प्रकृतिभूतस्य खल्वस्य लोकेषु चरतः कर्माणीमानि भवन्ति, तद्यथा-
धरणीधारणं, ज्वलनोज्ज्वलनं, आदित्य-चन्द्र-नक्षत्र-ग्रह गणानां सन्तान-
गति-विधानं सृष्टिश्च मेघानां, अपां च विसर्गः, प्रवर्त्तनं स्रोतसां,
पुष्पफलानां चाभिनिर्वर्त्तनम्, उद्भेदनं चौद्भिदानां, ऋतूनां प्रविभागः,
विभागो धातूनां धातुमानसंस्थानव्यक्तिः, बीजाभिसंस्कारः, शस्या-
भिवर्धनमविक्लदोपशोषणेऽवैकारिक-विकाराइचेति ।
प्रकुपितस्य खल्वस्य लोकेषु चरतः कर्माणीमानि भवन्ति, तद्यथा-
उत्त्रोडनं सागराणां, उद्वर्त्तनं सरसां, प्रतिसरणमापगानाम्, आकम्पनं च
भूमेः, आधमनमम्बुदानां, शिखरिशिखरावमथनं, उन्मथनमाकहानां,
नीहार-निर्ह्राद-पांसु-सिकता-मत्स्य-भेकारग क्षार रुधिराश्माशनि-विसर्गः
व्यापादनं च षण्णामृतूनां, शस्यानामसंघातः, भूतानां चापसर्गः, भावानां
चाभावकरणं, चतुर्युगान्तकरणां मेघ-सूर्यानलानिलानां विसर्गः ।
स हि भगवान् प्रभवश्चाव्ययश्च, भूतानां भावाभावकरः, सुखा-
सुखयोर्विधाता, मृत्युः, यमो, नियन्ता, प्रजापतिः, अदितिः, विश्वकर्मा,
विश्वरूपः, सर्वगः, सर्वतन्त्राणां विधाता, भावानामणुर्विभुर्विष्णुः,
क्रान्ता लोकानां, वायुरेव भगवानिति ॥८॥
बडिश के सत्य एवं ऋषियों के अनुमोदित उस बचन को सुन कर राजर्षि
वार्योविद ने कहा-आपने जो कुछ कहा है वह सब ठीक ही है, अर्थात् इन नियमों
के प्रतिकूल एक भी उदाहरण नहीं है । "अपवाद"का अर्थ निन्दा भी होता है ।
अभिप्राय यह है कि सब ऋषियों का इस विषय में एक ही मत है । कुपित तथा
शान्त हुये शरीर में संचार करने वाले एवं शरीर से बाहर संचार करने वाले
वायु के शरीर में तथा शरीर से बाहर जो कर्म हैं उनके अवयवों को प्रत्यक्षादि
प्रमाणों से सिद्ध कर तथा वायु को नमस्कार कर यथाशक्ति कहूँगा । वायु
शरीररूपी यन्त्रों को धारण करने वाला है । 'तन्त्र' शब्द से शरीरस्थ
धातुओं के जो अपने-अपने नियम हैं उनसे अभिप्राय है । यन्त्र से अभिप्राय
जिसके द्वारा शरीरस्थ धातुओं का एक जगह से दूसरी जगह जाना आदि
व्यापार होता है । अर्थात् तन्त्र (नियम) एवं यन्त्र दोनों को धारण करनेवाला है।
वायु प्राणादि पांच रूपों वाला है। सम्पूर्ण उच्च या नीच विविध प्रकार
की चेष्टाओं का प्रवर्त्तक है, मनका नियामक तथा नेता (लेजाने बाला) है ( वायु
१५२ चरकसंहिता [ अ० १२
मनको अनिष्ट विषय से लौटा कर इष्ट विषय में लगाता है) यही वायु
सम्पूर्ण इन्द्रियों को विषयों में प्रेरणा करता है।
सम्पूर्ण शब्द आदि इन्द्रियों के विषयों का वहन करने वाला भी वायु ही
है। वायु ही शरीरस्थ धातुओं को यथानियम अपने २ स्थलों पर स्थापित
करता है। शरीर को जोड़ने वाला भी यही वायु है, वाणी को प्रवृत्त करने
वाला, स्पर्श तथा शब्द की प्रकृति (कारण) श्रोत्रेन्द्रिय एवं स्पर्शनेन्द्रिय का
मूल कारण वायु ही है।
यह वायु हर्ष तथा उत्साह की योनि है (अभिव्यक्ति का कारण है। अग्नि
का प्रेरक शरीरस्थ दोषों का शोषण करनेवाला। मलों को बाहर निकालने वाला,
स्थूल एवं सूक्ष्म स्रोतों को भेदन करने वाला, शरीरोत्पत्ति के समय गर्भ की आकृ-
तियों को बनाने वाला भी वायु ही है। यह वायु आयु के अनुवर्तन-परिपालन
का कारणभूत होता है। उपर्युक्त सभी कर्म शान्तवायु के कहे गये हैं। शरीर में
कुपित हुआ वायु तो शरीर को नाना प्रकार के रोगों से पीड़ित करता है, जिस
से बलवर्णादि क्षीण होता है, मनको दुःखित करता है, सम्पूर्ण इन्द्रियों को नष्ट
करता है, गर्भ को नाश करता है, अथवा जितने काल तक गर्भ को गर्भाशय में
रहना चाहिये उससे अधिक काल तक गर्भाशय में ठहराता है। भय, शोक, मोह,
दीनता, अतिप्रलाप इनको उत्पन्न करता है और मृत्यु काभी कारण होता है।
प्रकृतिस्थ वायु के लोक में संचरण करने से ये कर्म होते हैं, जैसे—पृथ्वी का
धारण करना, अग्नि को जलाना, सूर्य, चन्द्रमा, नक्षत्र तथा ग्रहों को बराबर
नियमपूर्वक गति में रखना, बादलों को बनाना, जलों का छोड़ना, स्रोतो को बहाना
फल-फूलों को उत्पन्न करना, वृक्षादि को पृथ्वी से बाहर निकालना(अंकुरित करना),
ऋतुओं का विभाग करना, स्वर्णादि धातुओ का आकार तथा परिमाण को
व्यक्त करना, बीजों में अंकुर को उत्पन्न करने की शक्ति पैदा करना, शस्यादि को
बढ़ाना, इसे सड़ने तथा सूखने न देना अन्य जो भी प्रकृतिकार्य हैं उसे करना,
जब यह वायु प्रकुपित हो कर संसार में संचरण करता है तो इससे ये कर्म
होते हैं—समुद्रों को उत्पीड़न करना, तालाब आदि जलाशय के जलों को ऊँचा-
करना (अर्थात् तट के बाहर जल को निकालना) नदियों को विपरीत दिशा में
बहाना भूकंप कराना, मेघों का गर्जन कराना, पर्वतों के चोटियों को तोड़ना, वृक्षों
को उखाड़ना, नीहार,गर्जन,धूलि.बालू,मछली,मेढ़क,सांप,क्षार (राख),रुधिर,छोटे२
पत्थर तथा बिजली को आकाश से गिराना, छहों ऋतुओं को नाश करना,
अन्नको उत्पन्न न होने देना, प्राणियों को मारना, उत्पन्न हुये वस्तुओं का नाश
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करना,चारो युगोका संहार करनेवाले बादल,सूर्य,अग्नि एवं वायु की सृष्टि करना
इत्यादि होते हैं ।
वह भगवान् वायु उत्पत्ति के कारण हैं, अविनाशी हैं, एवं
प्राणियों का उत्पादक तथा नाशक हैं । सुख एवं दुःख को देने वाला, मृत्यु,
यम, नियन्ता, प्रजापति, अदिति, विश्वकमो, विश्वरूप सर्वग (व्यापक),
सम्पूर्ण नियमों, कर्मों तथा शरीरों को बनाने वाला सभी वस्तुओं का विधाता,
सूक्ष्म, व्यापक, विष्णु पृथ्व्यादिलोकों को आक्रमण करने वाला भगवान्
वायु ही हैं ॥ ८ ॥
तच्छ्रुत्वा वार्योविद्वचो मरीचिरुवाच-यद्यप्येवमेतत्किमर्थ-
स्यास्य वचने विज्ञाने वा सामर्थ्यमस्ति भिषग्विद्यायां, भिषग्विद्यां
चाधिकृत्यैयं कथा प्रवृत्तेति ॥ ९ ॥
वार्योविदि के वचन को सुनकर भगवान् मरीचि ने कहा, यद्यपि आपने
जो कहा है वह ठीक है तथापि आयुर्वेद में इस विषय को कहना या जानना
निष्प्रयोजन है यहां तो केवल चिकित्सा सम्बन्धी ही कथा हो रही है ॥ ९ ॥
वार्योविद उवाच — भिषक् पवनमतिबलमतिपरुषमतिशीघ्र-
कारिणमात्ययिकं चेन्नानुनिशम्येत्, सहसा प्रकुपितमतिप्रयतः कथमप्रेऽ-
भिरक्षितुमभिधास्यति प्रागेवैनमत्त्ययभयादिति । वायोर्यथार्था स्तुति-
रपि भवत्यारोग्याय बलवर्णवृद्धये वर्चस्वित्वायोपचयाय ज्ञानोपपत्तये
परमायुःप्रकर्षाय चेति ॥ १० ॥
वार्योविद बोले—चिकित्सा-शास्त्र में वायु बहुत बलवान्, बहुत कठोर,
अति शीघ्रकारी अतिचपल; अति दुःखदायक है, यदि ऐसा ज्ञात न हो तो,
सहसा वायु के कुपित होने पर, वैद्य किस प्रकार से उसको बिना जाने पहिले
ही इससे बचने को कहेगा । वायु के विषय में यथार्थ रूप में कहना, जानना,
स्तुति करना भी आरोग्यलाभ, बल, कान्ति, तेज, शक्ति को बढ़ाने, ज्ञान वृद्धि
करने और दीर्घतम आयु को प्राप्त करने और बढ़ाने के लिये है ॥ १० ॥
मरीचिरुवाच—अग्निरेव शरीरे पित्तान्तर्गतः कुपिताकुपितः शुभा-
शुभानि करोति, तद्यथा-पक्तिमपक्तिं दर्शनमदर्शनं मात्राममात्रत्वमूष्मणः
प्रकृति-विकृति-वर्णं शौर्यं भयं क्रोधं हर्षं मोहं प्रसादमित्येवमादीनि
चापराणि द्वन्द्वानीति ॥ ११ ॥
मरीचि बोले—शरीर में स्थित पित्त के अन्दर पहुंची हुई अग्नि ही कुपित
और अकुपित अवस्था में शुभ एवं अशुभ कर्मों को (क्रमशः) करती है ।