चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 153, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० ११ ] सूत्रस्थानम् १३५
आप्ताः शिष्टा विबुद्धास्ते तेषां वाक्यमसंशयम् ।
सत्यं, वक्ष्यन्ति ते कस्मादसत्यं नीरजस्तमाः ॥ २० ॥
जो पुरुष तप और ज्ञान के बल से रजोगुण और तमोगुण से मुक्त हो
चुके हैं, केवल सत्त्व गुण ही जिन में रह गया है, उनका ज्ञान भूत, भविष्य
और वर्त्तमान तीनों कालों में विशुद्ध और कभी भी बाधित नहीं होता । ऐसे
पुरुष 'आप्त', 'शिष्ट' और 'विबुद्ध' होते हैं, इन के वाक्य बिना सन्देह के होते
हैं । ये पुरुष सदा सत्य ही कहेंगे, जो पुरुष रजस् और तमस् से रहित हैं वे
असत्य कैसे बोल सकते हैं ? ॥ १६-२० ॥
प्रत्यक्ष का लक्षण—
आत्मेन्द्रिय-मनोऽर्थानां संनिकर्षात्प्रवर्त्तते ।
व्यक्ता तदात्वे या बुद्धिः प्रत्यक्षं सा निरुच्यते ॥ २१ ॥
आत्मा, इन्द्रिय, मन और अर्थ ( पदार्थ ) इन चारों का एक साथ संयोग
होने से जो ज्ञान उत्पन्न होता है, उस को 'प्रत्यक्ष' कहते हैं ॥ २१ ॥
अनुमान—
प्रत्यक्षपूर्वं त्रिविधं त्रिकालं चानुमीयते ।
वह्निर्निगूढो धूमेन मैथुनं गर्भदर्शनात् ॥ २२ ॥
एवं व्यवस्यन्त्यतीतं, बीजात्फलमनागतम् ।
दृष्ट्वा बीजात्फलं जातमिहैव सदृशं बुधाः ॥ २३ ॥
प्रथम प्रत्यक्ष प्रमाण से देखकर तीन प्रकार से कार्य-लिंगानुमान, कारण-
लिंगानुमान और कार्य-कारण लिंगानुमान होता है, भूत, भविष्यत्, और
वर्त्तमान इन तीनों समय में परोक्ष का अनुमान किया जाता है । जैसे कि
छिपी अग्नि को धुंआ देखकर जानते हैं और गर्भ को देखकर मैथुन कर्म का
ज्ञान कर लेते हैं । इसी प्रकार से अतीत काल का ज्ञान अनुमान से कर लेते
हैं और जिस प्रकार बीज को देखकर अनागत फल का अनुमान हो जाता है,
जैसा बीज होता है, वैसा ही फल लगता है । इसी प्रकार भविष्य काल का भी
अनुमान से ज्ञान करते हैं ॥ २२-२३ ॥
युक्ति—
जल-कर्षण-बीजर्त्तु-संयोगात्सस्य-संभवः ।
युक्तिः षड्धातु-संयोगाद् गर्भाणां संभवस्तथा ॥ २४ ॥
मथ्य-मन्थन-मन्थान-संयोगादग्निसंभवः ।
युक्तियुक्ता चतुष्पाद-संपद्व्याधि-निबर्हणी ॥ २५ ॥