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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

पृष्ठ 155, कुल 639 में से

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पृष्ठ 155

अ० ११] सूत्रस्थानम् १३७
जो अन्य ज्योतिष, व्याकरण, आयुर्वेद स्मृति आदि हैं, वे भी आप्नागम अर्थात्
शब्द प्रमाण हैं। आप्तागम से भी जाना जाता है कि ज्ञान, तप (द्वन्द्व-सहि-
ष्णुता), यज्ञ (अग्निहोत्रादि), सत्य अहिंसा, ब्रह्मचर्य्य आदि कर्म अभ्युदय
(इस लोक में कल्याण) और निःश्रेयस (परलोक में मङ्गल) करने वाले हैं।
मनोदोष, रजम् और तमस् जिन के शान्त नहीं हो गये उन रजोगुणी या तमो-
गुणी पुरुषों को अपुनर्भव नहीं कहा गया, अर्थात् रजोगुणी या तमोगुणी पुरुषों का
पुनर्जन्म होता है। ऐसा धर्म शास्त्रों में उपदेश किया गया है। धर्मशास्त्रों में
सावधान, राग, मोह, द्वेष, भय, लोभ, मोह, मान से रहित, ब्रह्मचारी, आप्त
विद्वान्, कर्म योग को जानने वाले, जिन के मन, बुद्धि एवं प्रचार (व्यवहार)
ठीक बने हुए हैं, ऐसे अति प्राचीन महर्षियों ने दिव्य चक्षुओं से देखकर
निश्चयपूर्वक पुनर्जन्म का उपदेश किया है, इसलिये उनका निश्चय सत्य
करके जाने ॥ २८ ॥
प्रत्यक्षमपि चोपलभ्यते-मातापित्राविसदृशान्यपत्यानि, तुल्यसंभ-
वानां वर्ण-स्वराकृति-सत्त्व-बुद्धि-भाग्यविशेषाः, प्रवरावर-कुल-जन्म,
दास्यैश्वर्यम्, सुखासुखमायुः, आयुषो वैषम्यम्, इहाकृतस्याप्राप्तिः, अशि-
क्षितानां च रुदित-स्तन-पान-हास-त्रासादीनां च प्रवृत्तिः, लक्षणोत्पत्तिः,
कर्मसामान्‍ये फलविशेषः, मेधा कचित्कचित्कर्मण्यमेधा, जातिस्मरणम्,
इहाऽऽगमनमितश्च्युतानां च भूतानां समदर्शने प्रियाप्रियत्वम् ॥२६॥
प्रत्यक्ष से भी जाना जाता है कि पुनर्जन्म है, माता पिता से विभिन्न
प्रकृति के पुत्र (रूपवान् माता पिता का काला पुत्र) होते हैं। एक ही माता
पिता के दो पुत्रों में सगे भाइयों में रंग, स्वर, आकृति, चेहरा, मन, ज्ञान और
भाग्य, प्रारब्ध भिन्न होते हैं, श्रेष्ठ और नीच कुल में जन्म होते हैं। किसी की
दासता और किसी की ऐश्वर्य-सम्पत्ति होती है, कोई सुख पूर्वक जिन्दगी
बसर करता है, कोई दुःख से जीवन व्यतीत करता है, आयु की विषमता, थोड़ा
जीना या अधिक देर जीना, यहां किए कर्म का फल न मिलना, पढ़े सीखे
बिना ही रोने, दुग्ध पान (स्तन्य पान), हँसने डरने आदि कार्यों में प्रवृत्ति
का होना, शरीर पर राज्यचिह्न या दारिद्र्यसूचक चिह्नों का होना, एक सदृश
काम करने पर भी फल में भिन्नता का रहना, कहीं पर बुद्धि का होना और
कहीं पर बुद्धि का न होना, जाति, पूर्व जन्म वृत्तान्त का स्मरण करना, यहां
से मरने पर फिर यहां आना, एक समान एक दृष्टि से देखने पर प्रिय एवं
अप्रिय, राग-द्वेष बुद्धि का उत्पन्न होना ये सब बातें पुनर्जन्म को सिद्ध करती हैं॥