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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

११० चरकसंहिता [ अ० ८
न हीन और न मिथ्यासंयोग से, एवं बुद्धि द्वारा भली प्रकार देखकर कर्मों को
उचित रूप में करने से और देश, काल, आत्मा के गुण के अविपरीत,
हितकारी वस्तुओं के सेवन करने से इन्द्रियां उपतप्त न होकर प्रकृति अवस्था
में रहती हैं। इसलिये अपना या अपने शरीर का और आत्मा का कल्याण
चाहने वाले सब पुरुषों को सदा स्मरण रखकर सद्वृत्त का (पांचों इन्द्रियों
को मन के साथ संयुक्त करके) मन, वचन और कर्म से पालन करना चाहिये।
इस सद्वृत्त के पालन करने से आरोग्यता एवं 'इन्द्रियविजय' दोनों कार्य
एक साथ ही सिद्ध हो जाते हैं ॥ १८ ॥
तत्सद्वृत्तमखिलेनोपदेक्ष्यामः । तद्यथा—देव-गो-ब्राह्मण-गुरु-वृद्ध-
सिद्धाचार्यानर्चयेत्, अग्निमुपाचरेत्, ओषधीः प्रशस्ता धारयेत्, द्वौ
कालावुपस्पृशेत्, मलायनेष्वभीक्ष्णं पादयोश्च वैमल्यमादध्यात्, त्रिः
पक्षस्य केश-श्मश्रु-लोम-नखान् संहारयेत्, नित्यमनुपहतवासाः सुमनाः
सुगन्धिः स्यात् ॥ १६ ॥
इस सद्वृत्त को सम्पूर्ण रूप में कहते हैं—देवता, गो, ब्राह्मण, गुरु (माता
पिता अभ्यागत अतिथि) वृद्ध (विद्यावृद्ध, धनवृद्ध, आयुवृद्ध, शौर्यवृद्ध,) सिद्ध
(तापस, भिक्षुक), आचार्य (उपनयन संस्कार करने वाले गुरु), इनकी पूजा सेवा
करनी चाहिये। अग्निहोत्र प्रातःसायं दोनों समय करना चाहिये, अनिन्दित, (दोषों
को नष्ट करने वाली ओषधियां) वनस्पतियां, धारण करनी चाहियें। दोनों समय
प्रातःसायं स्नान करना चाहिये। मल के स्थानों को बार बार एवं पांव को सदा
पवित्र रक्खे। बाल, दाढ़ी, मूंछ नाखून, कक्ष के एवं गुह्य स्थानों के बालों को
पन्द्रह दिन में तीन बार, पांच पांच दिन के पीछे कटवाना चाहिये। नित्य प्रति
शुद्ध वस्त्र धारण करे, प्रसन्न मन रहे, सुगन्ध धारण करे ॥ १६ ॥
साधुवेशः प्रसाधितकेशो मूर्ध-श्रोत्र घ्राण-पाद-तैल-नित्यो धूमपः,
पूर्वाभिभाषी, सुमुखः, दुर्गेष्वभ्युपपत्ता, हंता, यष्टा, दाता, चतुष्प-
थानां नमस्कर्त्ता, बलीनामुपहर्त्ता, अतिथीनां पूजकः, पितृभ्यः पिण्डदः, काले
हित-मित-मधुरार्थवादी, वश्यात्मा, धर्मात्मा, हेतावीर्षुः, फले नेर्षुः, नि-
श्चिन्त:,निर्भीकः, धीमान्, ह्रीमान्, महात्साही, दक्षः, क्षमावान्, धार्मिकः
आस्तिको, विनय-बुद्धि-विद्याऽभिजन-वयोवृद्ध-सिद्धाचार्याणामुपासिता,
छत्री, दण्डी, मौली, सोपानत्कः, युगमात्रदृग्गवचरेत्, मङ्गलाचारशी...
कुचेलास्थि-कण्टकामेध्य-केश-तुषोत्कर-भस्म-कपाल-स्नान-बलि... और
परिहर्त्ता. प्राक श्रमाद व्यायामवर्जो च म्यात. सर्वप्राणिषु मे...

अ० ८ सूत्रस्थानम् १११

अ० ८ सूत्रस्थानम् १११

स्यात्, क्रुद्धानामनुनेता, भीतानामाश्वासयिता, दीनानामभ्युपपत्ता,
सत्यसन्धः, सामप्रधानः, पर-पुरुष-वचन-सहिष्णुः, अमर्षघ्नः, प्रशम-
गुणदर्शी, राग-द्वेष-हेतूनां हन्ता च ॥ २० ॥

उत्तमवेश धारण करे, शिर के बाल संवार कर कंघी कर रक्खे, शिर,
कान त्वचा पर तैल का मर्दन करे, नित्य प्रति प्रायोगिक धूमपान करे, घर
आये हुए का या मिलने पर पहिले कुशल क्षेम पूछे, सुमुख, सुन्दर, प्रसन्न चेहरे
वाला कठिन अवसरों पर भी सोचकर काम करने वाला, होम करने वाला,
यज्ञ—देवयज्ञ, पितृयज्ञ, ब्रह्मयज्ञ, वैश्वदेव यज्ञ और नृयज्ञ करने वाला, दान
देनेवाला, चौराहों को नमस्कार करने वाला, देवता के लिये उपहार भेंट देने
वाला, अभ्यागतों को पूजा करने वाला, पिता पितामह आदि को श्रद्धापूर्वक
अन्न वस्त्र देने वाला हो, समय पर हित परिमित और मधुर अर्थ से युक्त वाणी
बोले । जितेन्द्रिय संयमी, धर्मात्मा हो, दूसरे की उन्नति को देखकर उन्नति
करने में ईर्ष्या भाव रखे कि मैं भी ऐसा करूँ जिस से मेरी भी उन्नति हो,
परन्तु फल में ईर्ष्या न करे । चिन्ता रहित न डरने वाला, साहसी आहार और
व्यवहार को छोड़कर अन्यत्र लज्जाशील, महत्त्वाकांक्षी, उत्साही, कामों में निपुण,
प्राणियों पर क्षमा करनेवाला, अपकारी को भी क्षमा देने वाला धर्म में चित्त
रखने वाला, आस्तिक (वेदादि सत् शास्त्रों को मानने वाला), विनय बुद्धि,
विद्या, अभिजन (पवित्र कुलोत्पत्ति से), और आयु में जो बड़े हों, सिद्ध, तप से
जो बड़े हों ऐसे तपस्वी, और आचार्य्य (सावित्री का उपदेश देने वाले गुरु)
इनकी सेवा करे । छत्र और दण्ड धारण करे, व्यर्थ या अकाल में न बोले,
जूता पहिने, अपने चारों ओर कुछ दूर (चार हाथ) तक देखता हुआ चले ।
मंगलजनक क्रियाशील रहे, कुचैले (मैले वस्त्र), हाड़-मांस, कांटे युक्त, अमेध्य
अपवित्र (श्मशान आदि, ) बाल, धान्यों के तुष, रोड़े-कंकड़ आदि, राख,
घड़े आदि के ठीकरे, नहाने के स्थान, पूजा स्थान, इन स्थानों को छोड़ने
वाला हो । श्रम से पूर्व ही आधी (शक्ति से) व्यायाम को छोड़ दे, सब
प्राणियों में बन्धुभाव भ्रातृ भाव रखने वाला, क्रोधी पुरुषों को मनालेने वाला,
डरे हुए पुरुषों के लिये आश्वासन (सांत्वना), देने वाला, दीनों गरीबों
के लिये उपकार करने वाला, सत्य प्रतिज्ञा वाला, शान्ति को मुख्य गिनने वाला,
... कठोर बचनों को सहन करने वाला, अक्रोधी, क्रोधियों को शान्त
... शान्तिमान्, लड़ाईझगड़े के कारणों को नष्ट करने वाला हो ॥२०॥
... स्यात्, नान्यस्वमादद्यात्, नान्यस्त्रियमभिलषेन्नान्यश्रियम्,

न वैरं रोचयेत् , न कुर्यात्पापम् , न पापेऽपि पापी स्यात्, नान्यदोषान्
ब्रूयात् , नान्यरहस्यमागमयेत् , नाधार्मिकैर्न नरेन्द्रद्विष्टैः सहाऽऽसीत,
नोन्मत्तैर्न पतितैर्न भ्रूणहन्तृभिर्न क्षुद्रैर्न दुष्टैः, न दुष्टयानान्यारोहेत् , न
जानुसमं कठिनमासनमध्यासीत, नानास्तीर्णमनुपहितमविशालमसमं
वा शयनं प्रपद्येत, न गिरि-विषम-मस्तकेष्वनुचरेत् , न द्रुममारो-
हेत् , न जलोप्रवेगमवगाहेत, कूलच्छायां नोपासीत, नाम्बुत्यानमभि-
तश्चरेत् , नार्धंहसेत, न शब्दवन्तं मारुतं मुञ्चेत्, नासंवृतमुखो
जृम्भां क्षवथुं हास्यं वा प्रवर्तयेत्, न नासिकां कुष्णीयात्, न
दन्तान् विघट्टयेत्, न नखान् वादयेत्, नास्थीन्यभिहन्यात्, ने भूमिं
विलिखेत्, न छिन्द्यात्तृणम्, न लोष्टं मृद्गीयात्, न विगुणमङ्गैश्चेष्टेत,
ज्योतींष्यग्निममेध्यमशस्तञ्च नाभिर्वीक्षेत, न हुङ्कुर्याच्छवम्, न चैत्य-
ध्वज-गुरु-पूज्याशस्त-च्छायामाक्रामेत्, न क्षपास्वनर-सदन-चैत्य-चत्वर-
चतुष्पथो पवन-श्मशानाघातनान्यासेवेत, नैकः शून्यगृहं न चाटवीमनु-
प्रविशेत्, न पापवृत्तान् स्त्री-मित्र-भृत्यान् भजेत, नोत्तमैर्विरुध्येत, नाव-
रानुपासीत, न जिह्मं रोचयेत्, नानार्यमाश्रयेत्, न भयमुत्पादयेत् ,
न साहसातिस्वप्न-प्रजागर-स्नान-पानाशानान्यभ्यसेत्, नोर्ध्वजानुश्चिरं
तिष्ठेत्, न व्यालानुपसर्पेत्र दंष्ट्रिणो न विषाणिनः पुरोवात-तपावश्या-
यातिप्रवातान् जह्यात्, कलिं नाऽऽरभेत, नाग्नुपहतोऽग्निमुपासीत,
नोच्छिष्टो नाधःकृत्वा प्रतापयेत् , नाविगतक्लमो नाप्लुत्वेया न नग्न
उपस्पृशेद्, न स्नानशाट्या स्पृष्टमुत्तमाङ्गम्, न केशाग्राण्यभिहन्यात्,
नोपस्पृश्य त एव वाससी विधूयात्, नास्पृष्ट्वा रत्नाश्व-पूज्य-मङ्गल-सुम-
सोऽभिनिष्क्रामेत्, न पूज्य-मङ्गलान्यपसव्यं गच्छेत्, नेतरान्यनुदक्षिणम्॥

झूठ न बोले, दूसरे के धन को न लेवे, दूसरे की स्त्री को न चाहे, दूसरे
की सम्पत्ति की चाहना न करे, वैर न करे, पाप न करे, पाप में मन न लगाये
अथवा पापी पुरुष पर भी पाप न करे, दूसरों के दोषों को न कहे, दूसरों की
गुप्त बातों को न जाने अधार्मिक, एवं राजा से द्वेष करने वाले (राजशत्रुओं)
के साथ न बैठे, पागल, पतित, नीच कर्म करने वाले, चाण्डाल आदि, भ्रूण-
घाती (गर्भपात करने वाले ) क्षुद्र, (छोटे पुरुष ) दुष्ट (चोर डाकू आदि)
के साथ न बैठे । दुष्टयान ( अनभ्यस्त घोड़े आदि ) पर न बैठे, घुटने ऊंचे
कर ( उत्कट आसन से ) भी देर तक न बैठे, बिना नीचे बिछाये, तकिया और
इाने रखे बिना, संकुचित स्थान पर, ऊंची नीची जगह पर न सोवे, मौन

अ० ८ ] = सूत्रस्थानम् ११३

अ० ८ ] = सूत्रस्थानम् ११३
ऊंचे नीचे प्रदेशों में या चोटियों पर न घूमे फिरे, वृक्ष पर न चढ़े, पानी के
तेज प्रवाह में स्नान न करे। नदी के किनारे खड़े वृक्ष की छाया में नहीं बैठे,
अग्नि की लपट के चारों ओर न फिरे। ऊंचे से (जोर से) न हंसे। शब्द के
साथ अधोवायु, (अपान वायु) न छोड़े, मुख को बिना ढांपे जम्भाई, छींक
अथवा हास्य-हंसी न करे, नाक को न कुरेदे, दांतों को न किटकिटाये। नखों
को न रगड़े, अस्थियों को न बजाये, भूमि को न कुरेदे, भूमि पर न लिखे,
तिनके न तोड़े, मिट्टी के ढेले को न फोड़े, अंगों को व्यर्थ में टेढ़ा मेढ़ा न करे,
न हिलाये। ज्योति (तैजस पदार्थ) सूर्य, अग्नि, तीव्राग्नि, अपवित्र चिता
आदि निन्दित वस्तुओं को न देखे। शव को देखकर हुंकार न छोड़े, चैत्य
(गांव के देवता) ध्वजा, पताका, गुरु माता पिता, आचार्य, पूज्य आदरणीय,
प्रशस्त कल्याणकारी वस्तुओं की छाया को न लांघे, रात्रि में देवालय, मन्दिर,
चैत्य (ग्राम्य देवता) गृह, आगन, चौराहा, बाग, श्मशान, (वध स्थान) में
न रहे। अकेला एकान्त गृह में, शून्य घर में या जंगल में प्रवेश न करे। पाप-
वृत्ति वाले स्त्री, मित्र अथवा नौकर का साथ न दे, अपने से श्रेष्ठों के साथ
विरोध न करे, अपने से नीच हीन की सेवा न करे। कुटिल की चाहना न करे,
अनार्य दुष्ट का आश्रय न ले, किसी के लिये भय उत्पन्न न करे, अतिसाहस
अति सोना, बहुत जागना, बहुत स्नान, बहुत पीना, बहुत खाना नहीं करे।
घुटने उठा कर देर तक न बैठे। सांप, दाढ़ वाले सिंह आदि, सींग वाले भैंस
बैल आदि जन्तुओं के पास न जाये। सामने की वायु, धूप, ओस, तेज वायु
को छोड़ दे। झगड़ा आरम्भ न करे। बिना सावधानी के अग्नि की उपासना
पूजा न करे, जूठे भांजन को पुनः आग पर गरम न करे (जूठा भोजन आग
में नहीं डालना चाहिये)। थकान मिटे बिना, मुख और सिर को जल से गीला
किये बिना, वा नंगा होकर स्नान न करे। नहाने की धोती (कटि वस्त्र से)
से शिर का स्पर्श न करे, बालों के अग्रभागों को ताड़न न करे; स्नान करके
जिन कपड़ों से स्नान किया है, उन्हीं को निचोड़कर फिर धारण नहीं करे। रत्न,
मणि आदि, पूज्य भगवान् आदि का नाम, मंगल कल्याणकारी वस्तुएं फूल
आदि को बिना स्पर्श किये घर से बाहर न निकले। पूज्य एवं मंगलकारी वस्तुओं
के वाम पार्श्व से न जाये, अपूज्य, अमंगल वस्तुओं के दक्षिण पार्श्व से
न जाये॥ २१ ॥
रत्नपाणिर्नास्नातो नोपहृतवासा नाजपित्वा नाहुत्वा देवताभ्यो
पितृभ्यो नादत्त्वा गुरुभ्यो नातिथिभ्यो नोपाश्रितेभ्यो नापुण्य-

१५४ चरकसंहिता [अ० ८
गन्धो नामाली नाप्रक्षालितपाणिपादवदनो नाशुद्धमुखो नोदङ्मुखो न
विमना नाभक्ताशिष्टाशुचि-क्षुधित-परिचरो नापात्रीष्वमेध्यासु नादेशे
नाकाले नाकीर्णे नादत्त्वाऽग्रमग्नये नाप्रोक्षितं प्रोक्षणोदकैर्न मन्त्रैरन-
भिमन्त्रितं न कुत्सयन् न कुत्सितं न प्रतिकूलोपहितमन्नमाददीत, न
पर्युषितमन्यत्र मांस-हरित-शुष्क-शाक-फल-भक्ष्येभ्यः। नाशेषभुक्स्याद्-
न्यत्र दधि-मधु-लवण-सक्तु-सर्पिग्भ्यः। न नक्तं दधि भुञ्जीत, न सक्तूने-
कानश्रीयात्, न निशि न भुक्त्वा न बहून् न द्विनोदकान्तरितान् न
छित्त्वा द्विजैर्भक्षयेत् ॥ २२ ॥
इन अवस्थाओं में भोजन न करे—रत्न को हाथ में लिये बिना, स्नान
किये बिना, वस्त्र पहिने बिना, गायत्री जप किये बिना, हवन किये बिना, देव-
ताओं के लिये दिये बिना, पिता माता को खिलाये बिना, आचार्य एवं बड़े
पुरुषों को, अतिथियों को, आश्रितों को खिलाये बिना, अशुभ गन्धवाला,
पुष्पमाला धारण किये बिना, हाथ पांव मुख धोये बिना, मलिन मुख से, उत्तर
दिशा की ओर मुख करके, अन्य मन से, बिना भक्ति के दिया, ठीक प्रकार से
या पवित्रता से न दिया, भूखे के हाथ से परसा, बिना पात्रों के मैले पात्रों में,
अदेश में, (मैले या अनुचित स्थान पर) कुसमय में, संकुचित स्थान में,
अग्नि को दिये बिना (वैश्वदेव यज्ञ किये बिना), प्रोक्षणोदक से विधिपूर्वक
प्रोक्षित किये बिना, (वेदमन्त्रों से अभिमन्त्रित किये बिना) निन्दा करते हुए,
निन्दित और प्रतिकूल अन्न को अपने मन के विरुद्ध मनुष्यों के पास में भोजन
नहीं करना चाहिये। पर्युषित जिसे एक रात बीत गई है ऐसे बासी भोजन को
नहीं खाना चाहिये। मांस, हरड़, सूखे हुए शाक, फल इनको बासी अर्थात्
एक रात बीतने पर भी खा सकते हैं। सम्पूर्ण न खावे, पात्र में थोड़ा छोड़ देना
चाहिये। परन्तु दही, शहद, लवण, सत्तू और घी इनको सम्पूर्ण खा लेना
चाहिये, पवित्र होने से इन को झूठा न छोड़े। रात में दही नहीं खाये, अकेले
सतुओं को न खाये अर्थात् केवल सत्तू न खाये। रात में सत्तू न खाये, भोजन
खाकर सत्तू न खाये, बहुत अधिक मात्रा में सत्तू न खाये, एक दिन में दो
बार सत्तू न खाये, पानी में भीगे हुए सत्तू या जौ का सत्तू बनाकर नहीं
खाना चाहिये। दाँतों से काटकर न खाये ॥ २२ ॥
नानृजुः क्षुयान्नाद्यान्न शयीत। न वेगतोऽन्यकार्यः स्यात्। न चाप्य-
ग्नि-सलिल-सोमार्क-द्विज-गुरु-प्रतिमुखं निष्ठीविका-वात-वर्चों-
ऽसृजेत्, न पन्थानमवमूत्रयेत्, न जनवति नाग्निकाले। जप-
बलि-मङ्गल-क्रियासु श्लेष्मसिङ्घाणकं मुञ्चेत् ॥ २३ ॥

अ० ८ ] सूत्रस्थानम १२५

अ० ८ ] सूत्रस्थानम १२५
बिना झुके छींक न ले, न खायें, न सोये । मल-मूत्र आदि के वेग उपस्थित
होने पर दूसरा काम न करे, पहला वेग का निराकरण करे। वायु, अग्नि,
जल, चन्द्रमा, सूर्य, ब्राह्मण, गुरु, पिता, माता, इनकी ओर मुख करके न थूके,
न अपान वायु और मल, मूत्र का त्याग करे । रास्ते में, मनुष्यों के बैठने के
स्थान में, भोजन के समय मूत्र त्याग न करे । जप, हवन, पठन, बलि, पवित्र
क्रियाओं के स्थान पर नाक का मल (सिंघाणक) नहीं फेंके ॥ २३ ॥
न स्त्रियमवजानीत, नातिविश्रम्भयेन्न गुह्यमनुश्रावयेन्नाधिकुर्यात् ।
न रजस्वलां नाऽऽतुरां नामेध्यां नाशस्तां नानिष्टरूपाचारोपचारां नादक्षां
नादक्षिणां नाकामां नान्यकामां नान्यस्त्रियं नान्ययोनिं नायोनौ न चैत्य-
चत्वर-चतुष्पथो पवन-श्मशान-घातन-सलिलौषधि-द्विज-गुरु-सुरालयेषु न
सन्ध्ययोर्नातिथिषु नाशुचिर्नाऽजग्धभेषजो नाप्रणीतसंकल्पो नानुपस्थित-
प्रहर्षो नामुक्तवान् नात्यशितो न विषमस्थो न मूत्रोच्चारपीडितो न
श्रम-व्यायामोपवास-क्लमाभिहतो नारहसि व्यवायं गच्छेत् ॥ २४ ॥
स्त्री का तिरस्कार न करे । स्त्री का अधिक विश्वास न करे । स्त्री को गुप्त
बात न कहे । स्त्री को अधिकारी न करे, अधिकार न देवे । रजस्वला, रोगिणी,
अपवित्र, चण्डाल आदि, कुष्ठ आदि निन्दित रोग से पीड़ित, इच्छित रूप
आचार-उपचार से रहित, अचतुर, जो स्वयं नहीं चाहती हो, दूसरे पुरुष को
चाहने वाली, परस्त्री, असमानजातीय, कामनारहित इन स्त्रियों के साथ, वा
योनि को छोड़कर अन्यत्र गुदा या मुख में, मैथुन नहीं करना चाहिये । चैत्य
( देवता का मन्दिर ), चौराहा, आंगन, उपवन, बाग, श्मशान, वध्य-भूमि में,
पानी, ओषधि, ब्राह्मण, गुरु, माता-पिता और मन्दिर के पास, प्रातः सायं दोनों
सन्ध्याकालों में, अति अधिक मात्रा में, निषिद्ध तिथियों में ( पूर्णिमा, अष्टमी,
चतुर्दशी, संक्रान्ति, श्राद्ध दिनों में, अमावस्या में, प्रतिपदा में), अपवित्रित
अवस्था में, वाजीकरण औषध खाये बिना, मन में मैथुनेच्छा किये बिना,
शिश्न में उत्तेजना हुए बिना, खाये बिना, खाली पेट, अधिक खाये, पेट भर
के और विषम स्थान पर स्थित होकर, मूत्र वेग से पीड़ित, खुले अनावृत स्थान
में स्त्री के साथ मैथुन न करे ॥ २४ ॥
न सतो न गुरून् परिवदेत्, नाशुचिरभिचार-कर्म-चैत्य-पूज्य-पूजा-
ध्ययनमभिनिर्वर्त्तयेत् ॥ २५ ॥
---------------- सज्जन या गुरुजनों की निन्दा न करे । अपवित्र अवस्था में अभिचार
(हिंसा का प्रयोग, श्येनादि उपचार) कर्म, चैत्य पूजा, एवं देवता,
पूजा, अध्ययन, पठन आदि नहीं करे ॥ २५ ॥

११६ चरकसंहिता [ अ० ८
न विद्युतस्वनार्तवीषु नाभ्युदितासु दिक्षु नाग्निसंप्लवे न भूमिकम्पे
न महोत्सवे नोल्कापाते न महाग्रहोपगमने न नष्टचन्द्रायां तिथौ न
सन्ध्ययोर्नामुखाद् गुरोर्नावपतितं नातिमात्रं तान्तं न विस्वरं नानवस्थि-
तपंदं नातिद्रुतं न विलम्बितं नातिकलीवं नात्युच्चैर्नातिनीचैः स्वरै-
रध्ययनमभ्यसेत् ॥ २६ ॥
निम्न अवस्थाओं में अध्ययन-पठन नहीं करना चाहिये—ऋतु के बिना
बिजली चमकने पर, दिशाओं के जलने पर, ग्राम नगर आदि में आग लगने
पर, भूकम्प आने पर, विवाहादि बड़े उत्सवों में, विजयादशमी, दीपमालिका
होली आदि में, उल्कापात होने पर, चन्द्रग्रहण, या सूर्यग्रहण होने पर, कृष्णपक्ष
की चतुर्दशी, अमावस्या और प्रतिपदा को जिन तिथियों में चन्द्रमा नहीं
दीखता, सन्ध्या कालों में, गुरुके मुख से बिना पढ़े, अक्षर को छोड़ते हुए,
खाते हुए, अधिक मात्रा में, रूक्ष स्वर से, स्वर के बिना, पदों की व्यवस्था के
बिना, विराम आदि चिह्नों का ध्यान न रखकर, रुक रुक कर, अति निर्बल
(बलहीन), बहुत ऊँची आवाज से बहुत जोर से, बहुत धीमी आवाज से भी
नहीं पढ़ना चाहिये ॥ २६ ॥
नातिसमयं जह्यात् । न नियमं भिन्द्यात् । न नक्तं नादेशे चरेत् ।
न सन्ध्यास्वभ्यवहाराध्ययन-स्त्री-स्वप्न-सेवी स्यात् । न बाल-वृद्ध-लुब्ध-
मूर्ख-क्लिष्ट-क्लीबैः सह सख्यं कुर्यात् । न मद्य-द्यूत-वेश्या-प्रसङ्ग-रुचिः
स्यात्, न गुह्यं विवृणुयात् । न कञ्चिदवजानीयात् । नाहंमानी स्यान्नादक्षो
नादक्षिणा नासूयकः । न ब्राह्मणान् परिवदेत् । न गवां दण्डमुद्यच्छेत्,
न वृद्धान् न गुरून् न गणान् न नृपान् वाऽधिक्षिपेत् । न चातिब्रूयात् ।
न बान्धवानुरक्तकृच्छ्रद्वितीयगुह्यज्ञान् बहिः कुर्यात् ॥ २७ ॥
समय को न खोये । नियम का उल्लंघन न करे । रात्रि में न घूमे । जंगल
आदि बीयाबान स्थानों में न घूमे । सन्ध्या समयों में भोजन, अध्ययन, मैथुन,
नींद नहीं करनी चाहिये । बालक, वृद्ध, लालची, मूर्ख, कुष्ठ रोगी, नपुंसक अनु-
त्साही अल्पसत्त्व के साथ मित्रता न करे । मद्य शराब, जुआ, वेश्या इनमें मन
नहीं लगाये । गुप्त रहस्य को न कहे । किसी का भी अपमान न करे ।
अहंकार या घमण्ड न करे । कार्यों में मूढ़ न रहे । गुणों में दोषों को न देखे ।
निन्दक, चुगलखोर न बने । ब्राह्मणों की निन्दा न करे । गाय के प्रति हाथ
उठाये । जो अपने अनुकूल हों उनकी निन्दा न करे । गुरु, [..] और
आचार्य, सभा, वयोवृद्ध, जनसमूह, समाज और राजा की [...]

अ० ८] सूत्रस्थानम् ११७

अ० ८] सूत्रस्थानम् ११७
भाई बन्धु आदि, अनुरक्त, स्नेही, मित्र आदि, आपत्ति में सहायक इनको कभी
बाहर न निकाले, कष्ट न दे ॥ २७ ॥
नाधीरो नात्युच्छ्रितसत्त्वः स्यात् । नाभृतभृत्यो, नाविश्रब्धस्वजनो,
नैकः सुखी, न दुःखशीलाचारोपचारो, न सर्वविश्रम्भी, न सर्वाभिशङ्की,
न सर्वकालविचारी । न कार्यकारलमतिपातयेत् । नापरीक्षितमभिनिवि-
शेत् । नेन्द्रियवशगः स्यात् । न चञ्चलं मनोऽनुभ्रामयेत् । न बुद्धीन्द्रि-
याणामतिभारमादध्यात् । न चातिदीर्घसूत्री स्यात् । न क्रोधहर्षायनु-
विदध्यात् । न शोकमनुवसेन् । न सिद्धावौत्सुक्यं गच्छेन्नासिद्धौ दैन्यम् ।
प्रकृतिमभीक्ष्णं स्मरेत् । हेतुप्रभाववििश्चितः स्यात् हेत्वारम्भनित्यश्च । न
कृतमित्याश्वसेत्, न वीर्यं जह्यात् । नापवादमनुस्मरेत् ॥ २८ ॥
बहुत अधीर, उतावला जल्दबाज़ न हो, बहुत उच्छ्रङ्खल उद्धत न बने ।
नौकरों का पोषण अवश्य करे । अपने मनुष्यों में, घर के आदमियों में अवि-
श्वास न करे । अकेला सुख का अनुभव न करे । अकेला मधुर पदार्थ न खाये
शील (स्वाभाविक व्यवहार), आचार, (शास्त्रानुकूल व्यवहार), उपचार,
(वस्त्र धारण करने और रहन सहन) में दुःखी व्यक्तियों की भाँति (गरीबों की
तरह) न रहे; सभ्य बनकर रहे । सब जगह सब का विश्वास न करे । सब
स्थानों पर सब का अविश्वास भी न करे, सन्देह भी न करे । सब समय सोचता
विचारता भी न रहे । काम के समय का उल्लंघन न करे । अपरीक्षित (अज्ञात)
स्थान आदि पर न बैठे न जाये । इन्द्रियों के वश में न हो । चंचल मन को
इधर उधर न घुमावे । बुद्धि, और ज्ञानेन्द्रियों का अतियोग न करे, उन पर
अधिक बोझ न डाले, अधिक विषय सेवन न करे । दीर्घ-सूत्री अर्थात् विलम्ब
से काम करने वाला न बने । जितना क्रोध आये उतना उग्र कर्म न करे और
जितनी खुशी हो उतनी अधिक खुशी न मनाये । शोक चिन्ता के वश में न
हो । कार्य में सफलता मिलने पर बहुत प्रसन्न न हो और कार्य में असफलता
मिलने पर दीन, (उदास चेहरा) न बनाये मुंह न लटकाये । बार बार प्रकृति
अर्थात् जन्म मरण के स्वभाव को ध्यान में रखे । शुभ कारण से कार्य का
आरम्भ करे । इतना कर लिया बस है, यह समझकर बैठ न जाये । वीर्य (परा-
क्रम) का त्याग न करे । निन्दा का स्मरण न करे ॥ २८ ॥
रूत्तमाभ्याक्षत-तिल-कुश-सर्षपैरग्निं जुहुयादात्मानमाशीर्भिराम-
न्त्रये नर्में नापगच्छेच्छरीरादु, वायुर्मे प्राणानादधातु, विष्णुर्मे
न्द्रो मे वीर्यं शिवा मां प्रविशन्त्वाप आपोहिष्ठेत्यपः

११८ चरकसंहिता [ अ० ८
स्पृशेत्, द्विः परिमृज्यौष्ठौ पादौ चाभ्युक्ष्य मूर्धनि खानि चोपस्पृशेदद्भि-
रात्मानं हृदयं शिरश्च, ब्रह्मचर्य-ज्ञान-दान-मैत्री-कारुण्य-हर्षोपेक्षा-प्रशम-
परश्च स्यादिति ॥ २६ ॥
अपवित्र अवस्था में उत्तम गौ का घी, अक्षत, तिल, कुशा और सरसों
द्वारा अग्नि में वेदमन्त्रों से हवन न करे और प्रार्थना करे कि अग्नि मेरे शरीर
से बाहर न जाये। वायु मेरे अन्दर प्राणों को धारण करे। विष्णु मेरे अन्दर
बल का संचार करें। इन्द्र मुझ में बल बढ़ावे। कल्याणकारी जल मुझ में प्रविष्ट
हों। ‘आपो हिष्ठा मयो भुवस्ता न ऊर्जे दधातन०’ इस मन्त्र से जल का स्पर्श
स्नान आचमन करना चाहिये। दोनों समय भोजन करने के उप्रान्त ओष्ठ
और पांव को धोकर शुष्क कर लेना चाहिये शिर और आंख, कान, नाक
इन्द्रियों को जल से स्पर्श करे। फिर अपने हृदय, शिर को जल से स्पर्श करे।
ब्रह्मचर्य (काय और मन वाणि से मैथुन को छोड़ना ब्रह्मचर्याश्रम में, गृहस्था-
श्रम में भी अपनी पत्नी में ऋतुकाल को छोड़कर) तथा अन्यों को ज्ञान-दान,
‘मैत्री’ सब प्राणियों में आत्मवत् प्रवृत्ति, सब प्राणियों में दयाभाव, हर्ष, प्रसन्नता
सब प्राणियों में, उपेक्षा अर्थात् अप्रतिग्रह बुद्धि, प्रशम अर्थात् शान्त इन्द्रिय
एवं चित्तवाला बने ॥ २६ ॥
तत्र श्लोकाः--
पञ्चपञ्चकमुद्दिष्टं मनो हेतुचतुष्टयम् ।
इन्द्रियोपक्रमेऽध्याये सद्वृत्तमखिलेन च ॥ ३० ॥
स्वस्थवृत्तं यथोद्दिष्टं यः सम्यगनुतिष्ठति ।
स समाः शतमव्याधिरायुषा न वियुज्यते ॥ ३१ ॥
नृलोकमापूरयते यशसा साधुसंमतः ।
धर्मार्थावेति भूतानां बन्धुतामुपगच्छति ॥ ३२ ॥
परान् सुकृतिनो लोकान् पुण्यकर्मा प्रपद्यते ।
तस्माद् वृत्तममुष्ठेयमिदं सर्वेण सर्वदा ॥ ३३ ॥
यच्चान्यदपि किंचित्स्यादनुक्तमिह पूजितम् ।
वृत्तं तदपि चाऽऽत्रेयः सदैवाभ्यनुमन्यते ॥ ३४ ॥
पंचेन्द्रिय और इनके पांच प्रकार, मन एवं चार कारण (समयोग, मिथ्या-
योग, हीनयोग, और अतियोग) और सम्पूर्ण सद्वृत्त को 'इन्द्रियोप...'
अध्याय में कह दिया है। जो मनुष्य कहे हुए स्वस्थवृत्त का सम्यक्
रूप से पालन करता है वह सौ वर्षों तक नीरोग रहता और...

अ० ९ ] सूत्रस्थानम् ११६

अ० ९ ] सूत्रस्थानम् ११६
आयु का भंग नहीं होता, वह सौ वर्षतक जीता है। साधुओं से पूजित होकर
मनुष्यलोक को अपने यश से भर देता है, यशस्वी बनता है। धर्म और अर्थ
को प्राप्त करता है। सब प्राणियों के प्रति बन्धुभाव उत्पन्न कर लेता है। पुण्य
कर्मों वाला मनुष्य अति उत्कृष्ट लोकों को प्राप्त करता है। इसलिये सब पुरुषों
को चाहिये कि सदा इस 'सद्वृत्त' का पालन करे। इस 'सद्वृत्त' के अतिरिक्त
और जो कुछ उत्तम कर्म हों जो कि यहां पर नहीं भी कहे हैं, उनको भी स्वीकार
करके पालन करना चाहिये ऐसा भगवान् आत्रेय का अभिप्राय है ॥ ३०-३४ ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने स्वस्थवृत्तचतुष्के
इन्द्रियोपक्रमणीयो नामाऽष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥ इति स्वस्थचतुष्कः ॥
नवमोऽध्यायः ।
अथातः खुड्डाकचतुष्पादमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
अब 'खुड्डाक चतुष्पाद' (चिकित्सा के क्षुद्र चार चरण) नामक अध्याय
का व्याख्यान करते हैं, जैसा भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ २ ॥
भिषग् द्रव्याण्युपस्थाता रोगी पादचतुष्टयम् ।
गुणवत्कारणं ज्ञेयं विकारव्युपशान्तये ॥ ३ ॥
वैद्य, औषध, परिचारक और रोगी ये चार पाद अर्थात् चिकित्सा के चार
अंग हैं। ये चारों ही विकार अर्थात् रोगों की शान्ति में गुणवान् कारण हैं ॥३॥
विकारो धातुवैषम्यं, साम्यं प्रकृतिरुच्यते ।
सुखसंज्ञकमरोग्यं, विकारो दुःखमेव च ॥ ४ ॥
शरीर के धातु वात, पित्त और कफ की विषमता का नाम ही 'विकार'
अर्थात् रोग है और धातुओं का 'साम्य' अर्थात् अनुकूलता रहने का नाम
'प्रकृति' है। आरोग्यता ही सुख है, रोग का होना दुःख है। वैद्यक शास्त्र में
सुख-आरोग्यता है, और दुःख रोग है ॥४॥
चिकित्सा का लक्षण-
चतुर्णां भिषगादीनां शस्तानां धातुवैकृते ।
प्रवृत्तिर्धातुसाम्यार्था चिकित्सेत्यभिधीयते ॥ ५ ॥
धातुओं के विषम होने पर भिषक्, रोगी, औषध और परिचारक ये चारों
गुणवाले मिलकर धातुओं को साम्य अर्थात् अनुकूल करने के लिये
प्रवृत्त होते हैं, उसी को चिकित्सा कहते हैं ॥ ५ ॥

१२० चरकसंहिता [ अ० ९
वैद्य के गुण—
श्रुते पर्यवदातत्वं बहुशो दृष्टकर्मता ।
दाक्ष्यं शौचमिति ज्ञेयं वैद्ये गुणचतुष्टयम् ॥ ६ ॥
सद्-गुरु के उपदेश मे पूर्ण रूप से शास्त्र का ठीक २ ज्ञान, चिकित्सा-कर्म
का बहुत बार दर्शन, चिकित्सा कार्य में कुशलता, चिकित्सा कर्म की सिद्ध-
हस्तता, पवित्रता, स्वच्छता ये वैद्य के गुण हैं ॥ ६ ॥
द्रव्य के गुण—
बहुता तत्र योग्यत्वमनेकविधकल्पना ।
संपच्चेति चतुष्कोऽयं द्रव्याणां गुण उच्यते ॥ ७ ॥
(बहुता) द्रव्य की प्रचुरता (योग्यता) रोगियों के दिये जाने वाले द्रव्य
में रोग को दूर करने का सामर्थ्य और जिसके अनेक प्रकार के कल्प, (स्वरस
कल्क, चूर्ण, कषाय आदि) बनाये जा सकें, 'संपत्' अर्थात् रस, वीर्य, प्रभाव,
गुण सम्पूर्ण हों, ठीक २ ऋतु में एकत्र की गई हो, ये चार गुण औषध में
होने चाहिये ॥ ७ ॥
परिचारक के गुण—
उपचारज्ञता दाक्ष्यमनुरागश्च भर्तरि ।
शौचं चेति चतुष्कोऽयं गुणः परिचरे जने ॥ ८ ॥
सेवा कर्म को जानने वाला, कर्मकुशल, रोगी में प्रीति रखने वाला शौच,
अर्थात् शुद्धि, स्वच्छता ये चार गुण परिचारक के हैं ॥ ८ ॥
रोगी के गुण—
स्मृति-निर्देश-कारित्वमभीरुत्वमथापि च ।
ज्ञापकत्वं च रोगाणामातुरस्य गुणाः स्मृताः ॥ ९ ॥
(स्मृति) स्मरण शक्ति, वैद्य के आदेश के अनुसार करने वाला, डरपोक
न हो, रोग या चिकित्सा कर्म से न घबराने वाला, अपनी शिकायतों को भली
प्रकार बता सके, ये चार गुण रोगी के हैं ॥ ६ ॥
कारणं षोडशगुणं सिद्धौ पादचतुष्टयम् ।
विज्ञाता शासिता योक्ता प्रधानं भिषगत्र तु ॥ १० ॥
पक्तौ हि कारणं पक्तुर्यथा पात्रेन्धनानलाः ।
विजेतुर्विजये भूमिश्चमूः प्रहरणानि च ॥ ११ ॥
आतुराद्यास्तथा सिद्धौ पादाः कारणसंज्ञिताः ।
वैद्यस्यातश्चिकित्सायां प्रधानं कारणं भिषक् ॥ १२ ॥

अ० ६ ] सूत्रस्थानम् १२१

अ० ६ ] सूत्रस्थानम् १२१
सोलह गुण युक्त चारों पाद मिलकर ही चिकित्सा में कारण हैं। इन सब में
प्रधान कारण 'भिषक्' अर्थात् वैद्य ही है। क्योंकि वही विशेष रूप से जानने
वाला, परिचारक आदि को आदेश देने वाला, दवाइयों का प्रयोग करने वाला
होता है। तीनों पाद वैद्य के अधीन हैं और वैद्य स्वतन्त्र है, इसलिये प्रधान
है। खाना पकाने में जिस प्रकार पाचक कारण है, और पात्र, ईंधन और
आग ये उसके अधीन रहते हैं और जिस प्रकार विजेता की विजय में भूमि,
स्थान, सेना, प्रहरण, शस्त्र आदि कारण निमित्त बनते हैं, उसी प्रकार सिद्धि
अर्थात् चिकित्सा की सफलता में रोगी, औषध और परिचारक ये तीन कारण
निमित्त होते हैं। चिकित्सा में मुख्य कारण वैद्य ही होता है ॥ १०-१२ ॥
मृद्दण्डचक्रसूत्राद्याः कुम्भकारादृते यथा ।
न वहन्ति गुणं वैद्यादृते पादत्रयं तथा ॥ १३ ॥
गन्धर्वपुरवन्नाशं यद्विकाराः सुदारुणाः ।
यान्ति यच्चेतरे वृद्धिमाशुपायप्रतोक्षिणः ॥ १४ ॥
सति पादत्रये ज्ञाना ज्ञौ भिषजावत्र कारणम् ।
जिस प्रकार कुम्हार के बिना मिट्टी, दण्ड, चक्र (चाक) सूत्र आदि मिल-
कर भी घड़े को नहीं बना सकते उसी प्रकार वैद्य के बिना रोगी, द्रव्य और
परिचारक मिलकर भी चिकित्सा-कार्य में सफलता नहीं प्राप्त कर सकते। रोगी
परिचारक और द्रव्य इन तीनों के होनेपर भी अतिशय भयानक जो रोग गन्धर्व पुर की
भांति नष्ट हो जाते हैं और दूसरे साधारण रोग भी जो थोड़ी चिकित्सा से भी
अच्छे हो सकते हैं-वे जो बढ़ते हैं-इन दोनों में ज्ञानवान् और अज्ञानी वैद्य ही
कारण होता है। गन्धर्व पुर जादूगर का बनाया मकान अथवा आकाश का
महल ॥ १३-१४ ॥
वरमात्मा हुतोऽज्ञेन न चिकित्सा प्रवर्तिता ॥ १५ ॥
पाणिचाराद्यथाऽचक्षुरज्ञानाद्भीतभीतवत् ।
नौर्मारुतवशेवाज्ञो भिषक्चरति कर्मसु ॥ १६ ॥
यदृच्छया समापन्नमुत्तार्य नियतायुषम् ।
भिषङ्कानी निहन्त्याशु शतान्यनियतायुषाम् ॥ १७ ॥
तस्माच्छास्त्रेऽर्थविज्ञाने प्रवृत्तौ कर्मदर्शने ।
भिषक् चतुष्टये युक्तः प्राणाभिसर उच्यते ॥ १८ ॥
म्थे मूढ़ वैद्य इलाज करे, इससे अच्छा अपनी हत्या कर लेना है। अन्धा
कैंकरके डरता हुआ जिस प्रकार हाथ से टटोल कर चलता है, वायु

१२२ चरकसंहिता [ अ० ९
के वश में पड़ी हुई नाव जिस प्रकार कहीं की कहीं वह जाती है, उसी प्रकार
मूढ़ वैद्य भी चिकित्सा-कर्म में प्रवृत्त होता है। नियत आयु वाले रोगियों के
स्वतः अच्छा हो जाने से अपने को वैद्य मानने वाला मनुष्य जिनको आयु
अभी शेष है, ऐसे सैकड़ों रोगियों को अपनी चिकित्सा से बिना समय के ही
शीघ्र मार देता है। इसलिये शास्त्र में तत्त्वार्थ के ज्ञान में, क्रिया में, कर्म और
कुशलता में इन चार गुणों से युक्त वैद्य ही 'प्राणाभिसर' अर्थात् रोगी के जाते
प्राणों को भी लौटा लाने वाला कहलाता है ॥ १५-१८ ॥
हेतौ लिङ्गे प्रशमने रोगाणामपुनर्भवे ।
ज्ञानं चतुर्विधं यस्य स राजार्हो भिषक्तमः ॥ १९ ॥
जिस वैद्य को रोगोत्पत्ति के कारण, लक्षण, प्रशमन, रोगों की शान्ति और पुनः
आक्रमण न होना इन चार बातों का ज्ञान है, वही 'राजवैद्य' होने योग्य है ॥
शस्त्रं शास्त्राणि सलिलं गुणदोषप्रवृत्तये ।
पात्रापेक्षीण्यतः प्रज्ञां चिकित्सार्थं विशोधयेत् ॥ २० ॥
शस्त्र, शास्त्र और पानी ये तीनों गुण और दोष को उत्पन्न करने में पात्र
की अपेक्षा करते हैं। जैसे निर्मल पानी मैले पात्र में रखने से मैला हो जाता है
और स्वच्छ पात्र में साफ दीखता है, तलवार से जहाँ दुष्ट चोर आदि का वध
हो सकता है, वहाँ सज्जन का भी गला काटा जा सकता है, शास्त्र द्वारा जहाँ
रोगी को बचाया जा सकता है, वहाँ मूढ़ वैद्य मार भी सकता है। इसलिये
चिकित्सा के लिये वैद्य को अपनी बुद्धि को सदा स्वच्छ रखना चाहिये ॥२०॥
विद्या वितर्को विज्ञानं स्मृतिस्तत्परता क्रिया ।
यस्यैते षड्गुणास्तस्य न साध्यमतिवर्तते ॥ २१ ॥
विद्या मतिः कर्मदृष्टिरभ्यासः सिद्धिराश्रयः ।
वैद्यशब्दाभिनिष्पत्तावलमेकैकमप्यतः ॥ २२ ॥
यस्य त्वेते गुणाः सर्वे सन्ति विद्यादयः शुभाः ।
स वैद्यशब्दं सद्भूतमर्हन् प्राणिसुखप्रदः ॥ २३ ॥
( विद्या ) आयुर्वेद विद्या, ( वितर्कः ) शास्त्रार्थ मूलक ऊहापोह, (विज्ञान)
बहुत शास्त्र के ज्ञान से विज्ञत्व, ( तत्परता ) लग्न, ( क्रिया ) चिकित्साकुशलता
जिस वैद्य में ये उपरोक्त छः गुण हैं उसके लिये कोई भी व्याधि असाध्य नहीं
है। आयुर्वेद विद्या, विशुद्ध बुद्धि, दृष्ट चिकित्सा, चिकित्सा कार्य में अभ्यास,
अनेक रोगियों को आरोग्य युक्त करने में सफलता, सद्गुरु का आश्रय,
एक एक भी गुण वैद्य पद प्राप्तकराने में समर्थ है। परन्तु जिस पुरुष में

अ० १०] सूत्रस्थानम् १२३

अ० १०] सूत्रस्थानम् १२३
आदि सब गुण होते हैं, वही सच्चे अर्थों में 'वैद्य' कहला सकता है। वही
प्राणियों के लिये सुख देने वाला होता है ॥ २१-२३ ॥
शास्त्रं ज्योतिः प्रकाशार्थं दर्शनं बुद्धिरात्मनः ।
ताभ्यां भिषक्सुयुक्ताभ्यां चिकित्सान्नापराध्यति ॥ २४ ॥
चिकित्सिते त्रयः पादा यस्माद्वैद्यव्यपाश्रयाः ।
तस्मात्प्रयत्नमातिष्ठेद्भिषक् स्वगुणसंपदि ॥ २५ ॥
मैत्री कारुण्यमार्तेषु, शक्ये प्रीतिरुपेक्षणम् ।
प्रकृतिस्थेषु भूतेषु, वैद्यवृत्तिश्चतुर्विधेति ॥ २६ ॥
आयुर्वेद शास्त्र तो प्रकाश करने के लिये ज्योति है और अपनी बुद्धि आंख
है। इन दोनों को मिलाकर ठीक तरह से प्रयोग करके चिकित्सक भूल नहीं
करता। चिकित्सा के तीन चरण रोगी, परिचारक और द्रव्य वैद्य पर ही आश्रित
हैं। इसलिये अपने गुणों को विशेष रूप से प्राप्त करने में वैद्य को प्रयत्नवान्
रहना चाहिये । वैद्य का व्यवहार चार प्रकार का है। रोग से पीडित पुरुष में
मित्रता और उन पर दया का भाव; साध्य रोगी में स्नेहभाव, मरणासन्न रोगी
में उपेक्षा बुद्धि रखना ॥ २४-२६ ॥
तत्र श्लोकौ-
भिषग्जितं चतुष्पादं पादः पादश्चतुर्गुणः ।
भिषक् प्रधानं पादेभ्यो यस्माद्वैद्यस्तु यद्गुणः ॥ २७ ॥
ज्ञानानि बुद्धिर्ब्राह्मी च भिषजां या चतुर्विधा ।
सर्वमेतच्चतुष्पादे खुड्डाके संप्रकाशितम् ॥ २८ ॥
चिकित्सा के चार चरण प्रत्येक चरण के चार-चार गुण, सब चरणों में
प्रधान 'भिषक्' है, क्यों प्रधान है ? वैद्य के गुण, वैद्यों की चार प्रकार की
बुद्धि और ब्राह्मी बुद्धि यह सब 'खुड्डाक चतुष्पाद' अध्याय में कह दिया है॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने निर्देशचतुष्के
खुड्डाकचतुष्पादो नाम नवमोऽध्यायः समाप्तः ॥ ६ ॥
दशमोऽध्यायः ।
ॐ अथातो महाचतुष्पादमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥

१२४ चरकसंहिता [ अ० १०

इस के अनन्तर 'महाचतुष्पाद' नामक अध्याय का व्याख्यान करेंगे जैसा
भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥
चतुष्पादं षोडशकलं भेषजमिति भिषजो भाषन्ते, यदुक्तं पूर्वा-
ध्याये षोडशगुणमिति, तद्भेषजं युक्तियुक्तमलमारोग्यायति भगवान्
पुनर्वसुरात्रेयः ॥ ३ ॥
चार चरण और सोलह कलायुक्त चिकित्सा होती है ऐसा वैद्य कहते हैं ।
पूर्व के ( खुड्डाक-चतुष्पाद ) अध्याय में जो सोलह गुणों से युक्त चिकित्सा का
उपदेश किया है उसी चिकित्सा को युक्ति पूर्वक प्रयोग करने से आरोग्यता
मिलती है ऐसा पुनर्वसु आत्रेय ने कहा है ॥ ३ ॥
नेति मैत्रेयः । किं कारणम् , दृश्यन्ते ह्यातुराः केचिदुपकरणवन्तश्च
परिचारकसंपन्नाश्चाऽऽत्मवन्तश्च कुशलैश्च भिषग्भिरनुष्ठिताः समुत्तिष्ठ-
मानास्तथायुक्ताश्चापरे म्रियमाणास्तस्माद्भेषजमकिंचित्करं भवति ।
तद्यथा श्वभ्रे सरसि च प्रसिक्तमल्पमुदकं नद्यां वा स्यन्दमानायां
पांसुधाने वा पांसुमुष्टिः प्रकीर्ण इति । तथाऽपरे दृश्यन्तेऽनुपकरणाश्चा-
परिचारकाश्चानात्मवन्तश्चाकुशलैश्च भिषग्भिरनुष्ठिताः समुत्तिष्ठमानाः,
तथायुक्ता म्रियमाणाश्चापरे । यतश्च प्रतिकुर्वन् सिद्ध्यति प्रतिकुर्वन्
म्रियते, अप्रतिकुर्वन् सिध्यत्यप्रतिकुर्वन् म्रियते ; ततश्चिन्त्यते भेषज-
मभेषजेनाविशिष्टमिति ॥ ४ ॥
'मैत्रेय' के विचार में यह ठीक नहीं, क्योंकि कुछ रोगी जिन को सब प्रकार
के साधन प्राप्त हैं, जिनके सेवक भी हैं, जो संयमी, जितेन्द्रिय भी हैं, और
चतुर वैद्य उनकी चिकित्सा करते हैं, वे अच्छे ( स्वस्थ ) होते देखे जाते हैं ।
इस के सिवाय उपरोक्त सब कुछ होते हुए भी कुछ रोगी मरते हुए भी देखे
जाते हैं । इसलिये कहते हैं कि सोलह गुणों से युक्त चिकित्सा कुछ फलदायक
नहीं । जिस प्रकार एक बड़े भारी गढ़े या तालाब में थोड़ा सा पानी डालने
पर कुछ लाभ नहीं होता और जिस प्रकार बहती हुई नदी में फेंकी हुई धूलि
की मुट्ठी निरर्थक होती है, वह पानी में बह जाती है और जिस प्रकार
रेत के बहुत बड़े ढेर में डाली हुई रेत की एक मुट्ठी का कुछ
लाभ नहीं, इसी प्रकार शुभ कर्मवाले रोगी में चिकित्सा का कोई लाभ
नहीं । कुछ रोगी साधनों के बिना ही, सेवकों से रहित, अजितेन्द्रिय,
अपथ्यसेवी, और मूढ़ वैद्यों से चिकित्सा कराने पर भी स्वस्थ होते हुये देखे
जाते हैं, एवं कुछ ( इस उपरोक्त अवस्था में ) मरते हुए भी देखे जाते
(सोलह गुणों से युक्त) चिकित्सा करने पर आरोग्ययुक्त स्वस्थ हो जाते हैं

चिकित्सा करना और न करना दोनों बराबर हैं ॥४॥

बहुत से चिकित्सा करने पर भी मर जाते हैं, बहुत चिकित्सा न करने पर भी
स्वस्थ हो जाते हैं, और न करने पर भी मर जाते हैं, अतः सन्देह होता है कि
चिकित्सा करना और न करना दोनों बराबर हैं ॥४॥

मैत्रेय ! मिथ्या चिन्त्यत इत्यात्रेयः । किं कारणम् ? ये ह्यातुराः
षोडशगुणसमुदितेनानेन भेषजेनोपपद्यमाना म्रियन्त इत्युक्तं तदनुपप-
न्नम्, न हि भेषजसाध्यानां व्याधीनां भेषजमकारणं भवति । ये पुनरा-
तुराः केवलाद्भेषजादृते समुत्तिष्ठन्ते न तेषां संपूर्णभेषजोपपादनाय
समुत्थानविशेषो नास्ति । यथा हि पतितं पुरुषं समर्थमुत्थानायोत्था-
पयन् पुरुषो बलमस्यापादद्योत् , स क्षिप्रतरमपरिक्लिष्ट एवात्तिष्ठेत्तद्व-
त्संपूर्णाभेषजोपलम्भादातुराः ! ये चाऽऽतुराः केवलादुपजादपि म्रियन्ते,
न च सर्व एव ते भेषजोपपन्नाः समुत्तिष्ठेरन्, न हि सर्व व्याधयो
भवन्त्युपायसाध्याः, न चापायसाध्यानां व्याधीनामनुपायेन सिद्धिरस्ति,
न चासाध्यानां व्याधीनां भेषजसमुदायोऽयमस्ति । न ह्यलं ज्ञानवान्
भिषङ्मुमूर्षुमातुरमुत्थापयितुम् । परीक्ष्यकारिणो हि कुशला भवन्ति ।
यथा हि योगज्ञाऽभ्यासनित्य इष्वासो धनुरादायेषुमरास्यन्नातिविप्रकृष्टे
महति काये नापराधवान् भवति सम्पादयति चेष्टकार्यम्, तथा भिषक्
स्वगुणसंपन्न उपकरणवान् वीक्ष्य कर्माऽऽरभमाणः साध्यरोगमनपराधः
संपादयत्येवाऽऽतुरमारोग्येन, तस्मान्न भेषजमभेषजेनाविशिष्टं भवति ॥५॥

आत्रेय भगवान् इसका उत्तर देते हैं कि हे मैत्रेय ! तुम्हारा ऐसा विचार
करना ठीक नहीं है । क्योंकि, रोगी सोलह गुणों से युक्त चिकित्सा करने पर भी
स्वस्थ नहीं होते, मर जाते हैं, यह कथन ठीक नहीं है । क्योंकि चिकित्सा से
अच्छे होने वाले रोगों में चिकित्सा निष्फल नहीं होती, और जो रोगी औषध-
चिकित्सा के बिना भी स्वस्थ हो जाते हैं, उनमें चिकित्सा के पूर्ण कारणों के
होने की आवश्यकता भी नहीं होती । जैसे गिरे हुए मनुष्य को जो कि अपने
आप उठने में समर्थ है, उठाने के लिये दूसरा पुरुष सहायता देता है, तब वह
जल्दी, बिना कष्ट के ही खड़ा हो जाता है । इस प्रकार सम्पूर्ण (सोलह गुणों
से युक्त) चिकित्सा प्राप्त होने से रोगी स्वस्थ हो जाते हैं । जो रोगी सम्पूर्ण
चिकित्सा के मिलने पर भी मर जाते हैं वे सब रोगी भी सोलह गुण युक्त
चिकित्सा से स्वस्थ नहीं हो सकते, क्योंकि सब रोग उपाय से साध्य नहीं हैं
(उन से रोग असाध्य भी हैं) और जो रोग उपाय से अच्छे होने वाले हैं वे
उपाय के अच्छे भी नहीं होते । इसी प्रकार जो रोगी असाध्य हैं उन को

१२६ चरकसंहिता [ अ० १०
सारा औषध-समुदाय भी ठीक नहीं कर सकता। ज्ञानवान् वैद्य भी मरणासन्न
रोगी को स्वस्थ करने में समर्थ नहीं होता। जो वैद्य साध्य-असाध्य का विचार
करके चिकित्सा का प्रारम्भ करते हैं वे कुशल चिकित्साकार्य में सफल, यशस्वी
होते हैं। जिस प्रकार कि प्रयोग विधि को जानने वाला, अभ्यासी धनुर्धारी
धनुष को लेकर बहुत दूर के नहीं, प्रत्युत समीपवर्ती स्थूल लक्ष्य पर बाण फेंकता
हुआ नहीं चूकता लक्ष्य वेध कर ही लेता है, इसी प्रकार वैद्य अपने गुणों से
युक्त, उपकरणवान्, साधनवान्, साध्य-असाध्य का विचार करके काम आरम्भ
करके, रोगी के साध्य रोग को स्वस्थ कर देता है, इसमें भूल नहीं करता, इस
लिये कहते हैं कि चिकित्सा करना और न करना दोनों समान नहीं हैं ॥ ५ ॥
इदं चेदं च नः प्रत्यक्षं यदनातुरेण भेषजेनाऽऽतुरं चिकित्सामः, क्षाम-
मक्षामेण, कृशं च दुर्बलमाप्याययामः, स्थूलं मेदस्विनमपतर्पयामः,
शीतेनोष्णाभिभूतमुपचरामः शीताभिभूतमुष्णेन, न्यूनान् धातून् पूर-
यामः, व्यतिरिक्तान् ह्रासयामः, व्याधीन् मूलविपर्ययेणोपचरन्तः सम्यक्
प्रकृतौ स्थापयामः, तेषां नस्तथा कुर्वतामयं भेषजसमुदायः कान्ततमो
भवति ॥ ६ ॥
और यह हमारा प्रत्यक्ष भी है कि रोगी की हम रोगों की प्रकृति से विपरीत
गुण वाली औषध से चिकित्सा करते हैं, क्षीणधातु वाले व्यक्ति की पौष्टिक
औषधियों से चिकित्सा करते हैं, (कृश) पतले-दुबले को मोटा बनाते हैं, स्थूल
चर्बी वाले पुरुष को पतला (कृश) करते हैं, गरमी से पीड़ित व्यक्ति की शीतल
चिकित्सा करते हैं, शीत से पीड़ित व्यक्ति की उष्ण पदार्थों से चिकित्सा करते
हैं, कम हुए धातुओं को पूर्ण करते हैं, परिमाण से अधिक बढ़े हुए धातुओं को
कम करते हैं, रोगों की कारण के विपरीत विरुद्ध चिकित्सा करते हुए दोषों को
प्रकृति में भली प्रकार से स्थित करते हैं। रोगी पुरुषों के लिये ऐसा करते हुए ये
भैषज्य-समुदाय अर्थात् सोलह गुणयुक्त चिकित्सा व्याधिनाशक और सुखकारी
होती है ॥ ६ ॥
भवन्ति चात्र—
साध्यासाध्यविभागज्ञो ज्ञानपूर्वं चिकित्सकः ।
काले चाऽऽरभते कर्म यत्तत् साधयति ध्रुवम् ॥ ७ ॥
अर्थ-विद्या-यशो-हानिमुपक्रोशमसंप्रहम् ।
प्राप्नुयान्नियतं वैद्यो योऽसाध्यं समुपाचरेत् ॥ ८ ॥
इसमें श्लोक हैं—
रोग के साध्य और असाध्य रूप को एवं साध्य असाध्य के गु...

अ० १० ] सूत्रस्थानम् १२७

अ० १० ] सूत्रस्थानम् १२७
जानकर विचारपूर्वक समय पर जो चिकित्सक कार्य का आरम्भ करता है वह
उस कर्म को अवश्य पूर्ण करता है और जो चिकित्सक असाध्य व्याधि की
चिकित्सा करता है, वह धन, विद्या और यश की हानि उठाता है । उस की
निन्दा होती है और लोग उस से चिकित्सा नहीं करवाते, उसका धन्धा नहीं
चलता ॥ ७-८ ॥
सुखसाध्यं मतं साध्यं कृच्छ्रसाध्यमथापि च ।
द्विविधं चाप्यसाध्यं स्याद्याप्यं यच्चानुपक्रमम् ॥ ६
साध्यानां त्रिविधश्चाल्पमध्यमोत्कृष्टतां प्रति ।
विकल्पो न त्वसाध्यानां नियतानां विकल्पना ॥ १० ॥
साध्य व्याधियां दो प्रकार की हैं, एक ( सुखसाध्य ) सरलता से अच्छी
होने वाली और दूसरी (कृच्छ्रसाध्य) कठिनाई से अच्छी होने वाली । असाध्य
व्याधियां भी दो प्रकार की हैं, एक (याप्य) जो कि चिकित्सा से कुछ समय के
लिये शान्त की जा सकती हैं और चिकित्सा के छोड़ने पर फिर खड़ी हो जाती
हैं। दूसरी (अनुपक्रम) सर्वथा असाध्य जो कभी अच्छी नहीं होती । साध्य
व्याधियों के पुनः तीन भेद हैं, (१) अल्पसाध्य, (२) मध्यमसाध्य, और
(३) उत्कृष्टसाध्य और जो निश्चित रूप से 'असाध्य' हैं, उनका कोई नियत
भेद नहीं है, याप्य, असाध्य रोगों के तीन भेद हैं ! यथा अल्पयाप्य, मध्यम
याप्य और उत्कृष्टयाप्य ॥ ॥ ६-१० ॥
सुखसाध्य व्याधि के लक्षण-
हेतवः पूर्वरूपाणि रूपाण्यल्पानि यस्य च ।
न च तुल्यगुणो दूष्यो, न दोषः प्रकृतिर्भवेत् ॥ ११ ॥
न च कालगुणस्तुल्यो, न देशो दुरुपक्रमः ।
गतिरेका नवत्वं च रोगस्योपद्रवो न च ॥ १२ ॥
दोषश्चैकः समुत्पत्तौ देहः सर्वौषधक्षमः ।
चतुष्पादोपपत्तिश्च सुखसाध्यस्य लक्षणम् ॥ १३ ॥
रोगोत्पत्ति के कारण थोड़े हों, बहुत अधिक या तीव्र कारण न हो, (पूर्वरूप)
अर्थात् रोग के प्राथमिक लक्षण भी हल्के हों, और 'रूप' अर्थात् स्पष्ट लक्षण
रोग के थोड़े और हल्के हों । (दूष्य रक्त, मांसादि धातु) दोष वातादि कारण के
समान न हों, पित्त के कारण से रक्त कुपित न हो, रोगोत्पादक दोष बात आदि
रोगी की प्रकृति न हो, वातजन्य व्याधि में रोगी की प्रकृति 'वात' न हो । समय
गुण न हो, हेमन्त में कफ संचय होता है, इस समय कफ का रोग न
शरीर का अवयव या अनूप अर्थात् जलबहुल प्रदेश अर्थात

१२८ चरकसंहिता [ अ० १०
कष्टसाध्य स्थान पर रोग न हुआ हो, अथवा जहां पर कठिनता से चिकित्सा
की जाय ऐसे स्थान पर रोग न हुआ हो, दोष की गति एक मार्ग में हो,
दो मार्ग में न हो, रोग नवीन हो, रोग के साथ कोई उपद्रव
(पीछे उत्पन्न हुई व्याधि या उपसर्ग (Complication) न हो, और
चिकित्सा के चारों चरण प्राप्त हों, रोगोत्पत्ति में कारण एक दोष हो तथा शरीर
सम्पूर्ण प्रकार की औषध का सहन कर सके तो ये सुखसाध्य अर्थात् सुगमता से
अच्छे होने वाले रोग के लक्षण हैं ॥११-१३॥
कृच्छ्रसाध्य रोग के लक्षण—
निमित्तपूर्वरूपाणां रूपाणां मध्यमे बले ।
कालप्रकृतिदूष्याणां सामान्येऽन्यतमस्य च ॥ १४ ॥
गर्भिणी वृद्ध-बालानां नात्युपद्रवपीडितम् ।
शस्त्र-क्षार-अग्नि-कृत्यानामनवं कृच्छ्रदेशजम् ॥ १५ ॥
विद्यादेकपर्थं रोगं नातिपूर्णचतुष्पदम् ।
द्विपथं नातिकालं वा कृच्छ्रसाध्यं द्विदोषजम् ॥ १६ ॥
रोग का कारण, रोग का पूर्वरूप और रोग का रूप, स्पष्ट चिन्ह, मध्यम
बल, संख्या में मध्यम हो अर्थात् जिस रोग को उत्पन्न करने वाले दोष-प्रकोप
के कारण न तो कम और न अधिक हों, काल प्रकृति और दूष्य इनमें से कोई
एक रोगोत्पादक दोष के समान साधारण हो, अधिक उपद्रवों से पीड़ित न हो,
तो वह रोग कृच्छ्रसाध्य है।
गर्भवती, वृद्ध और बालक, इनकी सब व्याधियां कष्टसाध्य हैं। शस्त्र, क्षार
और अग्नि इनसे चिकित्सा करते समय जो व्याधि उत्पन्न हो जाय, नवीन न
हो, जो रोग पुराना हो, मर्म स्थान, सन्धिस्यान आदि में जो रोग हो, एक
मार्गगामी हो, चिकित्सा के चारों अंग पूर्ण न हों दोष दो मार्गानुसारी हों,
बहुत समय का न हो, और दो दोषों से उत्पन्न हुआ हो वह रोग भी
कष्टसाध्य है ॥१४-१६॥
याप्य व्याधि का लक्षण—
शेषत्वादायुषो याप्यमसाध्यं पथ्यसेवया ।
लब्धाऽल्पसुखमल्पेन हेतुनाऽऽशुप्रवर्तकम् ॥ १७ ॥
असाध्य व्याधि, पथ्य, आहार विहार के पालन करने से आयु के शेष होने
के कारण 'याप्य' होती है। कुछ काल तक आराम मिलता है, परन्तु थोड़े से
भी कारण से पुनः शीघ्र उत्पन्न हो जाती है, इस प्रकार की व्याधि को याप्य
कहते हैं ॥ १७ ॥

अ० १० ] ६ सूत्रस्थानम् १२६

अ० १० ] ६ सूत्रस्थानम् १२६
असाध्य व्याधि का लक्षण—
गम्भीरं बहुधातुस्थं मर्मसन्धिसमाश्रितम् ।
नित्यमनुशायिनं रोगं दीर्घकालमवस्थितम् ॥ १८ ॥
विद्याद् द्विदोषजं, तद्वत्प्रत्याख्येयं त्रिदोषजम् ।
क्रियापथमतिक्रान्तं सर्वमार्गानुसारिणम् ॥ १९ ॥
औत्सुक्यारतिसंमोहकरनिन्द्रियनाशनम् ।
दुर्बलस्य सुसंवृद्धं व्याधिं सारिष्टमेव च ॥ २० ॥
मेद आदि गम्भीर धातु में स्थित, रस रक्तादि बहुत धातुओं में स्थित,
मर्म सन्धि में आश्रित हो लगातार रात दिन रहता हो २४ घन्टे चारइ महीने
बना रहे, देर तक दो चार साल का हो गया हो, दो दोषों से उत्पन्न हो ऐसे
रोग को याप्य, और इस प्रकार के ( गम्भीर बहु धातुस्थ आदि ) तीनों दोषों
से उत्पन्न रोग 'असाध्य' समझने चाहियें । जो रोग चिकित्सा से बाहर चला
गया हो, बहुत बढ़ गया हो, सब मार्ग ( ऊर्ध्व, अधः और तिर्यग् ) तीनों
मार्गों में पहुंच गया हो, अत्यन्त प्रसन्नता, अति बेचैनी, एवं मूर्च्छा ( गम्भीर
निद्रा ) को उत्पन्न करे, जिस रोग से इन्द्रिय, आंख का देखना, या कान का
सुनना आदि नष्ट हो जाये, निर्बल पुरुष में जो रोग बहुत बढ़ा हुआ हो, जिस
रोग के लक्षण निश्चित मृत्यु को बताने वाले स्पष्ट हों वह रोग 'असाध्य' हैं,
ऐसा रोगी भी असाध्य है ॥१८-२०॥
भिषजा प्राक् परीक्ष्यैवं विकाराणां स्वलक्षणम् ।
पश्चात्कायसमारम्भः कार्यः साध्येषु धीमता ॥ २१ ॥
साध्यासाध्यविभागज्ञो यः सम्यक् प्रतिपत्तिमान् ।
न स मैत्रेयतुल्यानां मिथ्याबुद्धिं प्रकल्पयेत् ॥ २२ ॥
वैद्य को चाहिये कि चिकित्सा करने से पूर्व रोगों की उनके लक्षणों से
परीक्षा, जांच कर ले कि यह साध्य है या असाध्य है । पीछे साध्य रोगों में
कार्य आरम्भ करना चाहिये असाध्यों में हाथ न लगाये। जो वैद्य साध्य और
असाध्य के भेदों को भली प्रकार जानता है, वह ज्ञानो बुद्धिमान् वैद्य, मैत्रेय
के समान लोगों की मिथ्या बुद्धि को नहीं बढ़ाता ॥२१-२२॥
तत्र श्लोकौ—इहौषधं पादगुणाः प्रभावो भेषजाश्रयः ।
आत्रेय-मैत्रेय-मती मति-द्वैविध्य-निश्चयः ॥ २३ ॥
ये चतुर्विधविकल्पाश्च व्याधयः स्वस्वलक्षणाः ।
महाचतुष्पादे येष्वायत्तं भिषग्जितम् ॥ २४ ॥ इति ॥