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सर्वकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

पृष्ठ 145, कुल 639 में से

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पृष्ठ 145

अ० १० ] सूत्रस्थानम् १२७
जानकर विचारपूर्वक समय पर जो चिकित्सक कार्य का आरम्भ करता है वह
उस कर्म को अवश्य पूर्ण करता है और जो चिकित्सक असाध्य व्याधि की
चिकित्सा करता है, वह धन, विद्या और यश की हानि उठाता है । उस की
निन्दा होती है और लोग उस से चिकित्सा नहीं करवाते, उसका धन्धा नहीं
चलता ॥ ७-८ ॥
सुखसाध्यं मतं साध्यं कृच्छ्रसाध्यमथापि च ।
द्विविधं चाप्यसाध्यं स्याद्याप्यं यच्चानुपक्रमम् ॥ ६
साध्यानां त्रिविधश्चाल्पमध्यमोत्कृष्टतां प्रति ।
विकल्पो न त्वसाध्यानां नियतानां विकल्पना ॥ १० ॥
साध्य व्याधियां दो प्रकार की हैं, एक ( सुखसाध्य ) सरलता से अच्छी
होने वाली और दूसरी (कृच्छ्रसाध्य) कठिनाई से अच्छी होने वाली । असाध्य
व्याधियां भी दो प्रकार की हैं, एक (याप्य) जो कि चिकित्सा से कुछ समय के
लिये शान्त की जा सकती हैं और चिकित्सा के छोड़ने पर फिर खड़ी हो जाती
हैं। दूसरी (अनुपक्रम) सर्वथा असाध्य जो कभी अच्छी नहीं होती । साध्य
व्याधियों के पुनः तीन भेद हैं, (१) अल्पसाध्य, (२) मध्यमसाध्य, और
(३) उत्कृष्टसाध्य और जो निश्चित रूप से 'असाध्य' हैं, उनका कोई नियत
भेद नहीं है, याप्य, असाध्य रोगों के तीन भेद हैं ! यथा अल्पयाप्य, मध्यम
याप्य और उत्कृष्टयाप्य ॥ ॥ ६-१० ॥
सुखसाध्य व्याधि के लक्षण-
हेतवः पूर्वरूपाणि रूपाण्यल्पानि यस्य च ।
न च तुल्यगुणो दूष्यो, न दोषः प्रकृतिर्भवेत् ॥ ११ ॥
न च कालगुणस्तुल्यो, न देशो दुरुपक्रमः ।
गतिरेका नवत्वं च रोगस्योपद्रवो न च ॥ १२ ॥
दोषश्चैकः समुत्पत्तौ देहः सर्वौषधक्षमः ।
चतुष्पादोपपत्तिश्च सुखसाध्यस्य लक्षणम् ॥ १३ ॥
रोगोत्पत्ति के कारण थोड़े हों, बहुत अधिक या तीव्र कारण न हो, (पूर्वरूप)
अर्थात् रोग के प्राथमिक लक्षण भी हल्के हों, और 'रूप' अर्थात् स्पष्ट लक्षण
रोग के थोड़े और हल्के हों । (दूष्य रक्त, मांसादि धातु) दोष वातादि कारण के
समान न हों, पित्त के कारण से रक्त कुपित न हो, रोगोत्पादक दोष बात आदि
रोगी की प्रकृति न हो, वातजन्य व्याधि में रोगी की प्रकृति 'वात' न हो । समय
गुण न हो, हेमन्त में कफ संचय होता है, इस समय कफ का रोग न
शरीर का अवयव या अनूप अर्थात् जलबहुल प्रदेश अर्थात