चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 147, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० १० ] ६ सूत्रस्थानम् १२६
असाध्य व्याधि का लक्षण—
गम्भीरं बहुधातुस्थं मर्मसन्धिसमाश्रितम् ।
नित्यमनुशायिनं रोगं दीर्घकालमवस्थितम् ॥ १८ ॥
विद्याद् द्विदोषजं, तद्वत्प्रत्याख्येयं त्रिदोषजम् ।
क्रियापथमतिक्रान्तं सर्वमार्गानुसारिणम् ॥ १९ ॥
औत्सुक्यारतिसंमोहकरनिन्द्रियनाशनम् ।
दुर्बलस्य सुसंवृद्धं व्याधिं सारिष्टमेव च ॥ २० ॥
मेद आदि गम्भीर धातु में स्थित, रस रक्तादि बहुत धातुओं में स्थित,
मर्म सन्धि में आश्रित हो लगातार रात दिन रहता हो २४ घन्टे चारइ महीने
बना रहे, देर तक दो चार साल का हो गया हो, दो दोषों से उत्पन्न हो ऐसे
रोग को याप्य, और इस प्रकार के ( गम्भीर बहु धातुस्थ आदि ) तीनों दोषों
से उत्पन्न रोग 'असाध्य' समझने चाहियें । जो रोग चिकित्सा से बाहर चला
गया हो, बहुत बढ़ गया हो, सब मार्ग ( ऊर्ध्व, अधः और तिर्यग् ) तीनों
मार्गों में पहुंच गया हो, अत्यन्त प्रसन्नता, अति बेचैनी, एवं मूर्च्छा ( गम्भीर
निद्रा ) को उत्पन्न करे, जिस रोग से इन्द्रिय, आंख का देखना, या कान का
सुनना आदि नष्ट हो जाये, निर्बल पुरुष में जो रोग बहुत बढ़ा हुआ हो, जिस
रोग के लक्षण निश्चित मृत्यु को बताने वाले स्पष्ट हों वह रोग 'असाध्य' हैं,
ऐसा रोगी भी असाध्य है ॥१८-२०॥
भिषजा प्राक् परीक्ष्यैवं विकाराणां स्वलक्षणम् ।
पश्चात्कायसमारम्भः कार्यः साध्येषु धीमता ॥ २१ ॥
साध्यासाध्यविभागज्ञो यः सम्यक् प्रतिपत्तिमान् ।
न स मैत्रेयतुल्यानां मिथ्याबुद्धिं प्रकल्पयेत् ॥ २२ ॥
वैद्य को चाहिये कि चिकित्सा करने से पूर्व रोगों की उनके लक्षणों से
परीक्षा, जांच कर ले कि यह साध्य है या असाध्य है । पीछे साध्य रोगों में
कार्य आरम्भ करना चाहिये असाध्यों में हाथ न लगाये। जो वैद्य साध्य और
असाध्य के भेदों को भली प्रकार जानता है, वह ज्ञानो बुद्धिमान् वैद्य, मैत्रेय
के समान लोगों की मिथ्या बुद्धि को नहीं बढ़ाता ॥२१-२२॥
तत्र श्लोकौ—इहौषधं पादगुणाः प्रभावो भेषजाश्रयः ।
आत्रेय-मैत्रेय-मती मति-द्वैविध्य-निश्चयः ॥ २३ ॥
ये चतुर्विधविकल्पाश्च व्याधयः स्वस्वलक्षणाः ।
महाचतुष्पादे येष्वायत्तं भिषग्जितम् ॥ २४ ॥ इति ॥