चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० ७ ] ७ सूत्रस्थानम् ८७
अ० ७ ] ७ सूत्रस्थानम् ८७
जम्भाई के रोकने से शरीर का झुकना, आक्षेप अर्थात् हाथ-पाँव का जोर
से कम्पन, पर्वसन्धियों का आकुञ्चन, अङ्गों का सो जाना, ( स्पर्श ज्ञान का
अभाव ), काँपना-हिलना आदि होता है। चिकित्सा के लिये वातनाशक उप-
चार करना चाहिये ॥ १६ ॥
कार्श्य-दौर्बल्य-वैवर्ण्यमङ्गमर्दोऽरुचिर्भ्रमः ।
क्षुद्वेग-निग्रहात्तत्र स्निग्धमुष्णं लघु भोजनम् ॥ २० ॥
भूख रोकने से कृशता, दुर्बलता, रंग का बदल जाना, अङ्ग-प्रत्यङ्गों में
वेदना, उनका टूटते हुए प्रतीत होना, भोजन में अनिच्छा, चक्कर आना ये
लक्षण होते हैं। चिकित्सा—स्निग्ध ( चिकना ), गरम और हल्का भोजन
देना चाहिये ॥ २० ॥
कण्ठास्य-शोषो बाधिर्यं श्रमः श्वासो हृदि व्यथा ।
पिपासा-निग्रहात्तत्र शीतं तर्पणमिष्यते ॥ २१ ॥
प्यास के रोकने से गले और मुख का खुश्क हो जाना, बहरापन, थकान,
श्वास, दम का चढ़ना, हृदय प्रदेश में दर्द ये लक्षण होते हैं। चिकित्सा—
शीतल, तृप्ति करनेवाले खान-पान देने चाहिये ॥ २१ ॥
प्रतिश्यायोऽक्षिरोगश्च हृद्रोगश्चारुचिर्भ्रमः ।
बाष्प-निग्रहात्तत्र स्वप्नो मद्यं प्रियाः कथाः ॥ २२ ॥
आँसुओं के रोकने से नाक से पानी झरना, कफ का स्राव होना, आँखों
के रोग, हृदय रोग, अनिच्छा और भ्रम, (सिरमें चक्कर) आदि होते हैं। चिकित्सा—
नींद, मदिरा का पान, आनन्ददायक प्रिय बातचीत करना चाहिये ॥ २२ ॥
जृम्भाऽङ्गमर्दस्तन्द्रा च शिरो-रोगाक्षि-गौरवम् ।
निद्रा-विधारणात्तत्र स्वप्नः संवाहनानि च ॥ २३ ॥
नींद रोकने से जम्भाई, अङ्गों का टूटना ( शरीर में भारीपन ), शिर की
वेदना और आँखें भारी हो जाती हैं। चिकित्सा—नींद लाना, अङ्गों का संवा-
हन अर्थात् हाथों से अङ्गों का दबाना कल्याणकारी है ॥ २३ ॥
गुल्म-हृद्रोग-संमोहाः श्रम-निश्वास-धारणात् ।
जायन्ते, तत्र विश्रामो वातघ्नाश्च क्रिया हिताः ॥ २४ ॥
थकान से उत्पन्न निःश्वास को रोकने से गुल्म रोग, हृद्-रोग,
( मूर्च्छा ) उत्पन्न होती है। इस के लिये विश्राम, ( आराम ) एवं
वातनाशक उपचार करने चाहियें ॥२४॥
९८ चरकसंहिता [ अ० ७
वेग-निग्रहजा रोगा य एते परिकीर्त्तिताः।
इच्छंस्तेषामनुत्पत्तिं वेगानेतान्न धारयेत् ॥ २५ ॥
उपस्थित वेगों को रोकने से उत्पन्न होने वाले जो ये रोग कहे हैं,
रोगों की उत्पत्ति को न चाहने वाले व्यक्ति को चाहिये कि वह इन वेगों
को न रोका करे ॥ २५ ॥
इमांस्तु धारयेद्वेगान् हितैषी प्रेत्य चेह च ।
साहसानामशस्तानां मनो-वाक्काय-कर्मणाम् ॥ २६ ॥
लोभ-शोक-भय-क्रोध-मान-वेगान् विधारयेत् ।
नैर्लज्ज्येष्र्यातिरागाणामभिध्यायाश्च बुद्धिमान् ॥ २७ ॥
परुषस्यातिमात्रस्य सूचकस्यानृतस्य च ।
वाक्यस्याकालयुक्तस्य धारयेद्वेगमुत्थितम् ॥ २८ ॥
देहप्रवृत्तिर्या काचिद्वर्तते परपीड़या ।
स्त्रीभोगस्तेय-हिंसाद्या तस्या वेगान्विधारयेत् ॥ २९ ॥
पुण्यशब्दो विपापत्वान्मनो-वाक्काय-कर्मणाम् ।
धर्मार्थकामान् पुरुषः सुखी भुङ्क्ते चिनोति च ॥ ३० ॥
इहलोक और परलोक की हित कामना करने वाले मनुष्य को चाहिये
कि इन आगे कहे वेगों को धारण करे, जैसे—अयोग्य अनुचित साहस और
मन वाणी और शरीर के निन्दित कर्मों के उपस्थित वेगों को रोके ।
मन के निन्दित कार्य जैसे—लोभ, अनुचित विषय में मन की प्रवृत्ति,
( शोक ) धन बान्धव आदि के कारण दुःख में मन की प्रवृत्ति, भय, क्रोध
जिसके कारण मनुष्य अपने को जलता हुआ प्रतीत करता है, ( द्वेष ) वैर,
दूसरे के अपकार करने में मन की प्रवृत्ति, ( मान ) महत्व, अभिमान में मन
की प्रवृत्ति, ( जुगुप्सित ) दूसरे की निन्दा, ( निर्लज्जा ) लज्जा का अभाव,
( ईर्ष्या ) कुढ़ना, ( अभिध्या ) दूसरे के द्रव्य को लेने की लालसा-बुद्धि, इन
मन के निन्दित कार्यों को रोकना चाहिये।
वाणी के निन्दित कर्म—कर्कश, कठोर विशेषतः दूसरे की निन्दा या
अनिष्ट करने की इच्छा से झूठी और अप्रासंगिक वाणी को रोकना चाहिये।
शरीर के निन्दित कर्म—दूसरे को दुःख देने की जो कोई शरीर की चेष्टा
हो, उसे स्त्री-भोग ( पर-स्त्रीसम्भोग ), स्तेय ( चोरी ), हिंसा ( दुःख कष्ट देना.,
मारना ) आदि शरीर कार्यों के उपस्थित वेगों को रोकना चाहिये।
अपनी आत्मा के प्रतिकूल जो कार्य हों वे कार्य दूसरे के लिये न
अ० ७ ] सूत्रस्थानम् ६६
अ० ७ ] सूत्रस्थानम् ६६
करने चाहिये । मनुष्य मन वचन और शरीर से पापरहित होकर ही 'पुण्य'
शब्द का भागी होता है । उसमें 'पुण्य' शब्द तभी सार्थक होता है और तभी
वह धर्म, अर्थ और काम इनको प्राप्त करता है, और सुख का भी भोग
कर सकता है ॥ २६-३० ॥
व्यायाम—
शरीरचेष्टा या चेष्टा स्थैर्यार्था बलवर्धिनी ।
देह-व्यायाम-संख्याता मात्रया तां समाचरेत् ॥ ३१ ॥
लाघवं कर्म-सामर्थ्यं स्थैर्यं क्लेश सहिष्णुता ।
दोषक्षयोऽग्निवृद्धिश्च व्यायामादुपजायते ॥ ३२ ॥
जो शारीरिक चेष्टायें शरीर की स्थिरता, दृढ़ता के लिये शरीर के बल को
बढ़ाने की इच्छा से की जाती हैं, उनको 'व्यायाम' कहते हैं । इस व्यायाम को
'मात्रा' में सेवन करना चाहिये । व्यायाम के गुण—
व्यायाम करने से शरीर में हल्कापन, काम करने की शक्ति, शरीर एवं
यौवन का टिकाऊपन, दुःख को सहन करने की शक्ति, वात आदि दोषों का
शमन, जठराग्नि की प्रदीप्ति होती है ।॥३१-३२॥
अधिक व्यायाम से हानियां—
श्रमः क्लमः क्षयस्तृष्णा रक्तपित्तं प्रतामकः ।
अतिव्यायामतः कासो ज्वरश्छर्दिश्च जायते ॥ ३३ ॥
शरीर का थकान, मन और इन्द्रियों का थकान धातुओं का क्षय, रक्तपित्त
रोग, प्रतमक संज्ञक श्वास, खांसी, ज्वर और वमन .अधिक व्यायाम से
उत्पन्न होते हैं ॥ ३३ ॥
व्यायाम-हास्य-भाष्याध्व-ग्राम्यधर्म-प्रजागरान् ।
नोचितानपि सेवेत बुद्धिमानतिमात्रया ॥ ३४ ॥
एतानेवविधांश्चान्यान् योऽतिमात्रं निषेवते ।
गजः सिंहमिवाऽऽकर्षन् सहसा स विनश्यति ॥ ३५ ॥
उचितादहिताद्धीमान् क्रमशो विरमेन्नरः ।
शरीर का परिश्रम, हँसना, ऊँचा या अधिक बोलना, ( मार्ग चलना सफर
करना ), ग्राम्यधर्म, ( मैथुन ), प्रजागर ( रात को जागना ), इन उचित
कार्यों को भी बुद्धिमान् मनुष्य अधिक मात्रा में सेवन न करे ।
इन ऊपर लिखे हुए या अन्य इसी प्रकार के कार्यों को जो मनुष्य अधिक
सेवन करता है, जिस प्रकार कि हाथी सिंह, को खींचता हुआ
मरता है, उसी प्रकार वह मनुष्य भी नष्ट हो जाता है । इसलिये बुद्धि-
मान् मनुष्य को चाहिये कि छोड़ने योग्य उन दुःखदायी कर्मों से क्रमशः
हट जावे ॥ ३४-३५ ॥
हितं क्रमेण सेवेत, क्रमश्चात्रोपदिश्यते ॥ ३६ ॥
प्रक्षेपचापचये नाभ्यां क्रमः पादांशिको भवेत् ।
एकान्तरं ततश्चोर्ध्वं व्यन्तरं त्र्यन्तरं तथा ॥ ३७ ॥
क्रमेणापचिता दोषाः क्रमेणोपचिता गुणाः ।
सन्तो यान्त्यपुनर्भावमप्रकम्प्या भवन्ति च ॥ ३८ ॥
हितकारी कार्यों का (क्रमशः) सेवन करना चाहिये । यहां अब क्रम का
उपदेश करते हैं। छोड़ने लायक ( सञ्चय करन योग्य ) कार्य को चौथाई भाग
करके क्रम से सेवन करना चाहिये । फिर दो और फिर तीन भाग छोड़ कर
ग्रहण करना चाहिये । अर्थात् छोड़ने योग्य एवं ग्रहण करने योग्य कार्य
दोनों के चार चार भाग करने चाहिये । छोड़ने योग्य कर्म का एक भाग
छोड़कर ग्रहण करने योग्य कर्म का एक भाग उसके स्थान पर ग्रहण
करना चाहिये । फिर दो भाग छोड़ कर दो भाग ग्रहण करने चाहिये
और फिर तीन भाग छोड़ कर तीन भाग ग्रहण करने चाहिये और पुनः सारा
छोड़कर सारा ग्रहण कर लेना चाहिये । ग्रहण करते समय एक दो तीन
चार दिन का अन्तर क्रम से देना चाहिये । छोड़ने योग्य कर्म को चतुर्थांश
छोड़ कर ग्रहण करने योग्य कर्म का चतुर्थांश ग्रहण करे । इस विधान को एक
दिन बरते । तीसरे दिन छोड़ने योग्य कर्म के दो भाग छोड़ कर ग्रहण करने
योग्य कर्म के दो भाग ग्रहण करे-इस प्रकार दो दिन करे । फिर तीन भाग
छोड़कर ग्रहण करने योग्य कर्म के तीन भाग ग्रहण करे-इस प्रकार तीन दिन
करे और फिर सारा कर्म छोड़कर सम्पूर्ण का ग्रहण कर लेवे । ऊपर बताये हुए
क्रम पूर्वक छोड़े हुए दोष फिर पैदा नहीं होते और क्रम से ग्रहण किये हुए गुण
नष्ट नहीं होते, चिरकाल तक स्थिर रहते हैं । हितकारी पदार्थ भी सहसा उपयोग
करने से अग्निनाश, अरुचि आदि करते हैं, इसलिये इनको भी क्रम से ही
ग्रहण करना चाहिये । इन सब कार्यों में मनुष्य की प्रकृति का ज्ञान अपेक्षित
है, क्योंकि कुछ कार्य ऐसे हैं जो कि एक के लिये अहितकारी हों, परन्तु दूसरे
के लिये हितकारी ॥ ३६-३८ ॥
सम-पित्तानिल-कफाः केचिद् गर्भादि-मानवाः ।
दृश्यन्ते वातलाः केचित्पित्तलाः श्लेष्मलास्तथा ॥ ३९ ॥
तेषामनातुराः पूर्वे, वातलाद्याः सदाऽऽतुराः ।
दोषानुशयिता ह्येषां देहप्रकृतिरुच्यते ॥ ४० ॥
अ० ७ ] सूत्रस्थानम् १०१
अ० ७ ] सूत्रस्थानम् १०१
विपरीत-गुणस्तेषां स्वस्थवृत्तेर्विधिर्हितः ।
सम-सर्व-रसं सात्म्यं समधातोः प्रशस्यते ॥ ४१ ॥
कुछ मनुष्य जन्म या गर्भकाल से ही पित्त, वायु, कफ की असमानावस्था
वाले होते हैं और कुछ मनुष्य गर्भाधान काल से ही वात प्रकृति वाले, पित्त
प्रकृति वाले और कफ प्रकृति वाले होते हैं। इन में पित्त वायु और कफ की
साम्यावस्था वाले मनुष्य प्रायः नीरोग रहते हैं, और वात प्रकृति या पित्त प्रकृति
अथवा कफ प्रकृति के मनुष्य सदा रोगी रहते हैं। इन में वातादि दोषों का
सात्म्य अर्थात् अनुकूल हो जाना ही शरीरकी 'प्रकृति' कही जाती है । अर्थात्
वात प्रकृति वाले मनुष्य में वात दोष उस के शरीर के अनुकूल हो जाता
है। इसलिये वही उसकी प्रकृति है, प्रकृति होने से वात उस में दोष नहीं,
परन्तु जब स्वास्थ्यावस्था में वात बढ़ेगा तभी दोष होगा। जिस प्रकार कि
विषकीट अपने विष से नहीं मरता, उसी प्रकार प्रकृतिस्थ वात से भी वात
प्रकृति का मनुष्य पीड़ित नहीं होता। इन वात आदि की अधिकता में वात
आदि के विपरीत विरुद्ध गुणों का इनके कारणों के विपरीत गुण भी सेवन करना
स्वास्थ्य के लिये कल्याणकारी उपाय है। और पित्त, वायु और कफ की
समानता वाली प्रकृति के मनुष्यों के लिये सब (मधुर अम्ल, लवण, तिक्त,
कटु और कषाय ) रसों का समानावस्था में अभ्यास करना उत्तम है। समान
धातुओं वाला आदमी प्रशस्त है ॥ ३६-४१ ॥
द्वे अधः सप्त शिरसि खानि स्वेद्मुखानि च ।
मलायनानि बाध्यन्ते दुष्टैर्मात्राधिकैर्मलैः ॥ ४२ ॥
मलवृद्धिं गुरुत्वेन लाघवान्मलसंक्षयम् ।
मलायनानां बुद्ध्येत सङ्गोत्सर्गादतीव च ॥ ४३ ॥
तान्दोषलिङ्गैरादिश्य व्याधीन् साध्यानुपाचरेत् ।
व्याधि-हेतु-प्रतिद्वन्द्वैर्मात्रा-कालो विचारयन् ॥ ४४ ॥
विषम-स्वस्थ-वृत्तानामेते रोगास्तथाऽपरे ।
जायन्तेऽनातुरस्तस्मात्स्वस्थ-वृत्त-परो भवेत् ॥ ४५ ॥
जब मल परिमाण से अधिक हो जाते हैं, तब वे विकृत होकर मल के
स्थानों को पीड़ित करते हैं, मल के स्थान नीचे के दो-गुदा और उपस्थ (स्त्रियों
में योनि भी); शिर में सात-दो नाक, दो कान, दो आंखें और एक मुख,
पसीना निकलने के सब छिद्र ये मल के स्थान हैं, मल इनको पीड़ित करते हैं।
भारीपन होने से मल की वृद्धि समझनी चाहिये और शरीर में हलकापन
१०२ चरकसंहिता [ अ० ७
होने से मल का क्षय समझना चाहिये। मल के स्थानों से मल के न निकलने से
मल का क्षय, मल स्थानों से मल का बार-बार अधिक बाहर निकलना वृद्धि को
बताता है । मलों की वृद्धि और क्षय दूसरों के कारण हुए हैं, यह समझकर
उनके चिन्हों से पहिचानकर उन से उत्पन्न साध्य रोगों को रोग और व्याधि के
हेतु इन दोनों के विपरीत गुण, वीर्य, विपाक और प्रभाव से विरुद्ध औषध,
आहार और विहार द्वारा चिकित्सा करनी चाहिये । चिकित्सा करते समय वैद्य
मात्रा औषध, आहार और विहार का परिमाण काल, दोष, व्याधि के प्रकोप,
ऋतु, रात, दिन आदि समयों का विचार कर ले। ये विषम धातु वाले रोगी
और नीरोगी इन दोनों के लिये हितकारी हैं, धातु की विषमता से उत्पन्न होने
वाले रोग और मानस या आगन्तुज रोग नहीं उत्पन्न होते । इसलिये मनुष्य
रोगी नहीं होता, रोगी न हो अतः रोगी होने से पूर्व ही स्वस्थवृत्त का सेवन
करना चाहिये ॥ ४२-४५ ॥
कारण से उत्पन्न होने वाले रोगों से बचने के उपाय—
माधव-प्रथमे मासि नभस्य-प्रथमे पुनः ।
सहस्य-प्रथमे चैव हारयेद्दोषसंचयम् ॥ ४६ ॥
स्निग्ध-स्विन्न-शरीराणामूर्ध्वं चाधश्च बुद्धिमान् ।
बस्तिकर्म ततः कुर्यान्नस्तः कर्म च बुद्धिमान् ॥ ४७ ॥
यथाक्रमं यथायोगमत ऊर्ध्वं प्रयोजयेत् ।
रसायनानि सिद्धानि वृष्ययोगांश्च कालवित् ॥ ४८ ॥
रोगास्तथा न जायन्ते प्रकृतिस्थेषु धातुषु ।
धातवश्चाभिवर्धन्ते जरा-मान्द्यमुपैति च ॥ ४९ ॥
विधिरेश विकाराणामनुत्पत्तौ निदर्शितः ।
निजानामितरेषां तु पृथगेवोपदिष्यते ॥ ५० ॥
वैशाख और इस से पूर्व के मास अर्थात् चैत्र में, और भाद्रपद,
इससे पूर्वके मास अर्थात् श्रावण में तथा पौष इससे मास पूर्व के मार्गशीर्ष
में एकत्रित दोषों को वमन विरेचन आदि से निकाल देना चाहिये ।
हेमन्त ऋतु में संचित कफ को चैत्र मास में ग्रीष्म में संचित वायुको
श्रावण मास में, वर्षा में संचित पित्त को मार्गशीर्ष में निकाल देना
चाहिये । इन मासों में दोषों के प्रकोप होने का भय रहता है, इसलिये प्रको[प]
होने से पूर्व ही दोषों को निकाल देना चाहिये । पहिले शरीर को स्नि[ग्ध] [घृत] और
आदि से चिकना करके पसीना देना चाहिये जिससे कि शरीर के म्ने[द] [स्वेद]
जायें । स्नेहन और स्वेदन के पीछे वमन कार्य और विरेचन कराना चाहिये ।
इन के पीछे बस्ति कर्म और अन्त में नस्य कर्म अर्थात् शिरोविरेचन देना
चाहिये । स्निग्ध और स्विन्न शरीर वाले पुरुषों के लिये वमन कफ नाशक होने
से चैत्र में, अनुवासन, बस्तिकर्म वात हर होने से श्रावण मास में एवं पित्त-
नाशक होने से विरेचन मार्गशीर्ष मास में लेना चाहिये । अथवा चैत्र मास में
वमन के पीछे विरेचन, मार्गशीर्ष में विरेचन से पूर्व वमन और फिर चैत्र और
मार्गशीर्ष दोनों में बस्तिकर्म एवं नस्य कर्म करना चाहिये । चैत्र में यदि वम-
नादि कार्य कर लिए हों तो श्रावण मास में अनुवासन और आस्थापन करना
चाहिये । और यदि चैत्र में वमनादि न किये हों तो वमन विरेचन करके फिर
बस्तिकर्म और नस्य कर्म करना चाहिये । स्नेह के पीछे स्वेद, स्वेद के पीछे
वमन, वमन के पीछे विरेचन, विरेचन के पीछे बस्तिकर्म और बस्तिकर्म के
पीछे नस्य देना चाहिये । प्रथम स्वेदन, वमन, विरेचन, बस्ति और नस्य कर्म
ये क्रमशः तथा जिस पुरुष के लिये जो २ कर्म योग्य हों उन्हें करने के पीछे
जरा और रोग को दूर करने वाली औषध का उपयोग करना चाहिये । रसायन
सेवन के पीछे सिद्ध एवं वृष्य पौष्टिक प्रयोगों का सेवन समय को जानने वाला
वैद्य करावे । रस रक्तादि धातुओं के प्रकृतिस्थ होने से शरीर में दोषजन्य रोग
नहीं होते । वृष्य आदि क्रिया करने से रस रक्तादि बढ़ते हैं और बुढ़ापे का
अन्त हो जाता है, बुढ़ापा नहीं आता । यह उपरोक्त विधि शरीर-दोषजन्य रोगों
की अनुत्पत्ति के लिये कहा है । आगन्तुक रोगों के लिये भिन्न विधि कहते हैं ।
ये भूत-विष-वाय्वग्नि-संप्रहारादि-संभवाः ।
नृणामागन्तवो रोगाः प्रज्ञा तेष्वपराध्यति ॥ ५१ ॥
ईर्ष्या-शोक-भय-क्रोध-मान-द्वेषादयश्च ये ।
मनो-विकारास्तेऽप्युक्ताः सर्वे प्रज्ञापराधजाः ॥ ५२ ॥
जो कि (भूत) नाना सूक्ष्म प्राणी ग्रह आदि, (विष) स्थावर या जंगम
विष, (वायु) झंझावात, (अग्नि) ज्वालामुखी, दावानल आदि (संप्रहार)
चोट आदि से मनुष्यों के 'आगन्तुज' अर्थात् बाहर से होने वाले रोग होते हैं,
उन में बुद्धि का अपराध मिथ्या या अन्यथा रूप में प्रयोग हुआ होता है ।
(मत्सर), शोक, भय, क्रोध, अभिमान, द्वेष आदि मन के विकार अर्थात्
वात आदि दोषजन्य नहीं प्रत्युत ये सब बुद्धि के दोष से ही उत्पन्न
हैं ॥ ५१-५२ ॥
१०४ चरकसंहिता [ अ० ७
आगन्तुज रोगों के प्रतीकार—
त्यागः प्रज्ञापराधानामिन्द्रियोपशमः स्मृतिः ।
देश-कालात्म-विज्ञानं सद्वृत्तस्यानुवर्त्तनम् ॥ ५३ ॥
आगन्तूनामनुत्पत्तावेष मार्गो निदर्शितः ।
प्राज्ञः प्रागेव तत्कुर्याद्धितं विद्याद्यदात्मनः ॥ ५४ ॥
आप्तोपदेश-प्रज्ञानं प्रतिपत्तिश्च कारणम् ।
विकाराणामनुत्पत्तावुपन्नानाञ्च शान्तये ॥ ५५ ॥
आगन्तुज एवं मानसिक रोग बुद्धि के दोष से उत्पन्न होते हैं, इस लिये
इस प्रज्ञापराध को छोड़ना चाहिये । इन्द्रियों को विषयों से रोकना बुद्धि, स्मृति,
भगवान् का स्मरण, देश काल और आत्मा का चिन्तन, (सद्वृत्त) सच्चे,
कल्याणकारी मार्ग का अनुसरण करना, यह विधि आगन्तुज रोगों की उत्पत्ति से
बचने का मार्ग है । इस प्रकार बरतने से आगन्तुज रोग उत्पन्न नहीं होते ।
बुद्धिमान् व्यक्ति को चाहिये कि अपने लिये जो हितकारी काम हो उनको रोगो-
त्पत्ति से पूर्व ही करे ।
(आप्तोपदेश) रजस् और तमस् से मुक्त निर्भ्रान्त विद्वानों के उपदेश
और (प्रज्ञान) बुद्धि से सिद्ध, प्रमाण द्वारा सिद्ध किये, बुद्धि से स्वीकार
किये ये दोनों मानसिक विकारों की अनुत्पत्ति में तथा उत्पन्न विकारों की
शान्ति में कारण है ॥ ५३-५५ ॥
वर्जने योग्य मनुष्य—
पाप-वृत्त-वचःसत्त्वाः सूचकाः कलह-प्रियाः ।
मर्मोपहासिनो लुब्धाः पर-वृद्धि द्विषः शठाः ॥ ५६ ॥
परापवाद-रतयश्चपला रिपु-सेविनः ।
निर्घृणास्त्यक्तधर्माणः परिवर्ज्या नराधमाः ॥ ५७ ॥
जिनकी वाणी और मन पापमय हों, चुगलखोर, झगड़ालू, कमजोरी या
छिद्र को ढूँढ़कर उस पर हंसनेवाले, लालची, जो दूसरी की उन्नति में द्वेष भाव
रखते हैं, दूसरों की निन्दा ही करना जिनका काम है, चंचल प्रकृति, अस्थिर
मन, दुश्मन से मिले हुए, या काम क्रोधादि के वशीभूत, दयारहित, निर्दयी,
धर्म से न डरने वाले, ऐसे नीच पुरुषों को छोड़ देना चाहिये ॥५६-५७॥
सेवन करने योग्य मनुष्य—
बुद्धि-विद्या-वयः-शील-धैर्य-स्मृति-समाधिभिः ।
वृद्धोपसेविनो वृद्धाः स्वभावज्ञा गत-व्यथाः ॥५८॥
अ० ७ ] सूत्रस्थानम् १०५
अ० ७ ] सूत्रस्थानम् १०५
सुमुखाः सर्वभूतानां प्रशान्ताः संशित-व्रताः ।
सेव्याः सन्मार्ग-वक्तारः पुण्य-श्रवण-दर्शनाः ॥५९॥
जो बुद्धि, विद्या, आयु, शील, स्वभाव, धैर्य्य साहस, स्मरण शक्ति, (समाधि)
मन का संयम आदि में अपने से बड़े हों, जो वृद्धों की सेवा करते हों, स्वभाव
को जानने वाले, अनुनयी, जिनको कि किसी प्रकार की चिन्ता नहीं, सुमुख-
सब प्राणियों के लिये प्रसन्नमुख, (प्रशान्त) इन्द्रियों के विषयों से निवृत्त,
ब्रह्मचारी, सच्चे मार्ग का उपदेश करने वाले, पुण्य शब्दों को सुनाने वाले एवं
पुण्य दर्शनशील, जिनका शब्द और दर्शन पवित्र करता है, इस प्रकार के
आप्त पुरुषों का सेवन करना चाहिये, उनको गुरु मानना चाहिये, ये ज्ञान,
विज्ञान, धैर्य्य, स्मृति आदि की शिक्षा देकर मानस रोगों को नष्ट कर सकते हैं ॥
आहाराऽऽचारचेष्टासु सुखार्थी प्रेत्य चेह च ।
परं प्रयत्नमातिष्ठेद् बुद्धिमान् हितसेवने ॥ ६० ॥
न नक्तं दधि भुञ्जीत न चाप्यघृत-शर्करम् ।
नामुद्गसूपं नाक्षौद्रं नोष्णं नाऽऽमलकैर्विना ॥ ६१ ॥
( अलक्ष्मी-दोष-युक्तत्वान्नक्तं तु दधि वर्जितम् ।
श्लेष्मलं स्यात्ससर्पिष्कं दधि मारुत-सूदनम् ॥ ६२ ॥
न च सन्धुक्षयेत्पित्तमाहारं च विपाचयेन् ।
शर्करा-संयुक्तं दद्यात्तृष्णा-दाह-निवारणम् ॥ ६३ ॥
मुद्गसूपेन संयुक्तं दद्याद्वह्निकानिलापहम् ।
सुरसं चाल्पदोषं च क्षौद्रयुक्तं भवेद्दधि ।
उष्णं पित्तास्रकृद्दोषान् धात्रीयुक्तं तु निर्हरेत् ॥ ६४ ॥
ज्वरासृक्पित्त-वीसर्प-कुष्ठ-पाण्ड्वामय-श्रमान् ।
प्राप्नुयात्कामलां चोग्रां विधिं हित्वा दधिप्रियः ) ॥ ६५ ॥
इहलोक और परलोक में सुख चाहने वाले बुद्धिमान् व्यक्ति को चाहिये कि
हितकारी आहार, खान पान, आचार वर्त्तन और चेष्टा-क्रियाओ इन में विशेष
रूप से यत्नवान् रहे।
रात्रि में दही नहीं खाना चाहिये, और रात के सिवाय अन्य समय में जब
खाना हो तब भी घी या शकर के बिना, मूंग की दाल के बिना, शहद के बिना
किये बिना, अथवा आंवले के बिना नहीं खाना चाहिये। जब खाना हो
य, शहद, आंवला इन के साथ या गरम करके खाना चाहिये। रात
भी प्रकार से नहीं खाना चाहिये। रात्रि में दही खाने से शरीर की
१०६ चरकसंहिता [ अ० ७
श्लेष्मा और स्वास्थ्य नष्ट हो जाते हैं और शरीर के दोष कुपित होते हैं। दही
में घी मिलाने से दही कफकारक हो जाता है, परन्तु वायु का नाश करता है।
शर्करा युक्त दही 'पित्त' ( जठराग्नि या पित्त को ) नहीं बढ़ाता, परन्तु आहार
भोजन को पचा देता है। इस लिये तृष्णा, प्यास और कलेजे की जलन
को मिटाता है। मूंग के साथ मिलाकर दही खाने से 'वातरक्त' रोग में लाभ
होता है। शहद के मिलाने से दही सुस्वाद और थोड़ा दोष वाला हो जाता है।
दही को गरम करके खाने से रक्तपित्त जन्य विकार नष्ट होते हैं, आंवले के
साथ खाने से भी रक्त पित्त रोग शान्त होता है। बहुत दही खाने वाला मनुष्य
जो इस उपरोक्त विधि को छोड़ कर दही खाता है, उसको ज्वर, रक्तपित्त,
वीसर्प, कुष्ठ, पाण्डुरोग, भ्रम, और तीव्र कामला रोग हो जाते हैं ॥ ६०-६५ ॥
तत्र श्लोकाः-
वेगा वेगसमुत्थाश्च रोगास्तेषां च भेषजम् ।
येषां वेगा विधार्याश्च यदर्थं यद्धिताहितम् ॥ ६६ ॥
उचिते चाहिते वर्ज्ये सेव्ये चानुचिते क्रमः ।
यथाप्रकृति चाऽऽहारो मलायनगदौषधम् ॥ ६७ ॥
भविष्यतामनुत्पत्तौ रोगाणामौषधं च यत् ।
वर्ज्याः सेव्याश्च पुरुषा धीमताऽऽत्म-सुखार्थिना ॥ ६८ ॥
विधिना दधि सेव्यं च येन यस्मात्तदत्रिजः ।
न वेगान्धारणेऽध्याये सर्वमेवाबदन्मुनिः ॥ ६६ ॥
मनुष्यों में उत्पन्न होने वाले स्वाभाविक वेग, वेगों को रोकने से उत्पन्न
होने वाले रोग, इन रोगों की औषध, जिन उपस्थित वेगों को धारण करना चाहिये,
जिस के लिये जो लाभकारी है, उचित एवं अहितकारी, छोड़ने योग्य और
सेवनीय क्रम प्रकृत के अनुसार आहार, मलस्थान मल की वृद्धि, क्षय, औषध, भविष्य
में न होने वाले रोगों की औषध, सुख चाहने वाले बुद्धिमान् मनुष्य को जिन
पुरुषों को छोड़ना या जिनका सेवन करना उचित है, और दही को सेवन
करने की विधि यह सब आत्रेय मुनि ने 'न वेगान्धारणीय' नामक अध्याय में सम्पूर्ण
रूप से उपदेश किया है ॥ ६६-६९ ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने स्वस्थवृत्तचतुष्के
'न वेगान्धारणीयो' नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥ और
अ० ८ ] सूत्रस्थानम् १०१
अ० ८ ] सूत्रस्थानम् १०१
अष्टमोऽध्यायः ।
अथात इन्द्रियोपक्रमणीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
आहार एवं 'स्वस्थ-चतुष्क' कहने के अनन्तर 'इन्द्रियोपक्रमणीय' नामक
अध्याय का व्याख्यान करते हैं जैसा भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥
इह खलु पञ्चेन्द्रियाणि पञ्चेन्द्रियद्रव्याणि पञ्चेन्द्रियाधिष्ठानानि
पञ्चेन्द्रियार्थाः पञ्चेन्द्रियबुद्धयो भवन्तीत्युक्तमिन्द्रियाधिकारे ॥ ३ ॥
इस आयुर्वेद के प्रकरण में पाँच इन्द्रियाँ हैं। पाँच ही इन्द्रियों के ग्राह्य
द्रव्य हैं। पांच ही इन्द्रियों के अधिष्ठान हैं। पांच ही इन्द्रियों के अर्थ, पाँच
प्रकार की इन्द्रियों का ज्ञान है ऐसा पूर्वाचार्यों ने इन्द्रियों के विषय में कहा है ॥
अतीन्द्रियं पुनर्मनः सत्त्वसञ्ज्ञकं चेत इत्याहुरेके, तदर्थात्मसंपत्त-
दायत्तचेष्टं चेष्टाप्रत्ययभूतमिन्र्द्रियाणाम् ॥ ४ ॥
'मन' अतीन्द्रिय अर्थात् इन्द्रियों में सूक्ष्मतम है वह इसी मन को 'सत्त्व'
कहते हैं। इसी मन को कितने 'चित्त' इस नाम से कहते हैं। वह मन अपने
विषय और आत्मा इन की श्रेष्ठता के अधीन व्यापार वाला है और इन्द्रियों की
चेष्टाओं का कारण है। एवं इन्द्रियों की चेष्टाओं, व्यापार वा प्रतीति का
कारण मन ही है ॥ ४ ॥
स्वार्थेन्द्रियार्थ-संकल्प-व्यभिचरणाच्चानेकमेकस्मिन् पुरुषे सत्त्वम्,
रजस्तमः सत्त्व-गुण-योगाच्च; न चानेकत्वम्, नह्येकं ह्येककालमनेकेषु
प्रवर्तते, तस्मान्नैक-काला सर्वेन्द्रिय-प्रवृत्तिः ॥ ५ ॥
वास्तव में 'मन' एक ही है, परन्तु इन्द्रियों के अपने २ द्रव्य में विषय के
संकल्पों के बदलते रहने से एक पुरुष में अनेक मन एवं मन के सत्त्व गुण होने
पर, सत्त्व, रजस्, तमस् इन गुणों के न्यूनाधिक होने से अनेक मन एकही
मनुष्य में प्रतीत होते हैं। वास्तव में मन एक ही है अनेक नहीं है। क्योंकि
एक ही समय में एक मन अनेक इन्द्रियों में प्रवृत्त नहीं हो सकता इसलिये
एक ही समय में सब इन्द्रियों की प्रवृत्तियाँ चेष्टा नहीं होती ॥ ५ ॥
यद्गुणं चाभीक्ष्णं पुरुषमनुवर्त्तते सत्त्वम्, तत्सत्त्वमेवोपविशन्ति
...यद्बहुत्वानुशयात् ॥ ६ ॥
जिस गुण (सत्व, रजस् या तमस् ) वाला मन बार बार अनु-
१०८ चरकसंहिता [अ० ८
सरण करता है, मन को उसी ही गुण वाला मुनि लोग कहते हैं। क्योंकि जिस
गुण की अधिकता होगी उसी गुण वाला मन होगा ॥ ६ ॥
मनःपुरःसराणीन्द्रियाण्यथं-ग्रहण-समर्थानि भवन्ति ॥ ७॥
इन्द्रियां मन को साथ में लेकर ही विषय के ग्रहण करने में समर्थ होती हैं।
बिना मन के इन्द्रियां विषय को ग्रहण नहीं कर सकतीं ॥ ७ ॥
तत्र चक्षुः श्रोत्रं घ्राणं रसनं स्पर्शनमिति पञ्चेन्द्रियाणि ॥ ८ ॥
पञ्चेन्द्रियद्रव्याणि—खं वायुर्ज्योतिरापो भूरिति ॥ ६ ॥
पञ्चेन्द्रियाधिष्ठानानि अक्षिणी कर्णौ नासिके जिह्वा त्वक् चेति।१०।
पञ्चेन्द्रियार्थाः—शब्द-स्पर्श-रूप-रस-गन्धाः ॥ ११ ॥
आंख, श्रोत्र, नासिका, जिह्वा और त्वचा ये पांच इन्द्रियां हैं। पांच
इन्द्रियों के पांच ग्राह्य पदार्थ हैं, यथा आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथिवी।
इन्द्रियों के पांच अधिष्ठान हैं, यथा चक्षु गोलक दो, दोनों बाह्य कान, जीभ,
दोनों नासिकायें और त्वचा। इन्द्रियों के पांच विषय हैं:—शब्द, स्पर्श, रूप,
रस और गन्ध। इन्द्रिय-ज्ञान भी पांच प्रकार का है—चक्षुर्ज्ञान, श्रोत्र-ज्ञान,
गन्ध-ज्ञान, रस ज्ञान और स्पर्श ज्ञान ॥ ८-११ ॥
पञ्चेन्द्रियबुद्धयश्चक्षुर्बुद्ध्यादिकाः, ताः पुनरिन्द्रियेन्द्रियार्थसत्त्वा-
त्मसंनिकर्षजाः क्षणिका निश्चयात्मिकाश्च इत्येतत्पञ्चपञ्चकम् ॥१२॥
ये पांचों इन्द्रियों के विषय, मन और आत्मा इनका एक साथ संयोग होने
से उत्पन्न होते हैं। यह और ही क्षणिक निश्चयात्मक (स्थायो ज्ञान) है। इस
प्रकार से ये पांच-पांच पदार्थों के समूह होते हैं ॥ १२ ॥
मनो मनोऽर्थो बुद्धिरात्मा चेत्यध्यात्म-द्रव्य-गुण-संग्रहः शुभाशुभ-प्रवृ-
त्तिनिवृत्ति हेतुश्च, द्रव्याश्रितं च कर्म, यदुच्यते क्रियेति ॥ १३ ॥
मन, मन के अर्थ (विषय), बुद्धि और आत्मा यह अध्यात्म द्रव्यों का
और गुणों का संग्रह है। तथा जो कर्म द्रव्य में आश्रित है उसे क्रिया कहते हैं।
'शुभ' दोनों लोकों में कल्याणकारी, अशुभ (लोकों में निन्दित), प्रवृत्ति,
निवृत्ति ये कारण हैं ॥१३ ॥
तत्रानुमानगम्यानां पञ्च-महाभूत-विकार-समुदायात्मकानामपि स-
तामिन्द्रियाणां तेजश्चक्षुषि, खं श्रोत्रे, घ्राणे क्षितिः, आपोरसने, स्पर्शनेऽ-
निलो विशेषेणोपदिश्यते ॥ १४ ॥
अनुमान द्वारा जानने योग्य इन्द्रियां पंचमहाभूतों के विकार के समूह...
उत्पन्न हुई हैं तो भी, तेज आंखों में, आकाश श्रोत्रों में, पृथिवी ना... और
जल रसना में और वायु त्वचा में विशेष रूप से रहते हैं ॥ १४ ...
अ० ८] सूत्रस्थानम् १०६
अ० ८] सूत्रस्थानम् १०६
तत्र यद्यदात्मकमिन्द्रियं विशेषात्तत्तदात्मकमेवार्थमनुधावति,
तत्स्वभावाद्द्विभुत्वाच्च ॥ १५ ॥
इनमें जो जो इन्द्रियाँ, जिस जिस भूत से बनी हैं वे विशेष रूप से
उसी उसी (भूत) से बने अर्थ (विषय) को ग्रहण करती हैं। ये अपने समान
स्वभाव वाली होने से समान जातिकारी विषय को ग्रहण करने में समर्थ होने से
प्रधान भूतात्मक विषय को ही ग्रहण करती हैं। यथा आंख तैजस है, इसलिये
वह तेज की ओर दौड़ती है, कान आकाश जन्य है इसलिये शब्द की ओर
दौड़ते हैं। स्पर्श वायव्य होने से वायु की ओर, जिह्वा आप्य है इसलिये रस की
ओर और घ्राण पार्थिव होने से पृथिवी की ओर दौड़ती है ॥ १५ ॥
यदर्थाति योगायोगमिथ्यायोगात्सममनस्कमिन्द्रियं विकृतिमापद्यमानं
यथास्वं बुद्धयुपघाताय संपद्यते, समयोगान्तुनः प्रकृतिमापद्यमानं
यथास्वं बुद्धिमाप्याययति ॥ १६ ॥
इनमें मन के साथ इन्द्रिय का विषय में अतियोग, अयोग, या मिथ्यायोग
होने से 'विकृति' अर्थात् रोग उत्पन्न होकर अपने अपने ज्ञान के नाश के लिये
उद्यत हो जाता है। समयोग से इन्द्रिय स्वभाव में रहकर अपने अपने ज्ञान की
वृद्धि करती हैं। समान अर्थात् उचित योग से वृद्धि होती है ॥ १६ ॥
मनसस्तु चिन्त्यमर्थः, तत्र मनसो बुद्धेश्च त एव समानाति हीन-
मिथ्यायोगाः प्रकृति-विकृति-हेतवो भवन्ति ॥ १७ ॥
मन का विषय चिन्तन करना है (सुख, दुःख, प्रयत्न आदि चिन्तनीय
होने से मन के विषय हैं)। इसलिये मन और बुद्धि का समान योग स्वस्थता
कारण है और मन एवं बुद्धि का अतियोग वा हीनयोग अथवा मिथ्यायोग
विकृति अर्थात् 'विकार' या रोग का कारण है ॥ १७ ॥
तत्रेन्द्रियाणां समनस्कानामनुपतप्तानामनुपतापाय प्रकृतिभावे प्रय-
तितव्यमेभिर्हेतुभिः। तद्यथा—सात्म्येन्द्रियार्थसंयोगेन, बुद्ध्या सम्यग-
वेक्ष्यावेक्ष्य कर्मणां सम्यक्प्रतिपादनेन, देशकालात्मगुणांविपरीतोपसेव-
नेन चेति । तस्मादात्महितं चिकीर्षता सर्वेण सर्वं सर्वदा स्मृतिमास्थाय
सद्वृत्तमनुष्ठेयम् । तद्ध्यनुष्ठितं युगपत्संपादयत्यर्थद्वयमारोग्यमिन्द्रि-
यविजयं चेति ॥ १८ ॥
इसलिये अपनी प्रकृति में स्थित मन सहित इन्द्रियों को स्वस्थ तथा अपने
वश में रखने के लिये, विकृति से बचाने के लिये निम्न कारणों द्वारा प्रयत्न
। उचित अनुकूल रूप से इन्द्रिय और विषय के संयोग न अति,
११० चरकसंहिता [ अ० ८
न हीन और न मिथ्यासंयोग से, एवं बुद्धि द्वारा भली प्रकार देखकर कर्मों को
उचित रूप में करने से और देश, काल, आत्मा के गुण के अविपरीत,
हितकारी वस्तुओं के सेवन करने से इन्द्रियां उपतप्त न होकर प्रकृति अवस्था
में रहती हैं। इसलिये अपना या अपने शरीर का और आत्मा का कल्याण
चाहने वाले सब पुरुषों को सदा स्मरण रखकर सद्वृत्त का (पांचों इन्द्रियों
को मन के साथ संयुक्त करके) मन, वचन और कर्म से पालन करना चाहिये।
इस सद्वृत्त के पालन करने से आरोग्यता एवं 'इन्द्रियविजय' दोनों कार्य
एक साथ ही सिद्ध हो जाते हैं ॥ १८ ॥
तत्सद्वृत्तमखिलेनोपदेक्ष्यामः । तद्यथा—देव-गो-ब्राह्मण-गुरु-वृद्ध-
सिद्धाचार्यानर्चयेत्, अग्निमुपाचरेत्, ओषधीः प्रशस्ता धारयेत्, द्वौ
कालावुपस्पृशेत्, मलायनेष्वभीक्ष्णं पादयोश्च वैमल्यमादध्यात्, त्रिः
पक्षस्य केश-श्मश्रु-लोम-नखान् संहारयेत्, नित्यमनुपहतवासाः सुमनाः
सुगन्धिः स्यात् ॥ १६ ॥
इस सद्वृत्त को सम्पूर्ण रूप में कहते हैं—देवता, गो, ब्राह्मण, गुरु (माता
पिता अभ्यागत अतिथि) वृद्ध (विद्यावृद्ध, धनवृद्ध, आयुवृद्ध, शौर्यवृद्ध,) सिद्ध
(तापस, भिक्षुक), आचार्य (उपनयन संस्कार करने वाले गुरु), इनकी पूजा सेवा
करनी चाहिये। अग्निहोत्र प्रातःसायं दोनों समय करना चाहिये, अनिन्दित, (दोषों
को नष्ट करने वाली ओषधियां) वनस्पतियां, धारण करनी चाहियें। दोनों समय
प्रातःसायं स्नान करना चाहिये। मल के स्थानों को बार बार एवं पांव को सदा
पवित्र रक्खे। बाल, दाढ़ी, मूंछ नाखून, कक्ष के एवं गुह्य स्थानों के बालों को
पन्द्रह दिन में तीन बार, पांच पांच दिन के पीछे कटवाना चाहिये। नित्य प्रति
शुद्ध वस्त्र धारण करे, प्रसन्न मन रहे, सुगन्ध धारण करे ॥ १६ ॥
साधुवेशः प्रसाधितकेशो मूर्ध-श्रोत्र घ्राण-पाद-तैल-नित्यो धूमपः,
पूर्वाभिभाषी, सुमुखः, दुर्गेष्वभ्युपपत्ता, हंता, यष्टा, दाता, चतुष्प-
थानां नमस्कर्त्ता, बलीनामुपहर्त्ता, अतिथीनां पूजकः, पितृभ्यः पिण्डदः, काले
हित-मित-मधुरार्थवादी, वश्यात्मा, धर्मात्मा, हेतावीर्षुः, फले नेर्षुः, नि-
श्चिन्त:,निर्भीकः, धीमान्, ह्रीमान्, महात्साही, दक्षः, क्षमावान्, धार्मिकः
आस्तिको, विनय-बुद्धि-विद्याऽभिजन-वयोवृद्ध-सिद्धाचार्याणामुपासिता,
छत्री, दण्डी, मौली, सोपानत्कः, युगमात्रदृग्गवचरेत्, मङ्गलाचारशी...
कुचेलास्थि-कण्टकामेध्य-केश-तुषोत्कर-भस्म-कपाल-स्नान-बलि... और
परिहर्त्ता. प्राक श्रमाद व्यायामवर्जो च म्यात. सर्वप्राणिषु मे...
अ० ८ सूत्रस्थानम् १११
अ० ८ सूत्रस्थानम् १११
स्यात्, क्रुद्धानामनुनेता, भीतानामाश्वासयिता, दीनानामभ्युपपत्ता,
सत्यसन्धः, सामप्रधानः, पर-पुरुष-वचन-सहिष्णुः, अमर्षघ्नः, प्रशम-
गुणदर्शी, राग-द्वेष-हेतूनां हन्ता च ॥ २० ॥
उत्तमवेश धारण करे, शिर के बाल संवार कर कंघी कर रक्खे, शिर,
कान त्वचा पर तैल का मर्दन करे, नित्य प्रति प्रायोगिक धूमपान करे, घर
आये हुए का या मिलने पर पहिले कुशल क्षेम पूछे, सुमुख, सुन्दर, प्रसन्न चेहरे
वाला कठिन अवसरों पर भी सोचकर काम करने वाला, होम करने वाला,
यज्ञ—देवयज्ञ, पितृयज्ञ, ब्रह्मयज्ञ, वैश्वदेव यज्ञ और नृयज्ञ करने वाला, दान
देनेवाला, चौराहों को नमस्कार करने वाला, देवता के लिये उपहार भेंट देने
वाला, अभ्यागतों को पूजा करने वाला, पिता पितामह आदि को श्रद्धापूर्वक
अन्न वस्त्र देने वाला हो, समय पर हित परिमित और मधुर अर्थ से युक्त वाणी
बोले । जितेन्द्रिय संयमी, धर्मात्मा हो, दूसरे की उन्नति को देखकर उन्नति
करने में ईर्ष्या भाव रखे कि मैं भी ऐसा करूँ जिस से मेरी भी उन्नति हो,
परन्तु फल में ईर्ष्या न करे । चिन्ता रहित न डरने वाला, साहसी आहार और
व्यवहार को छोड़कर अन्यत्र लज्जाशील, महत्त्वाकांक्षी, उत्साही, कामों में निपुण,
प्राणियों पर क्षमा करनेवाला, अपकारी को भी क्षमा देने वाला धर्म में चित्त
रखने वाला, आस्तिक (वेदादि सत् शास्त्रों को मानने वाला), विनय बुद्धि,
विद्या, अभिजन (पवित्र कुलोत्पत्ति से), और आयु में जो बड़े हों, सिद्ध, तप से
जो बड़े हों ऐसे तपस्वी, और आचार्य्य (सावित्री का उपदेश देने वाले गुरु)
इनकी सेवा करे । छत्र और दण्ड धारण करे, व्यर्थ या अकाल में न बोले,
जूता पहिने, अपने चारों ओर कुछ दूर (चार हाथ) तक देखता हुआ चले ।
मंगलजनक क्रियाशील रहे, कुचैले (मैले वस्त्र), हाड़-मांस, कांटे युक्त, अमेध्य
अपवित्र (श्मशान आदि, ) बाल, धान्यों के तुष, रोड़े-कंकड़ आदि, राख,
घड़े आदि के ठीकरे, नहाने के स्थान, पूजा स्थान, इन स्थानों को छोड़ने
वाला हो । श्रम से पूर्व ही आधी (शक्ति से) व्यायाम को छोड़ दे, सब
प्राणियों में बन्धुभाव भ्रातृ भाव रखने वाला, क्रोधी पुरुषों को मनालेने वाला,
डरे हुए पुरुषों के लिये आश्वासन (सांत्वना), देने वाला, दीनों गरीबों
के लिये उपकार करने वाला, सत्य प्रतिज्ञा वाला, शान्ति को मुख्य गिनने वाला,
... कठोर बचनों को सहन करने वाला, अक्रोधी, क्रोधियों को शान्त
... शान्तिमान्, लड़ाईझगड़े के कारणों को नष्ट करने वाला हो ॥२०॥
... स्यात्, नान्यस्वमादद्यात्, नान्यस्त्रियमभिलषेन्नान्यश्रियम्,
न वैरं रोचयेत् , न कुर्यात्पापम् , न पापेऽपि पापी स्यात्, नान्यदोषान्
ब्रूयात् , नान्यरहस्यमागमयेत् , नाधार्मिकैर्न नरेन्द्रद्विष्टैः सहाऽऽसीत,
नोन्मत्तैर्न पतितैर्न भ्रूणहन्तृभिर्न क्षुद्रैर्न दुष्टैः, न दुष्टयानान्यारोहेत् , न
जानुसमं कठिनमासनमध्यासीत, नानास्तीर्णमनुपहितमविशालमसमं
वा शयनं प्रपद्येत, न गिरि-विषम-मस्तकेष्वनुचरेत् , न द्रुममारो-
हेत् , न जलोप्रवेगमवगाहेत, कूलच्छायां नोपासीत, नाम्बुत्यानमभि-
तश्चरेत् , नार्धंहसेत, न शब्दवन्तं मारुतं मुञ्चेत्, नासंवृतमुखो
जृम्भां क्षवथुं हास्यं वा प्रवर्तयेत्, न नासिकां कुष्णीयात्, न
दन्तान् विघट्टयेत्, न नखान् वादयेत्, नास्थीन्यभिहन्यात्, ने भूमिं
विलिखेत्, न छिन्द्यात्तृणम्, न लोष्टं मृद्गीयात्, न विगुणमङ्गैश्चेष्टेत,
ज्योतींष्यग्निममेध्यमशस्तञ्च नाभिर्वीक्षेत, न हुङ्कुर्याच्छवम्, न चैत्य-
ध्वज-गुरु-पूज्याशस्त-च्छायामाक्रामेत्, न क्षपास्वनर-सदन-चैत्य-चत्वर-
चतुष्पथो पवन-श्मशानाघातनान्यासेवेत, नैकः शून्यगृहं न चाटवीमनु-
प्रविशेत्, न पापवृत्तान् स्त्री-मित्र-भृत्यान् भजेत, नोत्तमैर्विरुध्येत, नाव-
रानुपासीत, न जिह्मं रोचयेत्, नानार्यमाश्रयेत्, न भयमुत्पादयेत् ,
न साहसातिस्वप्न-प्रजागर-स्नान-पानाशानान्यभ्यसेत्, नोर्ध्वजानुश्चिरं
तिष्ठेत्, न व्यालानुपसर्पेत्र दंष्ट्रिणो न विषाणिनः पुरोवात-तपावश्या-
यातिप्रवातान् जह्यात्, कलिं नाऽऽरभेत, नाग्नुपहतोऽग्निमुपासीत,
नोच्छिष्टो नाधःकृत्वा प्रतापयेत् , नाविगतक्लमो नाप्लुत्वेया न नग्न
उपस्पृशेद्, न स्नानशाट्या स्पृष्टमुत्तमाङ्गम्, न केशाग्राण्यभिहन्यात्,
नोपस्पृश्य त एव वाससी विधूयात्, नास्पृष्ट्वा रत्नाश्व-पूज्य-मङ्गल-सुम-
सोऽभिनिष्क्रामेत्, न पूज्य-मङ्गलान्यपसव्यं गच्छेत्, नेतरान्यनुदक्षिणम्॥
झूठ न बोले, दूसरे के धन को न लेवे, दूसरे की स्त्री को न चाहे, दूसरे
की सम्पत्ति की चाहना न करे, वैर न करे, पाप न करे, पाप में मन न लगाये
अथवा पापी पुरुष पर भी पाप न करे, दूसरों के दोषों को न कहे, दूसरों की
गुप्त बातों को न जाने अधार्मिक, एवं राजा से द्वेष करने वाले (राजशत्रुओं)
के साथ न बैठे, पागल, पतित, नीच कर्म करने वाले, चाण्डाल आदि, भ्रूण-
घाती (गर्भपात करने वाले ) क्षुद्र, (छोटे पुरुष ) दुष्ट (चोर डाकू आदि)
के साथ न बैठे । दुष्टयान ( अनभ्यस्त घोड़े आदि ) पर न बैठे, घुटने ऊंचे
कर ( उत्कट आसन से ) भी देर तक न बैठे, बिना नीचे बिछाये, तकिया और
इाने रखे बिना, संकुचित स्थान पर, ऊंची नीची जगह पर न सोवे, मौन
अ० ८ ] = सूत्रस्थानम् ११३
अ० ८ ] = सूत्रस्थानम् ११३
ऊंचे नीचे प्रदेशों में या चोटियों पर न घूमे फिरे, वृक्ष पर न चढ़े, पानी के
तेज प्रवाह में स्नान न करे। नदी के किनारे खड़े वृक्ष की छाया में नहीं बैठे,
अग्नि की लपट के चारों ओर न फिरे। ऊंचे से (जोर से) न हंसे। शब्द के
साथ अधोवायु, (अपान वायु) न छोड़े, मुख को बिना ढांपे जम्भाई, छींक
अथवा हास्य-हंसी न करे, नाक को न कुरेदे, दांतों को न किटकिटाये। नखों
को न रगड़े, अस्थियों को न बजाये, भूमि को न कुरेदे, भूमि पर न लिखे,
तिनके न तोड़े, मिट्टी के ढेले को न फोड़े, अंगों को व्यर्थ में टेढ़ा मेढ़ा न करे,
न हिलाये। ज्योति (तैजस पदार्थ) सूर्य, अग्नि, तीव्राग्नि, अपवित्र चिता
आदि निन्दित वस्तुओं को न देखे। शव को देखकर हुंकार न छोड़े, चैत्य
(गांव के देवता) ध्वजा, पताका, गुरु माता पिता, आचार्य, पूज्य आदरणीय,
प्रशस्त कल्याणकारी वस्तुओं की छाया को न लांघे, रात्रि में देवालय, मन्दिर,
चैत्य (ग्राम्य देवता) गृह, आगन, चौराहा, बाग, श्मशान, (वध स्थान) में
न रहे। अकेला एकान्त गृह में, शून्य घर में या जंगल में प्रवेश न करे। पाप-
वृत्ति वाले स्त्री, मित्र अथवा नौकर का साथ न दे, अपने से श्रेष्ठों के साथ
विरोध न करे, अपने से नीच हीन की सेवा न करे। कुटिल की चाहना न करे,
अनार्य दुष्ट का आश्रय न ले, किसी के लिये भय उत्पन्न न करे, अतिसाहस
अति सोना, बहुत जागना, बहुत स्नान, बहुत पीना, बहुत खाना नहीं करे।
घुटने उठा कर देर तक न बैठे। सांप, दाढ़ वाले सिंह आदि, सींग वाले भैंस
बैल आदि जन्तुओं के पास न जाये। सामने की वायु, धूप, ओस, तेज वायु
को छोड़ दे। झगड़ा आरम्भ न करे। बिना सावधानी के अग्नि की उपासना
पूजा न करे, जूठे भांजन को पुनः आग पर गरम न करे (जूठा भोजन आग
में नहीं डालना चाहिये)। थकान मिटे बिना, मुख और सिर को जल से गीला
किये बिना, वा नंगा होकर स्नान न करे। नहाने की धोती (कटि वस्त्र से)
से शिर का स्पर्श न करे, बालों के अग्रभागों को ताड़न न करे; स्नान करके
जिन कपड़ों से स्नान किया है, उन्हीं को निचोड़कर फिर धारण नहीं करे। रत्न,
मणि आदि, पूज्य भगवान् आदि का नाम, मंगल कल्याणकारी वस्तुएं फूल
आदि को बिना स्पर्श किये घर से बाहर न निकले। पूज्य एवं मंगलकारी वस्तुओं
के वाम पार्श्व से न जाये, अपूज्य, अमंगल वस्तुओं के दक्षिण पार्श्व से
न जाये॥ २१ ॥
रत्नपाणिर्नास्नातो नोपहृतवासा नाजपित्वा नाहुत्वा देवताभ्यो
पितृभ्यो नादत्त्वा गुरुभ्यो नातिथिभ्यो नोपाश्रितेभ्यो नापुण्य-
१५४ चरकसंहिता [अ० ८
गन्धो नामाली नाप्रक्षालितपाणिपादवदनो नाशुद्धमुखो नोदङ्मुखो न
विमना नाभक्ताशिष्टाशुचि-क्षुधित-परिचरो नापात्रीष्वमेध्यासु नादेशे
नाकाले नाकीर्णे नादत्त्वाऽग्रमग्नये नाप्रोक्षितं प्रोक्षणोदकैर्न मन्त्रैरन-
भिमन्त्रितं न कुत्सयन् न कुत्सितं न प्रतिकूलोपहितमन्नमाददीत, न
पर्युषितमन्यत्र मांस-हरित-शुष्क-शाक-फल-भक्ष्येभ्यः। नाशेषभुक्स्याद्-
न्यत्र दधि-मधु-लवण-सक्तु-सर्पिग्भ्यः। न नक्तं दधि भुञ्जीत, न सक्तूने-
कानश्रीयात्, न निशि न भुक्त्वा न बहून् न द्विनोदकान्तरितान् न
छित्त्वा द्विजैर्भक्षयेत् ॥ २२ ॥
इन अवस्थाओं में भोजन न करे—रत्न को हाथ में लिये बिना, स्नान
किये बिना, वस्त्र पहिने बिना, गायत्री जप किये बिना, हवन किये बिना, देव-
ताओं के लिये दिये बिना, पिता माता को खिलाये बिना, आचार्य एवं बड़े
पुरुषों को, अतिथियों को, आश्रितों को खिलाये बिना, अशुभ गन्धवाला,
पुष्पमाला धारण किये बिना, हाथ पांव मुख धोये बिना, मलिन मुख से, उत्तर
दिशा की ओर मुख करके, अन्य मन से, बिना भक्ति के दिया, ठीक प्रकार से
या पवित्रता से न दिया, भूखे के हाथ से परसा, बिना पात्रों के मैले पात्रों में,
अदेश में, (मैले या अनुचित स्थान पर) कुसमय में, संकुचित स्थान में,
अग्नि को दिये बिना (वैश्वदेव यज्ञ किये बिना), प्रोक्षणोदक से विधिपूर्वक
प्रोक्षित किये बिना, (वेदमन्त्रों से अभिमन्त्रित किये बिना) निन्दा करते हुए,
निन्दित और प्रतिकूल अन्न को अपने मन के विरुद्ध मनुष्यों के पास में भोजन
नहीं करना चाहिये। पर्युषित जिसे एक रात बीत गई है ऐसे बासी भोजन को
नहीं खाना चाहिये। मांस, हरड़, सूखे हुए शाक, फल इनको बासी अर्थात्
एक रात बीतने पर भी खा सकते हैं। सम्पूर्ण न खावे, पात्र में थोड़ा छोड़ देना
चाहिये। परन्तु दही, शहद, लवण, सत्तू और घी इनको सम्पूर्ण खा लेना
चाहिये, पवित्र होने से इन को झूठा न छोड़े। रात में दही नहीं खाये, अकेले
सतुओं को न खाये अर्थात् केवल सत्तू न खाये। रात में सत्तू न खाये, भोजन
खाकर सत्तू न खाये, बहुत अधिक मात्रा में सत्तू न खाये, एक दिन में दो
बार सत्तू न खाये, पानी में भीगे हुए सत्तू या जौ का सत्तू बनाकर नहीं
खाना चाहिये। दाँतों से काटकर न खाये ॥ २२ ॥
नानृजुः क्षुयान्नाद्यान्न शयीत। न वेगतोऽन्यकार्यः स्यात्। न चाप्य-
ग्नि-सलिल-सोमार्क-द्विज-गुरु-प्रतिमुखं निष्ठीविका-वात-वर्चों-
ऽसृजेत्, न पन्थानमवमूत्रयेत्, न जनवति नाग्निकाले। जप-
बलि-मङ्गल-क्रियासु श्लेष्मसिङ्घाणकं मुञ्चेत् ॥ २३ ॥
अ० ८ ] सूत्रस्थानम १२५
अ० ८ ] सूत्रस्थानम १२५
बिना झुके छींक न ले, न खायें, न सोये । मल-मूत्र आदि के वेग उपस्थित
होने पर दूसरा काम न करे, पहला वेग का निराकरण करे। वायु, अग्नि,
जल, चन्द्रमा, सूर्य, ब्राह्मण, गुरु, पिता, माता, इनकी ओर मुख करके न थूके,
न अपान वायु और मल, मूत्र का त्याग करे । रास्ते में, मनुष्यों के बैठने के
स्थान में, भोजन के समय मूत्र त्याग न करे । जप, हवन, पठन, बलि, पवित्र
क्रियाओं के स्थान पर नाक का मल (सिंघाणक) नहीं फेंके ॥ २३ ॥
न स्त्रियमवजानीत, नातिविश्रम्भयेन्न गुह्यमनुश्रावयेन्नाधिकुर्यात् ।
न रजस्वलां नाऽऽतुरां नामेध्यां नाशस्तां नानिष्टरूपाचारोपचारां नादक्षां
नादक्षिणां नाकामां नान्यकामां नान्यस्त्रियं नान्ययोनिं नायोनौ न चैत्य-
चत्वर-चतुष्पथो पवन-श्मशान-घातन-सलिलौषधि-द्विज-गुरु-सुरालयेषु न
सन्ध्ययोर्नातिथिषु नाशुचिर्नाऽजग्धभेषजो नाप्रणीतसंकल्पो नानुपस्थित-
प्रहर्षो नामुक्तवान् नात्यशितो न विषमस्थो न मूत्रोच्चारपीडितो न
श्रम-व्यायामोपवास-क्लमाभिहतो नारहसि व्यवायं गच्छेत् ॥ २४ ॥
स्त्री का तिरस्कार न करे । स्त्री का अधिक विश्वास न करे । स्त्री को गुप्त
बात न कहे । स्त्री को अधिकारी न करे, अधिकार न देवे । रजस्वला, रोगिणी,
अपवित्र, चण्डाल आदि, कुष्ठ आदि निन्दित रोग से पीड़ित, इच्छित रूप
आचार-उपचार से रहित, अचतुर, जो स्वयं नहीं चाहती हो, दूसरे पुरुष को
चाहने वाली, परस्त्री, असमानजातीय, कामनारहित इन स्त्रियों के साथ, वा
योनि को छोड़कर अन्यत्र गुदा या मुख में, मैथुन नहीं करना चाहिये । चैत्य
( देवता का मन्दिर ), चौराहा, आंगन, उपवन, बाग, श्मशान, वध्य-भूमि में,
पानी, ओषधि, ब्राह्मण, गुरु, माता-पिता और मन्दिर के पास, प्रातः सायं दोनों
सन्ध्याकालों में, अति अधिक मात्रा में, निषिद्ध तिथियों में ( पूर्णिमा, अष्टमी,
चतुर्दशी, संक्रान्ति, श्राद्ध दिनों में, अमावस्या में, प्रतिपदा में), अपवित्रित
अवस्था में, वाजीकरण औषध खाये बिना, मन में मैथुनेच्छा किये बिना,
शिश्न में उत्तेजना हुए बिना, खाये बिना, खाली पेट, अधिक खाये, पेट भर
के और विषम स्थान पर स्थित होकर, मूत्र वेग से पीड़ित, खुले अनावृत स्थान
में स्त्री के साथ मैथुन न करे ॥ २४ ॥
न सतो न गुरून् परिवदेत्, नाशुचिरभिचार-कर्म-चैत्य-पूज्य-पूजा-
ध्ययनमभिनिर्वर्त्तयेत् ॥ २५ ॥
---------------- सज्जन या गुरुजनों की निन्दा न करे । अपवित्र अवस्था में अभिचार
(हिंसा का प्रयोग, श्येनादि उपचार) कर्म, चैत्य पूजा, एवं देवता,
पूजा, अध्ययन, पठन आदि नहीं करे ॥ २५ ॥
११६ चरकसंहिता [ अ० ८
न विद्युतस्वनार्तवीषु नाभ्युदितासु दिक्षु नाग्निसंप्लवे न भूमिकम्पे
न महोत्सवे नोल्कापाते न महाग्रहोपगमने न नष्टचन्द्रायां तिथौ न
सन्ध्ययोर्नामुखाद् गुरोर्नावपतितं नातिमात्रं तान्तं न विस्वरं नानवस्थि-
तपंदं नातिद्रुतं न विलम्बितं नातिकलीवं नात्युच्चैर्नातिनीचैः स्वरै-
रध्ययनमभ्यसेत् ॥ २६ ॥
निम्न अवस्थाओं में अध्ययन-पठन नहीं करना चाहिये—ऋतु के बिना
बिजली चमकने पर, दिशाओं के जलने पर, ग्राम नगर आदि में आग लगने
पर, भूकम्प आने पर, विवाहादि बड़े उत्सवों में, विजयादशमी, दीपमालिका
होली आदि में, उल्कापात होने पर, चन्द्रग्रहण, या सूर्यग्रहण होने पर, कृष्णपक्ष
की चतुर्दशी, अमावस्या और प्रतिपदा को जिन तिथियों में चन्द्रमा नहीं
दीखता, सन्ध्या कालों में, गुरुके मुख से बिना पढ़े, अक्षर को छोड़ते हुए,
खाते हुए, अधिक मात्रा में, रूक्ष स्वर से, स्वर के बिना, पदों की व्यवस्था के
बिना, विराम आदि चिह्नों का ध्यान न रखकर, रुक रुक कर, अति निर्बल
(बलहीन), बहुत ऊँची आवाज से बहुत जोर से, बहुत धीमी आवाज से भी
नहीं पढ़ना चाहिये ॥ २६ ॥
नातिसमयं जह्यात् । न नियमं भिन्द्यात् । न नक्तं नादेशे चरेत् ।
न सन्ध्यास्वभ्यवहाराध्ययन-स्त्री-स्वप्न-सेवी स्यात् । न बाल-वृद्ध-लुब्ध-
मूर्ख-क्लिष्ट-क्लीबैः सह सख्यं कुर्यात् । न मद्य-द्यूत-वेश्या-प्रसङ्ग-रुचिः
स्यात्, न गुह्यं विवृणुयात् । न कञ्चिदवजानीयात् । नाहंमानी स्यान्नादक्षो
नादक्षिणा नासूयकः । न ब्राह्मणान् परिवदेत् । न गवां दण्डमुद्यच्छेत्,
न वृद्धान् न गुरून् न गणान् न नृपान् वाऽधिक्षिपेत् । न चातिब्रूयात् ।
न बान्धवानुरक्तकृच्छ्रद्वितीयगुह्यज्ञान् बहिः कुर्यात् ॥ २७ ॥
समय को न खोये । नियम का उल्लंघन न करे । रात्रि में न घूमे । जंगल
आदि बीयाबान स्थानों में न घूमे । सन्ध्या समयों में भोजन, अध्ययन, मैथुन,
नींद नहीं करनी चाहिये । बालक, वृद्ध, लालची, मूर्ख, कुष्ठ रोगी, नपुंसक अनु-
त्साही अल्पसत्त्व के साथ मित्रता न करे । मद्य शराब, जुआ, वेश्या इनमें मन
नहीं लगाये । गुप्त रहस्य को न कहे । किसी का भी अपमान न करे ।
अहंकार या घमण्ड न करे । कार्यों में मूढ़ न रहे । गुणों में दोषों को न देखे ।
निन्दक, चुगलखोर न बने । ब्राह्मणों की निन्दा न करे । गाय के प्रति हाथ
उठाये । जो अपने अनुकूल हों उनकी निन्दा न करे । गुरु, [..] और
आचार्य, सभा, वयोवृद्ध, जनसमूह, समाज और राजा की [...]