चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 118, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ेंमान् मनुष्य को चाहिये कि छोड़ने योग्य उन दुःखदायी कर्मों से क्रमशः
हट जावे ॥ ३४-३५ ॥
हितं क्रमेण सेवेत, क्रमश्चात्रोपदिश्यते ॥ ३६ ॥
प्रक्षेपचापचये नाभ्यां क्रमः पादांशिको भवेत् ।
एकान्तरं ततश्चोर्ध्वं व्यन्तरं त्र्यन्तरं तथा ॥ ३७ ॥
क्रमेणापचिता दोषाः क्रमेणोपचिता गुणाः ।
सन्तो यान्त्यपुनर्भावमप्रकम्प्या भवन्ति च ॥ ३८ ॥
हितकारी कार्यों का (क्रमशः) सेवन करना चाहिये । यहां अब क्रम का
उपदेश करते हैं। छोड़ने लायक ( सञ्चय करन योग्य ) कार्य को चौथाई भाग
करके क्रम से सेवन करना चाहिये । फिर दो और फिर तीन भाग छोड़ कर
ग्रहण करना चाहिये । अर्थात् छोड़ने योग्य एवं ग्रहण करने योग्य कार्य
दोनों के चार चार भाग करने चाहिये । छोड़ने योग्य कर्म का एक भाग
छोड़कर ग्रहण करने योग्य कर्म का एक भाग उसके स्थान पर ग्रहण
करना चाहिये । फिर दो भाग छोड़ कर दो भाग ग्रहण करने चाहिये
और फिर तीन भाग छोड़ कर तीन भाग ग्रहण करने चाहिये और पुनः सारा
छोड़कर सारा ग्रहण कर लेना चाहिये । ग्रहण करते समय एक दो तीन
चार दिन का अन्तर क्रम से देना चाहिये । छोड़ने योग्य कर्म को चतुर्थांश
छोड़ कर ग्रहण करने योग्य कर्म का चतुर्थांश ग्रहण करे । इस विधान को एक
दिन बरते । तीसरे दिन छोड़ने योग्य कर्म के दो भाग छोड़ कर ग्रहण करने
योग्य कर्म के दो भाग ग्रहण करे-इस प्रकार दो दिन करे । फिर तीन भाग
छोड़कर ग्रहण करने योग्य कर्म के तीन भाग ग्रहण करे-इस प्रकार तीन दिन
करे और फिर सारा कर्म छोड़कर सम्पूर्ण का ग्रहण कर लेवे । ऊपर बताये हुए
क्रम पूर्वक छोड़े हुए दोष फिर पैदा नहीं होते और क्रम से ग्रहण किये हुए गुण
नष्ट नहीं होते, चिरकाल तक स्थिर रहते हैं । हितकारी पदार्थ भी सहसा उपयोग
करने से अग्निनाश, अरुचि आदि करते हैं, इसलिये इनको भी क्रम से ही
ग्रहण करना चाहिये । इन सब कार्यों में मनुष्य की प्रकृति का ज्ञान अपेक्षित
है, क्योंकि कुछ कार्य ऐसे हैं जो कि एक के लिये अहितकारी हों, परन्तु दूसरे
के लिये हितकारी ॥ ३६-३८ ॥
सम-पित्तानिल-कफाः केचिद् गर्भादि-मानवाः ।
दृश्यन्ते वातलाः केचित्पित्तलाः श्लेष्मलास्तथा ॥ ३९ ॥
तेषामनातुराः पूर्वे, वातलाद्याः सदाऽऽतुराः ।
दोषानुशयिता ह्येषां देहप्रकृतिरुच्यते ॥ ४० ॥