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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

पृष्ठ 119, कुल 639 में से

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पृष्ठ 119

अ० ७ ] सूत्रस्थानम् १०१
विपरीत-गुणस्तेषां स्वस्थवृत्तेर्विधिर्हितः ।
सम-सर्व-रसं सात्म्यं समधातोः प्रशस्यते ॥ ४१ ॥
कुछ मनुष्य जन्म या गर्भकाल से ही पित्त, वायु, कफ की असमानावस्था
वाले होते हैं और कुछ मनुष्य गर्भाधान काल से ही वात प्रकृति वाले, पित्त
प्रकृति वाले और कफ प्रकृति वाले होते हैं। इन में पित्त वायु और कफ की
साम्यावस्था वाले मनुष्य प्रायः नीरोग रहते हैं, और वात प्रकृति या पित्त प्रकृति
अथवा कफ प्रकृति के मनुष्य सदा रोगी रहते हैं। इन में वातादि दोषों का
सात्म्य अर्थात् अनुकूल हो जाना ही शरीरकी 'प्रकृति' कही जाती है । अर्थात्
वात प्रकृति वाले मनुष्य में वात दोष उस के शरीर के अनुकूल हो जाता
है। इसलिये वही उसकी प्रकृति है, प्रकृति होने से वात उस में दोष नहीं,
परन्तु जब स्वास्थ्यावस्था में वात बढ़ेगा तभी दोष होगा। जिस प्रकार कि
विषकीट अपने विष से नहीं मरता, उसी प्रकार प्रकृतिस्थ वात से भी वात
प्रकृति का मनुष्य पीड़ित नहीं होता। इन वात आदि की अधिकता में वात
आदि के विपरीत विरुद्ध गुणों का इनके कारणों के विपरीत गुण भी सेवन करना
स्वास्थ्य के लिये कल्याणकारी उपाय है। और पित्त, वायु और कफ की
समानता वाली प्रकृति के मनुष्यों के लिये सब (मधुर अम्ल, लवण, तिक्त,
कटु और कषाय ) रसों का समानावस्था में अभ्यास करना उत्तम है। समान
धातुओं वाला आदमी प्रशस्त है ॥ ३६-४१ ॥
द्वे अधः सप्त शिरसि खानि स्वेद्मुखानि च ।
मलायनानि बाध्यन्ते दुष्टैर्मात्राधिकैर्मलैः ॥ ४२ ॥
मलवृद्धिं गुरुत्वेन लाघवान्मलसंक्षयम् ।
मलायनानां बुद्ध्येत सङ्गोत्सर्गादतीव च ॥ ४३ ॥
तान्दोषलिङ्गैरादिश्य व्याधीन् साध्यानुपाचरेत् ।
व्याधि-हेतु-प्रतिद्वन्द्वैर्मात्रा-कालो विचारयन् ॥ ४४ ॥
विषम-स्वस्थ-वृत्तानामेते रोगास्तथाऽपरे ।
जायन्तेऽनातुरस्तस्मात्स्वस्थ-वृत्त-परो भवेत् ॥ ४५ ॥
जब मल परिमाण से अधिक हो जाते हैं, तब वे विकृत होकर मल के
स्थानों को पीड़ित करते हैं, मल के स्थान नीचे के दो-गुदा और उपस्थ (स्त्रियों
में योनि भी); शिर में सात-दो नाक, दो कान, दो आंखें और एक मुख,
पसीना निकलने के सब छिद्र ये मल के स्थान हैं, मल इनको पीड़ित करते हैं।
भारीपन होने से मल की वृद्धि समझनी चाहिये और शरीर में हलकापन