चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
१८२ चरकसंहिता [अ० १४
व्यपोज्झ्य सर्वानङ्गारान् प्रोक्ष्य चोष्णवारिणा ।
तां शिलामथ कुर्वीत कौषेयाविक-संस्तराम् ॥ ४८ ॥
तस्यां स्वभ्यक्तसर्वाङ्गः स्वपन् स्विद्यति ना सुखम् ।
कौरवाजिन-कौषेय-प्रावाराद्यैः सुसंवृतः ॥ ४९ ॥
इत्युक्तोऽश्मघनस्वेदः, कर्पूस्वेदः प्रवक्ष्यते ।
( ७ ) अश्मघन स्वेद विधि—पुरुष लेट सके, इतनी बड़ी लम्बो, चौड़ी,
मजबूत पत्थर की बनी शिला को; वातनाशक ( देवदारु या अगर आदि )
लकड़ियां जलाकर गरम करे । गरम होने पर सब अंगारों को दूर हटा दे,
शिला पर गरम पानी छिड़क देवे ( जिससे कि ऊपर की गरमी बाहर हो जाये )
सब अंगों पर तैल का अभ्यङ्ग करके मनुष्य सोता हुआ सूत का चादर, मृग
चर्म, रेशमी चादर कम्बल आदि भली प्रकार ओढ़कर सुख पूर्वक स्विन्न
होता है । इस प्रकार अश्मघन स्वेद बता दिया गया. अब कर्पू-स्वेद बताया
जाता है ॥४७-४९॥
खानयेच्छयनास्याधः कर्पू, स्थानविभागवित् ॥ ५० ॥
दीप्तैरधूमैरङ्गारैस्तां कर्पू पूरयेत्ततः ।
तस्यामुपरि शय्यायां स्वपन् स्विद्यति ना सुखम् ॥ ५१ ॥
( ८ ) कर्पू-स्वेद विधि—स्थान के विभाग को जानने वाला वैद्य शय्या
के नीचे हाण्डा के आकार का एक गोल गड्ढा बनावे। इस गड्ढे को जलते हुए
परन्तु धूमरहित अंगारों से भर दे । इस गड्ढे के ऊपर खाट बिछाकर लेटने से
सुख पूर्वक पसीना आता है ॥ ५०-५१ ॥
अनत्युत्सेधविस्तारां वृत्ताकारामलोचनाम् ।
घनभित्तिं कुटीं कृत्वा कुष्ठाद्यैः संप्रलेपयेत् ॥ ५२ ॥
कुटीमध्ये भिषक्शय्यां स्वास्तीर्णां चोपकल्पयेत् ।
प्रावाराजिन-कौषेय-कुथ-कम्बल-गोलकैः ॥ ५३ ॥
हसन्तिकाभिरङ्गार-पूर्णाभिस्तां च सर्वशः ।
परिवार्यान्तरास्तेह्यभ्यक्तः स्विद्यते सुखम् ॥ ५४ ॥
( ६ ) कुटीस्वेद विधि-न बहुत ऊंची और न बहुत चौड़ी गोलाकार,
रोशनदान रहित (जिसमें वायु के लिये छेद न हों) तथा मोटी दीवारों वाली कुटी
बनाये । इस घर को अन्दर से कुष्ठ आदि उष्णवोर्य द्रव्यों से लेप देना चाहिये ।
इस लिपी कुटी के बीच में वैद्य लम्बी, चौड़ी शय्या बनाये । इस शय्या के चारों
ओर अंगारों से भरी अंगीठियां रख देवे । फिर व्याघ्रचर्म, मृगचर्म, रेशम,
कम्बल, चित्र विचित्र गरम वस्त्र शय्या पर बिछाकर, लपेट लेने चाहिये । शरीर
पर स्नेह लगाकर स्वेद लेना चाहिये। इस प्रकार सुखपूर्वक स्वेदन हो
जाता है ॥ ५२-५४ ॥
य एवाश्मघनस्वेद-विधिर्भूभौ स एव तु ।
प्रशस्तायां निवातायां समायामुपदिश्यते ॥ ५५ ॥
(१०) भू-स्वेद विधि—जो विधि अश्मघन स्वेद की है, वही भूस्वेद
की है। इस स्वेद के लिये भूमि उत्तम, वायु रहित तथा समान हो ऊंची-नीची
नहीं होनी चाहिये ॥५५॥
कुम्भीं वातहर-क्वाथ-पूर्णां भूमौ निखानयेत् ।
अर्धभागं त्रिभागं वा शयनं तत्र चोपरि ॥ ५६ ॥
ध्यारयेदासनं वाऽपि नातिसान्द्रपरिच्छदम् ।
अथ कुम्भ्यां सुसन्तप्तान् प्रक्षिपेदयसो गुडान् ॥ ५७ ॥
पाषाणांश्चोष्मणा तेन ततःस्थः स्विद्यति ना सुखम् ।
सुसंवृताङ्गः स्वभ्यक्तः स्नेहैरनिलनाशनैः ॥ ५८ ॥
(११) कुम्भी-स्वेद विधि—घड़े को वातहर देवदारु आदि के क्वाथ से
भरकर भूमि में आधा या तिहाई भाग गाड़ देना चाहिये । इसके ऊपर एक
खाट बिछा दे । खाट के ऊपर बहुत गहरा मोटा कपड़ा न बिछाना चाहिये ।
फिर लोहे के गोले, या पत्थरों को खूब गरम करके भूमि में या गड़ी और
वात हर क्वाथ से भरी कुम्भी (घड़े) में गिरा दे । इनकी गरमी से, शय्या के
ऊपर अंगों को लपेट कर लेटे हुए, शरीर पर वातनाशक स्नेह का मर्दन किये
हुए पुरुष को सुखपूर्वक स्वेदन होता है ॥ ५६-५८ ॥
कूपं शयनविस्तारं द्विगुणं चापि वेधतः ।
देशे निवाते शस्ते च कुर्यादन्तः सुमार्जितम् ॥ ५६ ॥
हस्त्यश्व-गो-खरोष्ट्राणां करीषैर्दग्धपूरिते ।
स्ववच्छन्नः सुसंस्तीर्णेऽभ्यक्तः स्विद्यति ना सुखम् ॥ ६० ॥
(१२) कूप-स्वेद—जितनी जगह पर खाट बिछती हो, उतने स्थान पर
शय्या के बराबर लम्बा, चौड़ा एक गड्डा खोदे । इस गड्ढे की गहराई दुगनी
हो। इस कुप को वायु रहित स्थान पर बनावे इस कुप को अन्दर भली
प्रकार लेप कर साफ स्वच्छ कर लेना चाहिये । इस गत्त में हाथी, घोड़े आदि
के शुष्क मल (गोटों को) को डाल कर जला देना चाहिये । जब धुंआ
निकलना बन्द हो जाय तब इस कूप के ऊपर चारपाई बिछा कर कोई वस्त्र
इस पर बिछाकर, शरीर पर वातहर तैल मर्दन करके, व्याघ्रचर्म, मृगछाला,
कम्बल आदि ओढ़कर लेटने से सुख पूर्वक स्वेद हो जाता है ॥५९-६०॥
सुदग्धायां विधूमायां यथोक्तामुपकल्पयेत् ।
१८४ चरकसंहिता [ अ० १४
धीसिकां तु करीषाणां यथोक्तानां प्रदीपयेत् ।
शयनान्तःप्रमाणेन शय्यामुपरि तत्र च ॥ ६१ ॥
सुदग्धायां विधूमायां यथोक्तामुपकल्पयेत् ।
स्ववच्छन्नः स्वपँस्तत्राभ्यक्तः स्विद्यति ना सुखम् ॥ ६२ ॥
होलाकस्वेद इत्येष सुखः प्रोक्तो महर्षिणा ।
इति त्रयोदशविधः स्वेदोऽग्निगुणसंश्रयः ॥ ६३ ॥
( १३ ) होलाक स्वेद—हाथी, घोड़ा, गाय, गधा, ऊंट इनके छानों
( मल ) को लम्बी परन्तु गोलाकार ( धीतिका अर्थात् चिता के रूप में ) बना
कर जला देना चाहिये और जब यह चिता धूम रहित हो जाय, तब इस पर
यथोक्त शय्या आदि बिछाकर, वातहर तैल का मर्दन करके, उष्ण वस्त्र ओढ़कर
सोने से सुखपूर्वक पसीना आता है । यह सुखकारक होलाकस्वेद है । ये तेरह
प्रकार के स्वेद अग्नि के अधीन हैं, इनका महर्षि ने उपदेश किया है ॥६१-६३॥
व्यायाम उष्णसदनं गुरुप्रावरणं क्षुधा ।
बहुपानं भयक्रोधावुपनाहाहवातपाः ॥ ६४ ॥
स्वेदयन्ति दशैतानि नरमग्निगुणादृते ।
अग्निरहित स्वेद—व्यायाम ( शारीरिक श्रम ), उष्ण सदन ( वायु और
शीत स्पर्श रहित तहखाना भूमि के नीचे के गरम घर ), कम्बल आदि भारी
वस्त्र, क्षुधा ( भूख ), बहुपान ( गरम पानी या मद्य आदि का बहुत पीना ),
भय, क्रोध, उपनाह ( पुलटिस ) आहव ( युद्ध ), आतप ( धूप ), ये दस
अग्नि के बिना भी शरीर में स्वेदन करते हैं ॥ ६४ ॥
इत्युक्तो द्विविधः स्वेदः संयुक्तोऽग्निगुणैर्न च ॥ ६५ ॥
एकाङ्ग-सर्वाङ्ग-गतः स्निग्धो रूक्षस्तथैव च ।
इत्येतद् द्विविधं द्वन्द्वं स्वेदमुद्दिश्य कीर्तितम् ॥ ६६ ॥
स्निग्धः स्वेदैरुपक्रम्य स्विन्नः पथ्याशनो भवेत् ।
तदहः स्विन्नगात्रस्तु व्यायामं वर्जयेन्नरः ॥ ६७ ॥
इस प्रकार से दो प्रकार की स्वेद कह दिया; अग्नि गुण वाला और अग्नि-
गुण रहित, एकांग और सर्वांग स्वेद, स्निग्ध एवं रूक्ष स्वेद, इस प्रकार तीन
प्रकार के दो-दो स्वेदों को कह दिया, स्निग्ध मनुष्य की स्वेद द्वारा चिकित्सा
करनी चाहिये । स्वेदन हो जाने पर पथ्य भोजन करना चाहिये । स्वेद दिया
मनुष्य उस दिन व्यायाम को न करे ॥६५-६७॥
तत्र श्लोकाः । स्वेदो यथा कार्यकरो हितो येभ्यश्च यद्विधः ।
यत्र देशे यथा योग्यो देशो रक्ष्यश्च यो यथा ॥ ६८ ॥
अ० १५] सूत्रस्थानम् १०५
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अ० १५] सूत्रस्थानम् १०५
स्विन्नातिस्विन्नरूपाणि तथाऽतिस्विन्नभेषजम् ।
अस्वेद्याः स्वेदयोग्याश्च स्वेदद्रव्याणि कल्पना ॥ ६९ ॥
त्रयोदशविधः स्वेदो विना दशविधोऽग्निना ।
संग्रहेण च षट् स्वेदाः स्वेदाध्याये निदर्शिताः ॥ ७० ॥
स्वेदाधिकारे यद्वाच्यमुक्तमेतन्महर्षिणा ।
शिष्यैस्तु प्रतिपत्तव्यमुपदेष्टा पुनर्वसुः ॥ ७१ ॥ इति ।
किस प्रकार से स्वेद कार्य कर सकता है, किनके लिये उपकारी है, किस
प्रकार, किस स्थान पर, कैसा स्थान, किस प्रकार रक्षा करनी, सम्यक् स्विन्न,
अतिस्वेद के लक्षण, अतिस्वेद की चिकित्सा, स्वेद के अयोग्य और स्वेद के
योग्य, स्वेदन द्रव्य, तेरह प्रकार का स्वेद और बिना अग्नि के दस प्रकार का
स्वेद, संक्षेप रूप में छः स्वेद—ये सब स्वेदाध्याय में कह दिया । स्वेद अधि-
कार में जो कुछ कहना चाहिये था वह सब महर्षि ने कह दिया है । शिष्यों
को ठीक २ प्रकार समझना चाहिये, इसके उपदेश करने वाले पुनर्वसु आत्रेय हैं॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने कल्पनाचतुष्के
स्वेदाध्यायो नाम चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥
पञ्चदशोऽध्यायः ।
अथात उपकल्पनीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
अब उपकल्पनीय अध्याय का व्याख्यान करेंगे । ऐसा भगवान् आत्रेय
ने कहा था ॥२॥
इह खलु राजानं राजमात्रं वाऽन्यं विपुलद्रव्यं संभृतसंभारं वमनं
विरेचनं वा पाययितुकामेन भिषजा प्रागेवौषधपानात्संभारा उपकल्प-
नीया भवन्ति, सम्यक्चैव हि गच्छत्यौषधे प्रतिभोगार्थाः, व्यापन्ने
चौषधे व्यापदः परिसंख्याय प्रतीकारार्थाः । न हि संनिकृष्टे काले प्रादुर्भू-
तायामापदि सत्यपि क्रयाक्रये सुकरमाशु संभरणमौषधानां यथा-
वदिति ॥ ३ ॥
इस लोक में राजा अथवा राजा के समान ठाठ वाले पुरुष को या बहुत
धन और नौकर चाकरों वाले किसी रईस को वमन, विरेचन देने की इच्छा करने
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वाले वैद्य को चाहिये, कि, औषध पिलाने से पूर्व ही सब आवश्यक वस्तुएं
अपने पास एकत्र कर ले । क्योंकि यदि औषध ठीक प्रकार से काम कर गई
तो ये वस्तुवें फिर काम में आ जायेंगी और यदि प्रयोग से कुछ तकलीफ़ हो गई
तो इनकी सहायता से प्रतिकार किया जा सकेगा । और यदि सब आवश्यक
उपकरणों को समीप में न रक्खा जाय तो उपद्रव हो जाने पर, तुरन्त बाज़ार
से खरीद कर सब वस्तुओं का लाना भी उतना सरल नहीं होता जितना कि
प्रथम से ही सब वस्तुओं का संग्रह करना सरल है ॥ ३ ॥
एवं वादिनं भगवन्तमात्रेयमग्निवेश उवाच-ननु, भगवन् ! आदावेव
ज्ञानवता तथा प्रतिविधातव्यं यथा प्रतिविहिते सिध्येदौषधमेकान्तेन,
सम्यक्प्रयोगनिमित्ता हि सर्वकर्मणां सिद्धिरिष्टा, व्यापच्चासम्यक्प्र-
योगनिमित्ता । अथ सम्यगसम्यक् च समारब्धं कर्म सिध्यति व्यापद्यते
वाऽनियमेन, तुल्यं भवति ज्ञानमज्ञानेनेति ॥ ४ ॥
ऐसा कहते हुए भगवान् आत्रेय को अग्निवेश बोले—भगवन् ! ज्ञानवान्
वैद्य को पहिले से ही चाहिये कि वह संशोधन देने से पूर्व रोगी के बल, आयु,
क्रिया, सहनशक्ति, सत्त्व, देश, काल, दोष का बलाबल, प्रकृति आदि बातों
का विचार करके योग्य मात्रा में औषध पिलावे । जिससे कि औषध देने पर
वह औषध निश्चय से ही गुणकारी सफल हो । क्योंकि सब कार्यों को भली प्रकार
उचित रीति से करने पर सफलता अवश्य होती है । अनुचित रीति से करने पर
आपत्तियों का होना भी निश्चित है। और यदि ज्ञानपूर्वक किया हुआ कर्म
उचित या अनुचित रूप से करने पर कभी सिद्ध हो जाता है, और कभी सिद्ध
नहीं होता, तो ज्ञान अज्ञान के समान ही है, पढ़ना न पढ़ना बराबर हो जाता है ।४।
तमुवाच भगवानात्रेयः—शक्यं तथा प्रतिविधातुमस्माभिरस्म-
द्विधैर्वाऽप्यग्निवेश ! यथा प्रतिविहिते सिध्येदौषधमेकान्तेन, तच्च
प्रयोगसौष्ठवमुपदेष्टुं यथावत् न हि कश्चिदस्ति य एतदेवमुपदिष्टमुपधा-
रयितुमुत्सहेत, उपधार्य वा तथा प्रतिपत्तुं प्रयोक्तुं वा, सूक्ष्माणि हि
दोष-भेषज-देश-काल-बल-शरीराहार-सात्म्य-सत्त्व-प्रकृति-वयसामव-
स्थान्तराणि यान्यनुचिन्त्यमानानि विमलविपुलबुद्धेरपि बुद्धिमाकुली-
कुर्युः किं पुनरल्पबुद्धेः ? । तस्मादुभयमेतद्यथावदुपदेक्ष्यामः सम्यक्-
प्रयोगं चौषधानां व्यापन्नानां च व्यापत्साधनानि सिद्धिरुत्तरकालम् ॥५॥
अग्निवेश को भगवान् आत्रेय ने कहा—हे अग्निवेश ! औषध देने पर निश्चय
रूप से सफल हो, ऐसा औषधोपचार करना हम वा हम जैसे तपोबल द्वारा
अ० १५ ] सूत्रस्थानम् १८७
अ० १५ ] सूत्रस्थानम् १८७
रजस्, तमस् से निर्मुक्त हुये पुरुषों से ही सम्भव है और इस प्रयोग की सफलता
को पूरे पूरे रूप से उपदेश करने के लिये कोई तैयार नहीं। इसी प्रकार ऐसा
भी कोई शिष्य नहीं है जो कि इस प्रयोग को यथावत् रूप में जान सके और
जानकर प्रयोग ठीक २ प्रकार से कर सके, ऐसा भी कोई आदमी नहीं है, क्योंकि
प्रत्येक पुरुष में दोष, औषध, देश समय, बल, शरीर, भोजन, सात्म्य, सत्त्व,
प्रकृति, और आयु इनकी स्थिति प्रतिक्षण बदलती रहती है। इन दोष आदि
की सूक्ष्म विवेचना निर्मल एवं विशाल बुद्धि वाले पुरुष की भी बुद्धि को चकरा
देते हैं, फिर अल्पबुद्धि वाले मनुष्य का तो कहना ही क्या ? इसलिये थोड़ी
बुद्धि वाले मनुष्य की बुद्धि को व्याकुल करने के कारण दोनों बाते अर्थात् औष-
धियों का उचित प्रयोग और औषध प्रयोग के मिथ्यायोग से उत्पन्न आपत्तियों
को सिद्धिस्थान में कहेंगे ॥५॥
इदानीं तावत्सम्भारान्विविधानपि समासेनोपदेक्ष्यामः, तद्यथा-
दृढं निवातं प्रवातेकदेशं सुखप्रविचारमनुपत्यकं धूमातपजलरजसामन-
भिगमनीयमनिष्टानां च शब्द-स्पर्श-रस-रूप-गन्धानां सोदपानोलूखल-
मुसल-वर्चःस्थान-स्नान-भूमि-महानसोपेतं वास्तुविद्याकुशलः प्रशस्तं
गृहमेव तावत् पूर्वमुपकल्पयेत् ॥ ६ ॥
इस अध्याय में संशोधन के उपयोगी नाना प्रकार के उपकरणों का संक्षेप
से उपदेश करेंगे। सबसे पहिले मकान बनाने की विद्या ( स्थापत्य कर्म या
वास्तुविद्या ) को जानने वाला चतुर शिल्पी ऐसा गृह बनाये जो मज़बूत हो,
जिसमें खुली वायु सामने से न आकर एक पार्श्व से पर्याप्त मात्रा में आ
सके। जिसमें रोगी आराम से घूम-फिर सके, पहाड़ की तराई या पहाड़ पर
न बना हो, धुंवा, गरमी, धूप और धूल जिसमें न आ सकें, मन को अच्छे न
लगने वाले शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध जहां पर न जा सकें, पानी का
घड़ा, ऊखल, मूसल, मलत्याग का स्थान, स्नानघर, रसोई, पाकशाला
साथ हों ॥६॥
ततः शील-शौचाचारानुराग-दाक्ष्य-प्रादक्षिण्योपपन्नानुपचार-कुश-
लान् सर्वकर्मसु पर्यवदातान् सूपौदन-पाचक-स्नापक-संवाहकोत्थापक-
संवेशकौषधपेषकांश्च परिचारकान् सर्वकर्मस्वप्रतिकूलान्, तथा गीत-
वादित्रोल्लापक-श्लोक-गाथाख्यायिकेतिहास - पुराण-कुशलानभिप्रायज्ञान-
नुमतांश्च देशकालविदः परिषद्वद्यांश्च, तथा लावक-पिञ्जल-शश-हरिणैण-
कालपुच्छक-मृग-मातृकोरभ्रान्, गां दोग्ध्रीं शीलवतीमनातुरां जीवद्वत्सां
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सुप्रतिविहित-तृण-शरण-पानीयां, जलपाड्याचमनीयोदकोष्ठमणिक-घट-
पिठर-पर्योग-कुम्भी-कुम्भ-कुण्ड-शराव-दर्वी-कटोदञ्चन-परिपचन-मन्थान-
चर्म-चेल-सूत्र-कार्पासोर्णादीनि च, शयनासनादीनि चोपन्स्त-भृङ्गार-
प्रतिग्रहाणि सुप्रयुक्तास्तरणोत्तर-प्रच्छदोपधानानि स्वापाश्रयाणि संवेश-
नोपवेशन-स्नेह-स्वेदाभ्यङ्ग-प्रदेह-परिषेकानुलेपन-वमन-विरेचना-स्थापना-
नुवासन-शिरोविरेचन-मूत्रोच्चार-कर्मणामुपचारसुखानि, सुप्रक्षालितोप-
धानांश्च सुश्लक्ष्ण-खर-मध्यमा दृषदः, शस्त्राणि चोपकरणार्थानि, धूमनेत्रं
च, बस्तिनेत्रं चोत्तरवस्तिकं च, कुशहस्तकं च, तुलां च, मानभाण्डं च,
घृत-तैल-वसा-मज्ज-क्षौद्र-फाणित-लवणेंधनोदक-मधु-सीधु-सुरा-सौवी-
रक-तुषोदक-मैरेय-मेदक-दधि-मण्डोदश्विद्धान्याम्ल-मूत्राणि च, तथा
शालि-षष्टिक-मुद्ग-माष-यव-तिल-कुलत्थ-बदर-मृद्वीका-काश्मर्य-परूषका-
भयामलक-बिभीतकानि, नानाविधानि च स्नेहस्वेदोपकरणानि द्रव्याणि,
तथैवोर्ध्वहरानुलोमिकोभय-भाञ्जि संग्रहणीय-दीपनीय-पाचनीयोपशम-
नीय-वातहराणि संख्यातानि चौषधानि, यच्चान्यदपि किंचिद् व्यापदः
परिसंख्यायोपकरणं विद्यात्, यच्च प्रतिभांगार्थं; तत्तदुपकल्पयेत् ॥ ७ ॥
इस के उपरान्त पवित्र शुद्ध स्वभाव, निर्मल आचरण के, रोगी से प्रेम
रखने वाले, कर्मकुशल, सेवाकर्म में दक्ष, अपने २ कर्म में कुशल ( शिक्षित )
रसोई बनाने में होशियार रसोइये, स्नान कराने वाले, हाथ पांव मलने वाले,
शरीर को पकड़ थाम कर खड़ा करने वाले, बिठानेवाले, औषध-दवाई पीसने-
वाले सब कार्यों में अनुकूल नौकर, गाने बजाने में चतुर, स्तुतिपाठ करने
वाले, श्लोक, गाथा, कहानी, आख्यायिका, बात-चीत, इतिहास, पुराण आदि
सुनाने वाले, अभिप्रायों, को उसके इशारों से पहिचाननेवाले, मालिक के मन के
अनुकूल, देश, काल को समझने वाले यार-दोस्त, सोसायटी के आदमी वहां
रहने चाहियें। इसी प्रकार बटेर, कपिञ्जल ( कबङ्गा ), खरगोश, हरिण; काला
हरिण, कालपुच्छ ( हरिण का भेद ), मृगमातृका ( बड़े पेटवाला हरिण,
बारहसींगा ), और मेढ़ा इन को भी एकत्र करना चाहिये। दूध देनेवाली,
अच्छे शान्त स्वभाव की, रोगरहित, जिसका बछड़ा जीता हो, ऐसी गाय रक्खे।
इस गाय के लिये रहने, घास और पानी का अच्छा बन्दोबस्त करे, छोटा पात्र,
आचमन का पात्र, पानी रखने का बड़ा पात्र, मणिक ( मटका ), घड़ा, थाली,
कड़ाही, बड़ा घड़ा, मजबूत छोटा कलसा, कूंड़ा गहरा बर्तन, तकोरा, ढकन,
कड़छी, चटाई, ढांकने का ऊपर का ढकन, तेल पकाने की कड़ाही, रई
( मथानी ), मृगछाल, पुराने ( परन्तु साफ़ धुले ) वस्त्र, सूत, कपास, रूई,
ऊन तथा लेटने या बैठने के साधनों ( खाट, तकिया, आसन ) के पास में पानी
बरतने का गंगासागर, पीकदान, और सुन्दर सफेद चांदनी की भांति श्वेत चादर
और तकिया लगा पलंग, सुखपूर्वक बैठने के लिये गद्दी, तकिया या आराम-
कुर्सी, एवं स्नेहन, स्वेदन अभ्यंग, प्रलेप, स्नान, अनुलेपन, वमन, विरेचन,
आस्थापन, अनुवासन, शिरोविरेचन, मूत्रत्याग ( पेशाब घर ) का स्थान, मल-
त्याग का स्थान ( संडास ), उत्तम एवं सुखकारक तथा साधनयुक्त बनावे ।
स्वच्छ धुली, चिकनी, खुरदरी, मध्यम रूप की पत्थर की शिला ( सिल, दवाई
आदि पीसने के लिये ) एवं कैंची, फांवड़ा गण्डासा, दरांती आदि शस्त्र ये
सब पदार्थ एकत्र करे । धूमनेत्र-धूम्रनलिका, और उत्तर बस्ति की नलिका,
बुहारनी ( झाडू ), तराजू, द्रव मापने के लिये पात्र, घी, तैल, वसा, मज्जा,
मधु, राव ( आधा पका गुड़ ), नमक, ईंधन, पानी, मधु, सीधु, सुरा, कांजी,
तुषोदक, मैरेय, मेदक, दहो, दही का पानी, छाछ, धान्य, कांजी, आठों प्रकार
के मूत्र, शालि ( हेमन्त धान्य ), साठो चावल, मूंग, उड़द, जौ, तिल, कुलत्थी,
बेर, किशमिस, फालसा, हरड़, आंवला, बहेड़ा और नाना प्रकार के स्नेह एवं
स्वेदन के साधन, वमन, विरेचन के पदार्थ, संग्रहणीय, दीपनीय, पाचनीय,
शामक, वातनाशक गण की औषधियां, तथा इनके अतिरिक्त और भी जो
साधन या द्रव्य आपत्तियों को दूर करने वाले हों, उनको और जो उपयोग के
लिये आवश्यक प्रतीत हों, उन सबका एकत्र करना चाहिये ॥ ७ ॥
ततस्तं पुरुषं यथोक्ताभ्यां स्नेहस्वेदाभ्यां यथार्हमुपपादयेत् । तं
चेदस्मिन्नन्तरे मानसः शारीरो वा व्याधिः कश्चित्तीव्रतरः सहसाऽभ्या-
गच्छेत्तमेव तावदस्योपावर्तयितुं यतेत । ततस्तमुपावर्त्य तावन्तमेवैनं
कालं तथाविधेनैव कर्मणोपचारयेत् ॥ ८ ॥
साधन द्रव्य एकत्र करने के उपरान्त पुरुष को पहिले कही हुई विधि से
स्नेह एवं स्वेदन क्रिया करनी चाहिये । स्नेहन और स्वेदन किया करते हुए
बीच में यदि सहसा कोई भयानक तीव्र, शारीरिक या मानसिक व्याधि उत्पन्न
हो जाय तो स्नेहन और स्वेदन बन्द करके प्रथम उत्पन्न व्याधि का प्रतीकार
करना चाहिये । इस उपस्थित रोग के प्रतीकार में जितने दिन लगें, उतने दिनों
तक रोग को आराम करना चाहिये ॥८॥
ततस्तं पुरुषं स्नेहस्वेदोपपन्नमनुपहतमनसमभिसमीक्ष्य सुखोषितं
प्रजीर्णभक्तं शिरःस्नातमनुलिप्तगात्रं स्रग्विणमनुपहतवस्त्रसंवीतं देवताग्नि-
द्विज-गुरु-वृद्ध-वैद्यानर्चितवन्तं, इष्टे नक्षत्र-तिथि-करण-मुहूर्ते कारयित्वा
१६० चरकसंहिता [ अ० १५
ब्राह्मणान् स्वस्तिवाचनं प्रयुक्ताभिराशीर्भिरभिमन्त्रितां मधु-मधुक-
सैन्धव-फाणितोपहितां मदन-फल-कषाय-मात्रां पाययेत् ॥ ६ ॥
फिर मनुष्य को स्नेह एवं स्वेदन क्रिया से युक्त कराकर, सुखपूर्वक बिठाकर,
पहिले दिन का खाया भोजन जीर्ण होने पर, सम्पूर्ण अंगों का स्नान कराके,
शरीर पर चन्दन-अगरु आदि द्रव्य लगाकर, माला पहिना कर, उत्तम-स्वच्छ
वस्त्र पहिने हुए, देवता, ब्राह्मण, गुरु, वृद्ध और वैद्य की पूजा कराकर, पुण्य
नक्षत्र, तिथि मुहूर्त में, ब्राह्मणों से मंगल पाठ करवा कर, प्रशस्त मंगल क्रिया-
आशीर्वाद मन्त्रों से अभिमन्त्रित शहद, मुलैहटी, सैन्धव नमक, गुड़ से युक्त
मदनफल के कषाय को उचित मात्रा में पिलावे ॥६॥
मदनफल-कषाय-मात्राप्रमाणं तु खलु सर्वसंशोधनमात्राप्रमाणानि
च प्रतिपुरुषमपेक्षितव्यानि भवन्ति; यावद्धि यस्य संशोधनं पीतं
वैकारिक-दोष-हरणायोपपद्यते; न चातियोगायोगाय, तावदस्य मात्रा-
प्रमाणं वेदितव्यं भवति ॥ १० ॥
मदनफल के कषाय की मात्रा, तथा सम्पूर्ण संशोधनों की मात्रा प्रत्येक
पुरुष को देखकर निश्चित की जाती है। जितनी मात्रा पान करने पर शरीर
के विकार जन्य दोषों को बाहर निकाल सके और अतियोग आदि विकार
उत्पन्न न करे, उतनी इस संशोधन औषध की मात्रा वैद्य को समझनी चाहिये ॥
पीतवन्तं तु खल्वेनं मुहूर्तमनुकाङ्क्षेत्। तस्य यदा जानीयात्स्वेद-
प्रादुर्भावेण दोषं प्रविलयनमापद्यमानं, लोमहर्षेण च स्थानेभ्यः प्रच-
लितं, कुक्षिसमाध्मापनेन च कुक्षिमनुगतं, हृल्लासास्यस्रवणाभ्यामपिचो-
र्ध्वमुखीभूतमथास्मै जानुसममसम्बाधं सुप्रयुक्तास्तरणोत्तरप्रच्छदोप-
धानं स्वापाश्रयमासनमुपवेष्टुं प्रयच्छेत् ॥ ११ ॥
प्रतिग्रहांश्चोपचारयेत्—ललाटप्रतिग्रहे पार्श्वोपग्रहणे नाभिप्रपीडने
पृष्ठोन्मर्दने चानपन्नपनीयाः सुहृदोऽनुमताः प्रयतेरन् ॥ १२ ॥
उचित मात्रा में वमन-औषध पिलाकर कुछ काल तक एकाग्र चित्त से
ध्यानावस्थित होकर प्रतीक्षा करे और जब पसीना उत्पन्न होकर दोष निकल
जावे, शरीर में रोमांच हो तब दोष को अपने स्थान से चलायमान समझे। जब
उदर में अफारा प्रतीत हो, उस समय दोष को पेट में आया समझे। जब वमन
की इच्छा, और मुख से थूक गिरने लगे उस समय दोष को एकत्र होकर ऊपर
की ओर आता हुआ जानना चाहिये। इसके पीछे रोगी मनुष्य को घुटने उठा-
कर मिलाकर, बैठने को उत्तम गद्दे और चद्दर तथा तकिये से युक्त खाट देवे।
अ० १५ ] सूत्रस्थानम् १६१
अ० १५ ] सूत्रस्थानम् १६१
वमन करते हुए रोगी को पकड़ कर सहारा देना चाहिये । इसके लिये कोई
माथे को, कोई पसलियों को पकड़े, कोई पेट को दबाये, और कोई पीठ को मले ।
इस कार्य में जिनके सामने लज्जा अनुभव न हो ऐसे मनोऽनुकूल मित्र सहा-
यता करें ॥११-१२॥
अथैनमनुशिष्यात् — विवृतौष्ठ-तालु-कण्ठो नातिमहता व्यायामेन
वेगानुदीर्णानुदीरयन् किंचिदवनम्य ग्रीवामूर्ध्वशरीरमुपवेगमप्रवृत्तान्
प्रवर्तयन सुपरिलिखितनखाभ्यामङ्गुलीभ्यामुत्पल-कुमुद-सौगन्धिक-ना-
लैर्वा कण्ठमनभिस्पृशन् सुखं प्रवर्त्तयस्व—इति ॥ १३ ॥
स तथाविधं कुर्यात् । ततोऽस्य वेगान् प्रतिग्रहागतानवेक्षेताव-
हितः । वेगविशेषदर्शनाद्धि कुशलो योगायोगातियोगविशेषानुपलभेत,
वेगविशेषदर्शी पुनः कृत्यं यथार्हमवबुध्येत लक्षणेन, तस्माद्वेगानवे-
क्षेतावहितः ॥ १४ ॥
इसके अनन्तर वैद्य रोगी को उपदेश दे कि तालु और गला खोल कर
बहुत अधिक बल से नहीं, प्रत्युत साधारण शक्ति से बाहर आते हुए वेग को
बाहर करे । इसके लिये गर्दन, तथा मुख को आगे की ओर झुका दे तथा अनु-
पस्थित वेग को बाहर निकालने के लिये खूब अच्छी प्रकार से नखों से रहित
दो अंगुलियों, अथवा कमल, कुमुद या सुगन्धित कमल की डण्डों से धीरे-धीरे
गले के भीतर स्पर्श करे और वेग को बाहर कर देवे । रोगी वैद्य के कहे अनु-
सार करे । वैद्य रोगी के वमन किये पदार्थ को सावधानी से देखे । कुशल,
चतुर वैद्य वेग को देख कर ही सम्यक् योग, अयोग और अतियोग का अनु-
मान कर सकता है । वेग को समझने में चतुर वैद्य वेग देखकर लक्षणों से
अतियोग आदि के प्रतिकार को ठीक प्रकार से समझ लेता है । इसलिये वैद्य
सावधानी से वेगों को देखे ॥१३-१४॥
तत्रामुन्ययोग-योगातियोग-विशेषज्ञानानि भवन्ति, तद्यथा-अप्र-
वृत्तिः कुतश्चित् केवलस्य वाऽप्यौषधस्य विभ्रंशो विबन्धो वेगानामयो-
गलक्षणानि भवन्ति । काले प्रवृत्तिरनतिमहती व्यथा यथाक्रमं दोषह-
रणं स्वयं चावस्थानमिति योगलक्षणानि भवन्ति । योगेन तु दोषप्रमाण-
विशेषेण तीक्ष्ण-मृदु-मध्यविभागो ज्ञेयः, योगाधिक्येन तु फेनिल-रक्त-
चन्द्रिकोपगमनमित्यतियोगलक्षणानि भवन्ति । तत्रातियोगायोगनि-
मित्तानमानुपद्रवान् विद्यात्-आध्मानं परिकर्तिकां परिस्रावो हृदयो-
पसरणामङ्गग्रहो जीवादानं विभ्रंशः स्तम्भः क्लम उपद्रव इति ॥ १५ ॥
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१६२ चरकसंहिता [ अ० १५
अयोग, सम्यक् योग और अतियोग के विशेष लक्षण ये हैं । जैसे किसी
विशेष कारण से ( गले में अंगुली आदि डालने से भी वमन का थोड़ा आना
अथवा, वमनकारक औषध ही का केवल बाहर आना,) वेगों का रुक जाना
ये अयोग के चिन्ह हैं । न तो बहुत जल्दी और न देर में ठीक समय पर
वमन का आना; वमन करने में कष्ट का अधिक न होना, क्रम से
पहले कफ, फिर पित्त और अन्त में वायु इन दोषों का बाहर आना; और
वमन का अपने आप रुक जाना सम्यक् योग के लक्षण हैं । सम्यक् योग में दोषों
के प्रमाणों के अनुसार तीक्ष्ण, मृदु और मध्य भाग होते हैं । वमन के अतियोग
से झागदार, रक्तमिश्रित, चन्द्रिका का आना ये अतियोग के लक्षण हैं । अतियोग
और अयोग से होने वाले उपद्रवों को जानना चाहिये । अफारा, गुदा में काटने
के समान पीड़ा होना, स्राव होना, हृदय का बाहर आना, अर्थात् कलेजे का
मुख को आना ( आमाशय का बाहर आना सा प्रतीत होना ), अंगों में वेदना
और जकड़ना, रक्त का बाहर निकलना, शरीर का विभ्रम ( चक्कर आना ),
शरीर की जड़ता, शरीर में थकान, उदासी का होना, ये अयोग और अतियोग
के उपद्रव हैं ॥ १५ ॥
योगेन तु खल्वेनं छर्दितवन्तमभिसमीक्ष्य सुप्रक्षालित-पाणि-पादास्यं
मुहूर्तमाश्वास्य, स्नैहिकवैरेचनिकोपशमनीयानां धूमानामन्यतमं साम-
र्थ्यतः पाययित्वा, पुनरेवोदकमुपस्पर्शयेत् ॥ १६ ॥
उपस्पृष्टोदकं चैनं निवातमागारमनुप्रवेश्य संवेश्य चानुशिष्यात्—
उच्चैर्भाष्यमत्यासनमतिस्थानमतिचङ्क्रमणं क्रोध-शोक-हिमातपावश्याया-
तिप्रवातान् यानयानं ग्राम्यधर्ममस्वप्नं निशि दिवा स्वप्नं विरुद्धाजी-
र्णासात्म्याकालप्रमितातिहीन-गुरु-विषम-भोजन-वेग-सन्धारणोदीरण-
मिति भावानेतान् मनसाऽप्यसेवमानः सर्वमाहारमद्यात्-इति । स तथा
कुर्यात् ॥ १७ ॥
सम्यक् योग से वमन कर चुकने पर रोगी को देखकर उसके हाथ पांव, मुख
धुलवा कर थोड़ी देर विश्राम लेने दे । इसके पीछे स्नैहिक, वैरेचनिक या
उपशमनीय कोई एक प्रकार का धूम यथाशक्ति पिलाकर फिर पानी से हाथ
पांव धुला देवे । पानी से मुंह हाथ धुलाकर वमन किये पुरुष को वायुरहित—
सीधी वायु जिसमें न आ सके, एक पार्श्व से आये, ऐसे घर में लेजा कर लेटा
दे और निम्न आदेश करे—ऊंचा बोलना, बहुत देर बैठना, बहुत सोना,
बहुत चलना-फिरना, क्रोध, शोक, ठण्डक, धूप, ओस, वायु में अधिक बैठना,
घोड़े आदि की सवारी अधिक करना, मैथुन, रात में जागना, दिन में सोना,
अ० १५ ] १३ सूत्रस्थानम् १६३
अ० १५ ] १३ सूत्रस्थानम् १६३
विरुद्ध भोजन अजीर्ण, असात्म्यप्रकृति के प्रतिकूल, अकाल, कुसमय, मात्रा से
कम, गुरु-भारी और विषम भोजन; उपस्थित बेगों को रोकना, अनुपस्थित
बेगो को बल पूर्वक बाहर करना, इस प्रकार के कर्मों का विचार मन से भी
न करे और सब प्रकार का उचित आहार-भोजन करे। वह रोगी इसी
प्रकार करे ॥ १७ ॥
अथैनं सायाह्ने परे वाऽह्रि सुखोदकपरिषिक्तं पुराणानां लोहितशालि-
तण्डुलानां स्ववक्लिन्नानां मण्डपूर्वां सुखोष्णां यवागूं पाययेदग्निबलम-
भिसमीक्ष्य च, एवं द्वितीये तृतीये चान्नकाले। चतुर्थे त्वन्नकाले
तथाविधानामेव शालितण्डुलानामुत्त्वन्नां विलेपीमुष्णोदकद्वितीयाम-
स्नेह-लवणामल्प-स्नेह-लवणां वा भोजयेत्, एवं पञ्चमे षष्ठे चान्नकाले,
सप्तमे त्वन्नकाले तथाविधानामेव शालीनां द्विप्रसृतं सुस्विन्नमोदनमुष्णो-
दकानुपानं तनुना तनु-स्नेह-लवणोपपन्नेन मुद्गयूषेण भोजयेत्,
एवमष्टमे नवमे चान्नकाले, दशमे त्वन्नकाले लावकपिञ्जलादीनामन्य-
तमस्य मांसरसेनौदकलावणिकेनापि सारवता भोजयेदुष्णोदकानुपानम्,
एवमेकादशे द्वादशे चान्नकाले, अत ऊर्ध्वमन्नगुणान् क्रमेणोपभुञ्जानः
सप्तरात्रेण प्रकृतिभोजनमागच्छेत् ॥ १८ ॥
इसके पीछे रोगी को सायंकाल अथवा अगले दिन कुछ गरम पानी से
सम्पूर्ण अंगों का स्नान कराये। एक साल पुराने सांठी चावलों का यवागू बना
कर जब गल जावे, तब थोड़ी गरम यवागू के ऊपर की माण्ड को पहिले
पीवे। फिर अग्नि का बल देखकर शेष गाढ़े भाग को खावे। इस प्रकार दूसर
तीसरे भोजन के समय भी अग्निबल को देखकर इसी प्रकार का यवागू खावे।
चौथे भोजन काल में इसी प्रकार पुराने सांठी के चावलों से (विलेपी रूप में
बनाई) थोड़े नमक और स्नेहरहित यवागू को गरम पानी के साथ खाये।
(प्रथम दो तीन समयों में जल, नमक और स्नेह नहीं खाना चाहिये)। इस
प्रकार पांचवें और छठे अन्न-काल में चौथे समय के अनुसार बरते। सातवें
भोजन समय में पुराने सांठी के चावलों को दो प्रसृति लेकर पकाये। इन
चावलों को गरम पानी के साथ, थोड़े से घी एवं नमक के साथ मूंग के यूष
के साथ खावे। इसी प्रकार आठवें और नवे भोजन के समय में भी करे।
दसवें अन्न-काल में बटेर, कपिञ्जल आदि किसी पशु-पक्षी के मांस रस के साथ
धनी व भाई चावलों की यवागू खाये, तथा गरम पानी ऊपर से पीये। इसी
प्रकार ग्यारहवें और बारहवें अन्न-काल में क्रम से, मृदु, मध्य, कठिन (अथवा
१६४ चरकसंहिता [ अ० १५
गुरु, कठिन मधुर ) पदार्थों को सेवन करने पर सात दिन पीछे अपने स्वाभाविक
भोजन को ग्रहण करे ॥१८॥
अथैनं पुनरेव स्नेहस्वेदाभ्यामुपपाद्यानुपहतमनसमभिसमीक्ष्य
सुखोषितं सुप्रजीर्णभक्तं कृत-होम-बलि-मङ्गल-जप्य-प्रायश्चित्तमिष्टति-
थि-नक्षत्र-करण-मुहूर्ते ब्राह्मणान् स्वस्ति वाचयित्वा त्रिवृत्कल्काक्षमात्रं
यथार्हालोडनप्रतिविनीतं पाययेत् प्रसमीक्ष्य दोष-भेषज-देश-काल-बल-
शरीराहार-सात्म्य-सत्त्व-प्रकृति-वयसामवस्थान्तराणि विकारांश्च ।
सम्यग्विरिक्तं चैनं वमनानन्तरलक्षणोक्तेन धूमवर्जेन विधिनोपपादये-
दाबल-वर्ण-प्रकृति-लाभात् । बलवर्णोपपन्नं चैनमनुपहतमनसमभिस-
मीक्ष्य सुखोषितं सुप्रजीर्णभक्तं शिरःस्नातमनुलिप्तगात्रं स्रग्विणमनुप-
हत-वरू-संवीतमनुरूपालङ्कारालङ्कृतं सुहृदां दर्शयित्वा ज्ञातीनां दर्शयेत् ,
अथैनं कामेष्ववसृजेत् ॥ १९ ॥
भवन्ति चात्र--अनेन विधिना राजा राजमात्रोऽथवा पुनः ।
यस्य वा विपुलं द्रव्यं स संशोधनमहर्हति ॥ २० ॥
दरिद्रस्त्वापदं प्राप्य प्राप्तकालं विरेचनम् ।
पिबेत्काममसंभृत्य संभारानपि दुर्लभान् ॥ २१ ॥
न हि सर्वमनुष्याणां सन्ति सर्वपरिच्छदाः ।
न च रोगा न बाधन्ते दरिद्रानपि दारुणाः ॥ २२ ॥
यद्यच्छक्यं मनुष्येण कर्तुमौषधमापदि ।
तत्तत्सेव्यं यथाशक्ति वसनान्यशनानि च ॥ २३ ॥
मलापहं रोगहरं बल-वर्ण-प्रसादनम् ।
पीत्वा संशोधनं सम्यगायुषा युज्यते चिरम् ॥ २४ ॥
इसके सात दिन पीछे जब मनुष्य में बल आजाय, तब फिर स्नेहन और
स्वेदन कर्म करके, प्रसन्न मन देखकर, रात्रि में सुखपूर्वक सोने पर, पहिले
दिन का खाया भोजन भली प्रकार जीर्ण होने पर, अग्निहोत्र, बलि, मंगल, जप,
प्रायश्चित्त करके, पवित्र तिथि, नक्षत्र मुहूर्त्त का विचार करके, ब्राह्मणों से
मंगल पाठ करा कर त्रिवृत् कल्क ( विरेचन द्रव्य ) निशोथ के चूर्ण की एक
अक्ष मात्रा, योग्य द्रव्य में मिलाकर पिलावे । औषध देते समय दोष, औषध
मात्रा, देश, समय, शरीर, आहार, सात्म्य, सत्त्व, प्रकृति, आयु और रोगों
की विवेचना कर ले । सम्यक् विरेचन होने पर वमन के पीछे की सम्पूर्ण विधि
( धूम्रपान को छोड़कर ) करे । जब तक कि शरीर में बल कान्ति न आय,
अ० १६ ] सूत्रस्थानम् १८५
अ० १६ ] सूत्रस्थानम् १८५
शरीर स्वाभाविक रूप में न आय, तब तक वमनान्तर की विधि करे। जब बल
और वर्ण आजाय, मन भी स्वस्थ हो जाय, तब सुखपूर्वक सुलाकर, खाया हुआ
भोजन भली प्रकार पचने पर, सम्पूर्ण अंगों का स्नान कराके चन्दन, अगर आदि
शरीर में मलकर, माला, स्वच्छ वस्त्र पहिना कर, सुन्दर बना कर, आभूषणों से
आभूषित करके, मित्रों को दिखाकर, जाति, भाई, बन्धुओं को दिखाये
और फिर नित्य के उचित आहार-विहार करने की छूट देदे । इस उपरोक्त विधि
से राजा अथवा राजा के समान या बहुत धनी आदमी ही संशोधन करवा सकता
है। दरिद्र निर्धन व्यक्ति को जब रोग हो जाय और विरेचन लेने का अवसर हो,
तो उस समय कठिन उपकरणों को इकट्ठा करना छोड़कर दवाई पान करावे। सब
मनुष्यों को सब साधन नहीं जुट सकते और निर्धन व्यक्तियों को भयंकर रोग
भी नहीं सताते ऐसा नहीं, आरत्ति काल (रोगावस्था) में मनुष्य जो भी
औषध, वस्त्र या खान-पान कर सके, वह यथाशक्ति उसे करना चाहिये। मल-
नाशक, रोगनाशक, बल, कान्ति को बढ़ाने वाले संशोधन औषध को पीकर
मनुष्य दीर्घायु होता है ॥ २४ ॥
तत्र श्लोकाः—ईश्वराणां वसुमतां वमनं सविरेचनम् ।
संभारा ये यदर्थं च समानीय प्रयोजयेत् ॥ २५ ॥
यथा प्रयोज्यं या मात्रा यद्योगस्य लक्षणम् ।
योगातियोगयोर्यच्च दोषा ये चाप्युपद्रवाः ॥ २६ ॥
यदसेव्यं विशुद्धेन यश्च संसर्जनक्रमः ।
तत्सर्वं कल्पनाध्याये व्याजहार पुनर्वसुः ॥ २७ ॥
इसमें श्लोक हैं—राजाओं के या धनी पुरुषों के वमन, विरेचन कार्य, उप-
करण, इनको एकत्र करने का कारण, मात्रा, प्रयोग विधि, अयोग के लक्षण, योग
और अतियोग के दोष, और उपद्रव, संशुद्ध व्यक्ति को क्या सेवन करना, किस
प्रकार से छोड़ना, ये सब बातें इस 'कल्पनाध्याय' में पुनर्वसु आत्रेय ने कह दीं।
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने उपकल्पनीयो
नाम पञ्चदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥
षोडशोऽध्यायः ।
अथातश्चिकित्साप्राभृतीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
चिकित्साप्राभृतो विद्वान् शास्त्रवान् कर्मतत्परः ।
१६६ चरकसंहिता [ अ० १६
संशोधन कार्य के अनन्तर 'चिकित्सा प्राभृतीय' नामक अध्याय का व्याख्यान
करेंगे जैसा भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥
चिकित्साप्राभृतो विद्वान् शास्त्रवान् कर्मतत्परः ।
नरं विरेचयति यं स योगात्सुखमश्रुते ॥ ३ ॥
यं वैद्यमानी त्वबुधो विरेचयति मानवम् ।
सोऽतियोगादयोगाच्च मानवो दुःखमश्रुते ॥ ४ ॥
चिकित्सा-प्राभृत चिकित्सा में कुशल या साधन सम्पन्न विद्वान्, ज्ञानवान्,
शास्त्रवान्, आयुर्वेद शास्त्र का अध्ययन किया हुआ, चिकित्सा-कार्य में कुशल
वैद्य जिस मनुष्य को वमन, विरेचन द्वारा संशोधन कराता है, वह मनुष्य
वमन और विरेचन के सम्यक् योग से सुख भोगता है । अपने को वैद्य मानने
वाला मूर्ख वैद्य जिस मनुष्य का वमन विरेचन द्वारा संशोधन कराता है वह
मनुष्य वमन-विरेचन के अयोग या अतियोग के कारण दुःख भोगता है ॥३-४॥
दौर्बल्यं लाघवं ग्लानिर्व्याधीनामणताऽरुचिः ।
हृद्वर्णशुद्धिः क्षुत्तृष्णा काले वेगप्रवर्तनम् ॥ ५ ॥
बुद्धीन्द्रियमनःशुद्धिर्मारुतस्यानुलोमता ।
सम्यग्विरिक्तलिङ्गानि कायाग्नेश्चानुवर्तनम् ॥ ६ ॥
सम्यग् विरेचन के लक्षण—शरीर में कमजोरी आना, हलकापन, शरीर में
ग्लानि (प्रसन्नता का अभाव), रोगों का घटना, भोजन में अनिच्छा, हृदय का
शुद्ध होना, रंग का निखरना, भूख प्यास, समय पर वेगों का उपस्थित होना,
बुद्धि-इन्द्रिय और मन की शुद्धता, प्रसन्नता, अपान वायु का नीचे को जाना
और जाठराग्नि का क्रमशः बढ़ना ये सम्यग् योग के लक्षण हैं ॥ ५-६ ॥
ष्ठीवनं हृदयाशुद्धिरुत्क्लेशः श्लेष्मपित्तयोः ।
आध्मानमरुचिश्छर्दिर्दौर्बल्यमलाघवम् ॥ ७ ॥
जङ्घोरुसदनं तन्द्रा स्तैमित्यं पीनसागमः ।
लक्षणान्यविरिक्तानां मारुतस्य च निग्रहः ॥ ८ ॥
विरेचन के अयोग के लक्षण—मुख से थोड़ा २ थूक या ओषध का बाहर
आना, हृदय की जड़ता, वमन आने की भांति कफ और पित्त का मुख में
आना, पेट में अफारा, भोजन में अनिच्छा, वमन की इच्छा, शरीर में निर्ब-
लता का अनुभव न होना, शरीर में भारीपन, जांघ और टांग में पीड़ा, नींद का भान,
शरीर के अंगो का गीले वस्त्र के तुल्य ठंडा प्रतीत होना, सरदी-जुकाम होना,
और अपान वायु का रुक जाना, ये विरेचन के अयोग के लक्षण हैं ॥७-८॥
अ० १६ ] सूत्रस्थानम् १६७
अ० १६ ] सूत्रस्थानम् १६७
विट्-पित्त-श्लेष्म-वातानामागतानां यथाक्रमम् ।
परं स्रवति यद्रक्तं मेदोमांसोदकोपमम् ॥ ६ ॥
निःश्लेष्मपित्तमुदकं शोणितं कृष्णमेव वा ।
तृष्यतो मारुतार्तस्य सोऽतियोगः प्रमुह्यतः ॥ १० ॥
विरेचन के अतियोग के लक्षण—गुदा से प्रथम क्रमानुसार मल, पित्त, कफ
और वायु बाहर निकलते हैं, परन्तु पीछे से रक्त बहता है । यह रक्त मांसरस, मेद
मिश्रित या कफमिश्रित अथवा पित्तमिश्रित पानी की भांति, या लाल अथवा
काला होता है। रोगी को वायु के कारण प्यास और मूर्च्छा आ जाती है, ये
अतियोग के लक्षण हैं ॥६-१०॥
वमनेऽतिकृते लिङ्गान्येतान्येव भवन्ति हि ।
ऊर्ध्वगा वातरोगारच वाग्ग्रहश्चाधिको भवेत् ॥ ११ ॥
चिकित्साप्राभृतं तस्मादुपैयाच्छरणं नरः ।
युञ्ज्याद्य एनमत्यन्तमायुषा च सुखेन च ॥ १२ ॥
वमन के अतियोग में भी यही विरेचन के अतियोग के लक्षण होते हैं।
परन्तु शरीर के कटिभाग से ऊपर वातरोग एवं जबान का रुकना, ये लक्षण
विशेष अधिक होते हैं । इसलिये संशोधन कराने वाले मनुष्य को चाहिये कि
विद्वान्, कर्मकुशल वैद्य की शरण में जाय जो इस रोगी को वमन-विरेचन
द्वारा आयु और सुख से युक्त कर सके, मूढ़ अज्ञानी के पास नहीं ॥११-१२॥
अविपाकोऽरुचिः स्थौल्यं पाण्डुता गौरवं क्लमः ।
पिडका-कोठ-कण्डूनां संभवोऽरतिरेव च ॥ १३ ॥
आलस्य-श्रम-दौर्बल्यं दौर्गन्ध्यमवसादकः ।
श्लेष्म-पित्त-समुत्क्लेशो निद्रानाशोऽतिनिद्रता ॥ १४ ॥
तन्द्रा क्लैब्यमबुद्धित्वमशस्त-स्वप्न-दर्शनम् ।
बल-वर्ण-प्रणाशश्च तृप्यतो बृंहणैरपि ॥ १५ ॥
बहुदोषस्य लिङ्गानि, तस्मै संशोधनं हितम् ।
ऊर्ध्वं चैवानुलोम्यं च यथादोषं यथाबलम् ॥ १६ ॥
संशोधन योग्य व्यक्ति—अपचन, अरुचि, मोटापा (स्थूलता ), पाण्डुता,
निस्तेज, पीलापन, शरीर का भारीपन, बिना परिश्रम के थकान चढ़ना, उदासी,
शरीर पर छोटी २ फुन्सियां होना, कोठ ( छप्पे ) उठना, खाज का होना,
बेचैनी, आलस्य, थकान, निर्बलता, शरीर से दुर्गन्ध आना, मन को अप्रसन्नता,
सुस्ती, कफ या पित्त का बढ़ना, नींद का न आना, अथवा नींद का बहुत
१६८ चरकसंहिता [ अ० १६
आना, नपुंसकता, निरुत्साहता, बुद्धिमान्द्य बुरे भयानक स्वप्नों का आना, बल
और कान्ति का नाश होना, पुष्टिकारक आहार खाने पर शरीर का पुष्ट न होना,
जिसके शरीर में इनमें से बहुत से लक्षण हों तो उसमें सब दोष बढ़े हैं यह
समझकर संशोधन करना हितकारी है । इसलिये अविपाक आदि लक्षणों को
देख कर बल और दोष के अनुसार ऊर्ध्व अनुलोमन ( वमन ) या अधो-अनु-
लोमन ( विरेचन ) रूपी संशोधन देना हितकारी है ॥ १३-१६ ॥
एवं विशुद्धकोष्ठस्य कायाग्निरभिवर्धते ।
व्याधयश्चोपशाम्यन्ति प्रकृतिश्चानुवर्तते ॥ १७ ॥
इन्द्रियाणि मनो बुद्धिवर्णश्चास्य प्रसीदति ।
बलं पुष्टिर्पत्यं च वृषता चास्य जायते ॥ १८ ॥
जरां कृच्छ्रेण लभते चिरं जीवत्यनामयः ।
तस्मात्संशोधनं काले युक्तियुक्तं पिबेन्नरः ॥ १९ ॥
दोषाः कदाचित्कुप्यन्ति जिता लङ्घनपाचनैः ।
जिताः संशोधनैर्यै तु न तेषां पुनरुद्भवः ॥ २० ॥
दोषाणां च द्रुमाणां च मूलेऽनुपहते सति ।
रोगाणां प्रसवानां च गतानामागतिर्ध्रुवा ॥ २१ ॥
भेषजक्षपिते पथ्यमाहारैरेव बृंहणम् ।
घृत-मांस-रस-क्षीर-हृद्य-यूषोपसंहितैः ॥ २२ ॥
अभ्यङ्गोत्सादनैः स्नानैनिरूहैः सानुवासनैः ।
तथा स लभते शर्म युज्यते चाऽऽयुषा चिरम् ॥ २३ ॥
संशोधन का फल—इस उपरोक्त विधि से मनुष्य का कोष्ठ ( उदर ) साफ़
होने पर जाठराग्नि बढ़ जाती है, रोग शान्त हो जाते हैं, शरीर स्वाभाविक
अवस्था में आ जाता है । इन्द्रियां, मन-बुद्धि और कान्ति निर्मल हो जाती है ।
शरीर में बल, शक्ति, सामर्थ्य, संतान और पुरुषत्व उत्पन्न हो जाता है । बुढ़ापा
देर में आता है और नीरोगी होकर मनुष्य देर तक जीता है । इसलिये मनुष्य
दोष-संचयकाल में और संशोधन काल में वमन-विरेचन कार्य को युक्तियुक्त
रूप में करे । लंघन ( उपवास ) और पाचन रूपी संशमन क्रिया द्वारा वश में
किये हुए दोष कभी फिर भी ( समय मिलने पर ) कुपित हो सकते हैं; परन्तु
जो दोष संशोधन कार्य के द्वारा वश में कर लिये जाते हैं, वे फिर कभी भी
उत्पन्न नहीं हो सकते । क्योंकि—दोषों या वृक्षों का मूल अवशेष रहने पर रोगों
अथवा न नष्ट होने पर रोगों की उत्पत्ति फिर हो जानी सम्भव होती है । औषध
द्वारा दोष की जड़ कट जाने पर संशुद्ध हुए पुरुष को पथ्यकारक एवं शरीर
अ० १६] सूत्रस्थानम् १६६
अ० १६] सूत्रस्थानम् १६६
को बढ़ाने वाले भोजन देवे । यथा घी, मांस रस, दूध, हृदय के लिये हितकारी
या मन को अच्छे लगने वाले यूष आदि बना कर देवे । शरीर पर तेल मलना,
उबटन लगाना, स्नान, निरूह बस्ति, अनुवासनबस्ति का प्रयोग करे । इस प्रकार
करने से सुख मिलता है तथा देर तक आयु का भोगता है ॥१७-२३॥
अतियोग होने पर क्या करना चाहिये—
अतियोगानुबद्धानां सर्पिःपानं प्रशस्यते ।
तैलं मधुरकैः सिद्धमथवाऽप्यनुवासनम् ॥ २४ ॥
यस्य त्वयोगस्तं स्निग्धं पुनः संशोधयेन्नरम् ।
मात्रा-काल-बलापेक्षी स्मरन् पूर्वमनुक्रमम् ॥ २५ ॥
स्नेहने स्वेदने शुद्धौ रोगाः संसर्जने च ये ।
जायन्तेऽमार्गविहिते तेषां सिद्धिषु साधनम् ॥ २६ ॥
जिन पुरुषों में अतियोग के लक्षण हों, उनके लिये उन-उन रोगों को
शान्त करने वाली उन औषधियों से सिद्ध किया घृत पान करावे और मधुक
अर्थात् जीवनीयगण से सिद्ध तैल अनुवासन बस्ति के रूप में दे। जिस पुरुष
में अयोग के लक्षण हों, उसको फिर से स्नेह और स्वेद देकर, पूर्व कही हुई मात्रा
को, समय, बल आदि को क्रम से स्मरण करता हुआ, फिर से संशोधन के लिये
देवे । स्नेहन, स्वेदन संशोधन और पेयादि क्रम से विधिपूर्वक क्रिया न होने से
जो रोग उत्पन्न हो जाते हैं, उनको चिकित्सा 'सिद्धिस्थान' में कहेंगे । पहले जो
मात्रा दी थी दुबारा उससे कुछ अधिक देवे ॥२४-२६॥
जायन्ते हेतुवैषम्याद्विषमा देहधातवः ।
हेतुसाम्यात्समास्तेषां स्वभावोपरमः सदा ॥ २७ ॥
प्रवृत्तिहेतुर्भावानां न निरोधेऽस्ति कारणम् ।
केचित्स्वत्रापि मन्यन्ते हेतुं हेतोरवर्तनम् ॥ २८ ॥
शरीर को धारण करने वाले जो धातु हैं वे कारणों की विषमता अर्थात्
बढ़ने या घटने से बढ़ते या घटते हैं और शरीर के धातु कारण की समानता से
समान रहा करते हैं। विषम और सम धातुओं का सदा स्वभाव से नाश होता
है। इस समता और विषमता की निरन्तर प्रवृत्ति में ऐसा कारण रहता है
जिससे कि उनका वृद्धि और क्षय होता है, अर्थात् साम्य या विषमता के होने
में कोई कारण अवश्य होता है, बिना कारण इनके स्वाभाविक धर्म में अन्तर
नहीं आता । धातु एक क्षण भी विषमावस्था में नहीं रह सकते। यह उनका
धर्म है। सब पदार्थों की उत्पत्ति का कारण होता है, परन्तु विनाश कार्य में
स्वभावोपरमे कर्म चिकित्साप्राभृतस्य किम् ॥ २९ ॥
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कारण नहीं होता। इसलिये कुछ आचार्य पदार्थों के निरन्तर विनाश में कारण
की अपेक्षा नहीं करते हैं। कुछ विद्वान् पदार्थों के नाश में उत्पादक या प्रवर्तक
कारण के अभाव को ही कारण मानते हैं ॥२७-२८॥
एवमुक्तार्थमाचार्यमग्निवेशोऽभ्यभाषत ।
स्वभावोपरमे कर्म चिकित्साप्राभृतस्य किम् ॥ २९ ॥
भेषजैर्विषमान् धातून् कान समीकुरुते भिषक् ।
का वा चिकित्सा भगवन् किमर्थं वा प्रयुज्यते ॥ ३० ॥
तच्छिष्यवचनं श्रुत्वा व्याजहार पुनर्वसुः ।
इस प्रकार कहते हुए आचार्य पुनर्वसु को लक्ष्य करके अग्निवेश बोले—
भगवन् ! शरीर की धातुवें जब स्वतः अपने स्वभाव में आ जाती हैं तब चिकित्सा
के साधनों से सम्पन्न वैद्य से कर्म साध्य क्या है। फिर क्या काम ? और तब
किन विषम हुए धातुओं को ओषधियों से वैद्य समान करता है ? और यदि
धातुओं की विषमता ही सदा रहे, तब चिकित्सा क्या वस्तु है ? और यदि
विषमता का नाश सदा होना ही अवश्यम्भावी है, फिर वैद्य किस लिये चिकित्सा
कर्म करते हैं ? इस प्रकार अग्निवेश के वचन को सुनकर पुनर्वसु आत्रेय बोले॥
श्रूयतामत्र या सौम्य युक्तिर्दृष्टा महर्षिभिः ॥ ३१ ॥
न नाशकारणाभावाद्भावानां नाशकारणम् ।
ज्ञायते नित्यगस्येव कालस्यात्ययकारणम् ॥ ३२ ॥
शीघ्रगत्वाद्यथाभूतस्तथा भावो विपद्यते ।
निरोधे कारणं तस्य नास्ति नैवान्यथाक्रिया ॥ ३३ ॥
याभिः क्रियाभिर्जायन्ते शरीरे धातवः समाः ।
सा चिकित्सा विकाराणां कर्म तद्भिषजां स्मृतम् ॥ ६४ ॥
कथं शरीरे धातूनां वैषम्यं न भवेदिति ।
समानां चानुबन्धः स्यादित्यर्थं क्रियते क्रिया ॥ ३५ ॥
त्यागाद्विषमहेतूनां समानां चोपसेवनात् ।
विषमा नानुबध्नन्ति जायन्ते धातवः समाः ॥ ३६ ॥
समैस्तु हेतुभिर्यस्माद्धातून् संजनयेत्समान् ।
चिकित्साप्राभृतस्तस्माद्दाता देहसुखायुषाम् ॥ ३७ ॥
धर्मस्यार्थस्य कामस्य नृलोकस्योभयस्य च ।
दाता संपद्यते वैद्यो दानाद्देहसुखायुषाम् ॥ ३८ ॥
हे सौम्य ! जो युक्ति महर्षियों ने बुद्धि द्वारा देखी, वह सुनो। नित्यगमन-
शील काल के नाश के कारण की तरह नाश के कारण के अभाव से पदार्थों
के नाश का कारण नहीं जाना जाता। कोई भी पदार्थ जैसा उत्पन्न होता है,
वैसा ही शीघ्रगामी होने से नष्ट होता है। उनके विनाश में कोई कारण नहीं है।
उनमें किसी संस्कार का आधान नहीं किया जा सकता। पदार्थों के नाश होने
के कारण का पता नहीं चलता क्योंकि नाश के कारण का ही अभाव है।
जैसे नित्य काल का भी नाश होता दिखाई देता है, परन्तु इस नाश के कारण
का पता नहीं चलता, क्योंकि यह काल बहुत शीघ्रगामी है। धातु पदार्थ भी
काल के समान बहुत शीघ्रगामी हैं इसलिये इनके नाश का कारण न होने से
ही अज्ञात है। धातुओं की पूर्वावस्था के निरोध में भी कोई कारण नहीं है।
जिन क्रियाओं के द्वारा शरीर के अन्दर विषम हुए धातु समानावस्था में आते
हैं, उन क्रियाओं को रोगों की चिकित्सा कहते हैं, यह 'चिकित्सा' वैद्यों का
कर्म है। शरीर के अन्दर धातुओं में विषमता उत्पन्न न हो और समान अवस्था
में ही धातु सदा बने रहें, इसलिये चिकित्सा क्रिया की जाती हैं। काल, बुद्धि,
इन्द्रियार्थों के अतियोग, अयोग या मिथ्यायोग इन विषम हेतुओं के छोड़ने से,
समयोग रूप में कारणों के सेवन करने से धातु विषम नहीं होते, और विषम
हुए धातु समान हो जाते हैं। चिकित्सा-कुशल वैद्य समान कारणों से धातुओं
को समान बनाने का यत्न करें। इस प्रकार करने से वैद्य शरीर के सुख और
आयुष्य अर्थात् दीर्घायु को प्रदान करता है। मनुष्य को शारीरिक सुख और
आयुष्य प्रदान करने से वैद्य इहलोक एवं परलोक दोनों लोकों में धर्म, अर्थ
और काम ( त्रिवर्ग ) को देने वाला होता है ॥ ३१-३८ ॥
तत्र श्लोकाः—चिकित्साप्राभृतगुणो दोषो यश्चेतराश्रयः ।
योगायोगातियोगानां लक्षणं शुद्धिसंश्रयम् ॥ ३६ ॥
बहुदोषस्य लिङ्गानि संशोधनगुणाश्च ये ।
चिकित्सासूत्रमात्रं च सिद्धि-व्यापत्ति-संश्रयम् ॥ ४० ॥
या च युक्तिश्चिकित्सायां यं चार्थं कुरुते भिषक् ।
चिकित्साप्राभृतेऽध्याये तत्सर्वमवदन्मुनिः ॥ ४१ ॥
चिकित्साप्राभृत में वैद्य के गुण; वैद्य के विपरीत मूढ वैद्य के अवगुण,
संशोधन के सम्यकयोग और अतियोग के लक्षण; बहुत दोषों के लक्षण, संशोधन
के गुण, चिकित्सा का सूत्र रूप, चिकित्सा के युक्तियुक्त होने में शंका-समाधान;