चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 215, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० १६ ] सूत्रस्थानम् १६७
विट्-पित्त-श्लेष्म-वातानामागतानां यथाक्रमम् ।
परं स्रवति यद्रक्तं मेदोमांसोदकोपमम् ॥ ६ ॥
निःश्लेष्मपित्तमुदकं शोणितं कृष्णमेव वा ।
तृष्यतो मारुतार्तस्य सोऽतियोगः प्रमुह्यतः ॥ १० ॥
विरेचन के अतियोग के लक्षण—गुदा से प्रथम क्रमानुसार मल, पित्त, कफ
और वायु बाहर निकलते हैं, परन्तु पीछे से रक्त बहता है । यह रक्त मांसरस, मेद
मिश्रित या कफमिश्रित अथवा पित्तमिश्रित पानी की भांति, या लाल अथवा
काला होता है। रोगी को वायु के कारण प्यास और मूर्च्छा आ जाती है, ये
अतियोग के लक्षण हैं ॥६-१०॥
वमनेऽतिकृते लिङ्गान्येतान्येव भवन्ति हि ।
ऊर्ध्वगा वातरोगारच वाग्ग्रहश्चाधिको भवेत् ॥ ११ ॥
चिकित्साप्राभृतं तस्मादुपैयाच्छरणं नरः ।
युञ्ज्याद्य एनमत्यन्तमायुषा च सुखेन च ॥ १२ ॥
वमन के अतियोग में भी यही विरेचन के अतियोग के लक्षण होते हैं।
परन्तु शरीर के कटिभाग से ऊपर वातरोग एवं जबान का रुकना, ये लक्षण
विशेष अधिक होते हैं । इसलिये संशोधन कराने वाले मनुष्य को चाहिये कि
विद्वान्, कर्मकुशल वैद्य की शरण में जाय जो इस रोगी को वमन-विरेचन
द्वारा आयु और सुख से युक्त कर सके, मूढ़ अज्ञानी के पास नहीं ॥११-१२॥
अविपाकोऽरुचिः स्थौल्यं पाण्डुता गौरवं क्लमः ।
पिडका-कोठ-कण्डूनां संभवोऽरतिरेव च ॥ १३ ॥
आलस्य-श्रम-दौर्बल्यं दौर्गन्ध्यमवसादकः ।
श्लेष्म-पित्त-समुत्क्लेशो निद्रानाशोऽतिनिद्रता ॥ १४ ॥
तन्द्रा क्लैब्यमबुद्धित्वमशस्त-स्वप्न-दर्शनम् ।
बल-वर्ण-प्रणाशश्च तृप्यतो बृंहणैरपि ॥ १५ ॥
बहुदोषस्य लिङ्गानि, तस्मै संशोधनं हितम् ।
ऊर्ध्वं चैवानुलोम्यं च यथादोषं यथाबलम् ॥ १६ ॥
संशोधन योग्य व्यक्ति—अपचन, अरुचि, मोटापा (स्थूलता ), पाण्डुता,
निस्तेज, पीलापन, शरीर का भारीपन, बिना परिश्रम के थकान चढ़ना, उदासी,
शरीर पर छोटी २ फुन्सियां होना, कोठ ( छप्पे ) उठना, खाज का होना,
बेचैनी, आलस्य, थकान, निर्बलता, शरीर से दुर्गन्ध आना, मन को अप्रसन्नता,
सुस्ती, कफ या पित्त का बढ़ना, नींद का न आना, अथवा नींद का बहुत