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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

पृष्ठ 216, कुल 639 में से

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पृष्ठ 216

१६८ चरकसंहिता [ अ० १६
आना, नपुंसकता, निरुत्साहता, बुद्धिमान्द्य बुरे भयानक स्वप्नों का आना, बल
और कान्ति का नाश होना, पुष्टिकारक आहार खाने पर शरीर का पुष्ट न होना,
जिसके शरीर में इनमें से बहुत से लक्षण हों तो उसमें सब दोष बढ़े हैं यह
समझकर संशोधन करना हितकारी है । इसलिये अविपाक आदि लक्षणों को
देख कर बल और दोष के अनुसार ऊर्ध्व अनुलोमन ( वमन ) या अधो-अनु-
लोमन ( विरेचन ) रूपी संशोधन देना हितकारी है ॥ १३-१६ ॥
एवं विशुद्धकोष्ठस्य कायाग्निरभिवर्धते ।
व्याधयश्चोपशाम्यन्ति प्रकृतिश्चानुवर्तते ॥ १७ ॥
इन्द्रियाणि मनो बुद्धिवर्णश्चास्य प्रसीदति ।
बलं पुष्टिर्पत्यं च वृषता चास्य जायते ॥ १८ ॥
जरां कृच्छ्रेण लभते चिरं जीवत्यनामयः ।
तस्मात्संशोधनं काले युक्तियुक्तं पिबेन्नरः ॥ १९ ॥
दोषाः कदाचित्कुप्यन्ति जिता लङ्घनपाचनैः ।
जिताः संशोधनैर्यै तु न तेषां पुनरुद्भवः ॥ २० ॥
दोषाणां च द्रुमाणां च मूलेऽनुपहते सति ।
रोगाणां प्रसवानां च गतानामागतिर्ध्रुवा ॥ २१ ॥
भेषजक्षपिते पथ्यमाहारैरेव बृंहणम् ।
घृत-मांस-रस-क्षीर-हृद्य-यूषोपसंहितैः ॥ २२ ॥
अभ्यङ्गोत्सादनैः स्नानैनिरूहैः सानुवासनैः ।
तथा स लभते शर्म युज्यते चाऽऽयुषा चिरम् ॥ २३ ॥
संशोधन का फल—इस उपरोक्त विधि से मनुष्य का कोष्ठ ( उदर ) साफ़
होने पर जाठराग्नि बढ़ जाती है, रोग शान्त हो जाते हैं, शरीर स्वाभाविक
अवस्था में आ जाता है । इन्द्रियां, मन-बुद्धि और कान्ति निर्मल हो जाती है ।
शरीर में बल, शक्ति, सामर्थ्य, संतान और पुरुषत्व उत्पन्न हो जाता है । बुढ़ापा
देर में आता है और नीरोगी होकर मनुष्य देर तक जीता है । इसलिये मनुष्य
दोष-संचयकाल में और संशोधन काल में वमन-विरेचन कार्य को युक्तियुक्त
रूप में करे । लंघन ( उपवास ) और पाचन रूपी संशमन क्रिया द्वारा वश में
किये हुए दोष कभी फिर भी ( समय मिलने पर ) कुपित हो सकते हैं; परन्तु
जो दोष संशोधन कार्य के द्वारा वश में कर लिये जाते हैं, वे फिर कभी भी
उत्पन्न नहीं हो सकते । क्योंकि—दोषों या वृक्षों का मूल अवशेष रहने पर रोगों
अथवा न नष्ट होने पर रोगों की उत्पत्ति फिर हो जानी सम्भव होती है । औषध
द्वारा दोष की जड़ कट जाने पर संशुद्ध हुए पुरुष को पथ्यकारक एवं शरीर