श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
सैंतीसवाँ सर्ग
सैंतीसवाँ सर्ग
श्रीरामका सभासदोंके साथ राजसभामें बैठना
ककुत्स्थकुलभूषण आत्मज्ञानी श्रीरामचन्द्रजीका धर्मपूर्वक राज्याभिषेक हो जानेपर पुरवासियोंका हर्ष बढ़ानेवाली उनकी पहली रात्रि व्यतीत हुई॥ १ ॥
वह रात बीतनेपर जब सबेरा हुआ, तब प्रातःकाल महाराज श्रीरामको जगानेवाले सौम्य वन्दीजन राजमहलमें उपस्थित हुए॥ २ ॥
उनके कण्ठ बड़े मधुर थे। वे संगीतकी कलामें किन्नरोंके समान सुशिक्षित थे। उन्होंने बड़े हर्षमें भरकर यथावत्-रूपसे वीर नरेश श्रीरघुनाथजीका स्तवन आरम्भ किया॥ ३ ॥
‘श्रीकौसल्याजीका आनन्द बढ़ानेवाले सौम्य-स्वरूप वीर श्रीरघुवीर! आप जागिये। महाराज! आपके सोये रहनेपर तो सारा जगत् ही सोया रहेगा (ब्राह्ममुहूर्तमें उठकर धर्मानुष्ठानमें नहीं लग सकेगा)॥ ४ ॥
‘आपका पराक्रम भगवान् विष्णुके समान तथा रूप अश्विनीकुमारोंके समान है। बुद्धिमें आप बृहस्पतिके तुल्य हैं और प्रजापालनमें साक्षात् प्रजापतिके सदृश हैं॥
‘आपकी क्षमा पृथिवीके समान और तेज भगवान् भास्करके समान है। वेग वायुके तुल्य और गम्भीरता समुद्रके सदृश है॥ ६ ॥
‘नरेश्वर! आप भगवान् शङ्करके समान युद्धमें अविचल हैं। आपकी-सी सौम्यता चन्द्रमामें ही पायी जाती है। आपके समान राजा न पहले थे और न भविष्यमें होंगे॥ ७ ॥
‘पुरुषोत्तम! आपको परास्त करना कठिन ही नहीं, असम्भव है। आप सदा धर्ममें संलग्न रहते हुए प्रजाके हित-साधनमें तत्पर रहते हैं, अतः कीर्ति और लक्ष्मी आपको कभी नहीं छोड़ती हैं॥ ८ ॥
‘ककुत्स्थकुलनन्दन! ऐश्वर्य और धर्म आपमें नित्य प्रतिष्ठित हैं।’ वन्दीजनोंने ये तथा और भी बहुत-सी सुमधुर स्तुतियाँ सुनायीं॥ ९ ॥
सूत भी दिव्य स्तुतियोंद्वारा श्रीरघुनाथजीको जगाते रहे। इस प्रकार सुनायी जाती हुई स्तुतियोंके द्वारा भगवान् श्रीराम जागे॥ १० ॥
जैसे पापहारी भगवान् नारायण सर्पशय्यासे उठते हैं, उसी प्रकार वे भी श्वेत बिछौनोंसे ढकी हुई शय्याको छोड़कर उठ बैठे॥ ११॥
महाराजके शय्यासे उठते ही सहस्रों सेवक विनयपूर्वक हाथ जोड़ उज्ज्वल पात्रोंमें जल लिये उनकी सेवामें उपस्थित हुए॥ १२॥
स्नान आदि करके शुद्ध हो उन्होंने समयपर अग्निमें आहुति दी और शीघ्र ही इक्ष्वाकुवंशियोंद्वारा सेवित पवित्र देवमन्दिरमें वे पधारे॥ १३॥
वहाँ देवताओं, पितरों और ब्राह्मणोंका विधिवत् पूजन करके वे अनेक कर्मचारियोंके साथ बाहरकी ड्योढ़ीमें आये॥ १४॥
इसी समय प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी वसिष्ठ आदि सभी महात्मा मन्त्री और पुरोहित वहाँ उपस्थित हुए॥ १५॥
तत्पश्चात् अनेकानेक जनपदोंके स्वामी महामनस्वी क्षत्रिय श्रीरामचन्द्रजीके पास उसी तरह आकर बैठे, जैसे इन्द्रके समीप देवतालोग आकर बैठा करते हैं॥ १६॥
महायशस्वी भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न—ये तीनों भाई बड़े हर्षके साथ उसी तरह भगवान् श्रीरामकी सेवामें उपस्थित रहते थे, जैसे तीनों वेद यज्ञकी॥ १७॥
इसी समय मुदित नामसे प्रसिद्ध बहुत-से सेवक भी, जिनके मुखपर प्रसन्नता खेलती रहती थी, हाथ जोड़े सभाभवनमें आये और श्रीरघुनाथजीके पास बैठ गये॥ १८॥
फिर महापराक्रमी महातेजस्वी तथा इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले सुग्रीव आदि बीस* वानर भगवान् श्रीरामके समीप आकर बैठे॥ १९॥
अपने चार राक्षस मन्त्रियोंसे घिरे हुए विभीषण भी उसी प्रकार महात्मा श्रीरामकी सेवामें उपस्थित हुए, जैसे गुह्यकगण धनपति कुबेरकी सेवामें उपस्थित होते हैं॥ २०॥
जो लोग शास्त्रज्ञानमें बढ़े-चढ़े और कुलीन थे, वे चतुर मनुष्य भी महाराजको मस्तक झुकाकर प्रणाम करके वहाँ बैठ गये॥ २१॥
इस प्रकार बहुत-से श्रेष्ठ एवं तेजस्वी महर्षि, महापराक्रमी राजा, वानर और राक्षसोंसे घिरे राजसभामें बैठे हुए श्रीरघुनाथजी बड़ी शोभा पा रहे थे॥ २२॥
जैसे देवराज इन्द्र सदा ऋषियोंसे सेवित होते हैं, उसी तरह महर्षि-मण्डलीसे घिरे हुए श्रीरामचन्द्रजी उस समय सहस्रलोचन इन्द्रसे भी अधिक शोभा पा रहे थे॥ २३॥
जब सब लोग यथास्थान बैठ गये, तब पुराणवेत्ता महात्मा लोग भिन्न-भिन्न धर्म-कथाएँ कहने लगे*॥ २४ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें सैंतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३७॥
* सुग्रीव, अङ्गद, हनुमान्, जाम्बवान्, सुषेण, तार, नील, नल, मैन्द, द्विविद, कुमुद, शरभ, शतबलि, गन्धमादन, गज, गवाक्ष, गवय, धूम्र, रम्भ तथा ज्योतिर्मुख—ये प्रधान-प्रधान वानर-वीर बीसकी संख्यामें उपस्थित थे।
* इस सर्गके बाद कुछ प्रतियोंमें प्रक्षिप्त रूपसे पाँच सर्ग और उपलब्ध होते हैं, जिनमें वाली और सुग्रीवकी उत्पत्तिका तथा रावणके श्वेतद्वीपमें गमनका इतिहास वर्णित है। इस इतिहासके वक्ता भी अगस्त्यजी ही हैं। परंतु इसके पहले सर्गमें ही अगस्त्यजीके विदा होनेका वर्णन आ गया है; अतः यहाँ इन सर्गोंका उल्लेख असङ्गत प्रतीत होता है। इसीलिये ये सर्ग यहाँ नहीं लिये गये हैं।