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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

सैंतालीसवाँ सर्ग

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सैंतालीसवाँ सर्ग

दितिका अपने पुत्रोंको मरुद्गण बनाकर देवलोकमें रखनेके लिये इन्द्रसे अनुरोध, इन्द्रद्वारा उसकी स्वीकृति, दितिके तपोवनमें ही इक्ष्वाकु-पुत्र विशालद्वारा विशाला नगरीका निर्माण तथा वहाँके तत्कालीन राजा सुमतिद्वारा विश्वामित्र मुनिका सत्कार

इन्द्रद्वारा अपने गर्भके सात टुकड़े कर दिये जानेपर देवी दितिको बड़ा दुःख हुआ। वे दुर्धर्ष वीर सहस्राक्ष इन्द्रसे अनुनयपूर्वक बोलीं— ॥ १ ॥

‘देवेश! बलसूदन! मेरे ही अपराधसे इस गर्भके सात टुकड़े हुए हैं। इसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं है॥ २ ॥

‘इस गर्भको नष्ट करनेके निमित्त तुमने जो क्रूरतापूर्ण कर्म किया है, वह तुम्हारे और मेरे लिये भी जिस तरह प्रिय हो जाय—जैसे भी उसका परिणाम तुम्हारे और मेरे लिये सुखद हो जाय, वैसा उपाय मैं करना चाहती हूँ। मेरे गर्भके वे सातों खण्ड सात व्यक्ति होकर सातों मरुद्गणोंके स्थानोंका पालन करनेवाले हो जायँ॥ ३ ॥

‘बेटा! ये मेरे दिव्य रूपधारी पुत्र ‘मारुत’ नामसे प्रसिद्ध होकर आकाशमें जो सुविख्यात सात वातस्कन्ध* हैं, उनमें विचरें॥ ४ ॥

‘(ऊपर जो सात मरुत् बताये गये हैं, वे सात-सातके गण हैं। इस प्रकार उनचास मरुत् समझने चाहिये। इनमेंसे) जो प्रथम गण है, वह ब्रह्मलोकमें विचरे, दूसरा इन्द्रलोकमें विचरण करे तथा तीसरा महायशस्वी मरुद्गण दिव्य वायुके नामसे विख्यात हो अन्तरिक्षमें बहा करे॥ ५ ॥

‘सुरश्रेष्ठ! तुम्हारा कल्याण हो। मेरे शेष चार पुत्रोंके गण तुम्हारी आज्ञासे समयानुसार सम्पूर्ण दिशाओंमें संचार करेंगे। तुम्हारे ही रखे हुए नामसे (तुमने जो ‘मा रुदः’ कहकर उन्हें रोनेसे मना किया था, उसी ‘मा रुदः’—इस वाक्यसे) वे सब-के-सब मारुत कहलायेंगे। मारुत नामसे ही उनकी प्रसिद्धि होगी’॥ ६ १/२ ॥

दितिका वह वचन सुनकर बल दैत्यको मारनेवाले सहस्राक्ष इन्द्रने हाथ जोड़कर यह बात कही— ॥ ७ १/२ ॥

‘मा! तुम्हारा कल्याण हो। तुमने जैसा कहा है, वह सब वैसा ही होगा; इसमें संशय नहीं है। तुम्हारे ये पुत्र देवरूप होकर विचरेंगे’॥ ८ १/२ ॥

श्रीराम! उस तपोवनमें ऐसा निश्चय करके वे दोनों माता-पुत्र—दिति और इन्द्र कृतकृत्य हो स्वर्गलोकको चले गये—ऐसा हमने सुन रखा है॥ ९ १/२ ॥

काकुत्स्थ! यही वह देश है, जहाँ पूर्वकालमें रहकर देवराज इन्द्रने तपःसिद्ध दितिकी परिचर्या की थी॥ १० १/२ ॥

पुरुषसिंह! पूर्वकालमें महाराज इक्ष्वाकुके एक परम धर्मात्मा पुत्र थे, जो विशाल नामसे प्रसिद्ध हुए। उनका जन्म अलम्बुषाके गर्भसे हुआ था। उन्होंने इस स्थानपर विशाला नामकी पुरी बसायी थी॥ ११-१२ ॥

श्रीराम! विशालके पुत्रका नाम था हेमचन्द्र, जो बड़े बलवान् थे। हेमचन्द्रके पुत्र सुचन्द्र नामसे विख्यात हुए॥ १३ ॥

श्रीरामचन्द्र! सुचन्द्रके पुत्र धूम्राश्व और धूम्राश्वके पुत्र सृंजय हुए॥ १४ ॥

सृंजयके प्रतापी पुत्र श्रीमान् सहदेव हुए। सहदेवके परम धर्मात्मा पुत्रका नाम कुशाश्व था॥ १५ ॥

कुशाश्वके महातेजस्वी पुत्र प्रतापी सोमदत्त हुए और सोमदत्तके पुत्र काकुत्स्थ नामसे विख्यात हुए॥ १६ ॥

काकुत्स्थके महातेजस्वी पुत्र सुमति नामसे प्रसिद्ध हैं; जो परम कान्तिमान् एवं दुर्जय वीर हैं। वे ही इस समय इस पुरीमें निवास करते हैं॥ १७ ॥

महाराज इक्ष्वाकुके प्रसादसे विशालाके सभी नरेश दीर्घायु, महात्मा, पराक्रमी और परम धार्मिक होते आये हैं॥ १८ ॥

नरश्रेष्ठ! आज एक रात हमलोग यहीं सुखपूर्वक शयन करेंगे; फिर कल प्रातःकाल यहाँसे चलकर तुम मिथिलामें राजा जनकका दर्शन करोगे॥ १९ ॥

नरेशोंमें श्रेष्ठ, महातेजस्वी, महायशस्वी राजा सुमति विश्वामित्रजीको पुरीके समीप आया हुआ सुनकर उनकी अगवानीके लिये स्वयं आये॥ २० ॥

अपने पुरोहित और बन्धु-बान्धवोंके साथ राजाने विश्वामित्रजीकी उत्तम पूजा करके हाथ जोड़ उनका कुशल-समाचार पूछा और उनसे इस प्रकार कहा—॥

‘मुने! मैं धन्य हूँ। आपका मुझपर बड़ा अनुग्रह है; क्योंकि आपने स्वयं मेरे राज्यमें पधारकर मुझे दर्शन दिया। इस समय मुझसे बढ़कर धन्य पुरुष दूसरा कोर्ऽइ नहीं है’॥ २२ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें सैंतालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४७॥


* आवह, प्रवह, संवह, उद्वह, विवह, परिवह और परावह—ये सात मरुत् हैं। इन्हींको सात वातस्कन्ध कहते हैं।