श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
सरसठवाँ सर्ग
सरसठवाँ सर्ग
हनुमान्जीका भगवान् श्रीरामको सीताका संदेश सुनाना
महात्मा श्रीरघुनाथजीके ऐसा कहनेपर श्रीहनुमान्जीने सीताजीकी कही हुई सब बातें उनसे निवेदन कर दीं॥ १ ॥
वे बोले— 'पुरुषोत्तम! जानकी देवीने पहले चित्रकूटपर बीती हुई एक घटनाका यथावत् रूपसे वर्णन किया था। उसे उन्होंने पहचानके तौरपर इस प्रकार कहा था॥ २ ॥
'पहले चित्रकूटमें कभी जानकी देवी आपके साथ सुखपूर्वक सोयी थीं। वे सोकर आपसे पहले उठ गयीं। उस समय किसी कौएने सहसा उड़कर उनकी छातीमें चोंच मार दी॥ ३ ॥
'भरताग्रज! आपलोग बारी-बारीसे एक-दूसरेके अङ्कमें सिर रखकर सोते थे। जब आप देवीके अङ्कमें मस्तक रखकर सोये थे, उस समय पुनः उसी पक्षीने आकर देवीको कष्ट देना आरम्भ किया॥ ४ ॥
'कहते हैं उसने फिर आकर जोरसे चोंच मार दी। तब देवीके शरीरसे रक्त बहने लगा और उससे भीग जानेके कारण आप जग उठे॥ ५ ॥
'शत्रुओंको संताप देनेवाले रघुनन्दन! उस कौएने जब लगातार इस तरह पीड़ा दी, तब देवी सीताने सुखसे सोये हुए आपको जगा दिया॥ ६ ॥
'महाबाहो! उनकी छातीमें घाव हुआ देख आप विषधर सर्पके समान कुपित हो उठे और इस प्रकार बोले— ॥ ७ ॥
'भीरु! किसने अपने नखोंके अग्रभागसे तुम्हारी छातीमें घाव कर दिया है? कौन कुपित हुए पाँच मुँहवाले सर्पके साथ खेल रहा है?' ॥ ८ ॥
'ऐसा कहकर आपने जब सहसा इधर-उधर दृष्टि डाली, तब उस कौएको देखा। उसके तीखे पंजे खूनमें रँगे हुए थे और वह सीता देवीकी ओर मुँह करके ही कहीं बैठा था॥ ९ ॥
सुना है, उड़नेवालोंमें श्रेष्ठ वह कौआ साक्षात् इन्द्रका पुत्र था, जो उन दिनों पृथ्वीपर विचर रहा था। वह वायुदेवताके समान शीघ्रगामी था॥ १० ॥
'मतिमानोंमें श्रेष्ठ महाबाहो! उस समय आपके नेत्र क्रोधसे घूमने लगे और आपने उस कौएको कठोर दण्ड देनेका विचार किया॥ ११ ॥
‘आपने अपनी चटाईमेंसे एक कुशा निकालकर हाथमें ले लिया और उसे ब्रह्मास्त्रसे अभिमन्त्रित किया। फिर तो वह कुश प्रलयकालकी अग्निके समान प्रज्वलित हो उठा। उसका लक्ष्य वह कौआ ही था॥ १२ ॥
‘आपने उस जलते हुए कुशको कौएकी ओर छोड़ दिया। फिर तो वह दीप्तिमान् दर्भ उस कौएका पीछा करने लगा॥ १३ ॥
‘आपके भयसे डरे हुए समस्त देवताओंने भी उस कौएको त्याग दिया। वह तीनों लोकोंमें चक्कर लगाता फिरा, किंतु कहीं भी उसे कोई रक्षक नहीं मिला॥ १४ ॥
‘शत्रुदमन श्रीराम! सब ओरसे निराश होकर वह कौआ फिर वहीं आपकी शरणमें आया। शरणमें आकर पृथ्वीपर पड़े हुए उस कौएको आपने शरणमें ले लिया; क्योंकि आप शरणागतवत्सल हैं। यद्यपि वह वधके योग्य था तो भी आपने कृपापूर्वक उसकी रक्षा की॥ १५ १/२ ॥
‘रघुनन्दन! उस ब्रह्मास्त्रको व्यर्थ नहीं किया जा सकता था, इसलिये आपने उस कौएकी दाहिनी आँख फोड़ डाली॥ १६ १/२ ॥
‘श्रीराम! तदनन्तर आपसे विदा ले वह कौआ भूतलपर आपको और स्वर्गमें राजा दशरथको नमस्कार करके अपने घरको चला गया॥ १७ १/२ ॥
‘(सीता कहती हैं—) ‘रघुनन्दन! इस प्रकार अस्त्रवेत्ताओंमें श्रेष्ठ, शक्तिशाली और शीलवान् होते हुए भी आप राक्षसोंपर अपने अस्त्रका प्रयोग क्यों नहीं करते हैं ?॥ १८ १/२ ॥
‘श्रीराम! दानव, गन्धर्व, असुर और देवता कोई भी समराङ्गणमें आपका सामना नहीं कर सकते॥ १९ १/२ ॥
‘आप बल-पराक्रमसे सम्पन्न हैं। यदि मेरे प्रति आपका कुछ भी आदर है तो आप शीघ्र ही अपने तीखे बाणोंसे रणभूमिमें रावणको मार डालिये॥ २० १/२ ॥
‘हनुमन्! अथवा अपने भाईकी आज्ञा लेकर शत्रुओंको संताप देनेवाले रघुकुलतिलक नरश्रेष्ठ लक्ष्मण क्यों नहीं मेरी रक्षा करते हैं?॥ २१ १/२ ॥
‘वे दोनों पुरुषसिंह श्रीराम और लक्ष्मण वायु तथा अग्निके तुल्य तेजस्वी एवं शक्तिशाली हैं, देवताओंके लिये भी दुर्जय हैं; फिर किसलिये मेरी उपेक्षा कर रहे हैं?॥ २२ १/२ ॥
‘इसमें संदेह नहीं कि मेरा ही कोई ऐसा महान् पाप है, जिसके कारण वे दोनों शत्रुसंतापी वीर एक साथ रहकर समर्थ होते हुए मेरी रक्षा नहीं कर रहे हैं’॥ २३१/२ ॥
‘रघुनन्दन! विदेहनन्दिनीका करुणाजनक उत्तम वचन सुनकर मैंने पुनः आर्या सीतासे यह बात कही—॥
‘देवि! मैं सत्यकी शपथ खाकर कहता हूँ कि श्रीरामचन्द्रजी तुम्हारे शोकके कारण ही सब कार्योंसे विरत हो रहे हैं। श्रीरामके दुःखी होनेसे लक्ष्मण भी संतप्त हो रहे हैं॥ २५१/२ ॥
‘किसी तरह आपका दर्शन हो गया (आपके निवास-स्थानका पता लग गया), अतः अब शोक करनेका अवसर नहीं है। भामिनि! आप इसी मुहूर्तमें अपने सारे दुःखोंका अन्त हुआ देखेंगी॥ २६१/२ ॥
‘शत्रुओंको संताप देनेवाले वे दोनों नरश्रेष्ठ राजकुमार आपके दर्शनके लिये उत्साहित हो लङ्कापुरीको जलाकर भस्म कर देंगे॥ २७१/२ ॥
‘वरारोहे! समराङ्गणमें रौद्र राक्षस रावणको बन्धु-बान्धवोंसहित मारकर रघुनाथजी अवश्य ही आपको अपनी पुरीमें ले जायँगे॥ २८१/२ ॥
‘सती-साध्वी देवि! अब आप मुझे कोई ऐसी पहचान दीजिये, जिसे श्रीरामचन्द्रजी जानते हों और जो उनके मनको प्रसन्न करनेवाला हो॥ २९१/२ ॥
‘महाबली वीर! तब उन्होंने चारों ओर देखकर वेणीमें बाँधने योग्य इस उत्तम मणिको अपने वस्त्रसे खोलकर मुझे दे दिया॥ ३०१/२ ॥
‘रघुवंशियोंके प्रियतम श्रीराम! आपके लिये इस मणिको दोनों हाथोंमें लेकर मैंने सीतादेवीको मस्तक झुकाकर प्रणाम किया और यहाँ आनेके लिये मैं उतावला हो उठा॥ ३११/२ ॥
‘लौटनेके लिये उत्साहित हो मुझे अपने शरीरको बढ़ाते देख सुन्दरी जनकनन्दिनी सीता बहुत दुःखी हो गयीं। उनके मुखपर आँसुओंकी धारा बह चली। मेरी उछलनेकी तैयारीसे वे घबरा गयीं और शोकके वेगसे आहत हो उठीं। उस समय उनका स्वर अश्रुगद्गद हो गया था। वे मुझसे कहने लगीं— ‘महाकपे! तुम बड़े भाग्यशाली हो, जो मेरे महाबाहु प्रियतम कमलनयन श्रीरामको तथा मेरे यशस्वी देवर महाबाहु लक्ष्मणको भी अपनी आँखोंसे देखोगे’॥ ३२—३५ ॥
‘सीताजीके ऐसा कहनेपर मैंने उन मिथिलेशकुमारीसे कहा— ‘देवि! जनकनन्दिनी! आप शीघ्र मेरी पीठपर चढ़ जाइये। महाभागे! श्यामलोचने! मैं अभी सुग्रीव और लक्ष्मणसहित आपके पतिदेव श्रीरघुनाथजीका आपको दर्शन कराता हूँ’॥ ३६-३७ ॥
‘यह सुनकर सीतादेवी मुझसे बोलीं— ‘महाकपे! वानरशिरोमणे! मेरा यह धर्म नहीं है कि मैं अपने वशमें होती हुई भी स्वेच्छासे तुम्हारी पीठका आश्रय लूँ॥ ३८ ॥
‘वीर! पहले जो राक्षस रावणके द्वारा मेरे अङ्गोंका स्पर्श हो गया, उस समय वहाँ मैं क्या कर सकती थी? मुझे तो कालने ही पीड़ित कर रखा था। अतः वानरप्रवर ! जहाँ वे दोनों राजकुमार हैं, वहाँ तुम जाओ’॥ ३९१/२ ॥
‘ऐसा कहकर वे फिर मुझे संदेश देने लगीं— ‘हनुमन्! सिंहके समान पराक्रमी उन दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मणसे, मन्त्रियोंसहित सुग्रीवसे तथा अन्य सब लोगोंसे भी मेरा कुशल-समाचार कहना और उनका पूछना॥
‘तुम वहाँ ऐसी बात कहना, जिससे महाबाहु रघुनाथजी इस दुःखसागरसे मेरा उद्धार करें॥ ४२ ॥
‘वानरोंके प्रमुख वीर! मेरे इस तीव्र शोक-वेगको तथा इन राक्षसोंद्वारा जो मुझे डराया-धमकाया जाता है, इसको भी उन श्रीरामचन्द्रजीके पास जाकर कहना। तुम्हारा मार्ग मङ्गलमय हो’॥ ४३ ॥
‘नरेश्वर! आपकी प्रियतमा संयमशीला आर्या सीताने बड़े विषादके साथ ये सारी बातें कही हैं। मेरी कही हुई इन सब बातोंपर विचार करके आप विश्वास करें कि सतीशिरोमणि सीता सकुशल हैं’॥ ४४ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके सुन्दरकाण्डमें सरसठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ६७ ॥