श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
सत्तानबेवाँ सर्ग
सत्तानबेवाँ सर्ग
सीताका शपथ-ग्रहण और रसातलमें प्रवेश
महर्षि वाल्मीकिके ऐसा कहनेपर श्रीरघुनाथजी सुन्दरी सीतादेवीकी ओर एक बार दृष्टि डालकर उस जनसमुदायके बीच हाथ जोड़कर बोले— ॥ १ ॥
‘महाभाग! आप धर्मके ज्ञाता हैं। सीताके सम्बन्धमें आप जैसा कह रहे हैं, वह सब ठीक है। ब्रह्मन्! आपके इन निर्दोष वचनोंसे मुझे जनकनन्दिनीकी शुद्धतापर पूरा विश्वास हो गया है॥ २ ॥
‘एक बार पहले भी देवताओंके समीप विदेह-कुमारीकी शुद्धताका विश्वास मुझे प्राप्त हो चुका है। उस समय सीताने अपनी शुद्धिके लिये शपथ की थी, जिसके कारण मैंने इन्हें अपने भवनमें स्थान दिया॥ ३ ॥
‘किंतु आगे चलकर फिर बड़े जोरका लोकापवाद उठा, जिससे विवश होकर मुझे मिथिलेशकुमारीका त्याग करना पड़ा। ब्रह्मन्! यह जानते हुए भी कि सीता सर्वथा निष्पाप हैं, मैंने केवल समाजके भयसे इन्हें छोड़ दिया था; अतः आप मेरे इस अपराधको क्षमा करें॥ ४ ॥
‘मैं यह भी जानता हूँ कि ये जुड़वे उत्पन्न हुए कुमार कुश और लव मेरे ही पुत्र हैं, तथापि जनसमुदायमें शुद्ध प्रमाणित होनेपर ही मिथिलेशकुमारीमें मेरा प्रेम हो सकता है’॥ ५ ॥
श्रीरामचन्द्रजीके अभिप्रायको जानकर सीताके शपथके समय महेन्द्र आदि सभी मुख्य-मुख्य महा-तेजस्वी देवता पितामह ब्रह्माजीको आगे करके वहाँ आ गये॥ ६ १/२ ॥
आदित्य, वसु, रुद्र, विश्वेदेव, मरुद्गण, समस्त साध्यदेव, सभी महर्षि, नाग, गरुड़ और सम्पूर्ण सिद्धगण प्रसन्नचित्त हो सीताजीके शपथ-ग्रहणको देखनेके लिये घबराये हुए-से वहाँ आ पहुँचे॥ ७-८ १/२ ॥
देवताओं तथा ऋषियोंको उपस्थित देख श्रीरघुनाथजी फिर बोले—‘सुरश्रेष्ठगण! यद्यपि मुझे महर्षि वाल्मीकिके निर्दोष वचनोंसे ही पूरा विश्वास हो गया है, तथापि जन-समाजके बीच विदेहकुमारीकी विशुद्धता प्रमाणित हो जानेपर मुझे अधिक प्रसन्नता होगी’॥ ९-१० ॥
तदनन्तर दिव्य सुगन्धसे परिपूर्ण, मनको आनन्द देनेवाले परम पवित्र एवं शुभकारक सुरश्रेष्ठ वायुदेव मन्दगतिसे प्रवाहित हो सब ओरसे वहाँके जनसमुदायको आह्लाद प्रदान करने
लगे॥ ११ ॥
समस्त राष्ट्रोंसे आये हुए मनुष्योंने एकाग्रचित्त हो प्राचीन कालके सत्ययुगकी भाँति यह अद्भुत और अचिन्त्य-सी घटना अपनी आँखों देखी॥ १२ ॥
उस समय सीताजी तपस्विनियोंके अनुरूप गेरुआ वस्त्र धारण किये हुए थीं। सबको उपस्थित जानकर वे हाथ जोड़े, दृष्टि और मुखको नीचे किये बोलीं— ॥ १३ ॥
‘मैं श्रीरघुनाथजीके सिवा दूसरे किसी पुरुषका (स्पर्श तो दूर रहा) मनसे चिन्तन भी नहीं करती; यदि यह सत्य है तो भगवती पृथ्वीदेवी मुझे अपनी गोदमें स्थान दें॥ १४ ॥
‘यदि मैं मन, वाणी और क्रियाके द्वारा केवल श्रीरामकी ही आराधना करती हूँ तो भगवती पृथ्वीदेवी मुझे अपनी गोदमें स्थान दें॥ १५ ॥
‘भगवान् श्रीरामको छोड़कर मैं दूसरे किसी पुरुषको नहीं जानती, मेरी कही हुई यह बात यदि सत्य हो तो भगवती पृथ्वीदेवी मुझे अपनी गोदमें स्थान दें’॥ १६ ॥
विदेहकुमारी सीताके इस प्रकार शपथ करते ही भूतलसे एक अद्भुत सिंहासन प्रकट हुआ, जो बड़ा ही सुन्दर और दिव्य था॥ १७ ॥
दिव्य रत्नोंसे विभूषित महापराक्रमी नागोंने दिव्य रूप धारण करके उस दिव्य सिंहासनको अपने सिरपर धारण कर रखा था॥ १८ ॥
सिंहासनके साथ ही पृथ्वीकी अधिष्ठात्री देवी भी दिव्य रूपसे प्रकट हुईं। उन्होंने मिथिलेशकुमारी सीताको अपनी दोनों भुजाओंसे गोदमें उठा लिया और स्वागतपूर्वक उनका अभिनन्दन करके उन्हें उस सिंहासनपर बिठा दिया॥
सिंहासनपर बैठकर जब सीतादेवी रसातलमें प्रवेश करने लगीं, उस समय देवताओंने उनकी ओर देखा। फिर तो आकाशसे उनके ऊपर दिव्य पुष्पोंकी लगातार वर्षा होने लगी॥ २० ॥
देवताओंके मुँहसे सहसा ‘धन्य-धन्य’ का महान् शब्द प्रकट हुआ। वे कहने लगे—‘सीते! तुम धन्य हो, धन्य हो। तुम्हारा शील-स्वभाव इतना सुन्दर और ऐसा पवित्र है’॥ २१ ॥
सीताका रसातलमें प्रवेश देखकर आकाशमें खड़े हुए देवता प्रसन्नचित्त हो इस तरहकी बहुत-सी बातें कहने लगे॥ २२ ॥
यज्ञमण्डपमें पधारे हुए सभी मुनि और नरश्रेष्ठ नरेश भी आश्चर्यसे भर गये॥ २३ ॥
अन्तरिक्षमें और भूतलपर सभी चराचर प्राणी तथा पातालमें विशालकाय दानव और नागराज भी आश्चर्यचकित हो उठे॥ २४ ॥
कोई हर्षनाद करने लगे, कोई ध्यानमग्न हो गये, कोई श्रीरामकी ओर देखने लगे और कोई हक्के-बक्के-से होकर सीताजीकी ओर निहारने लगे॥ २५ ॥
सीताका भूतलमें प्रवेश देखकर वहाँ आये हुए सब लोग हर्ष, शोक आदिमें डूब गये। दो घड़ीतक वहाँका सारा जनसमुदाय अत्यन्त मोहाच्छन्न-सा हो गया॥ २६ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें सत्तानबेवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ९७ ॥