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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

बासठवाँ सर्ग

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बासठवाँ सर्ग

श्रीरामका ऋषियोंसे लवणासुरके आहार-विहारके विषयमें पूछना और शत्रुघ्नकी रुचि जानकर उन्हें लवण-वधके कार्यमें नियुक्त करना

ऋषियोंके इस प्रकार कहनेपर श्रीरामचन्द्रजीने उनसे हाथ जोड़कर पूछा—‘लवणासुर क्या खाता है? उसका आचार-व्यवहार कैसा है—रहने-सहनेका ढंग क्या है? और वह कहाँ रहता है?’॥ १ ॥

श्रीरघुनाथजीकी यह बात सुनकर उन सभी ऋषियोंने जिस तरहके आहार-व्यवहारसे लवणासुर पला था, वह सब कह सुनाया॥ २ ॥

वे बोले— ‘प्रभो! उसका आहार तो सभी प्राणी हैं; परंतु विशेषतः वह तपस्वी मुनियोंको खाता है। उसके आचार-व्यवहारमें बड़ी क्रूरता और भयानकता है और वह सदा मधुवनमें निवास करता है॥ ३ ॥

‘वह प्रतिदिन कँइ सहस्र सिंह, व्याघ्र, मृग, पक्षी और मनुष्योंको मारकर खा जाता है॥ ४ ॥

‘संहारकाल आनेपर मुँह बाकर खड़े हुए यमराजके समान वह महाबली असुर दूसरे-दूसरे जीवोंको भी खाता रहता है’॥ ५ ॥

उनका यह कथन सुनकर श्रीरघुनाथजीने उन महामुनियोंसे कहा—‘महर्षियो! मैं उस राक्षसको मरवा डालूँगा। आपलोगोंका भय दूर हो जाना चाहिये’॥ ६ ॥

इस प्रकार उन उग्र तेजस्वी मुनियोंके समक्ष प्रतिज्ञा करके रघुकुलनन्दन श्रीरामने वहाँ एकत्र हुए अपने सब भाइयोंसे पूछा—॥ ७ ॥

‘बन्धुओ! लवणको कौन वीर मारेगा? उसे किसके हिस्सेमें रखा जाय—महाबाहु भरतके या बुद्धिमान् शत्रुघ्नके’॥

रघुनाथजीके इस प्रकार पूछनेपर भरतजी बोले— ‘भैया! मैं इस लवणका वध करूँगा। इसे मेरे हिस्सेमें रखा जाय’॥ ९ ॥

भरतजीके ये धीरता और वीरतापूर्ण शब्द सुनकर शत्रुघ्नजी सोनेका सिंहासन छोड़कर खड़े हो गये और महाराज श्रीरामको प्रणाम करके बोले—‘रघुनन्दन! महाबाहु मझले भैया तो बहुत-

से कार्य कर चुके हैं॥

‘पहले जब अयोध्यापुरी आपसे सूनी हो गयी थी, उस समय आपके आगमन-कालतक हृदयमें अत्यन्त संताप लिये इन्होंने अयोध्यापुरीका पालन किया था॥ १२ ॥

‘पृथ्वीनाथ! महायशस्वी भरतने नन्दिग्राममें दुःखद शय्यापर सोते हुए पहले बहुत-से दुःख भोगे हैं। ये फल-मूल खाकर रहते थे और सिरपर जटा बढ़ाये चीर वस्त्र धारण करते थे॥ १३ १/२ ॥

‘महाराज! ऐसे-ऐसे दुःख भोगकर ये रघुकुलनन्दन भरत मुझ सेवकके रहते हुए अब फिर अधिक क्लेश न उठावें’॥ १४ १/२ ॥

शत्रुघ्नके ऐसा कहनेपर श्रीरघुनाथजी फिर बोले— ‘काकुत्स्थ! तुम जैसा कहते हो, वैसा ही हो। तुम्हीं मेरे इस आदेशका पालन करो। मैं तुम्हें मधुके सुन्दर नगरमें राजाके पदपर अभिषिक्त करूँगा॥ १५-१६ ॥

‘महाबाहो! यदि तुम भरतको क्लेश देना ठीक नहीं समझते तो इनको यहीं रहने दो। तुम शूरवीर हो, अस्त्र-विद्याके ज्ञाता हो तथा तुममें नूतन नगर निर्माण करनेकी शक्ति है॥ १७ ॥

‘तुम यमुनाजीके तटपर सुन्दर नगर बसा सकते हो और उत्तमोत्तम जनपदोंकी स्थापना कर सकते हो। जो किसी राजाके वंशका उच्छेद करके उसकी राजधानीमें दूसरे राजाको स्थापित नहीं करता, वह नरकमें पड़ता है॥

‘अतः तुम मधुके पुत्र पापात्मा लवणासुरको मारकर धर्मपूर्वक वहाँके राज्यका शासन करो। शूरवीर! यदि तुम मेरी बात मानने योग्य समझो तो मैं जो कुछ कहता हूँ, उसे चुपचाप स्वीकार करो। बीचमें बात काटकर कोई उत्तर तुम्हें नहीं देना चाहिये। बालकको अवश्य ही अपने बड़ोंकी आज्ञाका पालन करना चाहिये। शत्रुघ्न! वसिष्ठ आदि मुख्य-मुख्य ब्राह्मण विधि और मन्त्रोच्चारणके साथ तुम्हारा अभिषेक करेंगे। मेरी आज्ञासे प्राप्त हुए इस अभिषेकको तुम स्वीकार करो’॥ १९—२१ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें बासठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ६२॥