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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

बावनवाँ सर्ग

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बावनवाँ सर्ग

धूम्राक्षका युद्ध और हनुमान्‌जीके द्वारा उसका वध

भयंकर पराक्रमी निशाचर धूम्राक्षको निकलते देख युद्धकी इच्छा रखनेवाले समस्त वानर हर्ष और उत्साहसे भरकर सिंहनाद करने लगे॥ १ ॥

उस समय उन वानरों और राक्षसोंमें अत्यन्त भयंकर युद्ध छिड़ गया। वे घोर वृक्षों तथा शूलों और मुद्गरोंसे एक-दूसरेको चोट पहुँचाने लगे॥ २ ॥

राक्षसोंने चारों ओरसे घोर वानरोंको काटना आरम्भ किया तथा वानरोंने भी राक्षसोंको वृक्षोंसे मार-मारकर धराशायी कर दिया॥ ३ ॥

क्रोधसे भरे हुए राक्षसोंने अपने कङ्कपत्रयुक्त, सीधे जानेवाले, घोर एवं तीखे बाणोंसे वानरोंको गहरी चोट पहुँचायी॥ ४ ॥

राक्षसोंद्वारा भयंकर गदाओं, पट्टिशों, कूट, मुद्गरों, घोर परिघों और हाथमें लिये हुए विचित्र त्रिशूलोंसे विदीर्ण किये जाते हुए वे महाबली वानर अमर्षजनित उत्साहसे निर्भयकी भाँति महान् कर्म करने लगे॥ ५-६ ॥

बाणोंकी चोटसे उनके शरीर छिद गये थे। शूलोंकी मारसे देह विदीर्ण हो गयी थी। इस अवस्थामें उन वानर-यूथपतियोंने हाथोंमें वृक्ष और शिलाएँ उठायीं॥

उस समय उनका वेग बड़ा भयंकर था। वे जोर-जोरसे गर्जना करते हुए जहाँ-तहाँ वीर राक्षसोंको पटक-पटककर मथने लगे और अपने नामोंकी भी घोषणा करने लगे॥ ८ ॥

नाना प्रकारकी शिलाओं और बहुत-सी शाखावाले वृक्षोंके प्रहारसे वहाँ वानरों और राक्षसोंमें घोर एवं अद्भुत युद्ध होने लगा॥ ९ ॥

विजयोल्लाससे सुशोभित होनेवाले वानरोंने कितने ही राक्षसोंको मसल डाला। कितने ही रक्तभोजी राक्षस उनकी मार खाकर अपने मुखोंसे रक्त वमन करने लगे॥ १० ॥

कुछ राक्षसोंकी पसलियाँ फाड़ डाली गयीं। कितने ही वृक्षोंकी चोट खाकर ढेर हो गये, किन्हींका पत्थरोंकी चोटोंसे चूर्ण बन गया और कितने ही दाँतोंसे विदीर्ण कर दिये गये॥ ११ ॥

कितनोंके ध्वज खण्डित करके मसल डाले गये। तलवारें छीनकर नीचे गिरा दी गयीं और रथ चौपट कर दिये गये। इस प्रकार दुर्दशामें पड़कर बहुत-से राक्षस व्यथित हो गये॥ १२ ॥

वानरोंके चलाये हुए पर्वत-शिखरोंसे कुचल डाले गये पर्वताकार गजराजों, घोड़ों और घुड़सवारोंसे वह सारी रणभूमि पट गयी॥ १३ ॥

भयानक पराक्रम प्रकट करनेवाले वेगशाली वानर उछल-उछलकर अपने पंजोंसे राक्षसोंके मुँह नोच लेते या विदीर्ण कर देते थे॥ १४ ॥

उन राक्षसोंके मुखोंपर विषाद छा जाता। उनके बाल सब ओर बिखर जाते और रक्तकी गन्धसे मूर्च्छित हो पृथ्वीपर पड़ जाते थे॥ १५ ॥

दूसरे भीषण पराक्रमी राक्षस अत्यन्त क्रुद्ध हो अपने वज्रसदृश कठोर तमाचोंसे मारते हुए वहाँ वानरोंपर धावा करते थे॥ १६ ॥

प्रतिपक्षीको वेगपूर्वक गिरानेवाले उन राक्षसोंका बहुत-से अत्यन्त वेगशाली वानरोंने लातों, मुक्कों, दाँतों और वृक्षोंकी मारसे कचूमर निकाल दिया॥ १७ ॥

अपनी सेनाको वानरोंद्वारा भगायी गयी देख राक्षसशिरोमणि धूम्राक्षने युद्धकी इच्छासे सामने आये हुए वानरोंका रोषपूर्वक संहार आरम्भ किया॥ १८ ॥

कुछ वानरोंको उसने भालोंसे गाँथ दिया, जिससे वे खूनकी धारा बहाने लगे। कितने ही वानर उसके मुद्गरोंसे आहत होकर धरतीपर लोट गये॥ १९ ॥

कुछ वानर परिघोंसे कुचल डाले गये। कुछ भिन्दिपालोंसे चीर दिये गये और कुछ पट्टिशोंसे मथे जाकर व्याकुल हो अपने प्राणोंसे हाथ धो बैठे॥ २० ॥

कितने ही वानर राक्षसोंद्वारा मारे जाकर खूनसे लथपथ हो पृथ्वीपर सो गये और कितने ही क्रोधभरे राक्षसोंद्वारा युद्धस्थलमें खदेड़े जानेपर कहीं भागकर छिप गये॥ २२ ॥

कितनोंके हृदय विदीर्ण हो गये। कितने ही एक करवटसे सुला दिये गये तथा कितनोंको त्रिशूलसे विदीर्ण करके धूम्राक्षने उनकी आँतें बाहर निकाल दीं॥ २२ ॥

वानरों और राक्षसोंसे भरा हुआ वह महान् युद्ध बड़ा भयानक प्रतीत होता था। उसमें अस्त्र-शस्त्रोंकी बहुलता थी तथा शिलाओं और वृक्षोंकी वर्षासे सारी रणभूमि भर गयी थी॥ २३ ॥

वह युद्धरूपी गान्धर्व (संगीत-महोत्सव) अद्भुत प्रतीत होता था। धनुषकी प्रत्यञ्चासे जो टंकार-ध्वनि होती थी, वही मानो वीणाका मधुर नाद था, हिचकियाँ तालका काम देती थीं और मन्दस्वरसे घायलोंका जो कराहना होता था वही गीतका स्थान ले रहा था॥ २४ ॥

इस प्रकार धनुष हाथमें लिये धूम्राक्षने युद्धके मुहानेपर बाणोंकी वर्षा करके वानरोंको हँसते-हँसते सम्पूर्ण दिशाओंमें मार भगाया॥ २५ ॥

धूम्राक्षकी मारसे अपनी सेनाको पीड़ित एवं व्यथित हुई देख पवनकुमार हनुमान्जी अत्यन्त कुपित हो उठे और एक विशाल शिला हाथमें ले उसके सामने आये॥ २६ ॥

उस समय क्रोधके कारण उनके नेत्र दुगुने लाल हो रहे थे। उनका पराक्रम अपने पिता वायुदेवताके ही समान था। उन्होंने धूम्राक्षके रथपर वह विशाल शिला दे मारी॥ २७ ॥

उस शिलाको रथकी ओर आती देख धूम्राक्ष हड़बड़ीमें गदा लिये उठा और वेगपूर्वक रथसे कूदकर पृथ्वीपर खड़ा हो गया॥ २८ ॥

वह शिला पहिये, कूबर, अश्व, ध्वज और धनुषसहित उसके रथको चूर-चूर करके पृथ्वीपर गिर पड़ी॥ २९ ॥

इस प्रकार धूम्राक्षके रथको चौपट करके पवनपुत्र हनुमान्ने छोटी-बड़ी डालियोंसहित वृक्षोंद्वारा राक्षसोंका संहार आरम्भ किया॥ ३० ॥

बहुतेरे राक्षसोंके सिर फूट गये और वे रक्तसे नहा उठे। दूसरे बहुत-से निशाचर वृक्षोंकी मारसे कुचले जाकर धरतीपर लोट गये॥ ३१ ॥

इस प्रकार राक्षससेनाको खदेड़कर पवनकुमार हनुमान्ने एक पर्वतका शिखर उठा लिया और धूम्राक्षपर धावा किया॥ ३२ ॥

उन्हें आते देख पराक्रमी धूम्राक्षने भी गदा उठा ली और गर्जना करता हुआ वह सहसा हनुमान्जीकी ओर दौड़ा॥ ३३ ॥

धूम्राक्षने कुपित हुए हनुमान्जीके मस्तकपर बहुसंख्यक काँटोंसे भरी हुई वह गदा दे मारी॥ ३४ ॥

भयानक वेगवाली उस गदाकी चोट खाकर भी वायुके समान बलशाली कपिवर हनुमान्ने वहाँ इस प्रहारको कुछ भी नहीं गिना और धूम्राक्षके मस्तकपर वह पर्वतशिखर चला दिया॥ ३५ १/२ ॥

पर्वतशिखरकी गहरी चोट खाकर धूम्राक्षके सारे अङ्ग छिन्न-भिन्न हो गये और वह बिखरे हुए पर्वतकी भाँति सहसा पृथ्वीपर गिर पड़ा॥ ३६ १/२ ॥

धूम्राक्षको मारा गया देख मरनेसे बचे हुए निशाचर भयभीत हो वानरोंकी मार खाते हुए लङ्कामें घुस गये॥ ३७ ॥

इस प्रकार शत्रुओंको मारकर और रक्तकी धारा बहानेवाली बहुत-सी नदियोंको प्रवाहित करके महात्मा पवनकुमार हनुमान् यद्यपि शत्रुवधजनित परिश्रमसे थक गये थे, तथापि वानरोंद्वारा पूजित एवं प्रशंसित होनेसे उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई॥ ३८ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें बावनवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ५२ ॥