श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
बावनवाँ सर्ग
बावनवाँ सर्ग
तापसी स्वयंप्रभाके पूछनेपर वानरोंका उसे अपना वृत्तान्त बताना और उसके प्रभावसे गुफाके बाहर निकलकर समुद्रतटपर पहुँचना
तत्पश्चात् जब सब वानर-यूथपति खा-पीकर विश्राम कर चुके, तब धर्मका आचरण करनेवाली वह एकाग्रहृदया तपस्विनी उन सबसे इस प्रकार बोली— ॥
‘वानरो! यदि फल खानेसे तुम्हारी थकावट दूर हो गयी हो और यदि तुम्हारा वृत्तान्त मेरे सुनने योग्य हो तो मैं उसे सुनना चाहती हूँ’॥ २ ॥
उसकी यह बात सुनकर पवनकुमार हनुमान्जी बड़ी सरलताके साथ यथार्थ बात कहने लगे— ॥ ३ ॥
‘देवि! सम्पूर्ण जगत्के राजा दशरथनन्दन श्रीमान् भगवान् राम, जो देवराज इन्द्र और वरुणके समान तेजस्वी हैं, दण्डकारण्यमें पधारे थे॥ ४ ॥
‘उनके साथ उनके छोटे भाऽइ लक्ष्मण तथा उनकी धर्मपत्नी विदेहनन्दिनी सीता भी थीं। जनस्थानमें आकर रावणने उनकी स्त्रीका बलपूर्वक अपहरण कर लिया॥ ५ ॥
‘श्रेष्ठ वानरोंके राजा वानरजातीय वीरवर सुग्रीव महाराज श्रीरामचन्द्रजीके मित्र हैं, जिन्होंने इन अङ्गद आदि प्रधान वीरोंके साथ हमलोगोंको सीताकी खोज करनेके लिये अगस्त्यसेवित और यमराजद्वारा सुरक्षित दक्षिण दिशामें भेजा है॥ ६-७ ॥
‘उन्होंने आज्ञा दी थी कि तुम सब लोग एक साथ रहकर विदेहकुमारी सीतासहित उस इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले राक्षसराज रावणका पता लगाना॥ ८ ॥
‘हमने यहाँका सारा जंगल छान डाला। अब दक्षिण दिशामें समुद्रके भीतर उनका अन्वेषण करना है। अबतक सीताका कुछ पता नहीं लगा और हमलोग भूख-प्याससे पीड़ित हो गये। अन्तमें हम सब-के-सब एक वृक्षके नीचे थककर बैठ गये॥ ९ ॥
‘हमारे मुखकी कान्ति फीकी पड़ गयी। हम सभी चिन्तामें मग्न हो गये। चिन्ताके महासागरमें डूबकर हम उसका पार नहीं पा रहे थे॥ १० ॥
‘इसी समय चारों ओर दृष्टि दौड़ानेपर हमको यह विशाल गुफा दिखायी पड़ी, जो लता और वृक्षोंसे ढकी हुऽइ तथा अन्धकारसे आच्छन्न थी॥ ११ ॥
‘थोड़ी ही देरमें इस गुफासे हंस, कुरर और सारस आदि पक्षी निकले, जिनके पंख जलसे भीगे थे और उनमें कीचड़ लगी हुई थी॥ १२ ॥
‘तब मैंने वानरोंसे कहा, ‘अच्छा होगा कि हमलोग इसके भीतर प्रवेश करें’। इन सब वानरोंको भी यह अनुमान हो गया कि गुफाके भीतर पानी है॥ १३ ॥
‘हम सब लोग अपने कार्यकी सिद्धिके लिये उतावले थे ही, अतः इस गुफामें कूद पड़े। अपने हाथोंसे एक-दूसरेको दृढ़तापूर्वक पकड़कर हम गुफामें आगे बढ़ने लगे॥ १४ ॥
‘इस तरह सहसा हमलोगोंने इस अँधेरी गुफामें प्रवेश किया। यही हमारा कार्य है और इसी कार्यसे हम इधर आये हैं॥ १५ ॥
‘भूखसे व्याकुल एवं दुर्बल होनेके कारण हम सबने तुम्हारी शरण ली। तुमने आतिथ्य-धर्मके अनुसार हमें फल और मूल अर्पित किये और हमने भी भूखसे पीड़ित होनेके कारण उन्हें भरपेट खाया॥ १६१/२ ॥
‘देवि! हम भूखसे मर रहे थे। तुमने हम सब लोगोंके प्राण बचा लिये। अतः बताओ ये वानर तुम्हारे उपकारका बदला चुकानेके लिये क्या सेवा करें’॥ १७१/२ ॥
स्वयंप्रभा सर्वज्ञ थी। उन वानरोंके ऐसा कहनेपर उसने उन सभी यूथपतियोंको इस प्रकार उत्तर दिया’—
‘मैं तुम सभी वेगशाली वानरोंपर यों ही बहुत संतुष्ट हूँ। धर्मानुष्ठानमें लगी रहनेके कारण मुझे किसीसे कोई प्रयोजन नहीं रह गया है’॥ १९१/२ ॥
उस तपस्विनीने जब इस प्रकार धर्मयुक्त उत्तम बात कही, तब हनुमान्जीने निर्दोष दृष्टिवाली उस देवीसे यों कहा—॥ २०१/२ ॥
‘देवि! तुम धर्माचरणमें लगी हुई हो। अतः हम सब लोग तुम्हारी शरणमें आये हैं। महात्मा सुग्रीवने हमलोगोंके लौटनेके लिये जो समय निश्चित किया था, वह इस गुफाके भीतर घूमनेमें ही बीत गया॥ २१-२२ ॥
‘अब तुम कृपा करके हमें इस बिलसे बाहर निकाल दो। सुग्रीवके बताये हुए समयको हम लाँघ चुके हैं, इसलिये अब हमारी आयु पूरी हो चुकी है। हम सबके-सब सुग्रीवके भयसे डरे हुए हैं। अतः तुम हमारा उद्धार करो॥ २३१/२ ॥
‘धर्मचारिणि! हमें जो महान् कार्य करना है, उसे भी हम इस गुफामें रहनेके कारण नहीं कर सके हैं’॥
हनुमान्जीके ऐसा कहनेपर तापसी बोली—‘मैं समझती हूँ जो एक बार इस गुफामें चला आता है, उसका जीते-जी यहाँसे लौटना बहुत कठिन हो जाता है। तथापि नियमोंके पालन और तपस्याके उत्तम प्रभावसे मैं तुम सभी वानरोंको इस गुफासे बाहर निकाल दूँगी॥
‘श्रेष्ठ वानरो! तुम सब लोग अपनी-अपनी आँखें बंद कर लो। आँख बंद किये बिना यहाँसे निकलना असम्भव है’॥ २७१/२ ॥
यह सुनकर सबने सुकुमार अङ्गुलिवाले हाथोंसे आँखें मूँद लीं। गुफासे बाहर निकलनेकी इच्छासे प्रसन्न होकर उन सबने सहसा नेत्र बंद कर लिये॥ २८१/२ ॥
इस प्रकार उस समय हाथोंसे मुँह ढक लेनेके कारण उन महात्मा वानरोंको स्वयंप्रभाने पलक मारते-मारते बिलसे बाहर निकाल दिया॥ २९१/२ ॥
तत्पश्चात् वहाँ उस धर्मपरायणा तापसीने उस विषम गुफासे बाहर निकले हुए समस्त वानरोंको आश्वासन देकर इस प्रकार कहा—॥ ३०१/२ ॥
‘श्रेष्ठ वानरो! यह रहा नाना प्रकारके वृक्षों और लताओंसे व्याप्त शोभाशाली विन्ध्यगिरि। इधर यह प्रस्रवणगिरि है और सामने यह महासागर लहरा रहा है। तुम्हारा कल्याण हो। अब मैं अपने स्थानपर जाती हूँ।’ ऐसा कहकर स्वयंप्रभा उस सुन्दर गुफामें चली गयी॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें बावनवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ५२ ॥