श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
बावनवाँ सर्ग
बावनवाँ सर्ग
श्रीरामकी आज्ञासे गुहका नाव मँगाना, श्रीरामका सुमन्त्रको समझा-बुझाकर अयोध्यापुरी लौट जानेके लिये आज्ञा देना और माता-पिता आदिसे कहनेके लिये संदेश सुनाना, सुमन्त्रके वनमें ही चलनेके लिये आग्रह करनेपर श्रीरामका उन्हें युक्तिपूर्वक समझाकर लौटनेके लिये विवश करना, फिर तीनोंका नावपर बैठना, सीताकी गङ्गाजीसे प्रार्थना, नावसे पार उतरकर श्रीराम आदिका वत्सदेशमें पहुँचना और सायंकालमें एक वृक्षके नीचे रहनेके लिये जाना
जब रात बीती और प्रभात हुआ, उस समय विशाल वक्षवाले महायशस्वी श्रीरामने शुभलक्षणसम्पन्न सुमित्राकुमार लक्ष्मणसे इस प्रकार कहा— ॥ १ ॥
‘तात! भगवती रात्रि व्यतीत हो गयी। अब सूर्योदयका समय आ पहुँचा है। वह अत्यन्त काले रंगका पक्षी कोकिल कुहू-कुहू बोल रहा है॥ २ ॥
‘वनमें अव्यक्त शब्द करनेवाले मयूरोंकी केका वाणी भी सुनायी देती है; अतः सौम्य! अब हमें तीव्र गतिसे बहनेवाली समुद्रगामिनी गङ्गाजीके पार उतरना चाहिये’॥
मित्रोंको आनन्दित करनेवाले सुमित्राकुमार लक्ष्मणने श्रीरामचन्द्रजीके कथनका अभिप्राय समझकर गुह और सुमन्त्रको बुलाकर पार उतरनेकी व्यवस्था करनेके लिये कहा और स्वयं वे भाईके सामने आकर खड़े हो गये॥
श्रीरामचन्द्रजीका वचन सुनकर उनका आदेश शिरोधार्य करके निषादराजने तुरंत अपने सचिवोंको बुलाया और इस प्रकार कहा— ॥ ५ ॥
‘तुम घाटपर शीघ्र ही एक ऐसी नाव ले आओ, जो मजबूत होनेके साथ ही सुगमतापूर्वक खेनेयोग्य हो, उसमें डाँड़ लगा हुआ हो, कर्णधार बैठा हो तथा वह नाव देखनेमें सुन्दर हो’॥ ६ ॥
निषादराज गुहका वह आदेश सुनकर उसका महान् मन्त्री गया और एक सुन्दर नाव घाटपर पहुँचाकर उसने गुहको इसकी सूचना दी॥ ७ ॥
तब गुहने हाथ जोड़कर श्रीरामचन्द्रजीसे कहा— ‘देव! यह नौका उपस्थित है; बताइये, इस समय आपकी और क्या सेवा करूँ?॥ ८ ॥
‘देवकुमारके समान तेजस्वी तथा उत्तम व्रतका पालन करनेवाले पुरुषसिंह श्रीराम! समुद्रगामिनी गङ्गानदीको पार करनेके लिये आपकी सेवामें यह नाव आ गयी है, अब आप शीघ्र
इसपर आरूढ़ होइये'॥ ९ ॥
तब महातेजस्वी श्रीराम गुहसे इस प्रकार बोले— ‘सखे! तुमने मेरा सारा मनोरथ पूर्ण कर दिया, अब शीघ्र ही सब सामान नावपर चढ़ाओ’॥ १० ॥
यह कहकर श्रीराम और लक्ष्मणने कवच धारण करके तरकस एवं तलवार बाँधी तथा धनुष लेकर वे दोनों भाई जिस मार्गसे सब लोग घाटपर जाया करते थे, उसीसे सीताके साथ गङ्गाजीके तटपर गये॥ ११ ॥
उस समय धर्मके ज्ञाता भगवान् श्रीरामके पास जाकर सारथि सुमन्त्रने विनीतभावसे हाथ जोड़कर पूछा— ‘प्रभो! अब मैं आपकी क्या सेवा करूँ?’॥ १२ ॥
तब दशरथनन्दन श्रीरामने सुमन्त्रको उत्तम दाहिने हाथसे स्पर्श करते हुए कहा— ‘सुमन्त्रजी! अब आप शीघ्र ही पुनः महाराजके पास लौट जाइये और वहाँ सावधान होकर रहिये’॥ १३ ॥
उन्होंने फिर कहा— ‘इतनी दूरतक महाराजकी आज्ञासे मैंने रथद्वारा यात्रा की है, अब हमलोग रथ छोड़कर पैदल ही महान् वनकी यात्रा करेंगे; अतः आप लौट जाइये’॥ १४ ॥
अपनेको घर लौटनेकी आज्ञा प्राप्त हुई देख सारथि सुमन्त्र शोकसे व्याकुल हो उठे और इक्ष्वाकुनन्दन पुरुषसिंह श्रीरामसे इस प्रकार बोले—॥ १५ ॥
‘रघुनन्दन! जिसकी प्रेरणासे आपको भाई और पत्नीके साथ साधारण मनुष्योंकी भाँति वनमें रहनेको विवश होना पड़ा है, उस दैवका इस संसारमें किसी भी पुरुषने उल्लङ्घन नहीं किया॥ १६ ॥
‘जब आप-जैसे महान् पुरुषपर यह संकट आ गया, तब मैं समझता हूँ कि ब्रह्मचर्य-पालन, वेदोंके स्वाध्याय, दयालुता अथवा सरलतामें भी किसी फलकी सिद्धि नहीं है॥ १७ ॥
‘वीर रघुनन्दन! (इस प्रकार पिताके सत्यकी रक्षाके लिये) विदेहनन्दिनी सीता और भाई लक्ष्मणके साथ वनमें निवास करते हुए आप तीनों लोकोंपर विजय प्राप्त करनेवाले महापुरुष नारायणकी भाँति उत्कर्ष (महान् यश) प्राप्त करेंगे॥ १८ ॥
‘श्रीराम! निश्चय ही हमलोग हर तरहसे मारे गये; क्योंकि आपने हम पुरवासियोंको अपने साथ न ले जाकर अपने दर्शनजनित सुखसे वञ्चित कर दिया। अब हम पापिनी कैकेयीके वशमें पड़ेंगे और दुःख भोगते रहेंगे’॥ १९ ॥
आत्माके समान प्रिय श्रीरामचन्द्रजीसे ऐसी बात कहकर उन्हें दूर जानेको उद्यत देख सारथि सुमन्त्र दुःखसे व्याकुल होकर देरतक रोते रहे॥ २० ॥
आँसुओंका प्रवाह रुकनेपर आचमन करके पवित्र हुए सारथिसे श्रीरामचन्द्रजीने बारंबार मधुर वाणीमें कहा—॥ २१ ॥
‘सुमन्त्रजी! मेरी दृष्टिमें इक्ष्वाकुवंशियोंका हित करनेवाला सुहृद् आपके समान दूसरा कोई नहीं है। आप ऐसा प्रयत्न करें, जिससे महाराज दशरथको मेरे लिये शोक न हो॥ २२ ॥
‘पृथिवीपति महाराज दशरथ एक तो बूढ़े हैं, दूसरे उनका सारा मनोरथ चूर-चूर हो गया है; इसलिये उनका हृदय शोकसे पीड़ित है। यही कारण है कि मैं आपको उनकी संभालके लिये कहता हूँ॥ २३ ॥
‘वे महामनस्वी महाराज कैकेयीका प्रिय करनेकी इच्छासे आपको जो कुछ जैसी भी आज्ञा दें, उसका आप आदरपूर्वक पालन करें—यही मेरा अनुरोध है॥ २४ ॥
‘राजालोग इसीलिये राज्यका पालन करते हैं कि किसी भी कार्यमें इनके मनकी इच्छा-पूर्तिमें विघ्न न डाला जाय॥ २५ ॥
‘सुमन्त्रजी! जिस किसी भी कार्यमें जिस किसी तरह भी महाराजको अप्रिय बातसे खिन्न होनेका अवसर न आवे तथा वे शोकसे दुबले न हों, वह आपको उसी प्रकार करना चाहिये॥ २६ ॥
‘जिन्होंने कभी दुःख नहीं देखा है, उन आर्य, जितेन्द्रिय और वृद्ध महाराजको मेरी ओरसे प्रणाम करके यह बात कहियेगा॥ २७ ॥
‘हमलोग अयोध्यासे निकल गये अथवा हमें वनमें रहना पड़ेगा, इस बातको लेकर न तो मैं कभी शोक करता हूँ और न लक्ष्मणको ही इसका शोक है॥ २८ ॥
‘चौदह वर्ष समाप्त होनेपर हम पुनः शीघ्र ही लौट आयेंगे और उस समय आप मुझे, लक्ष्मणको और सीताको भी फिर देखेंगे॥ २९ ॥
‘सुमन्त्रजी! महाराजसे ऐसा कहकर आप मेरी मातासे, उनके साथ बैठी हुई अन्य देवियों (माताओं) से तथा कैकेयीसे भी बारंबार मेरा कुशल-समाचार कहियेगा॥ ३० ॥
‘माता कौसल्यासे कहियेगा कि तुम्हारा पुत्र स्वस्थ एवं प्रसन्न है। इसके बाद सीताकी ओरसे, मुझ ज्येष्ठ पुत्रकी ओरसे तथा लक्ष्मणकी ओरसे भी माताकी चरणवन्दना कह
दीजियेगा॥ ३१ ॥
‘तदनन्तर मेरी ओरसे महाराजसे भी यह निवेदन कीजियेगा कि आप भरतको शीघ्र ही बुलवा लें और जब वे आ जायें, तब अपने अभीष्ट युवराजपदपर उनका अभिषेक कर दें॥ ३२ ॥
‘भरतको छातीसे लगाकर और युवराजके पदपर अभिषिक्त करके आपको हमलोगोंके वियोगसे होनेवाला दुःख दबा नहीं सकेगा॥ ३३ ॥
‘भरतसे भी हमारा यह संदेश कह दीजियेगा कि महाराजके प्रति जैसा तुम्हारा बर्ताव है, वैसा ही समानरूपसे सभी माताओंके प्रति होना चाहिये॥ ३४ ॥
‘तुम्हारी दृष्टिमें कैकेयीका जो स्थान है, वही समानरूपसे सुमित्रा और मेरी माता कौसल्याका भी होना उचित है, इन सबमें कोई अन्तर न रखना॥ ३५ ॥
‘पिताजीका प्रिय करनेकी इच्छासे युवराजपदको स्वीकार करके यदि तुम राजकाजकी देखभाल करते रहोगे तो इहलोक और परलोकमें सदा ही सुख पाओगे’॥
श्रीरामचन्द्रजीने सुमन्त्रको लौटाते हुए जब इस प्रकार समझाया, तब उनकी सारी बातें सुनकर वे श्रीरामसे स्नेहपूर्वक बोले— ॥ ३७ ॥
‘तात! सेवकका स्वामीके प्रति जो सत्कारपूर्ण बर्ताव होना चाहिये, उसका यदि मैं आपसे बात करते समय पालन न कर सकूँ, यदि मेरे मुखसे स्नेहवश कोई धृष्टतापूर्ण बात निकल जाय तो ‘यह मेरा भक्त है’ ऐसा समझकर आप मुझे क्षमा कीजियेगा। जो आपके वियोगसे पुत्रशोकसे आतुर हुई माताकी भाँति संतप्त हो रही है, उस अयोध्यापुरीमें मैं आपको साथ लिये बिना कैसे लौटकर जा सकूँगा? ॥ ३८-३९ ॥
‘आते समय लोगोंने मेरे रथमें श्रीरामको विराजमान देखा था, अब इस रथको श्रीरामसे रहित देखकर उन लोगोंका और उस अयोध्यापुरीका भी हृदय विदीर्ण हो जायगा॥ ४० ॥
‘जैसे युद्धमें अपने स्वामी वीर रथीके मारे जानेपर जिसमें केवल सारथि शेष रह गया हो ऐसे रथको देखकर उसकी अपनी सेना अत्यन्त दयनीय अवस्थामें पड़ जाती है, उसी प्रकार मेरे इस रथको आपसे सूना देखकर सारी अयोध्या नगरी दीन दशाको प्राप्त हो जायगी॥ ४१ ॥
‘आप दूर रहकर भी प्रजाके हृदयमें निवास करनेके कारण सदा उसके सामने ही खड़े रहते हैं। निश्चय ही इस समय प्रजावर्गके सब लोगोंने आपका ही चिन्तन करते हुए खाना-पीना छोड़ दिया होगा॥ ४२ ॥
‘श्रीराम! जिस समय आप वनको आने लगे, उस समय आपके शोकसे व्याकुलचित्त हुर्इ प्रजाने जैसा आर्तनाद एवं क्षोभ प्रकट किया था, उसे तो आपने देखा ही था॥ ४३ ॥
‘आपके अयोध्यासे निकलते समय पुरवासियोंने जैसा आर्तनाद किया था, आपके बिना मुझे खाली रथ लिये लौटा देख वे उससे भी सौगुना हाहाकार करेंगे॥
‘क्या मैं महारानी कौसल्यासे जाकर कहूँगा कि मैंने आपके बेटेको मामाके घर पहुँचा दिया है? इसलिये आप संताप न करें, यह बात प्रिय होनेपर भी असत्य है, अतः ऐसा असत्य वचन भी मैं कभी नहीं कह सकता। फिर यह अप्रिय सत्य भी कैसे सुना सकूँगा कि मैं आपके पुत्रको वनमें पहुँचा आया॥ ४५-४६ ॥
‘ये उत्तम घोड़े मेरी आज्ञाके अधीन रहकर आपके बन्धुजनोंका भार वहन करते हैं (आपके बन्धुजनोंसे हीन रथका ये वहन नहीं करते हैं), ऐसी दशामें आपसे सूने रथको ये कैसे खींच सकेंगे?॥ ४७ ॥
‘अतः निष्पाप रघुनन्दन! अब मैं आपके बिना अयोध्या लौटकर नहीं जा सकूँगा। मुझे भी वनमें चलनेकी ही आज्ञा दीजिये॥ ४८ ॥
‘यदि इस तरह याचना करनेपर भी आप मुझे त्याग ही देंगे तो मैं आपके द्वारा परित्यक्त होकर यहाँ रथसहित अग्निमें प्रवेश कर जाऊँगा॥ ४९ ॥
‘रघुनन्दन! वनमें आपकी तपस्यामें विघ्न डालनेवाले जो-जो जन्तु उपस्थित होंगे, मैं इस रथके द्वारा उन सबको दूर भगा दूँगा॥ ५० ॥
‘श्रीराम! आपकी कृपासे मुझे आपको रथपर बिठाकर यहाँतक लानेका सुख प्राप्त हुआ। अब आपके ही अनुग्रहसे मैं आपके साथ वनमें रहनेका सुख भी पानेकी आशा करता हूँ॥ ५१ ॥
‘आप प्रसन्न होकर आज्ञा दीजिये। मैं वनमें आपके पास ही रहना चाहता हूँ। मेरी इच्छा है कि आप प्रसन्नतापूर्वक कह दें कि तुम वनमें मेरे साथ ही रहो॥ ५२ ॥
‘वीर! ये घोड़े भी यदि वनमें रहते समय आपकी सेवा करेंगे तो इन्हें परमगतिकी प्राप्ति होगी॥ ५३ ॥
‘प्रभो! मैं वनमें रहकर अपने सिरसे (सारे शरीरसे) आपकी सेवा करूँगा और इस सुखके आगे अयोध्या तथा देवलोकका भी सर्वथा त्याग कर दूँगा॥
‘जैसे सदाचारहीन प्राणी इन्द्रकी राजधानी स्वर्गमें नहीं प्रवेश कर सकता, उसी प्रकार आपके बिना मैं अयोध्यापुरीमें नहीं जा सकता॥ ५५ ॥
‘मेरी यह अभिलाषा है कि जब वनवासकी अवधि समाप्त हो जाय, तब फिर इसी रथपर बिठाकर आपको अयोध्यापुरीमें ले चलूँ॥ ५६ ॥
‘वनमें आपके साथ रहनेसे ये चौदह वर्ष मेरे लिये चौदह क्षणोंके समान बीत जायँगे। अन्यथा चौदह सौ वर्षोंके समान भारी जान पड़ेंगे॥ ५७ ॥
‘अतः भक्तवत्सल! आप मेरे स्वामीके पुत्र हैं। आप जिस पथपर चल रहे हैं, उसीपर आपकी सेवाके लिये साथ चलनेको मैं भी तैयार खड़ा हूँ। मैं आपके प्रति भक्ति रखता हूँ, आपका भृत्य हूँ और भृत्यजनोचित मर्यादाके भीतर स्थित हूँ; अतः आप मेरा परित्याग न करें’॥ ५८ ॥
इस तरह अनेक प्रकारसे दीन वचन कहकर बारंबार याचना करनेवाले सुमन्त्रसे सेवकोंपर कृपा करनेवाले श्रीरामने इस प्रकार कहा— ॥ ५९ ॥
‘सुमन्त्रजी! आप स्वामीके प्रति स्नेह रखनेवाले हैं। मुझमें आपकी जो उत्कृष्ट भक्ति है, उसे मैं जानता हूँ; फिर भी जिस कार्यके लिये मैं आपको यहाँसे अयोध्यापुरीमें भेज रहा हूँ, उसे सुनिये॥ ६० ॥
‘जब आप नगरको लौट जायँगे, तब आपको देखकर मेरी छोटी माता कैकेयीको यह विश्वास हो जायगा कि राम वनको चले गये॥ ६१ ॥
‘इसके विपरीत यदि आप नहीं गये तो उसे संतोष नहीं होगा। मेरे वनवासी हो जानेपर भी वह धर्मपरायण महाराज दशरथके प्रति मिथ्यावादी होनेका संदेह करे, ऐसा मैं नहीं चाहता॥ ६२ ॥
‘आपको भेजनेमें मेरा मुख्य उद्देश्य यही है कि मेरी छोटी माता कैकेयी भरतद्वारा सुरक्षित समृद्धिशाली राज्यको हस्तगत कर ले॥ ६३ ॥
‘सुमन्त्रजी! मेरा तथा महाराजका प्रिय करनेके लिये आप अयोध्यापुरीको अवश्य पधारिये और आपको जिनके लिये जो संदेश दिया गया है, वह सब वहाँ जाकर उन लोगोंसे कह दीजिये’॥ ६४ ॥
ऐसा कहकर श्रीरामने सुमन्त्रको बारंबार सान्त्वना दी। इसके बाद उन्होंने गुहसे उत्साहपूर्वक यह युक्तियुक्त बात कही—॥ ६५ ॥
‘निषादराज गुह! इस समय मेरे लिये ऐसे वनमें रहना उचित नहीं है, जहाँ जनपदके लोगोंका आना-जाना अधिक होता हो, अब अवश्य मुझे निर्जन वनके आश्रममें ही वास करना होगा। इसके लिये जटा धारण आदि आवश्यक विधिको मुझे पालन करना चाहिये॥
‘अतः फल-मूलका आहार और पृथ्वीपर शयन आदि नियमोंको ग्रहण करके मैं सीता और लक्ष्मणकी अनुमति लेकर पिताका हित करनेकी इच्छासे सिरपर तपस्वी जनोंके आभूषणरूप जटा धारण करके यहाँसे वनको जाऊँगा। मेरे केशोंको जटाका रूप देनेके लिये तुम बड़का दूध ला दो।’ गुहने तुरंत ही बड़का दूध लाकर श्रीरामको दिया॥ ६७-६८ ॥
श्रीरामने उसके द्वारा लक्ष्मणकी तथा अपनी जटाएँ बनायीं। महाबाहु पुरुषसिंह श्रीराम तत्काल जटाधारी हो गये॥ ६९ ॥
उस समय वे दोनों भांइ श्रीराम-लक्ष्मण वल्कल वस्त्र और जटामण्डल धारण करके ऋषियोंके समान शोभा पाने लगे॥ ७० ॥
तदनन्तर वानप्रस्थमार्गका आश्रय लेकर लक्ष्मणसहित श्रीरामने वानप्रस्थोचित व्रतको ग्रहण किया। तत्पश्चात् वे अपने सहायक गुहसे बोले—॥ ७१ ॥
‘निषादराज! तुम सेना, खजाना, किला और राज्यके विषयमें सदा सावधान रहना; क्योंकि राज्यकी रक्षाका काम बड़ा कठिन माना गया है’॥ ७२ ॥
गुहको इस प्रकार आज्ञा देकर उससे विदा ले इक्ष्वाकुकुलनन्दन श्रीरामचन्द्रजी पत्नी और लक्ष्मणके साथ तुरंत ही वहाँसे चल दिये। उस समय उनके चित्तमें तनिक भी व्यग्रता नहीं थी॥ ७३ ॥
नदीके तटपर लगी हुंइ नावको देखकर इक्ष्वाकुनन्दन श्रीरामने शीघ्रगामी गङ्गानदीके पार जानेकी इच्छासे लक्ष्मणको सम्बोधित करके कहा—॥ ७४ ॥
‘पुरुषसिंह! यह सामने नाव खड़ी है। तुम मनस्विनी सीताको पकड़कर धीरेसे उसपर बिठा दो, फिर स्वयं भी नावपर बैठ जाओ’॥ ७५ ॥
भांइका यह आदेश सुनकर मनको वशमें रखनेवाले लक्ष्मणने पूर्णतः उसके अनुकूल चलते हुए पहले मिथिलेशकुमारी श्रीसीताको नावपर बिठाया, फिर स्वयं भी उसपर आरूढ़
हुए॥ ७६ ॥
सबके अन्तमें लक्ष्मणके बड़े भाई तेजस्वी श्रीराम स्वयं नौकापर बैठे। तदनन्तर निषादराज गुहने अपने भाई-बन्धुओंको नौका खेनेका आदेश दिया॥ ७७ ॥
महातेजस्वी श्रीरामचन्द्रजी भी उस नावपर आरूढ़ होनेके पश्चात् अपने हितके उद्देश्यसे ब्राह्मण और क्षत्रियके जपनेयोग्य ‘दैवी नाव’ इत्यादि वैदिक मन्त्रका जप करने लगे॥ ७८ ॥
फिर शास्त्रविधिके अनुसार आचमन करके सीताके साथ उन्होंने प्रसन्नचित्त होकर गङ्गाजीको प्रणाम किया। महारथी लक्ष्मणने भी उन्हें मस्तक झुकाया॥ ७९ ॥
इसके बाद श्रीरामने सुमन्त्रको तथा सेनासहित गुहको भी जानेकी आज्ञा दे नावपर भलीभाँति बैठकर मल्लाहोंको उसे चलानेका आदेश दिया॥ ८० ॥
तदनन्तर मल्लाहोंने नाव चलायी। कर्णधार सावधान होकर उसका संचालन करता था। वेगसे सुन्दर डाँड़ चलानेके कारण वह नाव बड़ी तेजीसे पानीपर बढ़ने लगी॥ ८१ ॥
भागीरथीकी बीच धारामें पहुँचकर सती साध्वी विदेहनन्दिनी सीताने हाथ जोड़कर गङ्गाजीसे यह प्रार्थना की— ॥ ८२ ॥
‘देवि गङ्गे! ये परम बुद्धिमान् महाराज दशरथके पुत्र हैं और पिताकी आज्ञाका पालन करनेके लिये वनमें जा रहे हैं। ये आपसे सुरक्षित होकर पिताकी इस आज्ञाका पालन कर सकें—ऐसी कृपा कीजिये॥ ८३ ॥
‘वनमें पूरे चौदह वर्षोंतक निवास करके ये मेरे तथा अपने भाईके साथ पुनः अयोध्यापुरीको लौटेंगे॥ ८४ ॥
‘सौभाग्यशालिनी देवि गङ्गे! उस समय वनसे पुनः कुशलपूर्वक लौटनेपर सम्पूर्ण मनोरथोंसे सम्पन्न हुई मैं बड़ी प्रसन्नताके साथ आपकी पूजा करूँगी॥ ८५ ॥
‘स्वर्ग, भूतल और पाताल—तीनों मार्गोंपर विचरनेवाली देवि! तुम यहाँसे ब्रह्मलोकतक फैली हुई हो और इस लोकमें समुद्रराजकी पत्नीके रूपमें दिखायी देती हो॥ ८६ ॥
‘शोभाशालिनी देवि! पुरुषसिंह श्रीराम जब पुनः वनसे सकुशल लौटकर अपना राज्य प्राप्त कर लेंगे, तब मैं सीता पुनः आपको मस्तक झुकाऊँगी और आपकी स्तुति करूँगी॥ ८७ ॥
‘इतना ही नहीं, मैं आपका प्रिय करनेकी इच्छासे ब्राह्मणोंको एक लाख गौएँ, बहुत-से वस्त्र तथा उत्तमोत्तम अन्न प्रदान करूँगी॥ ८८ ॥
‘देवि! पुनः अयोध्यापुरीमें लौटनेपर मैं सहस्रों देवदुर्लभ पदार्थोंसे तथा राजकीय भागसे रहित पृथ्वी, वस्त्र और अन्नके द्वारा भी आपकी पूजा करूँगी। आप मुझपर प्रसन्न हों*॥ ८९ ॥
‘आपके किनारे जो-जो देवता, तीर्थ और मन्दिर हैं, उन सबका मैं पूजन करूँगी॥ ९० ॥
‘निष्पाप गङ्गे! ये महाबाहु पापरहित मेरे पतिदेव मेरे तथा अपने भाईके साथ वनवाससे लौटकर पुनः अयोध्या नगरीमें प्रवेश करें’॥ ९१ ॥
पतिके अनुकूल रहनेवाली सती-साध्वी सीता इस प्रकार गङ्गाजीसे प्रार्थना करती हुईं शीघ्र ही दक्षिणतटपर जा पहुँचीं॥ ९२ ॥
किनारे पहुँचकर शत्रुओंको संताप देनेवाले नरश्रेष्ठ श्रीरामने नाव छोड़ दी और भाई लक्ष्मण तथा विदेहनन्दिनी सीताके साथ आगेको प्रस्थान किया॥ ९३ ॥
तदनन्तर महाबाहु श्रीराम सुमित्रानन्दन लक्ष्मणसे बोले—‘सुमित्राकुमार! अब तुम सजन या निर्जन वनमें सीताकी रक्षाके लिये सावधान हो जाओ। हम-जैसे लोगोंको निर्जन वनमें नारीकी रक्षा अवश्य करनी चाहिये। अतः तुम आगे-आगे चलो, सीता तुम्हारे पीछे-पीछे चलें और मैं सीताकी तथा तुम्हारी रक्षा करता हुआ सबसे पीछे चलूँगा। पुरुषप्रवर! हमलोगोंको एक-दूसरेकी रक्षा करनी चाहिये॥ ९४—९६ ॥
‘अब तक कोई भी दुष्कर कार्य समाप्त नहीं हुआ है—इस समयसे ही कठिनाइयोंका सामना आरम्भ हुआ है। आज विदेहकुमारी सीताको वनवासके वास्तविक कष्टका अनुभव होगा॥ ९७ ॥
‘अब ये ऐसे वनमें प्रवेश करेंगी, जहाँ मनुष्योंके आने-जानेका कोई चिह्न नहीं दिखायी देगा, न धान आदिके खेत होंगे, न टहलनेके लिये बगीचे। जहाँ ऊँची-नीची भूमि होगी और गड्ढे मिलेंगे, जिसमें गिरनेका भय रहेगा’॥ ९८ ॥
श्रीरामचन्द्रजीका यह वचन सुनकर लक्ष्मण आगे बढ़े। उनके पीछे सीता चलने लगीं तथा सीताके पीछे रघुकुलनन्दन श्रीराम थे॥ ९९ ॥
श्रीरामचन्द्रजी शीघ्र गङ्गाजीके उस पार पहुँचकर जबतक दिखायी दिये तबतक सुमन्त्र निरन्तर उन्हींकी ओर दृष्टि लगाये देखते रहे। जब वनके मार्गमें बहुत दूर निकल जानेके कारण वे दृष्टिसे ओझल हो गये, तब तपस्वी सुमन्त्रके हृदयमें बड़ी व्यथा हुई। वे नेत्रोंसे आँसू बहाने लगे॥ १०० ॥
लोकपालोंके समान प्रभावशाली वरदायक महात्मा श्रीराम महानदी गङ्गाको पार करके क्रमशः समृद्धिशाली वत्सदेश (प्रयाग)-में जा पहुँचे, जो सुन्दर धन-धान्यसे सम्पन्न था। वहाँके लोग बड़े हृष्ट-पुष्ट थे॥ १०१ ॥
वहाँ उन दोनों भाइयोंने मृगया-विनोदके लिये वराह, ऋष्य, पृषत् और महारुरु—इन चार महामृगोंपर बाणोंका प्रहार किया। तत्पश्चात् जब उन्हें भूख लगी, तब पवित्र कन्द-मूल आदि लेकर सायंकालके समय ठहरनेके लिये (वे सीताजीके साथ) एक वृक्षके नीचे चले गये॥ १०२ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें बावनवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ५२॥
* इस श्लोकमें आये हुए ‘सुराघटसहस्रेण’ की व्युत्पत्ति इस प्रकार है—‘सुरेषु देवेषु न घटन्ते न सन्तीत्यर्थः, तेषां सहस्रं तेन सहस्रसंख्याकसुरदुर्लभपदार्थेनेत्यर्थः।’ ‘मांसभूतौदनेन’ की व्युत्पत्ति इस प्रकार समझनी चाहिये—‘मांसभूतौदनेन मा नास्ति अंसो राजभागो यस्यां सा एव भूः पृथ्वी च उतं वस्त्रं च ओदनं च एतेषां समाहारः, तेन च त्वां यक्ष्ये।’