श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
बहत्तरवाँ सर्ग
बहत्तरवाँ सर्ग
वाल्मीकिजीसे विदा ले शत्रुघ्नजीका अयोध्यामें जाकर श्रीराम आदिसे मिलना और सात दिनोंतक वहाँ रहकर पुनः मधुपुरीको प्रस्थान करना
सोते समय पुरुषसिंह शत्रुघ्न उस उत्तम श्रीरामचरित्रसम्बन्धी गानके विषयमें अनेक प्रकारकी बातें सोचते रहे। इसलिये रातमें उन्हें बहुत देरतक नींद नहीं आयी॥ १ ॥
वीणाके लयके साथ उस रामचरित-गानका सुमधुर शब्द सुनकर महात्मा शत्रुघ्नकी शेष रात बहुत जल्दी बीत गयी॥ २ ॥
जब वह रात बीती और प्रातःकाल आया, तब पूर्वाह्नकालोचित नित्यकर्म करके शत्रुघ्नने हाथ जोड़कर मुनिवर वाल्मीकिसे कहा—॥ ३ ॥
‘भगवन्! अब मैं रघुकुलनन्दन श्रीरघुनाथजीका दर्शन करना चाहता हूँ। अतः यदि आपकी आज्ञा हो तो कठोर व्रतका पालन करनेवाले इन साथियोंके साथ मेरी अयोध्या जानेकी इच्छा है’॥ ४ ॥
इस तरहकी बात कहते हुए रघुकुलभूषण शत्रुसूदन शत्रुघ्नको वाल्मीकिजीने हृदयसे लगा लिया और जानेकी आज्ञा दे दी॥ ५ ॥
शत्रुघ्न श्रीरघुनाथजीके दर्शनके लिये उत्कण्ठित थे, इसलिये मुनिश्रेष्ठ वाल्मीकिको प्रणाम करके वे एक सुन्दर दीप्तिमान् रथपर आरूढ़ हो तुरंत अयोध्याकी ओर चल दिये॥ ६ ॥
इक्ष्वाकुकुलको आनन्दित करनेवाले महाबाहु श्रीमान् शत्रुघ्न रमणीय अयोध्यापुरीमें प्रवेश करके सीधे उस राजमहलमें गये, जहाँ महातेजस्वी श्रीराम विराजमान थे॥ ७ ॥
जैसे सहस्रनेत्रधारी इन्द्र देवताओंके बीचमें बैठते हैं, उसी प्रकार पूर्णचन्द्रमाके समान मनोहर मुखवाले भगवान् श्रीराम मन्त्रियोंके मध्यभागमें विराजमान थे। शत्रुघ्नने अपने तेजसे प्रज्वलित होनेवाले सत्यपराक्रमी महात्मा श्रीरामको देखा, प्रणाम किया और हाथ जोड़कर कहा—॥ ८-९ ॥
‘महाराज! आपने मुझे जिस कामके लिये आज्ञा दी थी, वह सब मैं कर आया हूँ। पापी लवण मारा गया और उसकी पुरी भी बस गयी॥ १० ॥
‘रघुनन्दन! आपका दर्शन किये बिना ये बारह वर्ष तो किसी प्रकार बीत गये; किंतु नरेश्वर! अब और अधिक कालतक आपसे दूर रहनेका मुझमें साहस नहीं है॥ ११ ॥
‘अमित पराक्रमी काकुत्स्थ! जैसे छोटा बच्चा अपनी माँसे अलग नहीं रह सकता, उसी प्रकार मैं चिरकालतक आपसे दूर नहीं रह सकूँगा। इसलिये आप मुझपर कृपा करें'॥ १२ ॥
ऐसी बातें कहते हुए शत्रुघ्नको हृदयसे लगाकर श्रीरामचन्द्रजीने कहा—‘शूरवीर! विषाद न करो। इस तरह कातर होना क्षत्रियोचित चेष्टा नहीं है॥ १३ ॥
‘रघुकुलभूषण! राजालोग परदेशमें रहनेपर भी दुःखी नहीं होते हैं। रघुवीर! राजाको क्षत्रिय-धर्मके अनुसार प्रजाका भलीभाँति पालन करना चाहिये॥ १४ ॥
‘नरश्रेष्ठ वीर! समय-समयपर मुझसे मिलनेके लिये अयोध्या आया करो और फिर अपनी पुरीको लौट जाया करो॥ १५ ॥
‘निःसंदेह तुम मुझे भी प्राणोंसे बढ़कर प्रिय हो। परंतु राज्यका पालन करना भी तो आवश्यक कर्तव्य है॥ १६ ॥
‘अतः काकुत्स्थ! अभी सात दिन तो तुम मेरे साथ रहो। उसके बाद सेवक, सेना और सवारियोंके साथ मधुरापुरीको चले जाना’॥ १७ ॥
श्रीरामचन्द्रजीकी यह बात धर्मयुक्त होनेके साथ ही मनके अनुकूल थी। इसे सुनकर शत्रुघ्नने श्रीरामवियोगके भयसे दीन वाणीद्वारा कहा—‘जैसी प्रभुकी आज्ञा’॥ १८ ॥
श्रीरघुनाथजीकी आज्ञासे सात दिन अयोध्यामें ठहरकर महाधनुर्धर ककुत्स्थकुलभूषण शत्रुघ्न वहाँसे जानेको तैयार हो गये॥ १९ ॥
सत्यपराक्रमी महात्मा श्रीराम, भरत और लक्ष्मणसे विदा ले शत्रुघ्न एक विशाल रथपर आरूढ़ हुए॥ २० ॥
महात्मा लक्ष्मण और भरत पैदल ही उन्हें पहुँचानेके लिये बहुत दूरतक पीछे-पीछे गये। तत्पश्चात् शत्रुघ्न रथके द्वारा शीघ्र ही अपनी राजधानीकी ओर चल दिये॥ २१ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें बहत्तरवाँ सर्ग पूरा
हुआ॥ ७२॥