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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

बत्तीसवाँ सर्ग

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बत्तीसवाँ सर्ग

हनुमान्‌जीका चिन्तित हुए सुग्रीवको समझाना

मन्त्रियोंसहित अङ्गदका वचन सुनकर और लक्ष्मणके कुपित होनेका समाचार पाकर मनको वशमें रखनेवाले सुग्रीव आसन छोड़कर खड़े हो गये॥ १ ॥

वे मन्त्रणा (कर्तव्यविषयक विचार) के परिनिष्ठित विद्वान् होनेके कारण मन्त्रप्रयोगमें अत्यन्त कुशल थे। उन्होंने श्रीरामचन्द्रजीकी महत्ता और अपनी लघुताका विचार करके मन्त्रज्ञ मन्त्रियोंसे कहा— ॥ २ ॥

‘मैंने न तो कोऽइ अनुचित बात मुँहसे निकाली है और न कोऽइ बुरा काम ही किया है। फिर श्रीरघुनाथजीके भ्राता लक्ष्मण मुझपर कुपित क्यों हुए हैं? इस बातपर मैं बारंबार विचार करता हूँ॥ ३ ॥

‘जो सदा मेरे छिद्र देखनेवाले हैं तथा जिनका हृदय मेरे प्रति शुद्ध नहीं है, उन शत्रुओंने निश्चय ही श्रीरामचन्द्रजीके छोटे भाऽइ लक्ष्मणसे मेरे ऐसे दोष सुनाये हैं जो मेरे भीतर कभी प्रकट नहीं हुए थे॥ ४ ॥

‘लक्ष्मणके कोपके विषयमें पहले तुम सब लोगोंको धीरे-धीरे कुशलतापूर्वक उनके मनोभावका विधिवत् निश्चय कर लेना चाहिये, जिससे उनके कोपके कारणका यथार्थ रूपसे ज्ञान हो जाय॥ ५ ॥

‘अवश्य ही मुझे लक्ष्मणसे तथा श्रीरघुनाथजीसे कोऽइ भय नहीं है, तथापि बिना अपराधके कुपित हुआ मित्र हृदयमें घबराहट उत्पन्न कर ही देता है॥ ६ ॥

‘किसीको मित्र बना लेना सर्वथा सुकर है, परंतु उस मैत्रीको पालना या निभाना बहुत ही कठिन है; क्योंकि मनका भाव सदा एक-सा नहीं रहता। किसीके द्वारा थोड़ी-सी भी चुगली कर दी जानेपर प्रेममें अन्तर आ जाता है॥ ७ ॥

‘इसी कारण मैं और भी डर गया हूँ; क्योंकि महात्मा श्रीरामने मेरा जो उपकार किया है, उसका बदला चुकानेकी मुझमें शक्ति नहीं है’॥ ८ ॥

सुग्रीवके ऐसा कहनेपर वानरोंमें श्रेष्ठ हनुमान्‌जी अपनी युक्तिका सहारा लेकर वानरमन्त्रियोंके बीचमें बोले— ॥ ९ ॥

‘कपिराज! मित्रके द्वारा अत्यन्त स्नेहपूर्वक किये गये उत्तम उपकारको जो आप भूल नहीं रहे हैं, इसमें सर्वथा कोई आश्चर्यकी बात नहीं है (क्योंकि अच्छे पुरुषोंका ऐसा स्वभाव ही होता है)॥ १० ॥

‘वीरवर श्रीरघुनाथजीने तो लोकापवादके भयको दूर हटाकर आपका प्रिय करनेके लिये इन्द्रतुल्य पराक्रमी वालीका वध किया है; अतः वे निःसंदेह आपपर कुपित नहीं हैं। श्रीरामचन्द्रजीने शोभा-सम्पत्तिकी वृद्धि करनेवाले अपने भाई लक्ष्मणको जो आपके पास भेजा है, इसमें सर्वथा आपके प्रति उनका प्रेम ही कारण है॥ ११-१२ ॥

‘समयका ज्ञान रखनेवालोंमें श्रेष्ठ कपिराज! आपने सीताकी खोज करनेके लिये जो समय निश्चित किया था, उसे आप इन दिनों प्रमादमें पड़ जानेके कारण भूल गये हैं। देखिये न, यह सुन्दर शरद्-ऋतु आरम्भ हो गयी है, जो खिले हुए छितवनके फूलोंसे श्यामवर्णकी प्रतीत होती है॥ १३ ॥

‘आकाशमें अब बादल नहीं रहे। ग्रह, नक्षत्र निर्मल दिखायी देते हैं। सम्पूर्ण दिशाओंमें प्रकाश छा गया है तथा नदियों और सरोवरोंके जल पूर्णतः स्वच्छ हो गये हैं॥ १४ ॥

‘वानरराज! राजाओंके लिये विजय-यात्राकी तैयारी करनेका समय आ गया है; किंतु आपको कुछ पता ही नहीं है। इससे स्पष्ट प्रतीत होता है कि आप प्रमादमें पड़ गये हैं। इसीलिये लक्ष्मण यहाँ आये हैं॥ १५ ॥

‘महात्मा श्रीरामचन्द्रजीकी पत्नीका अपहरण हुआ है, इसलिये वे बहुत दुःखी हैं। अतः यदि लक्ष्मणके मुखसे उनका कठोर वचन भी सुनना पड़े तो आपको चुपचाप सह लेना चाहिये॥ १६ ॥

‘आपकी ओरसे अपराध हुआ है। अतः हाथ जोड़कर लक्ष्मणको प्रसन्न करनेके सिवा आपके लिये और कोई उचित कर्तव्य मैं नहीं देखता॥ १७ ॥

‘राज्यकी भलाईके कामपर नियुक्त हुए मन्त्रियोंका यह कर्तव्य है कि राजाको उसके हितकी बात अवश्य बतावें। अतएव मैं भय छोड़कर अपना निश्चित विचार बता रहा हूँ॥ १८ ॥

‘भगवान् श्रीराम यदि क्रोध करके धनुष हाथमें ले लें तो देवता-असुर-गन्धर्वोंसहित सम्पूर्ण जगत्को अपने वशमें कर सकते हैं॥ १९ ॥

‘जिसे पीछे हाथ जोड़कर मनाना पड़े, ऐसे पुरुषको क्रोध दिलाना कदापि उचित नहीं है। विशेषतः वह पुरुष जो मित्रके किये हुए पहले उपकारको याद रखता हो और कृतज्ञ हो, इस

बातका अधिक ध्यान रखे॥ २० ॥

‘राजन्! इसलिये आप पुत्र और मित्रोंके साथ मस्तक झुकाकर उन्हें प्रणाम कीजिये और अपनी प्रतिज्ञापर अटल रहिये। जैसे पत्नी अपने पतिके वशमें रहती है, उसी प्रकार आप सदा श्रीरामचन्द्रजीके अधीन रहिये॥ २१ ॥

‘वानरराज! श्रीराम और लक्ष्मणके आदेशकी आपको मनसे भी उपेक्षा नहीं करनी चाहिये। देवराज इन्द्रके समान तेजस्वी लक्ष्मणसहित श्रीरघुनाथजीके अलौकिक बलका ज्ञान तो आपके मनको है ही’॥ २२ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें बत्तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३२॥