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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

पैंतीसवाँ सर्ग

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पैंतीसवाँ सर्ग

रावणका समुद्रतटवर्ती प्रान्तकी शोभा देखते हुए पुनः मारीचके पास जाना

शूर्पणखाकी ये रोंगटें खड़ी कर देनेवाली बातें सुनकर रावण मन्त्रियोंसे सलाह ले अपने कर्तव्यका निश्चय करके वहाँसे चल दिया॥ १ ॥

उसने पहले सीताहरणरूपी कार्यपर मन-ही-मन विचार किया। फिर उसके दोषों और गुणोंका यथावत् ज्ञान प्राप्त करके बलाबलका निश्चय किया। अन्तमें यह स्थिर किया कि इस कामको करना ही चाहिये। जब इस बातपर उसकी बुद्धि जम गयी, तब वह रमणीय रथशालामें गया॥ २-३ ॥

गुप्तरूपसे रथशालामें जाकर राक्षसराज रावणने अपने सारथिको यह आज्ञा दी कि ‘मेरा रथ जोतकर तैयार करो’॥ ४ ॥

सारथि शीघ्रतापूर्वक कार्य करनेमें कुशल था। रावणकी उपर्युक्त आज्ञा पाकर उसने एक ही क्षणमें उसके मनके अनुकूल उत्तम रथ जोतकर तैयार कर दिया॥ ५ ॥

वह रथ इच्छानुसार चलनेवाला तथा सुवर्णमय था। उसे रत्नोंसे विभूषित किया गया था। उसमें सोनेके साज-बाजोंसे सजे हुए गधे जुते थे, जिनका मुख पिशाचोंके समान था। रावण उसपर आरूढ़ होकर चला॥ ६ ॥

वह रथ मेघ-गर्जनाके समान गम्भीर घर-घर ध्वनि फैलाता हुआ चलता था। उसके द्वारा वह कुबेरका छोटा भाई श्रीमान् राक्षसराज रावण समुद्रके तटपर गया॥ ७ ॥

उस समय उसके लिये सफेद चँवरसे हवा की जा रही थी। सिरके ऊपर श्वेत छत्र तना हुआ था। उसकी अङ्गकान्ति स्निग्ध वैदूर्यमणिके समान नीली या काली थी। वह पक्के सोनेके आभूषणोंसे विभूषित था। उसके दस मुख, दस कण्ठ और बीस भुजाएँ थीं। उसके वस्त्राभूषण आदि अन्य उपकरण भी देखने ही योग्य थे। देवताओंका शत्रु और मुनीश्वरोंका हत्यारा वह निशाचर दस शिखरोंवाले पर्वतराजके समान प्रतीत होता था॥ ८-९ ॥

इच्छानुसार चलनेवाले उस रथपर आरूढ़ हो राक्षसराज रावण आकाशमें विद्युन्मण्डलसे घिरे हुए तथा वकपंक्तियोंसे सुशोभित मेघके समान शोभा पा रहा था॥ १० ॥

पराक्रमी रावण पर्वतयुक्त समुद्रके तटपर पहुँचकर उसकी शोभा देखने लगा। सागरका वह किनारा नाना प्रकारके फल-फूलवाले सहस्रों वृक्षोंसे व्याप्त था। चारों ओर मङ्गलकारी शीतल जलसे भरी हुई पुष्करिणियाँ और वेदिकाओंसे मण्डित विशाल आश्रम उस सिन्धुतटकी शोभा बढ़ा रहे थे॥ ११-१२ ॥

कहीं कदलीवन और कहीं नारियलके कुञ्ज शोभा दे रहे थे। साल, ताल, तमाल तथा सुन्दर फूलोंसे भरे हुए दूसरे-दूसरे वृक्ष उस तटप्रान्तको अलंकृत कर रहे थे॥

अत्यन्त नियमित आहार करनेवाले बड़े-बड़े महर्षियों, नागों, सुपर्णों (गरुड़ों), गन्धर्वों तथा सहस्रों किन्नरोंसे भी उस स्थानकी बड़ी शोभा हो रही थी॥ १४ ॥

कामविजयी सिद्धों, चारणों, ब्रह्माजीके पुत्रों, वानप्रस्थों, माष गोत्रमें उत्पन्न मुनियों, बालखिल्य महात्माओं तथा केवल सूर्य-किरणोंका पान करनेवाले तपस्वीजनोंसे भी वह सागरका तटप्रान्त सुशोभित हो रहा था॥ १५ ॥

दिव्य आभूषणों और पुष्पमालाओंको धारण करनेवाली तथा क्रीड़ा-विहारकी विधिको जाननेवाली सहस्रों दिव्यरूपिणी अप्सराएँ वहाँ सब ओर विचर रही थीं। कितनी ही शोभाशालिनी देवाङ्गनाएँ उस सिन्धुतटका सेवन करती हुई आस-पास बैठी थीं। देवताओं और दानवोंके समूह तथा अमृतभोजी देवगण वहाँ विचर रहे थे॥ १६-१७ ॥

सिन्धुका वह तट समुद्रके तेजसे उसकी तरङ्गमालाओंके स्पर्शसे स्निग्ध एवं शीतल था। वहाँ हंस, क्रौञ्च तथा मेढक सब ओर फैले हुए थे और सारस उसकी शोभा बढ़ा रहे थे। उस तटपर वैदूर्यमणिके सदृश श्याम रंगके प्रस्तर दिखायी देते थे॥ १८ ॥

आकाशमार्गसे यात्रा करते हुए कुबेरके छोटे भाई रावणने रास्तेमें सब ओर बहुत-से श्वेत वर्णके विमानों, गन्धर्वों तथा अप्सराओंको भी देखा। वे इच्छानुसार चलनेवाले विशाल विमान उन पुण्यात्मा पुरुषोंके थे, जिन्होंने तपस्यासे पुण्यलोकोंपर विजय पायी थी। उन विमानोंको दिव्य पुष्पोंसे सजाया गया था और उनके भीतरसे गीत-वाद्यकी ध्वनि प्रकट हो रही थी॥ १९-२० ॥

आगे बढ़नेपर उसने, जिनकी जड़ोंसे गोंद निकले हुए थे, ऐसे चन्दनोंके सहस्रों वन देखे, जो बड़े ही सुहावने और अपनी सुगन्धसे नासिकाको तृप्त करनेवाले थे॥ २१ ॥

कहीं श्रेष्ठ अगुरुके वन थे, कहीं उत्तम जातिके सुगन्धित फलवाले तक्कोलों (वृक्षविशेषों) के उपवन थे। कहीं तमालके फूल खिले हुए थे। कहीं गोल मिर्चकी झाड़ियाँ शोभा पाती थीं

और कहीं समुद्रके तटपर ढेर-के-ढेर मोती सूख रहे थे। कहीं श्रेष्ठ पर्वतमालाएँ, कहीं मूँगोंकी राशियाँ, कहीं सोने-चाँदीके शिखर तथा कहीं सुन्दर, अद्भुत और स्वच्छ पानीके झरने दिखायी देते थे। कहीं धन-धान्यसे सम्पन्न, स्त्री-रत्नोंसे भरे हुए तथा हाथी, घोड़े और रथोंसे व्याप्त नगर दृष्टिगोचर होते थे। इन सबको देखता हुआ रावण आगे बढ़ा॥ २२—२५ १/२ ॥

फिर उसने सिंधुराजके तटपर एक ऐसा स्थान देखा, जो स्वर्गके समान मनोहर, सब ओरसे समतल और स्निग्ध था। वहाँ मन्द-मन्द वायु चलती थी, जिसका स्पर्श बड़ा कोमल जान पड़ता था॥ २६ १/२ ॥

वहाँ सागरतटपर एक बरगदका वृक्ष दिखायी दिया, जो अपनी घनी छायाके कारण मेघोंकी घटाके समान प्रतीत होता था। उसके नीचे चारों ओर मुनि निवास करते थे। उस वृक्षकी सुप्रसिद्ध शाखाएँ चारों ओर सौ योजनोंतक फैली हुई थीं॥ २७ १/२ ॥

यह वही वृक्ष था, जिसकी शाखापर किसी समय महाबली गरुड़ एक विशालकाय हाथी और कछुएको लेकर उन्हें खानेके लिये आ बैठे थे॥ २८ १/२ ॥

पक्षियोंमें श्रेष्ठ महाबली गरुड़ने बहुसंख्यक पत्तोंसे भरी हुई उस शाखाको सहसा अपने भारसे तोड़ डाला था॥ २९ १/२ ॥

उस शाखाके नीचे बहुत-से वैखानस, माष, बालखिल्य, मरीचिप (सूर्य-किरणोंका पान करनेवाले), ब्रह्मपुत्र और धूम्रप संज्ञावाले महर्षि एक साथ रहते थे॥ ३० १/२ ॥

उनपर दया करके उनके जीवनकी रक्षा करनेके लिये पक्षियोंमें श्रेष्ठ धर्मात्मा गरुड़ने उस टूटी हुई सौ योजन लंबी शाखाको और उन दोनों हाथी तथा कछुएको भी वेगपूर्वक एक ही पंजेसे पकड़ लिया तथा आकाशमें ही उन दोनों जंतुओंके मांस खाकर फेंकी हुई उस डालीके द्वारा निषाद देशका संहार कर डाला। उस समय पूर्वोक्त महामुनियोंको मृत्युके संकटसे बचा लेनेसे गरुड़को अनुपम हर्ष प्राप्त हुआ॥ ३१—३३ ॥

उस महान् हर्षसे बुद्धिमान् गरुड़का पराक्रम दूना हो गया और उन्होंने अमृत ले आनेके लिये पक्का निश्चय कर लिया॥ ३४ ॥

तत्पश्चात् इन्द्रलोकमें जाकर उन्होंने इन्द्रभवनकी उन जालियोंको तोड़ डाला, जो लोहेकी सींकचोंसे बनी हुई थीं। फिर रत्ननिर्मित श्रेष्ठ भवनको नष्टभ्रष्ट करके वहाँ छिपाकर रखे हुए अमृतको वे महेन्द्रभवनसे हर लाये॥ ३५ ॥

गरुड़के द्वारा तोड़ी हुई डालीका वह चिह्न उस बरगदमें उस समय भी मौजूद था। उस वृक्षका नाम था सुभद्रवट। बहुत-से महर्षि उस वृक्षकी छायामें निवास करते थे। कुबेरके छोटे भाई रावणने उस वटवृक्षको देखा॥ ३६ ॥

नदियोंके स्वामी समुद्रके दूसरे तटपर जाकर उसने एक रमणीय वनके भीतर पवित्र एवं एकान्तस्थानमें एक आश्रमका दर्शन किया॥ ३७ ॥

वहाँ शरीरमें काला मृगचर्म और सिरपर जटाओंका समूह धारण किये नियमित आहार करते हुए मारीच नामक राक्षस निवास करता था। रावण वहाँ जाकर उससे मिला॥ ३८ ॥

मिलनेपर उस राक्षस मारीचने सब प्रकारके अलौकिक कमनीय पदार्थ अर्पित करके राजा रावणका विधिपूर्वक आतिथ्य-सत्कार किया॥ ३९ ॥

अन्न और जलसे स्वयं उसका पूर्ण सत्कार करके मारीचने प्रयोजनकी बातें पूछते हुए उससे इस प्रकार कहा— ॥ ४० ॥

‘राजन्! तुम्हारी लङ्कामें कुशल तो है? राक्षसराज! तुम किस कामके लिये पुनः इतनी जल्दी यहाँ आये हो?॥ ४१ ॥

मारीचके इस प्रकार पूछनेपर बातचीत करनेमें कुशल महातेजस्वी रावणने उससे इस प्रकार कहा— ॥ ४२ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें पैंतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३५॥