श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पञ्चानबेवाँ सर्ग
पञ्चानबेवाँ सर्ग
रावणका अपने मन्त्रियोंको बुलाकर शत्रुवधविषयक अपना उत्साह प्रकट करना और सबके साथ रणभूमिमें आकर पराक्रम दिखाना
रावणने लङ्काके घर-घरमें शोकमग्न राक्षसियोंका करुणाजनक विलाप सुना॥ १ ॥
वह लम्बी साँस खींचकर दो घड़ीतक ध्यानमग्न हो कुछ सोचता रहा; तत्पश्चात् रावण अत्यन्त कुपित हो बड़ा भयानक दिखायी देने लगा॥ २ ॥
उसने दाँतोंसे ओठ दबा लिया। उसकी आँखें रोषसे लाल हो गयीं। वह मूर्तिमान् प्रलयाग्निके समान दिखायी देने लगा। राक्षसोंके लिये भी उसकी ओर देखना कठिन हो गया॥ ३ ॥
उस राक्षसराजने अपने पास खड़े हुए राक्षसोंसे अस्पष्ट शब्दोंमें वार्तालाप आरम्भ किया। उस समय वहाँ वह इस तरह देख रहा था, मानो अपने नेत्रोंसे दग्ध कर डालेगा॥ ४ ॥
उसने कहा—‘निशाचरो! महोदर, महापार्श्व तथा राक्षस विरुपाक्षसे शीघ्र जाकर कहो—‘तुमलोग मेरी आज्ञासे शीघ्र ही सेनाओंको कूच करनेका आदेश दो’॥ ५ ॥
रावणकी यह बात सुनकर भयसे पीड़ित हुए उन राक्षसोंने राजाकी आज्ञाके अनुसार उन निर्भीक निशाचरोंको पूर्वोक्त कार्य करनेके लिये प्रेरित किया॥ ६ ॥
तब ‘तथास्तु’ कहकर भयानक दीखनेवाले उन सभी राक्षसोंने अपने लिये स्वस्तिवाचन करवाया और युद्धके लिये प्रस्थान किया॥ ७ ॥
स्वामीकी विजय चाहनेवाले वे सभी महारथी वीर यथोचित रीतिसे रावणका आदर-सम्मान करके उसके सामने हाथ जोड़े खड़े हो गये॥ ८ ॥
तत्पश्चात् रावण क्रोधसे मूर्च्छित-सा होकर बड़े जोरसे हँस पड़ा और महोदर, महापार्श्व तथा राक्षस विरुपाक्षसे कहा— ॥ ९ ॥
‘आज अपने धनुषसे छूटे हुए तीखे बाणोंद्वारा, जो प्रलयकालके सूर्य-सदृश तेजस्वी हैं, मैं राम और लक्ष्मणको भी यमलोक पहुँचा दूँगा॥ १० ॥
‘आज शत्रुंका वध करके खर, कुम्भकर्ण, प्रहस्त तथा इन्द्रजित्के मारे जानेका भरपूर बदला चुकाऊँगा॥
‘मेरे बाण मेघोंकी घटाके समान सब ओर छा जायँगे; अतः अन्तरिक्ष, दिशाएँ, आकाश तथा समुद्र— कुछ भी दिखायी न देगा॥ १२ ॥
‘आज अपने धनुषसे पङ्खवाले बाणोंका जाल-सा बिछा दूँगा और वानरोंके मुख्य-मुख्य यूथोंका पृथक्-पृथक् वध करूँगा॥ १३ ॥
‘आज वायुके समान वेगशाली रथपर आरूढ़ हो मैं अपने धनुषरूपी समुद्रसे उठी हुई बाणमयी तरङ्गोंसे वानर-सेनाओंको मथ डालूँगा॥ १४ ॥
‘कमल-केसरकी-सी कान्तिवाले वानरोंके यूथ सरोवरोंके समान हैं। उनके मुख ही उन सरोवरोंके भीतर प्रफुल्ल कमलके समान सुशोभित होते हैं। आज मैं हाथीके समान उनमें प्रवेश करके उन वानर-यूथरूपी सरोवरोंको मथ डालूँगा॥ १५ ॥
‘आज युद्धस्थलमें गिरे हुए वानर-यूथपति अपने बाणविद्ध मुखोंद्वारा नालयुक्त कमलोंका भ्रम उत्पन्न करते हुए रणभूमिकी शोभा बढ़ायेंगे॥ १६ ॥
‘आज युद्धभूमिमें धनुषसे छूटे हुए एक-एक बाणसे मैं वृक्ष लेकर जूझनेवाले सौ-सौ प्रचण्ड वानरोंको विदीर्ण करूँगा॥ १७ ॥
‘आज शत्रुका वध करके मैं उन सब निशाचरोंके आँसू पोछूँगा, जिनके भाई और पुत्र इस युद्धमें मारे गये हैं॥ १८ ॥
आज युद्धमें मेरे बाणोंसे विदीर्ण तथा निर्जीव हुए वानर इस तरह बिछ जायँगे कि वहाँकी भूमि बड़े यत्नसे दीख सकेगी॥ १९ ॥
‘आज अपने बाणोंद्वारा मारे गये शत्रुओंके मांसोंसे मैं कौओं, गीधों तथा जो दूसरे मांसभक्षी जन्तु हैं, उन सबको भी तृप्त करूँगा॥ २० ॥
‘जल्दी मेरा रथ तैयार किया जाय, शीघ्र धनुष लाया जाय तथा मरनेसे बचे हुए निशाचर युद्धमें मेरे पीछे-पीछे चलें’॥ २१ ॥
रावणका वह वचन सुनकर महापार्श्वने वहाँ खड़े हुए सेनापतियोंसे कहा— ‘सेनाको शीघ्र ही कूच करनेकी आज्ञा दो’॥ २२ ॥
यह आज्ञा पाकर वे शीघ्रपराक्रमी सेनाध्यक्ष घरघर जाकर उन राक्षसोंको तैयार होनेका आदेश देते हुए सारी लङ्कामें घूमते फिरे॥ २३ ॥
थोड़ी ही देरमें भयंकर मुख एवं आकारवाले राक्षस गर्जना करते हुए वहाँ आ पहुँचे। उनके हाथोंमें नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र थे॥ २४ ॥
तलवार, पट्टिश, शूल, गदा, मूसल, हल, तीखी धारवाली शक्ति, बड़े-बड़े कूटमुद्गर, डंडे, भाँतिभाँ तिके चक्र, तीखे फरसे, भिन्दिपाल, शतघ्नी तथा अन्य प्रकारके उत्तमोत्तम अस्त्र-शस्त्रोंसे वे सम्पन्न थे॥
रावणकी आज्ञासे चार सेनापति एक लाखसे कुछ अधिक रथ, तीन लाख हाथी, साठ करोड़ घोड़े, उतने ही गदहे तथा ऊँट और असंख्य पैदल योद्धा लेकर आ पहुँचे। वे सब सैनिक राजाके आदेशसे वहाँ गये॥ २७-२८ ॥
इस प्रकार विशाल सेना लाकर सेनाध्यक्षोंने राक्षसराज रावणके सामने खड़ी कर दी। इसी बीचमें सारथिने एक रथ लाकर उपस्थित कर दिया॥ २९ ॥
उसमें उत्तम दिव्यास्त्र रखे थे, अनेक प्रकारके अलंकारोंसे उस रथको सजाया गया था। उसमें भाँतिभाँ तिके हथियार थे और वह रथ घुँघुरुदार झालरोंसे सुशोभित था॥ ३० ॥
उसमें नाना प्रकारके रन्त जड़े हुए थे। रन्तमय खम्भे उसकी शोभा बढ़ाते थे और सोनेके बने हुए सहस्रों कलशोंसे वह अलंकृत था॥ ३१ ॥
उस रथको देखकर सब राक्षस अत्यन्त आश्चर्यसे चकित हो उठे। उसपर दृष्टि पड़ते ही राक्षसराज रावण सहसा उठकर खड़ा हो गया। वह रथ करोड़ों सूर्योंके समान तेजस्वी तथा प्रज्वलित अग्निके सदृश दीप्तिमान् था। उसमें आठ घोड़े जुते हुए थे। उसपर सारथि बैठा था। वह रथ अपने तेजसे प्रकाशित होता था। रावण तुरंत उस भयंकर रथपर आरूढ़ हो गया॥ ३२-३३ ॥
तदनन्तर बहुत-से राक्षसोंसे घिरा हुआ रावण सहसा युद्धके लिये प्रस्थित हुआ। वह अपने बलकी अधिकतासे पृथ्वीको विदीर्ण-सा करता हुआ जा रहा था॥ ३४ ॥
फिर तो जहाँ-तहाँ सब ओर वाद्योंका महानाद गूँज उठा। मृदङ्ग, पटह, शङ्ख तथा राक्षसोंके कलहकी ध्वनि भी उसमें मिली हुई थी॥ ३५ ॥
‘सीताको चुरानेवाला, दुराचारी, ब्रह्महत्यारा तथा देवताओंके लिये कण्टकरूप राक्षसराज रावण छत्र एवं चँवर लगाये श्रीरघुनाथजीके साथ युद्ध करनेके लिये आ रहा है; इस प्रकारकी कलह-ध्वनि कानोंमें पड़ रही थी॥
उस महानादसे पृथ्वी काँप उठी। उस भयानक शब्दको सुनकर सब वानर सहसा भयसे भाग चले॥ ३७ ॥
मन्त्रियोंसे घिरा हुआ महातेजस्वी महाबाहु रावण युद्धमें विजयकी प्राप्तिका उद्देश्य लेकर वहाँ आया॥ ३८ ॥
रावणकी आज्ञा पाकर उस समय महापार्श्व, महोदर तथा दुर्जय वीर विरूपाक्ष—तीनों ही रथोंपर आरूढ़ हुए॥ ३९ ॥
वे हर्षपूर्वक जोर-जोरसे इस तरह दहाड़ रहे थे, मानो पृथिवीको विदीर्ण कर डालेंगे। वे विजयकी इच्छा मनमें लिये घोर सिंहनाद करते हुए पुरीसे बाहर निकले॥
तदनन्तर काल, मृत्यु और यमराजके समान भयंकर तेजस्वी रावण धनुष हाथमें ले राक्षसोंकी सेनासे घिरकर युद्धके लिये आगे बढ़ा॥ ४१ ॥
उसके रथके घोड़े बहुत तेज चलनेवाले थे। उसके द्वारा वह महारथी वीर लङ्काके उसी द्वारसे बाहर निकला, जहाँ श्रीराम और लक्ष्मण मौजूद थे॥ ४२ ॥
उस समय सूर्यकी प्रभा फीकी पड़ गयी। समस्त दिशाओंमें अन्धकार छा गया, भयंकर पक्षी अशुभ बोली बोलने लगे और धरती डोलने लगी॥ ४३ ॥
बादल रक्तकी वर्षा करने लगे। घोड़े लड़खड़ाकर गिर पड़े। ध्वजके अग्रभागपर गीध आकर बैठ गया और गीदड़ियाँ अमङ्गलसूचक बोली बोलने लगीं॥ ४४ ॥
बाँयी आँख फड़कने लगी। बाँयीं भुजा सहसा काँप उठी। उसके चेहरेका रंग फीका पड़ गया और आवाज कुछ बदल गयी॥ ४५ ॥
राक्षस दशग्रीव ज्यों ही युद्धके लिये निकला, त्यों ही रणभूमिमें उसकी मृत्युके सूचक लक्षण प्रकट होने लगे॥ ४६ ॥
आकाशसे उल्कापात हुआ। उससे वज्रपातके समान गड़गड़ाहट पैदा हुई। अमङ्गलसूचक पक्षी गीध कौओंसे मिलकर अशुभ बोली बोलने लगे॥ ४७ ॥
इन भयंकर उत्पातोंको सामने उपस्थित देखकर भी रावणने उनकी कोई परवा नहीं की। वह कालसे प्रेरित हो मोहवश अपने ही वधके लिये निकल पड़ा॥
उन महाकाय राक्षसोंके रथका गम्भीर घोष सुनकर वानरोंकी सेना भी युद्धके लिये ही उनके सामने आकर डट गयी॥ ४९ ॥
फिर तो अपनी-अपनी जीत चाहते हुए रोषपूर्वक एक-दूसरेको ललकारनेवाले वानरों और राक्षसोंमें तुमुल युद्ध छिड़ गया॥ ५० ॥
उस समय दशमुख रावण अपने सुवर्णभूषित बाणोंद्वारा वानरोंकी सेनाओंमें रोषपूर्वक बड़ी भारी मार-काट मचाने लगा॥ ५१ ॥
रावणने कितने ही वानरोंके सिर काट लिये, कितनोंकी छाती छेद डाली और बहुतोंके कान उड़ा दिये॥
कितनोंने घायल होकर प्राण त्याग दिये। रावणने कितने ही वानरोंकी पसलियाँ फाड़ डालीं, कितनोंके मस्तक कुचल डाले और कितनोंकी आँखें चौपट कर दीं॥ ५३ ॥
दशमुख रावणके नेत्र क्रोधसे घूम रहे थे। वह अपने रथके द्वारा युद्धस्थलमें जहाँ-जहाँ गया, वहाँ-वहाँ वे वानरयूथपति उसके बाणोंका वेग न सह सके॥ ५४ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें पञ्चानबेवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ९५ ॥