सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

पचासीवाँ सर्ग

⬅ विषय-सूची (TOC)

पचासीवाँ सर्ग

भगवान् विष्णुके तेजका इन्द्र और वज्र आदिमें प्रवेश, इन्द्रके वज्रसे वृत्रासुरका वध तथा ब्रह्महत्याग्रस्त इन्द्रका अन्धकारमय प्रदेशमें जाना

लक्ष्मणका यह कथन सुनकर शत्रुओंका संहार करनेवाले श्रीरामचन्द्रजीने कहा—'उत्तम व्रतका पालन करनेवाले सुमित्राकुमार! वृत्रासुरके वधकी पूरी कथा कह सुनाओ'॥ १॥

श्रीरामचन्द्रजीके इस प्रकार आदेश देनेपर उत्तम व्रतके पालक सुमित्रानन्दन लक्ष्मणने पुनः उस दिव्य कथाको सुनाना आरम्भ किया—॥ २॥

“प्रभो! सहस्रनेत्रधारी इन्द्र तथा सम्पूर्ण देवताओंकी वह प्रार्थना सुनकर भगवान् विष्णुने इन्द्र आदि सब देवताओंसे इस प्रकार कहा—॥ ३॥

“देवताओ! तुम्हारी इस प्रार्थनाके पहलेसे ही मैं महामना वृत्रासुरके स्नेह-बन्धनमें बँधा हुआ हूँ। इसलिये तुम्हारा प्रिय करनेके उद्देश्यसे मैं उस महान् असुरका वध नहीं करूँगा॥ ४॥

“परंतु तुम सबके उत्तम सुखकी व्यवस्था करना मेरा आवश्यक कर्तव्य है; इसलिये मैं ऐसा उपाय बताऊँगा, जिससे देवराज इन्द्र उसका वध कर सकेंगे॥ ५॥

“सुरश्रेष्ठगण! मैं अपने स्वरूपभूत तेजको तीन भागोंमें विभक्त करूँगा, जिससे इन्द्र निस्संदेह वृत्रासुरका वध कर डालेंगे॥ ६॥

“मेरे तेजका एक अंश इन्द्रमें प्रवेश करे, दूसरा वज्रमें व्याप्त हो जाय और तीसरा भूतलको चला जाय* तब इन्द्र वृत्रासुरका वध कर सकेंगे'॥ ७॥

‘देवेश्वर भगवान् विष्णुके ऐसा कहनेपर देवता बोले—'दैत्यविनाशन! आप जो कहते हैं, ठीक ऐसी ही बात है, इसमें संदेह नहीं। आपका कल्याण हो। हमलोग वृत्रासुरके वधकी इच्छा मनमें लिये यहाँसे लौट जायँगे। परम उदार प्रभो! आप अपने तेजके द्वारा देवराज इन्द्रको अनुगृहीत करें'॥ ८-९॥

‘तत्पश्चात् इन्द्र आदि सभी महामनस्वी देवता उस वनमें गये, जहाँ महान् असुर वृत्र तपस्या करता था॥

‘उन्होंने देखा, असुरश्रेष्ठ वृत्रासुर अपने तेजसे सब ओर व्याप्त हो रहा है और ऐसी तपस्या कर रहा है, मानो उसके द्वारा तीनों लोकोंको पी जायगा और आकाशको भी दग्ध कर डालेगा॥

११ ॥

‘उस असुरश्रेष्ठ वृत्रको देखते ही देवतालोग घबरा गये और सोचने लगे—‘हम कैसे इसका वध करेंगे? और किस उपायसे हमारी पराजय नहीं होने पायेगी?’॥

‘वे लोग वहाँ इस प्रकार सोच ही रहे थे कि सहस्रनेत्रधारी इन्द्रने दोनों हाथोंसे वज्र उठाकर उसे वृत्रासुरके मस्तकपर दे मारा॥ १३ ॥

‘इन्द्रका वह वज्र प्रलयकालकी अग्निके समान भयंकर और दीप्तिमान् था। उससे बड़ी भारी लपटें उठ रही थीं। उसकी चोटसे कटकर जब वृत्रासुरका मस्तक गिरा, तब सारा संसार भयभीत हो उठा॥ १४ ॥

‘निरपराध वृत्रासुरका वध करना उचित नहीं था, अतः उसके कारण महायशस्वी देवराज इन्द्र बहुत चिन्तित हुए और तुरंत ही सब लोकोंके अन्तमें लोकालोक पर्वतसे परवर्ती अन्धकारमय प्रदेशमें चले गये॥ १५ ॥

‘जानेके समय ब्रह्महत्या तत्काल उनके पीछे लग गयी और उनके अङ्गोंपर टूट पड़ी। इससे इन्द्रके मनमें बड़ा दुःख हुआ॥ १६ ॥

‘देवताओंका शत्रु मारा गया। इसलिये अग्नि आदि सब देवता त्रिभुवनके स्वामी भगवान् विष्णुकी बार-बार स्तुति-पूजा करने लगे। परंतु उनके इन्द्र अदृश्य हो गये थे (इसके कारण उन्हें बड़ा दुःख हो रहा था)॥ १७ ॥

(देवता बोले—) ‘परमेश्वर! आप ही जगत्के आश्रय और आदि पिता हैं। आपने सम्पूर्ण प्राणियोंकी रक्षाके लिये विष्णुरूप धारण किया है॥ १८ ॥

‘आपने ही इस वृत्रासुरका वध किया है। परंतु ब्रह्महत्या इन्द्रको कष्ट दे रही है; अतः सुरश्रेष्ठ! आप उनके उद्धारका कोई उपाय बताइये’॥ १९ ॥

‘देवताओंकी यह बात सुनकर भगवान् विष्णु बोले—‘इन्द्र मेरा ही यजन करें। मैं उन वज्रधारी देवराज इन्द्रको पवित्र कर दूँगा॥ २० ॥

“पवित्र अश्वमेध-यज्ञके द्वारा मुझ यज्ञ-पुरुषकी आराधना करके पाकशासन इन्द्र पुनः देवेन्द्रपदको प्राप्त कर लेंगे और फिर उन्हें किसीसे भय नहीं रहेगा’॥ २१ ॥

‘देवताओंके समक्ष अमृतमयी वाणीद्वारा उक्त संदेश देकर देवेश्वर भगवान् विष्णु अपनी स्तुति सुनते हुए परम धामको चले गये॥ २२ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें पचासीवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ८५ ॥


* वृत्र-वधके पश्चात् इन्द्रको लगी हुई ब्रह्महत्याकी निवृत्तिके समयतक इस भूतलकी रक्षा करनेके लिये तथा वृत्रके धराशायी होनेपर उसके भारी शरीरको धारण करनेकी शक्ति देनेके लिये भगवान्‌के तेजके तीसरे अंशका भूतलपर आना आवश्यक था; इसलिये ऐसा हुआ।