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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

नब्बेवाँ सर्ग

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नब्बेवाँ सर्ग

अश्वमेधके अनुष्ठानसे इलाको पुरुषत्वकी प्राप्ति

श्रीरामचन्द्रजी जब पुरूरवाके जन्मकी अद्भुत कथा कह गये, तब लक्ष्मण तथा महायशस्वी भरतने पुनः पूछा— ॥ १ ॥

‘नरश्रेष्ठ! सोमपुत्र बुधके यहाँ एक वर्षतक निवास करनेके पश्चात् इलाने क्या किया, यह ठीक-ठीक बतानेकी कृपा करें’॥ २ ॥

प्रश्न करते समय उन दोनों भाइयोंकी वाणीमें बड़ा माधुर्य था। उसे सुनकर श्रीरामने प्रजापतिपुत्र इलके विषयमें फिर इस प्रकार कथा आरम्भ की— ॥ ३ ॥

‘शूरवीर! इल जब एक मासके लिये पुरुषभावको प्राप्त हुए, तब परम बुद्धिमान् महायशस्वी बुधने परम उदार महात्मा संवर्तको बुलाया॥ ४ ॥

‘भृगुपुत्र च्यवन मुनि, अरिष्टनेमि, प्रमोदन, मोदकर और दुर्वासा मुनिको भी आमन्त्रित किया॥ ५ ॥

‘इन सबको बुलाकर बातचीतकी कला जाननेवाले तत्त्वदर्शी बुधने धैर्यसे एकाग्रचित्त रहनेवाले इन सभी सुहृदोंसे कहा— ॥ ६ ॥

‘“ये महाबाहु राजा इल प्रजापति कर्दमके पुत्र हैं। इनकी जैसी स्थिति है, इसे आप सब लोग जानते हैं। अतः इस विषयमें ऐसा कोई उपाय कीजिये, जिससे इनका कल्याण हो’॥ ७ ॥

‘वे सब इस प्रकार बातचीत कर ही रहे थे कि महात्मा द्विजॉंके साथ महातेजस्वी प्रजापति कर्दम भी उस आश्रमपर आ पहुँचे॥ ८ ॥

‘साथ ही पुलस्त्य, क्रतु, वषट्कार तथा महातेजस्वी ओंकार भी उस आश्रमपर पधारे॥ ९ ॥

‘परस्पर मिलनेपर वे सभी महर्षि प्रसन्नचित्त हो बाह्लिकदेशके स्वामी राजा इलका हित चाहते हुए भिन्न-भिन्न प्रकारकी राय देने लगे॥ १० ॥

‘तब कर्दमने पुत्रके लिये अत्यन्त हितकर बात कही—‘ब्राह्मणो! आपलोग मेरी बात सुनें, जो इस राजाके लिये कल्याणकारिणी होगी॥ ११ ॥

“मैं भगवान् शङ्करके सिवा दूसरे किसीको ऐसा नहीं देखता, जो इस रोगकी दवा कर सके तथा अश्वमेध-यज्ञसे बढ़कर दूसरा कोई ऐसा यज्ञ नहीं है, जो महात्मा महादेवजीको प्रिय हो॥ १२ ॥

“अतः हम सब लोग राजा इलके हितके लिये उस दुष्कर यज्ञका अनुष्ठान करें।’ कर्दमके ऐसा कहनेपर उन सभी श्रेष्ठ ब्राह्मणोंने भगवान् रुद्रकी आराधनाके लिये उस यज्ञका अनुष्ठान ही अच्छा समझा॥ १३ १/२ ॥

‘संवर्तके शिष्य तथा शत्रुनगरीपर विजय पानेवाले सुप्रसिद्ध राजर्षि मरुत्तने उस यज्ञका आयोजन किया॥

‘फिर तो बुधके आश्रमके निकट वह महान् यज्ञ सम्पन्न हुआ तथा उससे महायशस्वी रुद्रदेवको बड़ा संतोष प्राप्त हुआ॥ १५ १/२ ॥

‘यज्ञ समाप्त होनेपर परमानन्दसे परिपूर्णचित्त हुए भगवान् उमापतिने इलके पास ही उन सब ब्राह्मणोंसे कहा—॥ १६ १/२ ॥

“द्विजश्रेष्ठगण! मैं तुम्हारी भक्ति तथा इस अश्वमेध-यज्ञके अनुष्ठानसे बहुत प्रसन्न हूँ। बताओ, मैं बाह्लिकनरेश इलका कौन-सा शुभ एवं प्रिय कार्य करूँ?’॥ १७ १/२ ॥

‘देवेश्वर शिवके ऐसा कहनेपर वे सब ब्राह्मण एकाग्रचित्त हो उन देवाधिदेवको इस तरह प्रसन्न करनेकी चेष्टा करने लगे, जिससे नारी इला सदाके लिये पुरुष इल हो जाय॥ १८ १/२ ॥

‘तब प्रसन्न हुए महातेजस्वी महादेवजीने इलाको सदाके लिये पुरुषत्व प्रदान कर दिया और ऐसा करके वे वहीं अन्तर्धान हो गये॥ १९ १/२ ॥

‘अश्वमेध-यज्ञ समाप्त होनेपर जब महादेवजी दर्शन देकर अदृश्य हो गये, तब वे सब दीर्घदर्शी ब्राह्मण जैसे आये थे, वैसे लौट गये॥ २० १/२ ॥

‘राजा इलने बाह्लिकदेशको छोड़कर मध्य-देशमें (गङ्गा-यमुनाके संगमके निकट) एक परम उत्तम एवं यशस्वी नगर बसाया, जिसका नाम था प्रतिष्ठानपुर*॥ २१ १/२ ॥

‘शत्रुनगरीपर विजय पानेवाले राजर्षि शशबिन्दुने बाह्लिकदेशका राज्य ग्रहण किया और प्रजापति कर्दमके पुत्र बलवान् राजा इल प्रतिष्ठानपुरके शासक हुए॥

‘समय आनेपर राजा इल शरीर छोड़कर परम उत्तम ब्रह्मलोकको प्राप्त हुए और इलाके पुत्र राजा पुरूरवाने प्रतिष्ठानपुरका राज्य प्राप्त किया॥ २३ १/२ ॥

‘पुरुषश्रेष्ठ भरत और लक्ष्मण! अश्वमेध-यज्ञका ऐसा ही प्रभाव है। जो स्त्रीरूप हो गये थे, उन राजा इलने इस यज्ञके प्रभावसे पुरुषत्व प्राप्त कर लिया तथा और भी दुर्लभ वस्तुएँ हस्तगत कर लीं’॥ २४ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें नब्बेवाँ सर्ग पूरा हुआ॥

९० ॥