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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

नब्बेवाँ सर्ग

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नब्बेवाँ सर्ग

इन्द्रजित् और लक्ष्मणका भयंकर युद्ध तथा इन्द्रजित्का वध

घोड़ोंके मारे जानेपर पृथ्वीपर खड़े हुए महातेजस्वी निशाचर इन्द्रजित्का क्रोध बहुत बढ़ गया। वह तेजसे प्रज्वलित-सा हो उठा॥ १ ॥

इन्द्रजित् और लक्ष्मण दोनोंके हाथमें धनुष थे। दोनों ही अपनी-अपनी विजयके लिये एक-दूसरेके सम्मुख युद्धमें प्रवृत्त हुए थे। वे अपने बाणोंद्वारा परस्पर वधकी इच्छा रखकर वनमें लड़नेके लिये निकले हुए दो गजराजोंके समान एक-दूसरेपर गहरी चोट करने लगे॥

वानर और राक्षस भी परस्पर संहार करते हुए इधर-उधर दौड़ते रहे; परंतु अपने-अपने स्वामीका साथ न छोड़ सके॥ ३ ॥

तदनन्तर रावणकुमारने प्रसन्न हो प्रशंसा करके राक्षसोंका हर्ष बढ़ाते हुए कहा—॥ ४ ॥

‘श्रेष्ठ निशाचरो! चारों दिशाओंमें अन्धकार छा रहा है, अतः यहाँ अपने या परायेकी पहचान नहीं हो रही है॥ ५ ॥

‘इसलिये मैं जाता हूँ। दूसरे रथपर बैठकर शीघ्र ही युद्धके लिये आऊँगा। तबतक तुमलोग वानरोंको मोहमें डालनेके लिये निर्भय होकर ऐसा युद्ध करो, जिससे ये महामनस्वी वानर नगरमें प्रवेश करते समय मेरा सामना करनेके लिये न आवें’॥ ६-७ ॥

ऐसा कहकर शत्रुहन्ता रावणकुमार वानरोंको चकमा दे रथके लिये लङ्कापुरीमें चला गया॥ ८ ॥

उसने एक सुवर्णभूषित सुन्दर रथको सजाकर उसके ऊपर प्रास, खड्ग तथा बाण आदि आवश्यक सामग्री रखी, फिर उसमें उत्तम घोड़े जुतवाये और अश्व हाँकनेकी विद्याके जानकार तथा हितकर उपदेश देनेवाले सारथिको उसपर बिठाकर वह महातेजस्वी समरविजयी रावणकुमार स्वयं भी उस रथपर आरूढ़ हुआ॥ ९-१० ॥

फिर प्रमुख राक्षसोंको साथ ले वीर मन्दोदरीकुमार कालशक्तिसे प्रेरित हो नगरसे बाहर निकला॥ ११ ॥

नगरसे निकलकर इन्द्रजित्ने अपने वेगशाली घोड़ोंद्वारा विभीषणसहित लक्ष्मणपर बलपूर्वक धावा किया॥ १२ ॥

रावणकुमारको रथपर बैठा देख सुमित्रानन्दन लक्ष्मण, महापराक्रमी वानरगण तथा राक्षसराज विभीषण— सबको बड़ा विस्मय हुआ। सभी उस बुद्धिमान् निशाचरकी फुर्ती देखकर दंग रह गये॥ १३ १/२ ॥

तत्पश्चात् क्रोधसे भरे हुए रावणपुत्रने अपने बाण-समूहोंद्वारा रणभूमिमें सैकड़ों और हजारों वानरयूथ पतियोंको गिराना आरम्भ किया॥ १४ १/२ ॥

युद्धविजयी रावणकुमारने अपने धनुषको इतना खींचा कि वह मण्डलाकार बन गया। उसने कुपित हो बड़ी शीघ्रताके साथ वानरोंका संहार आरम्भ किया॥ १५ १/२ ॥

उसके नाराचोंकी मार खाते हुए भयानक पराक्रमी वानर सुमित्राकुमार लक्ष्मणकी शरणमें गये, मानो प्रजाने प्रजापतिकी शरण ली हो॥ १६ १/२ ॥

तब शत्रुके युद्धसे रघुकुलनन्दन लक्ष्मणका क्रोध भड़क उठा। वे रोषसे जल उठे और उन्होंने अपने हाथकी फुर्ती दिखाते हुए उस राक्षसके धनुषको काट दिया॥

यह देख उस निशाचरने तुरंत ही दूसरा धनुष लेकर उसपर प्रत्यञ्चा चढ़ायी; परंतु लक्ष्मणने तीन बाण मारकर उसके उस धनुषको भी काट दिया॥ १८ ॥

धनुष कट जानेपर विषधर सर्पके समान पाँच भयंकर बाणोंद्वारा सुमित्राकुमारने रावणपुत्रकी छातीमें गहरी चोट पहुँचायी॥ १९ ॥

उनके विशाल धनुषसे छूटे हुए वे बाण इन्द्रजित्का शरीर छेदकर लाल रंगके बड़े-बड़े सर्पोंके समान पृथ्वीपर गिर पड़े॥ २० ॥

धनुष कट जानेपर उन बाणोंकी चोट खाकर मुँहसे रक्त वमन करते हुए रावणपुत्रने पुनः एक मजबूत धनुष हाथमें लिया। उसकी प्रत्यञ्चा भी बहुत ही दृढ़ थी॥

फिर तो उसने लक्ष्मणको लक्ष्य करके बड़ी फुर्तीके साथ बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी, मानो देवराज इन्द्र जल बरसा रहे हों॥ २२ ॥

यद्यपि इन्द्रजित्द्वारा की गयी उस बाणवर्षाको रोकना बहुत ही कठिन था तो भी शत्रुदमन लक्ष्मणने बिना किसी घबराहटके उसको रोक दिया॥ २३ ॥

रघुकुलनन्दन महातेजस्वी लक्ष्मणके मनमें तनिक भी घबराहट नहीं थी। उन्होंने उस रावणकुमारको जो अपना पौरुष दिखाया, वह अद्भुत-सा ही था॥ २४ ॥

उन्होंने अत्यन्त कुपित हो अपनी शीघ्र अस्त्र-संचालनकी कलाका प्रदर्शन करते हुए उन समस्त राक्षसोंको प्रत्येकके शरीरमें तीन-तीन बाण मारकर घायल कर दिया तथा राक्षसराजके पुत्र इन्द्रजित्को भी अपने बाण-समूहोंद्वारा गहरी चोट पहुँचायी॥ २५ ॥

शत्रुहन्ता प्रबल शत्रुके बाणोंसे अत्यन्त घायल होकर इन्द्रजित्ने लक्ष्मणपर लगातार बहुत बाण बरसाये॥ २६ ॥

परंतु शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले रथियोंमें श्रेष्ठ धर्मात्मा लक्ष्मणने अपने पासतक पहुँचनेसे पहले ही उन बाणोंको अपने तीखे सायकोंद्वारा काट डाला और रणभूमिमें रथी इन्द्रजित्के सारथिका मस्तक भी झुकी हुई गाँठवाले भल्लसे उड़ा दिया॥ २७ १/२ ॥

सारथिके न रहनेपर भी वहाँ उसके घोड़े व्याकुल नहीं हुए। पूर्ववत् शान्तभावसे रथको ढोते रहे और विभिन्न प्रकारके पैंतरे बदलते हुए मण्डलाकार गतिसे दौड़ लगाते रहे। वह एक अद्भुत-सी बात थी॥ २८ १/२ ॥

सुदृढ़ पराक्रमी सुमित्राकुमार लक्ष्मण अमर्षके वशीभूत हो रणक्षेत्रमें उसके घोड़ोंको भयभीत करनेके लिये उन्हें बाणोंसे बेधने लगे॥ २९ १/२ ॥

रावणकुमार इन्द्रजित् युद्धस्थलमें लक्ष्मणके इस पराक्रमको नहीं सह सका। उसने उन अमर्षशील सुमित्राकुमारको दस बाण मारे॥ ३० १/२ ॥

उसके वे वज्रतुल्य बाण सर्पके विषकी भाँति प्राणघाती थे, तथापि लक्ष्मणके सुनहरी कान्तिवाले कवचसे टकराकर वहीं नष्ट हो गये॥ ३१ ॥

लक्ष्मणका कवच* अभेद्य है, ऐसा जानकर रावणकुमार इन्द्रजित्ने उनके ललाटमें सुन्दर पंखवाले तीन बाण मारे। उसने अपनी अस्त्र चलानेकी फुर्ती दिखाते हुए अत्यन्त क्रोधपूर्वक उन्हें घायल कर दिया। ललाटमें धँसे हुए उन बाणोंसे युद्धकी श्लाघा रखनेवाले रघुकुलनन्दन लक्ष्मण संग्रामके मुहानेपर तीन शिखरोंवाले पर्वतके समान शोभा पा रहे थे॥ ३२-३३ १/२ ॥

उस राक्षसके द्वारा युद्धमें बाणोंसे इस प्रकार पीड़ित किये जानेपर भी लक्ष्मणने उस समय तुरंत पाँच बाणोंका संधान किया और धनुषको खींचकर चलाये हुए उन बाणोंके द्वारा सुन्दर कुण्डलोंसे सुशोभित इन्द्रजित्के मुखमण्डलको क्षत-विक्षत कर दिया॥ ३४-३५ ॥

लक्ष्मण तथा इन्द्रजित् दोनों वीर महाबलवान् थे। उनके धनुष भी बहुत बड़े थे। भयंकर पराक्रम करनेवाले वे दोनों योद्धा एक-दूसरेको बाणोंसे घायल करने लगे॥ ३६ ॥

इससे लक्ष्मण और इन्द्रजित् दोनोंके शरीर लहूलुहान हो गये। रणभूमिमें वे दोनों वीर फूले हुए पलाशके वृक्षोंकी भाँति शोभा पा रहे थे॥ ३७ ॥

उन दोनों धनुर्धर वीरोंके मनमें विजय पानेके लिये दृढ़ संकल्प था, अतः वे आपसमें भिड़कर एक-दूसरेके सभी अङ्गोंको भयंकर बाणोंका निशाना बनाने लगे॥ ३८ ॥

इसी बीचमें समरोचित क्रोधसे युक्त हुए रावणकुमारने विभीषणके सुन्दर मुखपर तीन बाणोंका प्रहार किया॥ ३९ ॥

जिनके अग्रभागमें लोहेके फल लगे हुए थे, ऐसे तीन बाणोंसे राक्षसराज विभीषणको घायल करके इन्द्रजित्ने उन सभी वानर-यूथपतियोंपर एक-एक बाणका प्रहार किया॥ ४० ॥

इससे महातेजस्वी विभीषणको उसपर बड़ा क्रोध आया और उन्होंने अपनी गदासे उस दुरात्मा रावणकुमारके चारों घोड़ोंको मार डाला॥ ४१ ॥

जिसका सारथि पहले ही मारा जा चुका था और अब घोड़े भी मार डाले गये, उस रथसे नीचे कूदकर महातेजस्वी इन्द्रजित्ने अपने चाचापर शक्तिका प्रहार किया॥ ४२ ॥

उस शक्तिको आती देख सुमित्राका आनन्द बढ़ानेवाले लक्ष्मणने तीखे बाणोंसे काट डाला और दस टुकड़े करके उसे पृथ्वीपर गिरा दिया॥ ४३ ॥

तत्पश्चात् सुदृढ़ धनुष धारण करनेवाले विभीषणने जिसके घोड़े मारे गये थे, उस इन्द्रजित्पर कुपित हो उसकी छातीमें पाँच बाण मारे, जिनका स्पर्श वज्रके समान दुःसह था॥ ४४ ॥

सुनहरे पङ्खोंसे सुशोभित और लक्ष्यतक पहुँचनेवाले वे बाण इन्द्रजित्के शरीरको विदीर्ण करके उसके रक्तमें सन गये और लाल रंगके बड़े-बड़े सर्पोंके समान दिखायी देने लगे॥ ४५ ॥

तब महाबली इन्द्रजित्के मनमें अपने चाचाके प्रति बड़ा क्रोध हुआ। उसने राक्षसोंके बीचमें यमराजका दिया हुआ उत्तम बाण हाथमें लिया॥ ४६ ॥

उस महान् बाणको इन्द्रजित्के द्वारा धनुषपर रखा गया देख भयानक पराक्रम करनेवाले महातेजस्वी लक्ष्मणने भी दूसरा बाण उठाया॥ ४७ ॥

उस बाणकी शिक्षा महात्मा कुबेरने स्वप्नमें प्रकट होकर स्वयं उन्हें दी थी। वह बाण इन्द्र आदि देवताओं तथा असुरोंके लिये भी असह्य एवं दुर्जय था॥ ४८ ॥

उन दोनोंकी परिघके समडन मोटी और बलिष्ठ भुजाओंद्वारा जोर-जोरसे खींचे जाते हुए उन दोनोंके श्रेष्ठ धनुष दो क्रौञ्च पक्षियोंके समान शब्द करने लगे॥ ४९ ॥

उन वीरोंने अपने-अपने श्रेष्ठ धनुषपर जो उत्तम सायक रखे थे, वे खींचे जाते ही अत्यन्त तेजसे प्रज्वलित हो उठे॥ ५० ॥

दोनोंके बाण एक साथ ही धनुषसे छूटे और अपनी प्रभासे आकाशको प्रकाशित करने लगे। दोनोंके मुखभाग बड़े वेगसे आपसमें टकरा गये॥ ५१ ॥

उन दोनों भयानक बाणोंकी ज्यों ही टक्कर हुई, उससे दारुण अग्नि प्रकट हो गयी; जिससे धूआँ उठने लगा और चिनगारियाँ दिखायी दीं॥ ५२ ॥

वे दोनों बाण दो महान् ग्रहोंकी भाँति आपसमें टकराकर सैकड़ों टुकड़े हो संग्रामभूमिमें गिर पड़े॥ ५३ ॥

युद्धके मुहानेपर उन दोनों बाणोंको आपसके आघात-प्रतिघातसे व्यर्थ हुआ देख लक्ष्मण और इन्द्रजित् दोनोंको ही उस समय लज्जा हुई। फिर दोनों एक-दूसरेके प्रति अत्यन्त रोषसे भर गये॥ ५४ ॥

सुमित्रानन्दन लक्ष्मणने कुपित होकर वारुणास्त्र उठाया। साथ ही उस रणभूमिमें खड़े हुए इन्द्रजित्ने रौद्रास्त्र उठाया और उसे वारुणास्त्रके प्रतीकारके लिये छोड़ दिया॥ ५५ ॥

उस रौद्रास्त्रसे आहत होकर लक्ष्मणका अत्यन्त अद्भुत वारुणास्त्र शान्त हो गया। तदनन्तर समरविजयी महातेजस्वी इन्द्रजित्ने कुपित होकर दीप्तिमान् आग्नेयास्त्रका संधान किया, मानो वह उसके द्वारा समस्त लोकोंका प्रलय कर देना चाहता हो॥ ५६ ॥

परंतु वीर लक्ष्मणने सूर्यास्त्रके प्रयोगसे उसे शान्त कर दिया। अपने अस्त्रको प्रतिहत हुआ देख रावणकुमार इन्द्रजित् अचेत-सा हो गया॥ ५७ ॥

उसने आसुर नामक शत्रुनाशक तीखे बाणका प्रयोग किया, फिर तो उसके उस धनुषसे चमकते हुए कूट, मुद्गर, शूल, भुशुण्डि, गदा, खड्ग और फरसे निकलने लगे॥

रणभूमिमें उस भयंकर आसुरास्त्रको प्रकट हुआ देख तेजस्वी लक्ष्मणने सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्रोंको विदीर्ण करनेवाले माहेश्वरास्त्रका प्रयोग किया, जिसका समस्त प्राणी मिलकर भी निवारण नहीं कर सकते थे। उस माहेश्वरास्त्रके द्वारा उन्होंने उस आसुरास्त्रको नष्ट कर दिया॥ ५९-६० ॥

इस प्रकार उन दोनोंमें अत्यन्त अद्भुत और रोमाञ्चकारी युद्ध होने लगा। आकाशमें रहनेवाले प्राणी लक्ष्मणको घेरकर खड़े हो गये॥ ६१ ॥

भैरव-गर्जनासे गूँजते हुए वानरों और राक्षसोंके उस भयानक युद्धके छिड़ जानेपर आश्चर्यचकित हुए बहुसंख्यक प्राणी आकाशमें आकर खड़े हो गये। उनसे घिरे हुए उस आकाशकी अद्भुत शोभा हो रही थी॥

ऋषि, पितर, देवता, गन्धर्व, गरुड़ और नाग भी इन्द्रको आगे करके रणभूमिमें सुमित्राकुमारकी रक्षा करने लगे॥ ६३ ॥

तत्पश्चात् लक्ष्मणने दूसरा उत्तम बाण अपने धनुषपर रखा, जिसका स्पर्श आगके समान जलानेवाला था। उसमें रावणकुमारको विदीर्ण कर देनेकी शक्ति थी॥ ६४ ॥

उसमें सुन्दर पर लगे थे। उस बाणका सारा अङ्ग सुडौल एवं गोल था। उसकी गाँठ भी सुन्दर थी। वह बहुत ही मजबूत और सुवर्णसे भूषित था। उसमें शरीरको चीर डालनेकी क्षमता थी। उसे रोकना अत्यन्त कठिन था। उसके आघातको सह लेना भी बहुत मुश्किल था। वह राक्षसोंको भयभीत करनेवाला तथा विषधर सर्पके विषकी भाँति शत्रुके प्राण लेनेवाला था। देवताओंद्वारा उस बाणकी सदा ही पूजा की गयी थी। पूर्वकालके देवासुर संग्राममें हरे रंगके घोड़ोंसे युक्त रथवाले, पराक्रमी, शक्तिमान् एवं महातेजस्वी इन्द्रने उसी बाणसे दानवोंपर विजय पायी थी। उसका नाम था ऐन्द्रास्त्र। वह युद्धके अवसरोंपर कभी पराजित या असफल नहीं हुआ था। शोभासम्पन्न वीर सुमित्राकुमार लक्ष्मणने अपने उत्तम धनुषपर उस श्रेष्ठ बाणको रखकर उसे खींचते हुए अपने अभिप्रायको सिद्ध करनेवाली यह बात कही— 'यदि दशरथनन्दन भगवान् श्रीराम धर्मात्मा और सत्यप्रतिज्ञ हैं तथा पुरुषार्थमें उनकी समानता करनेवाला दूसरा कोई वीर नहीं है तो हे अस्त्र! तुम इस रावणपुत्रका वध कर डालो'॥ ६५—६९ ॥

समराङ्गणमें ऐसा कहकर शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले वीर लक्ष्मणने सीधे जानेवाले उस बाणको कानतक खींचकर ऐन्द्रास्त्रसे संयुक्त करके इन्द्रजित्की ओर छोड़ दिया॥ ७० ॥

धनुषसे छूटते ही ऐन्द्रास्त्रने जगमगाते हुए कुण्डलोंसे युक्त इन्द्रजित्के शिरस्त्राणसहित दीप्तिमान् मस्तकको धड़से काटकर धरतीपर गिरा दिया॥ ७१ ॥

राक्षसपुत्र इन्द्रजित्का कंधेपरसे कटा हुआ वह विशाल सिर, जो खूनसे लथपथ हो रहा था, भूमिपर सुवर्णके समान दिखायी देने लगा॥ ७२ ॥

इस प्रकार मारा जाकर कवच, सिर और शिरस्त्राणसहित रावणकुमार धराशायी हो गया। उसका धनुष दूर जा गिरा॥ ७३ ॥

जैसे वृत्रासुरका वध होनेपर देवता प्रसन्न हुए थे, उसी प्रकार इन्द्रजित्के मारे जानेपर विभीषणसहित समस्त वानर हर्षसे भर गये और जोर-जोरसे सिंहनाद करने लगे॥

आकाशमें देवताओं, महात्मा ऋषियों, गन्धर्वों तथा अप्सराओंका भी विजयजनित हर्षनाद गूँज उठा॥ ७५ ॥

इन्द्रजित्को धराशायी हुआ जान राक्षसोंकी वह विशाल सेना विजयसे उल्लसित हुए वानरोंकी मार खाकर सम्पूर्ण दिशाओंमें भागने लगी॥ ७६ ॥

वानरोंद्वारा मारे जाते हुए राक्षस अपनी सुध-बुध खो बैठे और अस्त्र-शस्त्रोंको छोड़कर तेजीसे भागते हुए लङ्काकी ओर चले गये॥ ७७ ॥

राक्षस बहुत डर गये थे; इसलिये वे सब-के-सब पट्टिश, खड्ग और फरसे आदि शस्त्रोंको त्यागकर सैकड़ोंकी संख्यामें एक साथ ही सब दिशाओंमें भागने लगे॥ ७८ ॥

वानरोंसे पीड़ित होकर कोई डरके मारे लङ्कामें घुस गये, कोई समुद्रमें कूद पड़े और कोई-कोई पर्वतकी चोटीपर चढ़ गये॥ ७९ ॥

इन्द्रजित् मारा गया और रणभूमिमें सो रहा है, यह देख हजारों राक्षसोंमेंसे एक भी वहाँ खड़ा नहीं दिखायी दिया॥ ८० ॥

जैसे सूर्यके अस्त हो जानेपर उसकी किरणें यहाँ नहीं ठहरती हैं, उसी प्रकार इन्द्रजित्के धराशायी होनेपर वे राक्षस वहाँ रुक न सके, सम्पूर्ण दिशाओंमें भाग गये॥ ८१ ॥

महाबाहु इन्द्रजित् निष्प्राण हो जानेपर शान्त किरणोंवाले सूर्य अथवा बुझी हुई आगके समान निस्तेज हो गया॥ ८२ ॥

उस समय राक्षसराजकुमार इन्द्रजित्के समरभूमिमें गिर जानेपर सारे संसारकी अधिकांश पीड़ा नष्ट हो गयी। सबका शत्रु मारा गया और सभी हर्षसे भर गये॥

उस पापकर्मा राक्षसके मारे जानेपर सम्पूर्ण महर्षियोंके साथ भगवान् इन्द्रको बड़ी प्रसन्नता हुई॥

आकाशमें नाचती हुई अप्सराओं और गाते हुए महामना गन्धर्वोंके नृत्य और गानकी ध्वनिके साथ देवताओंकी दुन्दुभिका शब्द भी सुनायी देने लगा॥ ८५ ॥

देवता आदि वहाँ फूलोंकी वर्षा करने लगे। वह दृश्य अद्भुत-सा प्रतीत हुआ। उस क्रूरकर्मा राक्षसके मारे जानेपर वहाँकी उड़ती हुई धूल शान्त हो गयी॥ ८६ ॥

सम्पूर्ण लोकोंको भय देनेवाले इन्द्रजित्के धराशायी होनेपर जल स्वच्छ हो गया, आकाश भी निर्मल दिखायी देने लगा और देवता तथा दानव हर्षसे खिल उठे। देवता, गन्धर्व और दानव वहाँ आये और सब एक साथ संतुष्ट होकर बोले—अब ब्राह्मणलोग निश्चिन्त एवं क्लेशशून्य होकर सर्वत्र विचरें॥ ८७-८८ ॥

समराङ्गणमें अप्रतिम बलशाली निशाचरशिरोमणि इन्द्रजित्को मारा गया देख हर्षसे भरे हुए वानर-यूथपति लक्ष्मणका अभिनन्दन करने लगे॥ ८९ ॥

विभीषण, हनुमान् और रीछ-यूथपति जाम्बवान्— ये इस विजयके लिये लक्ष्मणजीका अभिनन्दन करते हुए उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे॥ ९० ॥

हर्ष एवं रक्षाका अवसर पाकर वानर किलकिलाते, कूदते और गर्जते हुए वहाँ रघुकुलनन्दन लक्ष्मणको घेरकर खड़े हो गये॥ ९१ ॥

उस समय अपनी पूँछोंको हिलाते और फटकारते हुए वानर वीर ‘लक्ष्मणकी जय हो’ यह नारा लगाने लगे॥ ९२ ॥

वानरोंका चित्त हर्षसे भरा हुआ था। वे विविध गुणोंवाले वानर एक-दूसरेको हृदयसे लगाकर श्रीरामचन्द्रजीसे सम्बन्ध रखनेवाली कथाएँ कहने लगे॥ ९३ ॥

युद्धस्थलमें लक्ष्मणके प्रिय सुहृद् वानर उनका वह दुष्कर एवं महान् पराक्रम देख बड़े प्रसन्न हुए। देवता भी उस इन्द्रद्रोही राक्षसका वध हुआ देख मनमें बड़े भारी हर्षका अनुभव करने लगे॥ ९४ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें नब्बेवाँ सर्ग पूरा हुआ॥

९० ॥


* पहले लक्ष्मणके कवचके टूटनेका वर्णन आ चुका है। उसके बाद लक्ष्मणने फिर अभेद्य कवच धारण किया था। यह इस प्रसंगसे जाना जाता है।