श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
दसवाँ सर्ग
दसवाँ सर्ग
विभीषणका रावणके महलमें जाना, उसे अपशकुनोंका भय दिखाकर सीताको लौटा देनेके लिये प्रार्थना करना और रावणका उनकी बात न मानकर उन्हें वहाँसे विदा कर देना
दूसरे दिन सबेरा होते ही धर्म और अर्थके तत्त्वको जाननेवाले भीमकर्मा महातेजस्वी वीर विभीषण अपने बड़े भाई राक्षसराज रावणके घर गये। वह घर अनेक प्रासादोंके कारण पर्वतशिखरोंके समूहकी भाँति शोभा पाता था। उसकी ऊँचाई भी पहाड़ की चोटीको लज्जित करती थी। उसमें अलग-अलग बड़ी-बड़ी कक्षाएँ (ड्योढ़ियाँ) सुन्दर ढंगसे बनी हुई थीं। बहुतेरे श्रेष्ठ पुरुषोंका वहाँ आना-जाना लगा रहता था। अनेकानेक बुद्धिमान् महामन्त्री, जो राजाके प्रति अनुराग रखनेवाले थे, उसमें बैठे थे। विश्वसनीय, हितैषी तथा कार्यसाधनमें कुशल बहुसंख्यक राक्षस सब ओरसे उस भवनकी रक्षा करते थे। वहाँकी वायु मतवाले हाथियोंके निःश्वाससे मिश्रित हो बवंडर-सी जान पड़ती थी। शङ्ख-ध्वनिके समान राक्षसोंका गम्भीर घोष वहाँ गूँजता रहता था। नाना प्रकारके वाद्योंके मनोरम शब्द उस भवनको निनादित करते थे। रूप और यौवनके मदसे मतवाली युवतियोंकी वहाँ भीड़-सी लगती रहती थी। वहाँके बड़े-बड़े मार्ग लोगोंके वार्तालापसे मुखरित जान पड़ते थे। उसके फाटक तपाये हुए सुवर्णके बने हुए थे। उत्तम सजावटकी वस्तुओंसे वह महल अच्छी तरह सजा हुआ था, अतएव वह गन्धर्वोंके आवास और देवताओंके निवासस्थान-सा मनोरम प्रतीत होता था। रत्नराशिसे परिपूर्ण होनेके कारण वह नागभवनके समान उद्भासित होता था। जैसे तेजसे विस्तृत किरणोंवाले सूर्य महान् मेघोंकी घटामें प्रवेश करते हैं, उसी प्रकार तेजस्वी विभीषणने रावणके उस भवनमें पदार्पण किया॥ १—७ ॥
वहाँ पहुँचकर उन महातेजस्वी विभीषणने अपने भाईकी विजयके उद्देश्यसे वेदवेत्ता ब्राह्मणोंद्वारा किये गये पुण्याहवाचनके पवित्र घोष सुने॥ ८ ॥
तत्पश्चात् उन महाबली विभीषणने वेदमन्त्रोंके ज्ञाता ब्राह्मणोंका दर्शन किया, जिनके हाथोंमें दही और घीके पात्र थे। फूलों और अक्षतोंसे उन सबकी पूजा की गयी थी॥ ९ ॥
वहाँ जानेपर राक्षसोंने उनका स्वागत-सत्कार किया। फिर उन महाबाहु विभीषणने अपने तेजसे देदीप्यमान और सिंहासनपर विराजमान कुबेरके छोटे भाई रावणको प्रणाम किया॥ १० ॥
तदनन्तर शिष्टाचारके ज्ञाता विभीषण ‘विजयतां महाराजः’ (महाराजकी जय हो) इत्यादि रूपसे राजाके प्रति परम्पराप्राप्त शुभाशंसासूचक वचनका प्रयोग करके राजाके द्वारा दृष्टिके संकेतसे बताये गये सुवर्णभूषित सिंहासनपर बैठ गये॥ ११ ॥
विभीषण जगत्की भली-बुरी बातोंको अच्छी तरह जानते थे। उन्होंने प्रणाम आदि व्यवहारका यथार्थरूपसे निर्वाह करके सान्त्वनापूर्ण वचनोंद्वारा अपने बड़े भाई महामना रावणको प्रसन्न किया और उससे एकान्तमें मन्त्रियोंके निकट देश, काल और प्रयोजनके अनुरूप, युक्तियोंद्वारा निश्चित तथा अत्यन्त हितकारक बात कही—॥ १२-१३ ॥
‘शत्रुओंको संताप देनेवाले महाराज! जबसे विदेहकुमारी सीता यहाँ आयी हैं, तभीसे हमलोगोंको अनेक प्रकारके अमङ्गलसूचक अपशकुन दिखायी दे रहे हैं॥ १४ ॥
‘मन्त्रोंद्वारा विधिपूर्वक धधकानेपर भी आग अच्छी तरह प्रज्वलित नहीं हो रही है। उससे चिनगारियाँ निकलने लगती हैं। उसकी लपटके साथ धुआँ उठने लगता है और मन्थनकालमें जब अग्नि प्रकट होती है, उस समय भी वह धूएँसे मलिन ही रहती है॥ १५ ॥
‘रसोईघरोंमें, अग्निशालाओंमें तथा वेदाध्ययनके स्थानोंमें भी साँप देखे जाते हैं और हवन-सामग्रियोंमें चीटियाँ पड़ी दिखायी देती हैं॥ १६ ॥
‘गायोंका दूध सूख गया है, बड़े-बड़े गजराज मदरहित हो गये हैं, घोड़े नये ग्राससे आनन्दित (भोजनसे संतुष्ट) होनेपर भी दीनतापूर्ण स्वरमें हिनहिनाते हैं॥ १७ ॥
‘राजन्! गधों, ऊँटों और खच्चरोंके रोंगटे खड़े हो जाते हैं। उनके नेत्रोंसे आँसू गिरने लगते हैं। विधिपूर्वक चिकित्सा की जानेपर भी वे पूर्णतः स्वस्थ हो नहीं पाते हैं॥ १८ ॥
‘क्रूर कौए झुंड-के-झुंड एकत्र होकर कर्कश स्वरमें काँव-काँव करने लगते हैं तथा वे सतमहले मकानोंपर समूह-के-समूह इकट्ठे हुए देखे जाते हैं॥ १९ ॥
लङ्कापुरीके ऊपर झुंड-के-झुंड गीध उसका स्पर्श करते हुए-से मड़राते रहते हैं। दोनों संध्याओंके समय सियारिनें नगरके समीप आकर अमङ्गलसूचक शब्द करती हैं॥ २० ॥
‘नगरके सभी फाटकोंपर समूह-के-समूह एकत्र हुए मांसभक्षी पशुओंके जोर-जोरसे किये जानेवाले चीत्कार बिजलीकी गड़गड़ाहटके समान सुनायी पड़ते हैं॥ २१ ॥
‘वीरवर! ऐसी परिस्थितिमें मुझे तो यही प्रायश्चित्त अच्छा जान पड़ता है कि विदेहकुमारी सीता श्रीरामचन्द्रजीको लौटा दी जायँ॥ २२ ॥
‘महाराज! यदि यह बात मैंने मोह या लोभसे कही हो तो भी आपको मुझमें दोषदृष्टि नहीं करनी चाहिये॥
‘सीताका अपहरण तथा इससे होनेवाला अपशकुनरूपी दोष यहाँकी सारी जनता, राक्षस-राक्षसी तथा नगर और अन्तःपुर—सभीके लिये उपलक्षित होता है॥ २४ ॥
‘यह बात आपके कानोंतक पहुँचानेमें प्रायः सभी मन्त्री संकोच करते हैं; परंतु जो बात मैंने देखी या सुनी है वह मुझे तो आपके आगे अवश्य निवेदन कर देनी चाहिये; अतः उसपर यथोचित विचार करके आप जैसा उचित समझें, वैसा करें’॥ २५ ॥
इस प्रकार भार्इ विभीषणने अपने मन्त्रियोंके बीचमें बड़े भार्इ राक्षसराज रावणसे ये हितकारी वचन कहे॥ २६ ॥
विभीषणकी ये हितकर, महान् अर्थकी साधक, कोमल, युक्तिसंगत तथा भूत, भविष्य और वर्तमानकालमें भी कार्यसाधनमें समर्थ बातें सुनकर रावणको बुखार चढ़ आया। श्रीरामके साथ वैर बढ़ानेमें उसकी आसक्ति हो गयी थी। इसलिये उसने इस प्रकार उत्तर दिया—‘विभीषण! मैं तो कहींसे भी कोर्इ भय नहीं देखता। राम मिथिलेशकुमारी सीताको कभी नहीं पा सकते। इन्द्रसहित देवताओंकी सहायता प्राप्त कर लेनेपर भी लक्ष्मणके बड़े भार्इ राम मेरे सामने संग्राममें कैसे टिक सकेंगे?’॥ २७-२८ ॥
ऐसा कहकर देवसेनाके नाशक और समराङ्गणमें प्रचण्ड पराक्रम प्रकट करनेवाले महाबली दशाननने अपने यथार्थवादी भार्इ विभीषणको तत्काल विदा कर दिया॥ २९ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें दसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥
१० ॥