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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

तैंतालीसवाँ सर्ग

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तैंतालीसवाँ सर्ग

भगीरथकी तपस्यासे संतुष्ट हुए भगवान् शङ्करका गंगाको अपने सिरपर धारण करके बिन्दुसरोवरमें छोड़ना और उनका सात धाराओंमें विभक्त हो भगीरथके साथ जाकर उनके पितरोंका उद्धार करना

श्रीराम! देवाधिदेव ब्रह्माजीके चले जानेपर राजा भगीरथ पृथ्वीपर केवल अँगूठेके अग्रभागको टिकाये हुए खड़े हो एक वर्षतक भगवान् शङ्करकी उपासनामें लगे रहे॥ १ ॥

वर्ष पूरा होनेपर सर्वलोकवन्दित उमावल्लभ भगवान् पशुपतिने प्रकट होकर राजासे इस प्रकार कहा— ॥ २ ॥

‘नरश्रेष्ठ! मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ। तुम्हारा प्रिय कार्य अवश्य करूँगा। मैं गिरिराजकुमारी गङ्गादेवीको अपने मस्तकपर धारण करूँगा’॥ ३ ॥

श्रीराम! शङ्करजीकी स्वीकृति मिल जानेपर हिमालयकी ज्येष्ठ पुत्री गङ्गाजी, जिनके चरणोंमें सारा संसार मस्तक झुकाता है, बहुत बड़ा रूप धारण करके अपने वेगको दुस्सह बनाकर आकाशसे भगवान् शङ्करके शोभायमान मस्तकपर गिरीं॥ ४ १/२ ॥

उस समय परम दुर्धर गंगादेवीने यह सोचा था कि मैं अपने प्रखर प्रवाहके साथ शङ्करजीको लिये-दिये पातालमें घुस जाऊँगी॥ ५ १/२ ॥

उनके इस अहंकारको जानकर त्रिनेत्रधारी भगवान् हर कुपित हो उठे और उन्होंने उस समय गंगाको अदृश्य कर देनेका विचार किया॥ ६ १/२ ॥

पुण्यस्वरूपा गंगा भगवान् रुद्रके पवित्र मस्तकपर गिरीं। उनका वह मस्तक जटामण्डलरूपी गुफासे सुशोभित हिमालयके समान जान पड़ता था। उसपर गिरकर विशेष प्रयत्न करनेपर भी किसी तरह वे पृथ्वीपर न जा सकीं॥ ७-८ ॥

भगवान् शिवके जटा-जालमें उलझकर किनारे आकर भी गंगादेवी वहाँसे निकलनेका मार्ग न पा सकीं और बहुत वर्षोंतक उस जटाजूटमें ही भटकती रहीं॥ ९ ॥

रघुनन्दन! भगीरथने देखा, गंगाजी भगवान् शङ्करके जटामण्डलमें अदृश्य हो गयी हैं; तब वे पुनः वहाँ भारी तपस्यामें लग गये। उस तपस्याद्वारा उन्होंने भगवान् शिवको बहुत संतुष्ट कर लिया॥ १० ॥

तब महादेवजीने गङ्गाजीको बिन्दुसरोवरमें ले जाकर छोड़ दिया। वहाँ छूटते ही उनकी सात धाराएँ हो गयीं॥ ११ ॥

ह्लादिनी, पावनी और नलिनी—ये कल्याणमय जलसे सुशोभित गंगाकी तीन मंगलमयी धाराएँ पूर्व दिशाकी ओर चली गयीं॥ १२ ॥

सुचक्षु, सीता और महानदी सिन्धु—ये तीन शुभ धाराएँ पश्चिम दिशाकी ओर प्रवाहित हुईं॥ १३ ॥

उनकी अपेक्षा जो सातवीं धारा थी, वह महाराज भगीरथके रथके पीछे-पीछे चलने लगी। महातेजस्वी राजर्षि भगीरथ भी दिव्य रथपर आरूढ़ हो आगे-आगे चले और गंगा उन्हींके पथका अनुसरण करने लगीं। इस प्रकार वे आकाशसे भगवान् शङ्करके मस्तकपर और वहाँसे इस पृथ्वीपर आयी थीं॥ १४-१५ ॥

गंगाजीकी वह जलराशि महान् कलकल नादके साथ तीव्र गतिसे प्रवाहित हुईं। मत्स्य, कच्छप और शिंशुमार (सूँस) झुंड-के-झुंड उसमें गिरने लगे। उन गिरे हुए जलजन्तुओंसे वसुन्धराकी बड़ी शोभा हो रही थी॥ १६ १/२ ॥

तदनन्तर देवता, ऋषि, गन्धर्व, यक्ष और सिद्धगण नगरके समान आकारवाले विमानों, घोड़ों तथा गजराजोंपर बैठकर आकाशसे पृथ्वीपर गयी हुईं गंगाजीकी शोभा निहारने लगे॥ १७-१८ ॥

देवतालोग आश्चर्यचकित होकर वहाँ खड़े थे। जगत्में गंगावतरणके इस अद्भुत एवं उत्तम दृश्यको देखनेकी इच्छासे अमित तेजस्वी देवताओंका समूह वहाँ जुटा हुआ था॥ १९ १/२ ॥

तीव्र गतिसे आते हुए देवताओं तथा उनके दिव्य आभूषणोंके प्रकाशसे वहाँका मेघरहित निर्मल आकाश इस तरह प्रकाशित हो रहा था, मानो उसमें सैकड़ों सूर्य उदित हो गये हों॥ २० १/२ ॥

शिंशुमार, सर्प तथा चञ्चल मत्स्यसमूहोंके उछलनेसे गंगाजीके जलसे ऊपरका आकाश ऐसा जान पड़ता था, मानो वहाँ चञ्चल चपलाओंका प्रकाश सब ओर व्याप्त हो रहा हो॥ २१ १/२ ॥

वायु आदिसे सहस्रों टुकड़ोंमें बँटे हुए फेन आकाशमें सब ओर फैल रहे थे। मानो शरद्-ऋतुके श्वेत बादल अथवा हंस उड़ रहे हों॥ २२ १/२ ॥

गंगाजीकी वह धारा कहीं तेज, कहीं टेढ़ी और कहीं चौड़ी होकर बहती थी। कहीं बिलकुल नीचेकी ओर गिरती और कहीं ऊँचेकी ओर उठी हुई थी। कहीं समतल भूमिपर वह धीरे-धीरे बहती थी और कहीं-कहीं अपने ही जलसे उसके जलमें बारम्बार टक्करें लगती रहती थीं॥ २३-२४ ॥

गंगाका वह जल बार-बार ऊँचे मार्गपर उठता और पुनः नीची भूमिपर गिरता था। आकाशसे भगवान् शङ्करके मस्तकपर तथा वहाँसे फिर पृथ्वीपर गिरा हुआ वह निर्मल एवं पवित्र गंगाजल उस समय बड़ी शोभा पा रहा था॥

उस समय भूतलनिवासी ऋषि और गन्धर्व यह सोचकर कि भगवान् शङ्करके मस्तकसे गिरा हुआ यह जल बहुत पवित्र है, उसमें आचमन करने लगे॥ २६ १/२ ॥

जो शापभ्रष्ट होकर आकाशसे पृथ्वीपर आ गये थे, वे गंगाके जलमें स्नान करके निष्पाप हो गये तथा उस जलसे पाप धुल जानेके कारण पुनः शुभ पुण्यसे संयुक्त हो आकाशमें पहुँचकर अपने लोकोंको पा गये॥

उस प्रकाशमान जलके सम्पर्कसे आनन्दित हुए सम्पूर्ण जगत्को सदाके लिये बड़ी प्रसन्नता हुई। सब लोग गंगामें स्नान करके पापहीन हो गये॥ २९ १/२ ॥

(हम पहले बता आये हैं कि) राजर्षि महाराज भगीरथ दिव्य रथपर आरूढ़ हो आगे-आगे चल रहे थे और गंगाजी उनके पीछे-पीछे जा रही थीं॥ ३० १/२ ॥

श्रीराम! उस समय समस्त देवता, ऋषि, दैत्य, दानव, राक्षस, गन्धर्व, यक्षप्रवर, किन्नर, बड़े-बड़े नाग, सर्प तथा अप्सरा—ये सब लोग बड़ी प्रसन्नताके साथ राजा भगीरथके रथके पीछे गंगाजीके साथ-साथ चल रहे थे। सब प्रकारके जलजन्तु भी गंगाजीकी उस जलराशिके साथ सानन्द जा रहे थे॥ ३१-३२ १/२ ॥

जिस ओर राजा भगीरथ जाते, उसी ओर समस्त पापोंका नाश करनेवाली सरिताओंमें श्रेष्ठ यशस्विनी गंगा भी जाती थीं॥ ३३ १/२ ॥

उस समय मार्गमें अद्भुत पराक्रमी महामना राजा जह्नु यज्ञ कर रहे थे। गंगाजी अपने जल-प्रवाहसे उनके यज्ञमण्डपको बहा ले गयीं॥ ३४ १/२ ॥

रघुनन्दन! राजा जह्नु इसे गंगाजीका गर्व समझकर कुपित हो उठे; फिर तो उन्होंने गंगाजीके उस समस्त जलको पी लिया। यह संसारके लिये बड़ी अद्भुत बात हुई॥ ३५ १/२ ॥

तब देवता, गन्धर्व तथा ऋषि अत्यन्त विस्मित होकर पुरुषप्रवर महात्मा जह्नुकी स्तुति करने लगे॥ ३६ १/२ ॥

उन्होंने गंगाजीको उन महात्मा नरेशकी कन्या बना दिया। (अर्थात् उन्हें यह विश्वास दिलाया कि गंगाजीको प्रकट करके आप इनके पिता कहलायेंगे।) इससे सामर्थ्यशाली महातेजस्वी जह्नु बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने अपने कानोंके छिद्रोंद्वारा गंगाजीको पुनः प्रकट कर दिया, इसलिये गंगा जह्नुकी पुत्री एवं जाह्नवी कहलाती हैं॥ ३७-३८ ॥

वहाँसे गंगा फिर भगीरथके रथका अनुसरण करती हुईं चलीं। उस समय सरिताओंमें श्रेष्ठ जाह्नवी समुद्रतक जा पहुँचीं और राजा भगीरथके पितरोंके उद्धाररूपी कार्यकी सिद्धिके लिये रसातलमें गयीं॥ ३९ १/२ ॥

राजर्षि भगीरथ भी यत्नपूर्वक गंगाजीको साथ ले वहाँ गये। उन्होंने शापसे भस्म हुए अपने पितामहोंको अचेत-सा होकर देखा॥ ४० १/२ ॥

रघुकुलके श्रेष्ठ वीर! तदनन्तर गंगाके उस उत्तम जलने सगर-पुत्रोंकी उस भस्मराशिको आप्लावित कर दिया और वे सभी राजकुमार निष्पाप होकर स्वर्गमें पहुँच गये॥ ४१ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें तैंतालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४३॥