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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

तेरहवाँ सर्ग

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तेरहवाँ सर्ग

महापार्श्वका रावणको सीतापर बलात्कारके लिये उकसाना और रावणका शापके कारण अपनेको ऐसा करनेमें असमर्थ बताना तथा अपने पराक्रमके गीत गाना

तब रावणको कुपित हुआ जान महाबली महापार्श्वने दो घड़ीतक कुछ सोच-विचार करनेके बाद हाथ जोड़कर कहा— ॥ १ ॥

‘जो हिंसक पशुओं और सर्पोंसे भरे हुए दुर्गम वनमें जाकर वहाँ पीने योग्य मधु पाकर भी उसे पीता नहीं है, वह पुरुष मूर्ख ही है॥ २ ॥

‘शत्रुसूदन महाराज! आप तो स्वयं ही ईश्वर हैं। आपका ईश्वर कौन है? आप शत्रुओंके सिरपर पैर रखकर विदेहकुमारी सीताके साथ रमण कीजिये॥ ३ ॥

‘महाबली वीर! आप कुक्कुटोंके बर्तावको अपनाकर सीताके साथ बलात्कार कीजिये। बारंबार आक्रमण करके उनके साथ रमण एवं उपभोग कीजिये॥ ४ ॥

‘जब आपका मनोरथ सफल हो जायगा, तब फिर आपपर कौन-सा भय आयेगा? यदि वर्तमान एवं भविष्यकालमें कोई भय आया भी तो उस समस्त भयका यथोचित प्रतीकार किया जायगा॥ ५ ॥

‘हमलोगोंके साथ यदि महाबली कुम्भकर्ण और इन्द्रजित् खड़े हो जायँ तो ये दोनों वज्रधारी इन्द्रको भी आगे बढ़नेसे रोक सकते हैं॥ ६ ॥

‘मैं तो नीतिनिपुण पुरुषोंके द्वारा प्रयुक्त साम, दान और भेदको छोड़कर केवल दण्डके द्वारा काम बना लेना ही अच्छा समझता हूँ॥ ७ ॥

‘महाबली राक्षसराज! यहाँ आपके जो भी शत्रु आयेंगे, उन्हें हमलोग अपने शस्त्रोंके प्रतापसे वशमें कर लेंगे, इसमें संशय नहीं है’॥ ८ ॥

महापार्श्वके ऐसा कहनेपर उस समय लङ्काके राजा रावणने उसके वचनोंकी प्रशंसा करते हुए इस प्रकार कहा— ॥ ९ ॥

‘महापार्श्व! बहुत दिन हुए पूर्वकालमें एक गुप्त घटना घटित हुई थी—मुझे शाप प्राप्त हुआ था। अपने जीवनके उस गुप्त रहस्यको आज मैं बता रहा हूँ, उसे सुनो॥ १० ॥

‘एक बार मैंने आकाशमें अग्निशिखाके समान प्रकाशित होती हुई पुञ्जिकस्थला नामकी अप्सराको देखा, जो पितामह ब्रह्माजीके भवनकी ओर जा रही थी। वह अप्सरा मेरे भयसे लुकती-छिपती आगे बढ़ रही थी॥

‘मैंने बलपूर्वक उसके वस्त्र उतार दिये और हठात् उसका उपभोग किया। इसके बाद वह ब्रह्माजीके भवनमें गयी। उसकी दशा हाथीद्वारा मसलकर फेंकी हुई कमलिनीके समान हो रही थी॥ १२ ॥

‘मैं समझता हूँ कि मेरे द्वारा उसकी जो दुर्दशा की गयी थी, वह पितामह ब्रह्माजीको ज्ञात हो गयी। इससे वे अत्यन्त कुपित हो उठे और मुझसे इस प्रकार बोले— ॥ १३ ॥

‘आजसे यदि तू किसी दूसरी नारीके साथ बलपूर्वक समागम करेगा तो तेरे मस्तकके सौ टुकड़े हो जायँगे, इसमें संशय नहीं है’॥ १४ ॥

‘इस तरह मैं ब्रह्माजीके शापसे भयभीत हूँ। इसीलिये अपनी शुभ-शय्यापर विदेहकुमारी सीताको हठात् एवं बलपूर्वक नहीं चढ़ाता हूँ॥ १५ ॥

‘मेरा वेग समुद्रके समान है और मेरी गति वायुके तुल्य है। इस बातको दशरथनन्दन राम नहीं जानते हैं, इसीसे वे मुझपर चढ़ाई करते हैं॥ १६ ॥

‘अन्यथा पर्वतकी कन्दरामें सुखपूर्वक सोये हुए सिंहके समान तथा कुपित होकर बैठी हुई मृत्युके तुल्य भयंकर मुझ रावणको कौन जगाना चाहेगा?॥ १७ ॥

‘मेरे धनुषसे छूटे हुए दो जीभवाले सर्पोंके समान भयंकर बाणोंको समराङ्गणमें श्रीरामने कभी देखा नहीं है, इसीलिये वे मुझपर चढ़े आ रहे हैं॥ १८ ॥

‘मैं अपने धनुषसे शीघ्रतापूर्वक छूटे हुए सैकड़ों वज्रसदृश बाणोंद्वारा रामको उसी प्रकार जला डालूँगा, जैसे लोग उल्काओंद्वारा हाथीको उसे भगानेके लिये जलाते हैं॥ १९ ॥

‘जैसे प्रातःकाल उदित हुए सूर्यदेव नक्षत्रोंकी प्रभाको छीन लेते हैं, उसी प्रकार अपनी विशाल सेनासे घिरा हुआ मैं उनकी उस वानर-सेनाको आत्मसात् कर लूँगा॥ २० ॥

युद्धमें तो हजार नेत्रोंवाले इन्द्र और वरुण भी मेरा सामना नहीं कर सकते। पूर्वकालमें कुबेरके द्वारा पालित हुई इस लङ्कापुरीको मैंने अपने बाहुबलसे ही जीता था’॥ २१ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें तेरहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥

१३ ॥