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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

तिरपनवाँ सर्ग

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तिरपनवाँ सर्ग

वज्रदंष्ट्रका सेनासहित युद्धके लिये प्रस्थान, वानरों और राक्षसोंका युद्ध, वज्रदंष्ट्रद्वारा वानरोंका तथा अङ्गदद्वारा राक्षसोंका संहार

धूम्राक्षके मारे जानेका समाचार सुनकर राक्षसराज रावणको महान् क्रोध हुआ। वह फुफकारते हुए सर्पके समान जोर-जोरसे साँस लेने लगा॥ १ ॥

क्रोधसे कलुषित हो गर्म-गर्म लम्बी साँस खींचकर उसने क्रूर निशाचर महाबली वज्रदंष्ट्रसे कहा— ॥ २ ॥

‘वीर! तुम राक्षसोंके साथ जाओ और दशरथकुमार राम और वानरोंसहित सुग्रीवको मार डालो’ ॥ ३ ॥

तब वह मायावी राक्षस ‘बहुत अच्छा’ कहकर बहुत बड़ी सेनाके साथ तुरंत युद्धके लिये चल दिया॥

वह हाथी, घोड़े, गदहे और ऊँट आदि सवारियोंसे युक्त था, चित्तको पूर्णतः एकाग्र किये हुए था और पताका, ध्वजा आदिसे विचित्र शोभा पानेवाले बहुत-से सेनाध्यक्ष उसकी शोभा बढ़ाते थे॥ ५ ॥

विचित्र भुजबंद और मुकुटसे विभूषित हो कवच धारण करके हाथमें धनुष लिये वह शीघ्र ही निकला॥

ध्वजा-पताकाओंसे अलंकृत, दीप्तिमान् तथा सोनेके साज-बाजसे सुसज्जित रथकी परिक्रमा करके सेनापति वज्रदंष्ट्र उसपर आरूढ़ हुआ॥ ७ ॥

उसके साथ ऋष्टि, विचित्र तोमर, चिकने मूसल, भिन्दिपाल, धनुष, शक्ति, पट्टिश, खड्ग, चक्र, गदा और तीखे फरसोंसे सुसज्जित बहुत-से पैदल योद्धा चले। उनके हाथोंमें अनेक प्रकारके अस्त्र-शस्त्र शोभा पा रहे थे॥ ८-९ ॥

विचित्र वस्त्र धारण करनेवाले सभी राक्षस वीर अपने तेजसे उद्भासित हो रहे थे। शौर्यसम्पन्न मदमत्त गजराज चलते-फिरते पर्वतोंके समान जान पड़ते थे॥

हाथोंमें तोमर, अंकुश धारण करनेवाले महावत जिनकी गर्दनपर सवार थे तथा जो युद्धकी कलामें कुशल थे, वे हाथी युद्धके लिये आगे बढ़े। उत्तम लक्षणोंसे युक्त जो दूसरे-दूसरे

महाबली घोड़े थे, जिनके ऊपर शूरवीर सैनिक सवार थे, वे भी युद्धके लिये निकले॥ ११ ॥

युद्धके उद्देश्यसे प्रस्थित हुई राक्षसोंकी वह सारी सेना वर्षाकालमें गर्जते हुए बिजलियोंसहित मेघके समान शोभा पा रही थी॥ १२ ॥

वह सेना लङ्काके दक्षिणद्वारसे निकली, जहाँ वानर-यूथपति अङ्गद राह रोके खड़े थे। उधरसे निकलते ही उन राक्षसोंके सामने अशुभसूचक अपशकुन होने लगा॥

मेघरहित आकाशसे तत्काल दुःसह उल्कापात होने लगे। भयानक गीदड़ मुँहसे आगकी ज्वाला उगलते हुए अपनी बोली बोलने लगे॥ १४ ॥

घोर पशु ऐसी बोली बोलने लगे, जिससे राक्षसोंके संहारकी सूचना मिल रही थी। युद्धके लिये आते हुए योद्धा बुरी तरह लड़खड़ाकर गिर पड़ते थे। इससे उनकी बड़ी दारुण अवस्था हो जाती थी॥ १५ ॥

इन उत्पातसूचक लक्षणोंको देखकर भी महाबली वज्रदंष्ट्रने धैर्य नहीं छोड़ा। वह तेजस्वी वीर युद्धके लिये उत्सुक होकर निकला॥ १६ ॥

तीव्रगतिसे आते हुए उन राक्षसोंको देखकर विजयलक्ष्मीसे सुशोभित होनेवाले वानर बड़े जोर-जोरसे गर्जना करने लगे। उन्होंने अपने सिंहनादसे सम्पूर्ण दिशाओंको गुँजा दिया॥ १७ ॥

तदनन्तर भयानक रूप धारण करनेवाले घोर वानरोंका राक्षसोंके साथ तुमुल युद्ध आरम्भ हुआ। दोनों दलोंके योद्धा एक-दूसरेका वध करना चाहते थे॥ १८ ॥

वे बड़े उत्साहसे युद्धके लिये निकलते; परंतु देह और गर्दन कट जानेसे पृथ्वीपर गिर पड़ते थे। उस समय उनके सारे अङ्ग रक्तसे भीग जाते थे॥ १९ ॥

युद्धसे कभी पीछे न हटनेवाले और परिघ-जैसी बाँहोंवाले कितने ही शूरवीर एक-दूसरेके निकट पहुँचकर परस्पर नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंका प्रहार करते थे॥

उस युद्धस्थलमें प्रयुक्त होनेवाले वृक्षों, शिलाओं और शस्त्रोंका महान् एवं घोर शब्द जब कानोंमें पड़ता था, तब वह हृदयको विदीर्ण-सा कर देता था॥ २१ ॥

वहाँ रथके पहियोंकी घर्घर्राहट, धनुषकी भयानक टंकार तथा शङ्ख, भेरी और मृदङ्गोंका शब्द एकमें मिलकर बड़ा भयंकर प्रतीत होता था॥ २२ ॥

कुछ योद्धा अपने हथियार फेंककर बाहुयुद्ध करने लगते थे। थप्पड़ों, लातों, मुक्कों, वृक्षों और घुटनोंकी मार खाकर कितने ही राक्षसोंके शरीर चूर-चूर हो गये थे। रणदुर्मद वानरोंने

शिलाओंसे मार-मारकर कितने ही राक्षसोंका चूरा बना दिया था॥ २३-२४॥

उस समय वज्रदंष्ट्र अपने बाणोंकी मारसे वानरोंको अत्यन्त भयभीत करता हुआ तीनों लोकोंके संहारके लिये उठे हुए पाशधारी यमराजके समान रणभूमिमें विचरने लगा॥ २५॥

साथ ही क्रोधसे भरे तथा नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र लिये अन्य अस्त्रवेत्ता बलवान् राक्षस भी वानरसेनाओंका रणभूमिमें संहार करने लगे॥ २६॥

किंतु प्रलयकालमें संवर्तक अग्नि जैसे प्राणियोंका संहार करती है, उसी तरह वालिपुत्र अङ्गद और भी निर्भय हो दूने क्रोधसे भरकर उन सब राक्षसोंका वध करने लगे॥ २७॥

उनकी आँखें क्रोधसे लाल हो रही थीं। वे इन्द्रके तुल्य पराक्रमी थे। जैसे सिंह छोटे वन्य-पशुओंको अनायास ही नष्ट कर देता है, उसी तरह पराक्रमी अङ्गदने एक वृक्ष उठाकर उन समस्त राक्षसगणोंका घोर संहार आरम्भ किया॥ २८ १/२॥

अङ्गदकी मार खाकर वे भयानक पराक्रमी राक्षस सिर फट जानेके कारण कटे हुए वृक्षोंके समान पृथ्वीपर गिरने लगे॥ २९ १/२॥

उस समय रथों, चित्र-विचित्र ध्वजों, घोड़ों, राक्षस और वानरोंके शरीरों तथा रक्तकी धाराओंसे भर जानेके कारण वह रणभूमि बड़ी भयानक जान पड़ती थी॥ ३० १/२॥

योद्धाओंके हार, केयूर (बाजूबंद), वस्त्र और शस्त्रोंसे अलंकृत हुई रणभूमि शरत्कालकी रात्रिके समान शोभा पाती थी॥ ३१ १/२॥

अङ्गदके वेगसे वहाँ वह विशाल राक्षससेना उस समय उसी तरह काँपने लगी, जैसे वायुके वेगसे मेघ कम्पित हो उठता है॥ ३२॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें तिरपनवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ५३॥