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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

छब्बीसवाँ सर्ग

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छब्बीसवाँ सर्ग

रावणका रम्भापर बलात्कार करना और नलकूबरका रावणको भयंकर शाप देना

जब सूर्य अस्ताचलको चले गये, तब पराक्रमी दशग्रीवने अपनी सेनाके साथ कैलासपर ही रातमें ठहर जाना ठीक समझा॥ १ ॥

(उसने वहीं छावनी डाल दी) फिर, कैलासके ही समान श्वेत कान्तिवाले निर्मल चन्द्रदेवका उदय हुआ और नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंसे सुसज्जित निशाचरोंकी वह विशाल सेना गाढ़ निद्रामें निमग्न हो गयी॥ २ ॥

परंतु महापराक्रमी रावण उस पर्वतके शिखरपर चुपचाप बैठकर चन्द्रमाकी चाँदनीसे सुशोभित होनेवाले उस पर्वतके विभिन्न स्थानोंकी (जो सम्पूर्ण कामभोगके उपयुक्त थे) नैसर्गिक छटा निहारने लगा॥ ३ ॥

कहीं कनेरके दीप्तिमान् कानन शोभा पाते थे, कहीं कदम्ब और बकुल (मौलसिरी) वृक्षोंके समूह अपनी रमणीयता बिखेर रहे थे, कहीं मन्दाकिनीके जलसे भरी हुई और प्रफुल्ल कमलोंसे अलंकृत पुष्करिणियाँ शोभा दे रही थीं, कहीं चम्पा, अशोक, पुंनाग (नागकेसर), मन्दार, आम, पाड़र, लोध्र, प्रियङ्गु, अर्जुन, केतक, तगर, नारिकेल, प्रियाल और पनस आदि वृक्ष अपने पुष्प आदिकी शोभासे उस पर्वत-शिखरके वन्यप्रान्तको उद्भासित कर रहे थे॥ ४—६ ॥

मधुर कण्ठवाले कामार्त किन्नर अपनी कामिनियोंके साथ वहाँ रागयुक्त गीत गा रहे थे, जो कानोंमें पड़कर मनका आनन्द-वर्धन करते थे॥ ७ ॥

जिनके नेत्र-प्रान्त मदसे कुछ लाल हो गये थे, वे मदमत्त विद्याधर युवतियोंके साथ क्रीडा करते और हर्षमग्न होते थे॥ ८ ॥

वहाँसे कुबेरके भवनमें गाती हुई अप्सराओंके गीतकी मधुर ध्वनि घण्टानादके समान सुनायी पड़ती थी॥ ९ ॥

वसन्त-ऋतुके सभी पुष्पोंकी गन्धसे युक्त वृक्ष हवाके थपेड़े खाकर फूलोंकी वर्षा करते हुए उस समूचे पर्वतको सुवासित-सा कर रहे थे॥ १० ॥

विविध कुसुमोंके मधुर मकरन्द तथा परागसे मिश्रित प्रचुर सुगन्ध लेकर मन्द-मन्द बहती हुई सुखद वायु रावणकी काम-वासनाको बढ़ा रही थी॥ ११ ॥

संगीतकी मीठी तान, भाँति-भाँतिके पुष्पोंकी समृद्धि, शीतल वायुका स्पर्श, पर्वतके (रमणीयता आदि) आकर्षक गुण, रजनीकी मधुवेला और चन्द्रमाका उदय—उद्दीपनके इन सभी उपकरणोंके कारण वह महापराक्रमी रावण कामके अधीन हो गया और बारम्बार लंबी साँस खींचकर चन्द्रमाकी ओर देखने लगा॥ १२-१३ ॥

इसी बीचमें समस्त अप्सराओंमें श्रेष्ठ सुन्दरी, पूर्ण-चन्द्रमुखी रम्भा दिव्य वस्त्राभूषणोंसे विभूषित हो उस मार्गसे आ निकली॥ १४ ॥

उसके अङ्गोंमें दिव्य चन्दनका अनुलेप लगा था और केशपाशमें पारिजातके पुष्प गुँथे हुए थे। दिव्य पुष्पोंसे अपना शृङ्गार करके वह प्रिय-समागमरूप दिव्य उत्सवके लिये जा रही थी॥ १५ ॥

मनोहर नेत्र तथा काञ्चीकी लड़ियोंसे विभूषित पीन जघन-स्थलको वह रतिके उत्तम उपहारके रूपमें धारण किये हुए थी॥ १६ ॥

उसके कपोल आदिपर हरिचन्दनसे चित्र-रचना की गयी थी। वह छहों ऋतुओंमें होनेवाले नूतन पुष्पोंके आर्द्र हारोंसे विभूषित थी और अपनी अलौकिक कान्ति, शोभा, द्युति एवं कीर्तिसे युक्त हो उस समय दूसरी लक्ष्मीके समान जान पड़ती थी॥ १७ ॥

उसका मुख चन्द्रमाके समान मनोहर था और दोनों सुन्दर भौंहें कमान-सी दिखायी देती थीं। वह सजल जलधरके समान नील रंगकी साड़ीसे अपने अङ्गोंको ढके हुए थी॥ १८ ॥

उसकी जाँघोंका चढ़ाव-उतार हाथीकी सूँड़के समान था। दोनों हाथ ऐसे कोमल थे, मानो (देहरूपी रसालकी डालके) नये-नये पल्लव हों। वह सेनाके बीचसे होकर जा रही थी, अतः रावणने उसे देख लिया॥ १९ ॥

देखते ही वह कामदेवके बाणोंका शिकार हो गया और खड़ा होकर उसने अन्यत्र जाती हुई रम्भाका हाथ पकड़ लिया। बेचारी अबला लाजसे गड़ गयी; परंतु वह निशाचर मुसकराता हुआ उससे बोला— ॥ २० ॥

'वरारोहे! कहाँ जा रही हो? किसकी इच्छा पूर्ण करनेके लिये स्वयं चल पड़ी हो? किसके भाग्योदयका समय आया है, जो तुम्हारा उपभोग करेगा?॥ २१ ॥

'कमल और उत्पलकी सुगन्ध धारण करनेवाले तुम्हारे इस मनोहर मुखारविन्दका रस अमृतका भी अमृत है। आज इस अमृत-रसका आस्वादन करके कौन तृप्त होगा?॥ २२ ॥

‘भीरु! परस्पर सटे हुए तुम्हारे ये सुवर्णमय कलशोंके सदृश सुन्दर पीन उरोज किसके वक्षःस्थलोंको अपना स्पर्श प्रदान करेंगे?॥ २३ ॥

‘सोनेकी लड़ियोंसे विभूषित तथा सुवर्णमय चक्रके समान विपुल विस्तारसे युक्त तुम्हारे पीन जघनस्थलपर जो मूर्तिमान् स्वर्ग-सा जान पड़ता है, आज कौन आरोहण करेगा?॥ २४ ॥

‘इन्द्र, उपेन्द्र अथवा अश्विनीकुमार ही क्यों न हों, इस समय कौन पुरुष मुझसे बढ़कर है? भीरु! तुम मुझे छोड़कर अन्यत्र जा रही हो, यह अच्छा नहीं है॥ २५ ॥

‘स्थूल नितम्बवाली सुन्दरी! यह सुन्दर शिला है, इसपर बैठकर विश्राम करो। इस त्रिभुवनका जो स्वामी है, वह मुझसे भिन्न नहीं है—मैं ही सम्पूर्ण लोकोंका अधिपति हूँ॥ २६ ॥

‘तीनों लोकोंके स्वामीका भी स्वामी तथा विधाता यह दशमुख रावण आज इस प्रकार विनीतभावसे हाथ जोड़कर तुमसे याचना करता है। सुन्दरी! मुझे स्वीकार करो'॥ २७ ॥

रावणके ऐसा कहनेपर रम्भा काँप उठी और हाथ जोड़कर बोली—‘प्रभो! प्रसन्न होइये—मुझपर कृपा कीजिये। आपको ऐसी बात मुँहसे नहीं निकालनी चाहिये; क्योंकि आप मेरे गुरुजन हैं—पिताके तुल्य हैं॥ २८ ॥

‘यदि दूसरे कोई पुरुष मेरा तिरस्कार करनेपर उतारू हों तो उनसे भी आपको मेरी रक्षा करनी चाहिये। मैं धर्मतः आपकी पुत्रवधू हूँ—यह आपसे सच्ची बात बता रही हूँ'॥ २९ ॥

रम्भा अपने चरणोंकी ओर देखती हुई नीचे मुँह किये खड़ी थी। रावणकी दृष्टि पड़नेमात्रसे भयके कारण उसके रोंगटे खड़े हो गये थे। उस समय उससे रावणने कहा—॥ ३० ॥

‘रम्भे! यदि यह सिद्ध हो जाय कि तुम मेरे बेटेकी बहू हो, तभी मेरी पुत्रवधू हो सकती हो, अन्यथा नहीं।' तब रम्भाने ‘बहुत अच्छा' कहकर रावणको इस प्रकार उत्तर दिया—॥ ३१ ॥

‘राक्षसशिरोमणे! धर्मके अनुसार मैं आपके पुत्रकी ही भार्या हूँ। आपके बड़े भाई कुबेरके पुत्र मुझे प्राणोंसे भी बढ़कर प्रिय हैं॥ ३२ ॥

‘वे तीनों लोकोंमें ‘नलकूबर' नामसे विख्यात हैं तथा धर्मानुष्ठानकी दृष्टिसे ब्राह्मण और पराक्रमकी दृष्टिसे क्षत्रिय हैं॥ ३३ ॥

‘वे क्रोधमें अग्नि और क्षमामें पृथ्वीके समान हैं। उन्हीं लोकपालकुमार प्रियतम नलकूबरको आज मैंने मिलनेके लिये संकेत दिया है॥ ३४ ॥

‘यह सारा श्रृङ्गार मैंने उन्हींके लिये धारण किया है; जैसे उनका मेरे प्रति अनुराग है, उसी प्रकार मेरा भी उन्हींके प्रति प्रगाढ़ प्रेम है, दूसरे किसीके प्रति नहीं॥ ३५ ॥

‘शत्रुओंका दमन करनेवाले राक्षसराज! इस सत्यको दृष्टिमें रखकर आप इस समय मुझे छोड़ दीजिये; वे मेरे धर्मात्मा प्रियतम उत्सुक होकर मेरी प्रतीक्षा करते होंगे॥ ३६ ॥

‘उनकी सेवाके इस कार्यमें आपको यहाँ विघ्न नहीं डालना चाहिये। मुझे छोड़ दीजिये। राक्षसराज! आप सत्पुरुषोंद्वारा आचरित धर्मके मार्गपर चलिये॥ ३७ ॥

‘आप मेरे माननीय गुरुजन हैं, अतः आपको मेरी रक्षा करनी चाहिये।’ यह सुनकर दशग्रीवने उसे नम्रतापूर्वक उत्तर दिया— ॥ ३८ ॥

‘रम्भे! तुम अपनेको जो मेरी पुत्रवधू बता रही हो, वह ठीक नहीं जान पड़ता। यह नाता-रिश्ता उन स्त्रियोंके लिये लागू होता है, जो किसी एक पुरुषकी पत्नी हों। तुम्हारे देवलोककी तो स्थिति ही दूसरी है। वहाँ सदासे यही नियम चला आ रहा है कि अप्सराओंका कोई पति नहीं होता। वहाँ कोई एक स्त्रीके साथ विवाह करके नहीं रहता है’॥ ३९ १/२ ॥

ऐसा कहकर उस राक्षसने रम्भाको बलपूर्वक शिलापर बैठा लिया और कामभोगमें आसक्त हो उसके साथ समागम किया॥ ४० १/२ ॥

उसके पुष्पहार टूटकर गिर गये, सारे आभूषण अस्त-व्यस्त हो गये। उपभोगके बाद रावणने रम्भाको छोड़ दिया। उसकी दशा उस नदीके समान हो गयी जिसे किसी गजराजने क्रीडा करके मथ डाला हो; वह अत्यन्त व्याकुल हो उठी॥ ४१ १/२ ॥

वेणी-बन्ध टूट जानेसे उसके खुले हुए केश हवामें उड़ने लगे—उसका श्रृङ्गार बिगड़ गया। कर-पल्लव काँपने लगे। वह ऐसी लगती थी—मानो फूलोंसे सुशोभित होनेवाली किसी लताको हवाने झकझोर दिया हो॥ ४२ १/२ ॥

लज्जा और भयसे काँपती हुई वह नलकूबरके पास गयी और हाथ जोड़कर उनके पैरोंपर गिर पड़ी॥ ४३ १/२ ॥

रम्भाको इस अवस्थामें देखकर महामना नलकूबरने पूछा— ‘भद्रे! क्या बात है? तुम इस तरह मेरे पैरोंपर क्यों पड़ गयीं?’॥ ४४ १/२ ॥

वह थर-थर काँप रही थी। उसने लंबी साँस खींचकर हाथ जोड़ लिये और जो कुछ हुआ था, वह सब ठीक-ठीक बताना आरम्भ किया— ॥ ४५ १/२ ॥

‘देव! यह दशमुख रावण स्वर्गलोकपर आक्रमण करनेके लिये आया है। इसके साथ बहुत बड़ी सेना है। उसने आजकी रातमें यहीं डेरा डाला है॥ ४६ १/२ ॥

‘शत्रुदमन वीर! मैं आपके पास आ रही थी, किंतु उस राक्षसने मुझे देख लिया और मेरा हाथ पकड़ लिया। फिर पूछा—‘तुम किसकी स्त्री हो?’॥ ४७ १/२ ॥

‘मैंने उसे सब कुछ सच-सच बता दिया, किंतु उसका हृदय कामजनित मोहसे आक्रान्त था, इसलिये मेरी वह बात नहीं सुनी॥ ४८ १/२ ॥

‘देव! मैं बारम्बार प्रार्थना करती ही रह गयी कि प्रभो! मैं आपकी पुत्रवधू हूँ, मुझे छोड़ दीजिये; किंतु उसने मेरी सारी बातें अनसुनी कर दीं और बलपूर्वक मेरे साथ अत्याचार किया॥ ४९ १/२ ॥

‘उत्तम व्रतका पालन करनेवाले प्रियतम! इस बेबसीकी दशामें मुझसे जो अपराध बन गया है, उसे आप क्षमा करें। सौम्य! नारी अबला होती है, उसमें पुरुषके बराबर शारीरिक बल नहीं होता है (इसीलिये उस दुष्टसे अपनी रक्षा मैं नहीं कर सकी)’॥ ५० १/२ ॥

यह सुनकर वैश्रवणकुमार नलकूबरको बड़ा क्रोध हुआ। रम्भापर किये गये उस महान् अत्याचारको सुनकर उन्होंने ध्यान लगाया॥ ५१ १/२ ॥

उस समय दो ही घड़ीमें रावणकी उस करतूतको जानकर वैश्रवणपुत्र नलकूबरके नेत्र क्रोधसे लाल हो गये और उन्होंने अपने हाथमें जल लिया॥ ५२ १/२ ॥

जल लेकर पहले विधिपूर्वक आचमन करके नेत्र आदि सारी इन्द्रियोंका स्पर्श करनेके अनन्तर उन्होंने राक्षसराजको बड़ा भयंकर शाप दिया॥ ५३ १/२ ॥

वे बोले—‘भद्रे! तुम्हारी इच्छा न रहनेपर भी रावणने तुमपर बलपूर्वक अत्याचार किया है। अतः वह आजसे दूसरी किसी ऐसी युवतीसे समागम नहीं कर सकेगा जो उसे चाहती न हो॥ ५४ १/२ ॥

‘यदि वह कामपीड़ित होकर उसे न चाहनेवाली युवतीपर बलात्कार करेगा तो तत्काल उसके मस्तकके सात टुकड़े हो जायँगे’॥ ५५ १/२ ॥

नलकूबरके मुखसे प्रज्वलित अग्निके समान दग्ध कर देनेवाले इस शापके निकलते ही देवताओंकी दुन्दुभियाँ बज उठीं और आकाशसे फूलोंकी वर्षा होने लगी॥ ५६ १/२ ॥

ब्रह्मा आदि सभी देवताओंको बड़ा हर्ष हुआ। रावणके द्वारा की गयी लोककी सारी दुर्दशाको और उस राक्षसकी मृत्युको भी जानकर ऋषियों तथा पितरोंको बड़ी प्रसन्नता प्राप्त हुई॥ ५७-५८ ॥

उस रोमाञ्चकारी शापको सुनकर दशग्रीवने अपनेको न चाहनेवाली स्त्रियोंके साथ बलात्कार करना छोड़ दिया॥ ५९ ॥

वह जिन-जिन पतिव्रता स्त्रियोंको हरकर ले गया था, उन सबके मनको नलकुबरका दिया वह शाप बड़ा प्रिय लगा। उसे सुनकर वे सब-की-सब बहुत प्रसन्न हुईं॥ ६० ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें छब्बीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ २६ ॥