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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

छब्बीसवाँ सर्ग

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छब्बीसवाँ सर्ग

सारणका रावणको पृथक्-पृथक् वानरयूथपतियोंका परिचय देना

(शुक और) सारणके ये सच्चे और जोशीले शब्द सुनकर रावणने सारणसे कहा— ॥ १ ॥

‘यदि देवता, गन्धर्व और दानव भी मुझसे युद्ध करने आ जायँ और समस्त लोक भय दिखाने लगे तो भी मैं सीताको नहीं दूँगा॥ २ ॥

‘सौम्य! जान पड़ता है कि तुम्हें बंदरोंने बहुत तंग किया है। इसीसे भयभीत होकर तुम आज ही सीताको लौटा देना ठीक समझने लगे हो। भला, कौन ऐसा शत्रु है, जो समराङ्गणमें मुझे जीत सके’॥ ३ १/२ ॥

ऐसा कठोर वचन कहकर श्रीमान् राक्षसराज रावण वानरोंकी सेनाका निरीक्षण करनेके लिये अपनी कई ताल ऊँची और बर्फके समान श्वेत रंगकी अट्टालिकापर चढ़ गया॥ ४-५ ॥

उस समय रावण क्रोधसे तमतमा उठा था। उसने उन दोनों गुप्तचरोंके साथ जब समुद्र, पर्वत और वनोंपर दृष्टिपात किया, तब पृथिवीका सारा प्रदेश वानरोंसे भरा दिखायी दिया॥ ६ १/२ ॥

वानरोंकी वह विशाल सेना अपार और असह्य थी। उसे देखकर राजा रावणने सारणसे पूछा— ॥ ७ १/२ ॥

‘सारण! इन वानरोंमें कौन-कौनसे मुख्य हैं? कौन शूरवीर हैं और कौन बलमें बहुत बढ़े-चढ़े हैं?॥ ८ ॥

‘कौन-कौनसे वानर महान् उत्साहसे सम्पन्न होकर युद्धमें आगे-आगे रहते हैं? सुग्रीव किनकी बातें सुनते हैं और कौन यूथपतियोंके भी यूथपति हैं? सारण! ये सारी बातें मुझे बताओ। साथ ही यह भी कहो कि उन वानरोंका प्रभाव कैसा है?’॥ ९ १/२ ॥

इस प्रकार पूछते हुए राक्षसराज रावणका वचन सुनकर मुख्य-मुख्य वानरोंको जाननेवाले सारणने उन मुख्य वानरोंका परिचय देते हुए कहा— ॥ १० १/२ ॥

‘महाराज! यह जो लङ्काकी ओर मुख करके खड़ा है और गरज रहा है, एक लाख यूथपोंसे घिरा हुआ है तथा जिसकी गर्जनाके अत्यन्त गम्भीर घोषसे परकोटे, दरवाजे, पर्वत और वनोंके

सहित सारी लङ्का प्रतिहत हो गूँज उठी है, इसका नाम नील है। यह वीर यूथपतियोंमेंसे है। समस्त वानरोंके राजा महामना सुग्रीवकी सेनाके आगे यही खड़ा होता है॥ ११—१३ १/२ ॥

‘जो पराक्रमी वानर दोनों उठी हुई बाँहोंको एक दूसरीसे पकड़कर दोनों पैरोंसे पृथ्वीपर टहल रहा है, लङ्काकी ओर मुख करके क्रोधपूर्वक देखता है और बारंबार अँगड़ाई लेता है, जिसका शरीर पर्वतशिखरके समान ऊँचा है, जिसकी कान्ति कमलकेसरके समान सुनहले रंगकी है, जो रोषसे भरकर बारंबार अपनी पूँछ पटक रहा है तथा जिसकी पूँछके पटकनेकी आवाजसे दसों दिशाएँ गूँज उठती हैं, यह युवराज अङ्गद है। वानरराज सुग्रीवने इसका युवराजके पदपर अभिषेक किया है। यह अपने साथ युद्धके लिये आपको ललकारता है॥ १४—१७ ॥

‘वालीका यह पुत्र अपने पिताके समान ही बलशाली है। सुग्रीवको यह सदा ही प्रिय है। जैसे वरुण इन्द्रके लिये पराक्रम प्रकट करते हैं, उसी प्रकार यह श्रीरामचन्द्रजीके लिये अपना पुरुषार्थ प्रकट करनेके लिये उद्यत है॥ १८ ॥

‘श्रीरघुनाथजीका हित चाहनेवाले वेगशाली हनुमान्जीने जो यहाँ आकर जनकनन्दिनी सीताका दर्शन किया, उसके भीतर इस अङ्गदकी ही सारी बुद्धि काम कर रही थी॥ १९ ॥

‘पराक्रमी अङ्गद वानरशिरोमणियोंके बहुत-से यूथ लिये अपनी सेनाके साथ आपको कुचल डालनेके लिये आ रहा है॥ २० ॥

‘अङ्गदके पीछे संग्रामभूमिमें जो वीर विशाल सेनासे घिरा हुआ खड़ा है, इसका नाम नल है। यही सेतु-निर्माणका प्रधान हेतु है॥ २१ ॥

‘जो अपने अङ्गोंको सुस्थिर करके सिंहनाद करते और गर्जते हैं तथा जो कपिश्रेष्ठ वीर अपने आसनोंसे उठकर क्रोधपूर्वक अँगड़ाई लेते हैं, इनके वेगको सह लेना अत्यन्त कठिन है। ये बड़े भयंकर, अत्यन्त क्रोधी और प्रचण्ड पराक्रमी हैं। इनकी संख्या दस अरब और आठ लाख है। ये सब वानर तथा चन्दनवनमें निवास करनेवाले वीर वानर इस यूथपति नलका ही अनुसरण करते हैं। यह नल भी अपनी सेनाद्वारा लङ्कापुरीको कुचल देनेका हौसला रखता है॥ २२-२३ १/२ ॥

‘यह जो चाँदीके समान सफेद रंगका चञ्चल वानर दिखायी देता है, इसका नाम श्वेत है। यह भयंकर पराक्रम करनेवाला, बुद्धिमान्, शूरवीर और तीनों लोकोंमें विख्यात है। श्वेत बड़ी तेजीसे सुग्रीवके पास आकर फिर लौट जाता है। यह वानरीसेनाका विभाग करता और सैनिकोंमें हर्ष तथा उत्साह भरता है॥ २४-२५ १/२ ॥

‘गोमतीके तटपर जो नाना प्रकारके वृक्षोंसे युक्त संरोचन नामक पर्वत है, उसी रमणीय पर्वतके चारों ओर जो पहले विचरा करता था और वहीं अपने वानरराज्यका शासन करता था, वही यह कुमुद नामक यूथपति है॥

‘वह जो लाखों वानर-सैनिकोंको सहर्ष अपने साथ खींचे लाता है, जिसकी लंबी दुममें बहुत बड़े-बड़े लाल, पीले, भूरे और सफेद रंगके बाल फैले हुए हैं और देखनेमें बड़े भयंकर हैं तथा जो कभी दीनता न दिखाकर सदा युद्धकी ही इच्छा रखता है, उस वानरका नाम चण्ड है। यह चण्ड भी अपनी सेनाद्वारा लङ्काको कुचल देनेकी इच्छा रखता है॥ २८-२९ ॥

‘राजन्! जो सिंहके समान पराक्रमी और कपिल वर्णका है, जिसकी गर्दनमें लंबे-लंबे बाल हैं और जो ध्यान लगाकर लङ्काकी ओर इस प्रकार देख रहा है, मानो इसे भस्म कर देगा, वह रम्भ नामक यूथपति है। वह निरन्तर विन्ध्य, कृष्णगिरि, सह्य और सुदर्शन आदि पर्वतोंपर रहा करता है। जब वह युद्धके लिये चलता है, उस समय उसके पीछे एक करोड़ तीस श्रेष्ठ भयंकर, अत्यन्त क्रोधी और प्रचण्ड पराक्रमी वानर चलते हैं। वे सब-के-सब अपने बलसे लङ्काको मसल डालनेके लिये रम्भको सब ओरसे घेरे हुए आ रहे हैं॥ ३०—३२ ॥

‘जो कानोंको फैलाता है, बारंबार जँभाँऽइ लेता है, मृत्युसे भी नहीं डरता है और सेनाके पीछे न जाकर अर्थात् सेनाका भरोसा न करके अकेले ही युद्ध करना चाहता है, रोषसे काँप रहा है, तिरछी नजरसे देखता है और पूँछ फटकारकर सिंहनाद करता है, इसका नाम शरभ है। देखिये, यह महाबली वानर कैसी गर्जना करता है॥ ३३-३४ ॥

‘इसका वेग महान् है। भय तो इसे छू तक नहीं गया है। राजन्! यह यूथपति शरभ सदा रमणीय साल्वेय पर्वतपर निवास करता है॥ ३५ ॥

‘इसके पास जो यूथपति हैं, उन सबकी ‘विहार’ संज्ञा है। वे बड़े बलवान् हैं। राजन्! उनकी संख्या एक लाख चालीस हजार है॥ ३६ ॥

‘जो विशाल वानर मेघके समान आकाशको घेरे हुए खड़ा है तथा वानरवीरोंके बीचमें ऐसा जान पड़ता है, जैसे देवताओंमें इन्द्र हों, युद्धकी इच्छावाले वानरोंके बीचमें जिसकी गम्भीर गर्जना ऐसी सुनायी देती है, मानो बहुत-सी भेरियोंका तुमुल नाद हो रहा हो तथा जो युद्धमें दुःसह है, वह ‘पनस’ नामसे प्रसिद्ध यूथपति है। यह पनस परम उत्तम पारियात्र पर्वतपर निवास करता है। यूथपतियोंमें श्रेष्ठ पनसकी सेवामें पचास लाख यूथपति रहते हैं, जिनके अपने-अपने यूथ अलग-अलग हैं॥ ३७—४० ॥

‘जो समुद्रके तटपर स्थित हुँऽइ इस उछलती-कूदती भीषण सेनाको दूसरे मूर्तिमान् समुद्रकी भाँति सुशोभित करता हुआ खड़ा है, वह दर्दुर पर्वतके समान विशालकाय वानर विनत नामसे प्रसिद्ध यूथपति है। वह नदियोंमें श्रेष्ठ वेणा नदीका पानी पीता हुआ विचरता है। साठ लाख वानर उसके सैनिक हैं॥ ४१-४२ १/२ ॥

‘जो युद्धके लिये सदा आपको ललकारता रहता है तथा जिसके पास बल-विक्रमशाली अनेक यूथपति रहते हैं और उन यूथपतियोंके पास पृथक्-पृथक् बहुत-से यूथ हैं, वह ‘क्रोधन’ नामसे प्रसिद्ध वानर है॥ ४३ १/२ ॥

‘वह जो गेरुके समान लाल रंगके शरीरका पोषण करता है, उस तेजस्वी वानरका नाम ‘गवय’ है। उसे अपने बलपर बड़ा घमंड है। वह सदा सब वानरोंका तिरस्कार किया करता है। देखिये, कितने रोषसे वह आपकी ओर बढ़ा आ रहा है। इसकी सेवामें सत्तर लाख वानर रहते हैं। यह भी अपनी सेनाके द्वारा लङ्काको धूलमें मिला देनेकी इच्छा रखता है॥ ४४—४६ ॥

‘ये सारे-के-सारे वानर दुःसह वीर हैं। इनकी गणना करना भी असम्भव है। यूथपतियोंमें श्रेष्ठ जो यूथप हैं, उन सबके अलग-अलग यूथ हैं’॥ ४७ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें छब्बीसवाँ सर्ग पूरा
हुआ॥ २६ ॥