श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
चौहत्तरवाँ सर्ग
चौहत्तरवाँ सर्ग
जाम्बवान्के आदेशसे हनुमान्जीका हिमालयसे दिव्य ओषधियोंके पर्वतको लाना और उन ओषधियोंकी गन्धसे श्रीराम, लक्ष्मण एवं समस्त वानरोंका पुनः स्वस्थ होना
युद्धके मुहानेपर जब वे दोनों भार्इ श्रीराम और लक्ष्मण निश्चेष्ट होकर पड़ गये, तब वानर-सेनापतियोंकी वह सेना किंकर्तव्यविमूढ़ हो गयी। सुग्रीव, नील, अङ्गद और जाम्बवान्को भी उस समय कुछ नहीं सूझता था॥
उस समय सबको विषादमें डूबा हुआ देख बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ विभीषणने वानरराजके उन वीर सैनिकोंको आश्वासन देते हुए अनुपम वाणीमें कहा— ॥ २ ॥
‘वानर वीरो! आपलोग भयभीत न हों। यहाँ विषादका अवसर नहीं है; क्योंकि इन दोनों आर्यपुत्रोंने ब्रह्माजीके वचनोंका आदर एवं पालन करते हुए स्वयं ही हथियार नहीं उठाये थे; इसीलिये इन्द्रजित्ने इन दोनोंको अपने अस्त्र-समूहोंसे आच्छादित कर दिया था। अतएव ये दोनों भार्इ केवल विषादग्रस्त (मूर्च्छित) हो गये हैं (इनके प्राणोंपर संकट नहीं आया है)॥ ३ ॥
‘स्वयम्भू ब्रह्माजीने यह उत्तम अस्त्र इन्द्रजित्को दिया था। ब्रह्मास्त्रके नामसे इसकी प्रसिद्धि है और इसका बल अमोघ है। संग्राममें उसका समादर— उसकी मर्यादाकी रक्षा करते हुए ही ये दोनों राजकुमार धराशायी हुए हैं; अतः इसमें खेदकी कौन-सी बात है?’॥ ४ ॥
विभीषणकी बात सुनकर बुद्धिमान् पवनकुमार हनुमान्ने ब्रह्मास्त्रका सम्मान करते हुए उनसे इस प्रकार कहा— ॥ ५ ॥
‘राक्षसराज! इस अस्त्रसे घायल हुए वेगशाली वानर-सैनिकोंमें जो-जो प्राण धारण करते हों, उन-उनको हमें चलकर आश्वासन देना चाहिये’॥ ६ ॥
उस समय रात हो गयी थी, इसलिये हनुमान् और राक्षसप्रवर विभीषण दोनों वीर अपने-अपने हाथमें मसाल लिये एक ही साथ रणभूमिमें विचरने लगे॥ ७ ॥
जिनकी पूँछ, हाथ, पैर, जाँघ, अंगुलि और ग्रीवा आदि अङ्ग कट गये थे, अतएव जो अपने शरीरोंसे रक्त बहा रहे थे, ऐसे पर्वताकार वानरोंके गिरनेसे वहाँकी सारी भूमि सब ओरसे पट गयी थी तथा वहाँ गिरे हुए चमकीले अस्त्र-शस्त्रोंसे भी आच्छादित हो गयी थी। हनुमान् और विभीषणने इस अवस्थामें उस युद्धभूमिका निरीक्षण किया॥ ८-९ ॥
सुग्रीव, अङ्गद, नील, शरभ, गन्धमादन, जाम्बवान्, सुषेण, वेगदर्शी, मैन्द, नल, ज्योतिर्मुख तथा द्विविद— इन सभी वानरोंको हनुमान् और विभीषणने युद्धमें घायल होकर पड़ा देखा॥ १०-११ ॥
ब्रह्माजीके प्रिय अस्त्र—ब्रह्मास्त्रने दिनके चार भाग व्यतीत होते-होते सरसठ करोड़ वानरोंको हताहत कर दिया था। जब केवल पाँचवाँ भाग—सायाह्नकाल शेष रह गया, तब ब्रह्मास्त्रका प्रयोग बंद हुआ था॥ १२ ॥
समुद्रके समान विशाल एवं भयंकर वानर-सेनाको बाणोंसे पीड़ित देख विभीषणसहित हनुमान्जी जाम्बवान्को ढूँढ़ने लगे॥ १३ ॥
ब्रह्माजीके पुत्र वीर जाम्बवान् एक तो स्वाभाविक वृद्धावस्थासे युक्त थे, दूसरे उनके शरीरमें सैकड़ों बाण धँसे हुए थे; अतः वे बुझती हुई आगके समान निस्तेज दिखायी देते थे। उन्हें देखकर विभीषण तुरंत ही उनके पास गये और बोले—‘आर्य! इन तीखे बाणोंके प्रहारसे आपके प्राण निकल तो नहीं गये?’॥ १४-१५ ॥
विभीषणकी बात सुनकर ऋक्षराज जाम्बवान् बड़ी कठिनाईसे वाक्यका उच्चारण करते हुए इस प्रकार बोले—॥ १६ ॥
‘महापराक्रमी राक्षसराज! मैं केवल स्वरसे तुम्हें पहचान रहा हूँ। मेरे सभी अङ्ग पैने बाणोंसे बिंधे हुए हैं, अतः मैं आँख खोलकर तुम्हें नहीं देख सकता॥ १७ ॥
‘उत्तम व्रतके पालक विभीषण! यह तो बताओ, जिनको जन्म देनेसे अञ्जनादेवी उत्तम पुत्रकी जननी और वायुदेव श्रेष्ठ पुत्रके जनक माने जाते हैं, वे वानरश्रेष्ठ हनुमान् कहीं जीवित हैं?’॥ १८ ॥
जाम्बवान्का यह प्रश्न सुनकर विभीषणने पूछा— ‘ऋक्षराज! आप दोनों महाराजकुमारोंको छोड़कर केवल पवनकुमार हनुमान्जीको ही क्यों पूछ रहे हैं?॥ १९ ॥
‘आर्य! आपने न तो राजा सुग्रीवपर, न अङ्गदपर और न भगवान् श्रीरामपर ही वैसा स्नेह दिखाया है, जैसा पवनपुत्र हनुमान्जीके प्रति आपका प्रगाढ़ प्रेम लक्षित हो रहा है’॥ २० ॥
विभीषणकी यह बात सुनकर जाम्बवान्ने कहा— ‘राक्षसराज! सुनो। मैं पवनकुमार हनुमान्जीको क्यों पूछता हूँ—यह बता रहा हूँ॥ २१ ॥
‘यदि वीरवर हनुमान् जीवित हों तो यह मरी हुई सेना भी जीवित ही है—ऐसा समझना चाहिये और यदि उनके प्राण निकल गये हों तो हमलोग जीते हुए भी मृतकके ही तुल्य हैं॥ २२ ॥
‘तात! यदि वायुके समान वेगशाली और अग्निके समान पराक्रमी पवनकुमार हनुमान् जीवित हैं तो हम सबके जीवित होनेकी आशा की जा सकती है’॥ २३ ॥
बूढ़े जाम्बवान्के इतना कहते ही पवनपुत्र हनुमान्जी उनके पास आ गये और दोनों पैर पकड़कर उन्होंने विनीतभावसे उन्हें प्रणाम किया॥ २४ ॥
हनुमान्जीकी बात सुनकर उस समय ऋक्षराज जाम्बवान्ने, जिनकी सारी इन्द्रियाँ बाणोंके प्रहारसे पीड़ित थीं, अपना पुनर्जन्म हुआ-सा माना॥ २५ ॥
फिर उन महातेजस्वी जाम्बवान्ने हनुमान्जीसे कहा— ‘वानरसिंह! आओ, सम्पूर्ण वानरोंकी रक्षा करो॥ २६ ॥
‘तुम्हारे सिवा दूसरा कोई पूर्ण पराक्रमसे युक्त नहीं है। तुम्हीं इन सबके परम सहायक हो। यह समय तुम्हारे ही पराक्रमका है। मैं दूसरे किसीको इसके योग्य नहीं देखता॥ २७ ॥
‘तुम रीछों और वानरवीरोंकी सेनाओंको हर्ष प्रदान करो और बाणोंसे पीड़ित हुए इन दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मणके शरीरसे बाण निकालकर इन्हें स्वस्थ करो॥ २८ ॥
‘हनूमन्! समुद्रके ऊपर-ऊपर उड़कर बहुत दूरका रास्ता तै करके तुम्हें पर्वतश्रेष्ठ हिमालयपर जाना चाहिये॥
‘शत्रुसूदन! वहाँ पहुँचनेपर तुम्हें बहुत ही ऊँचे सुवर्णमय उत्तम पर्वत ऋषभका तथा कैलास-शिखरका दर्शन होगा॥ ३० ॥
‘वीर! उन दोनों शिखरोंके बीचमें एक ओषधियोंका पर्वत दिखायी देगा, जो अत्यन्त दीप्तिमान् है। उसमें इतनी चमक है, जिसकी कहीं तुलना नहीं है। वह पर्वत सब प्रकारकी ओषधियोंसे सम्पन्न है॥ ३१ ॥
‘वानरसिंह! उसके शिखरपर उत्पन्न चार ओषधियाँ तुम्हें दिखायी देंगी, जो अपनी प्रभासे दसों दिशाओंको प्रकाशित किये रहती हैं॥ ३२ ॥
‘उनके नाम इस प्रकार हैं—मृतसञ्जीवनी, विशल्यकरणी, सुवर्णकरणी और संधानी नामक महौषधि॥
‘हनुमन्! पवनकुमार! तुम उन सब ओषधियोंको लेकर शीघ्र लौट आओ और वानरोंको प्राणदान देकर आश्वासन दो’॥ ३४ ॥
जाम्बवान्की यह बात सुनकर वायुनन्दन हनुमान्जी उसी तरह असीम बलसे भर गये, जैसे महासागर वायुके वेगसे व्याप्त हो जाता है॥ ३५ ॥
वीर हनुमान् एक पर्वतके शिखरपर खड़े हो गये और उस उत्तम पर्वतको पैरोंसे दबाते हुए द्वितीय पर्वतके समान दिखायी देने लगे॥ ३६ ॥
हनुमान्जीके चरणोंके भारसे पीड़ित हो वह पर्वत धरतीमें धँस गया। अधिक दबाव पड़नेके कारण वह अपने शरीरको भी धारण न कर सका॥ ३७ ॥
हनुमान्जीके भारसे पीड़ित हुए उस पर्वतके वृक्ष उन्हींके वेगसे टूटकर पृथ्वीपर गिर पड़े और कितने ही जल उठे। साथ ही उस पहाड़के चोटियाँ भी ढहने लगीं॥
हनुमान्जीके दबानेपर वह श्रेष्ठ पर्वत हिलने लगा। उसके वृक्ष और शिलाएँ टूट-फूटकर गिरने लगीं; अतः वानर वहाँ ठहर न सके॥ ३९ ॥
लङ्काका विशाल और ऊँचा द्वार भी हिल गया। मकान और दरवाजे ढह गये। समूची नगरी भयसे व्याकुल हो उस रातमें नाचती-सी जान पड़ी॥ ४० ॥
पर्वताकार पवनकुमार हनुमान्जीने उस पर्वतको दबाकर पृथ्वी और समुद्रमें भी हलचल पैदा कर दी॥
तदनन्तर वहाँसे आगे बढ़कर वे मेरु और मन्दराचलके समान ऊँचे मलयपर्वतपर चढ़ गये। वह पर्वत नाना प्रकारके झरनोंसे व्याप्त था॥ ४२ ॥
वहाँ भाँति-भाँतिके वृक्ष और लताएँ फैली थीं। कमल और कुमुद खिले हुए थे। देवता और गन्धर्व उस पर्वतका सेवन करते थे तथा वह साठ योजन ऊँचा था॥ ४३ ॥
विद्याधर, ऋषि-मुनि तथा अप्सराएँ भी वहाँ निवास करती थीं। अनेक प्रकारके मृगसमूह वहाँ सब ओर फैले हुए थे तथा बहुत-सी कन्दराएँ उस पर्वतकी शोभा बढ़ाती थीं॥ ४४ ॥
पवनकुमार हनुमान्जी वहाँ रहनेवाले यक्ष, गन्धर्व और किन्नर आदि सबको व्याकुल करते हुए मेघके समान बढ़ने लगे॥ ४५ ॥
वे दोनों पैरोंसे उस पर्वतको दबाकर और वडवानलके समान अपने भयङ्कर मुखको फैलाकर निशाचरोंको डराते हुए जोर-जोरसे गर्जना करने लगे॥ ४६ ॥
उच्च स्वरसे बारम्बार गर्जते हुए हनुमान्जीका वह महान् सिंहनाद सुनकर लङ्कावासी श्रेष्ठ राक्षस भयके मारे कहीं हिल-डुल भी न सके॥ ४७ ॥
शत्रुओंको संताप देनेवाले भयानक पराक्रमी पवनकुमार हनुमान्जीने समुद्रको नमस्कार करके श्रीरामचन्द्रजीके लिये महान् पुरुषार्थ करनेका निश्चय किया॥ ४८ ॥
वे अपनी सर्पाकार पूँछको ऊपर उठाकर पीठको झुकाकर दोनों कान सिकोड़कर और वडवामुख अग्निके समान अपना मुख फैलाकर प्रचण्डवेगसे आकाशमें उड़े॥
हनुमान्जी अपने तीव्र वेगसे कितने ही वृक्षों, पर्वत-शिखरों, शिलाओं और वहाँ रहनेवाले साधारण वानरोंको भी साथ-साथ उड़ाते गये। उनकी भुजाओं और जाँघोंके वेगसे दूर फेंक दिये जानेके कारण जब उनका वेग शान्त हो गया, तब वे वृक्ष आदि समुद्रके जलमें गिर पड़े॥ ५० ॥
सर्पके शरीरकी भाँति दिखायी देनेवाली अपनी दोनों भुजाओंको फैलाकर गरुड़के समान पराक्रमी पवनपुत्र हनुमान्जी सम्पूर्ण दिशाओंको खींचते हुए-से श्रेष्ठ पर्वत गिरिराज हिमालयकी ओर चले॥ ५१ ॥
जिसकी तरंगमालाएँ झूम रही थीं तथा जिसके जलके द्वारा समस्त जल-जन्तु इधर-उधर घुमाये जा रहे थे, उस महासागरको देखते हुए हनुमान्जी भगवान् विष्णुके हाथसे छूटे हुए चक्रकी भाँति सहसा आगे बढ़ गये॥ ५२ ॥
उनका वेग अपने पिता वायुके ही समान था। वे अनेकानेक पर्वतों, पक्षियों, सरोवरों, नदियों, तालाबों, नगरों तथा समृद्धिशाली जनपदोंको देखते हुए बड़े वेगसे आगे बढ़ने लगे॥ ५३ ॥
वीर हनुमान् अपने पिताके ही तुल्य पराक्रमी और तीव्रगामी थे। वे सूर्यके मार्गका आश्रय ले बिना थके-माँदे शीघ्रतापूर्वक अग्रसर हो रहे थे॥ ५४ ॥
वानरसिंह पवनकुमार हनुमान् महान् वेगसे युक्त थे। वे सम्पूर्ण दिशाओंको शब्दायमान करते हुए वायुके समान वेगसे आगे बढ़े॥ ५५ ॥
महाकपि हनुमान्जीका बल-विक्रम बड़ा भयङ्कर था। उन्होंने जाम्बवान्के वचनोंका स्मरण करते हुए सहसा पहुँचकर हिमालय पर्वतका दर्शन किया॥ ५६ ॥
वहाँ अनेक प्रकारके सोते बह रहे थे। बहुत-सी कन्दराएँ और झरने उसकी शोभा बढ़ा रहे थे। श्वेत बादलोंके समूहकी भाँति मनोहर दिखायी देनेवाले शिखरों और नाना प्रकारके वृक्षोंसे
उस श्रेष्ठ पर्वतकी अद्भुत शोभा हो रही थी। हनुमान्जी उस पर्वतपर पहुँच गये॥ ५७ ॥
उस महापर्वतराजका सबसे ऊँचा शिखर सुवर्णमय दिखायी देता था। वहाँ पहुँचकर हनुमान्जीने परम पवित्र बड़े-बड़े आश्रम देखे, जिनमें देवर्षियोंका श्रेष्ठ समुदाय निवास करता था॥ ५८ ॥
उस पर्वतपर जिन्हें हिरण्यगर्भ भगवान् ब्रह्माका स्थान, उन्हींके दूसरे स्वरूप रजतनाभिका स्थान, इन्द्रका भवन, जहाँ खड़े होकर रुद्रदेवने त्रिपुरासुरपर बाण छोड़ा था, वह स्थान, भगवान् हयग्रीवका वासस्थान तथा ब्रह्मास्त्र देवताका दीप्तिमान् स्थान—ये सभी दिव्य स्थान दिखायी दिये। साथ ही यमराजके सेवक भी वहाँ दृष्टिगोचर हुए॥ ५९ ॥
इसके सिवा अग्नि, कुबेर और द्वादश सूर्योंके समावेशका भी सूर्यतुल्य तेजस्वी स्थान उन्हें दृष्टिगोचर हुआ। चतुर्मुख ब्रह्मा, शंकरजीके धनुष और वसुन्धराकी नाभिके स्थानोंका भी उन्होंने दर्शन किया॥ ६० ॥
तत्पश्चात् श्रेष्ठ कैलासपर्वत, हिमालय-शिला, शिवजीके वाहन वृषभ तथा सुवर्णमय श्रेष्ठ पर्वत ऋषभको भी देखा। इसके बाद उनकी दृष्टि सम्पूर्ण ओषधियोंके उत्तम पर्वतपर पड़ी, जो सब प्रकारकी दीप्तिमती ओषधियोंसे देदीप्यमान हो रहा था॥ ६१ ॥
अग्निराशिके समान प्रकाशित होनेवाले उस पर्वतको देखकर पवनकुमार हनुमान्जीको बड़ा विस्मय हुआ। वे कूदकर ओषधियोंसे भरे हुए उस गिरिराजपर चढ़ गये और वहाँ पूर्वोक्त चारों ओषधियोंकी खोज करने लगे॥
महाकपि पवनपुत्र हनुमान्जी सहस्रों योजन लाँघकर वहाँ आये थे और दिव्य ओषधियोंको धारण करनेवाले उस शैल-शिखरपर विचरण कर रहे थे॥ ६३ ॥
उस उत्तम पर्वतपर रहनेवाले सम्पूर्ण महौषधियाँ यह जानकर कि कोऽइ हमें लेनेके लिये आ रहा है, तत्काल अदृश्य हो गयीं॥ ६४ ॥
उन ओषधियोंको न देखकर महात्मा हनुमान्जी कुपित हो उठे और रोषके कारण जोर-जोरसे गर्जना करने लगे। ओषधियोंका छिपाना उनके लिये असह्य
हो गया। उनकी आँखें अग्निके समान लाल हो गयीं और वे उस पर्वतराजसे इस प्रकार बोले—॥ ६५ ॥
‘नगेन्द्र! तुम श्रीरघुनाथजीपर भी कृपा नहीं कर सके, ऐसा निश्चय तुमने किस बलपर किया है? आज मेरे बाहुबलसे पराजित होकर तुम अपने-आपको सब ओर बिखरा हुआ देखो’॥ ६६ ॥
ऐसा कहकर उन्होंने वेगसे पकड़कर वृक्षों, हाथियों, सुवर्ण तथा अन्य सहस्रों प्रकारकी धातुओंसे भरे हुए उस पर्वत-शिखरको ही सहसा उखाड़ लिया। वेगसे उखाड़े जानेके कारण उसकी बहुत-सी चोटियाँ बिखरकर गिर पड़ीं। उस पर्वतका ऊपरी भाग अपनी प्रभासे प्रज्वलित-सा हो रहा था॥ ६७ ॥
उसे उखाड़कर साथ ले हनुमान्जी देवेश्वरों और असुरेश्वरोंसहित सम्पूर्ण लोकोंको भयभीत करते हुए गरुड़के समान भयङ्कर वेगसे आकाशमें उड़ चले। उस समय बहुत-से आकाशचारी प्राणी उनकी स्तुति कर रहे थे॥ ६८ ॥
सूर्यके समान चमकते हुए उस पर्वतशिखरको हाथमें लेकर हनुमान्जी सूर्यके ही पथपर जा पहुँचे थे। उस समय सूर्यदेवके समीप रहकर उन्हींके समान तेजस्वी शरीरवाले वे पवनकुमार दूसरे सूर्यकी भाँति प्रतीत होते थे॥ ६९ ॥
वायुदेवताके पुत्र हनुमान्जी पर्वतके समान जान पड़ते थे। उस पर्वतशिखरके साथ उनकी वैसी ही विशेष शोभा हो रही थी, जैसे सहस्रधारोंसे सुशोभित और अग्निकी ज्वालासे युक्त चक्र धारण करनेसे भगवान् विष्णु सुशोभित होते हैं॥ ७० ॥
उस समय उन्हें लौटा देख सब वानर जोर-जोरसे गर्जना करने लगे। उन्होंने भी उन सबको देखकर बड़े हर्षसे सिंहनाद किया। उन सबके उस तुमुलनादको सुनकर लङ्कावासी निशाचर और भी भयानक चीत्कार करने लगे॥ ७१ ॥
तदनन्तर हनुमान्जी उस उत्तम पर्वत त्रिकूटपर कूद पड़े और वानरसेनाके मध्यमें आकर सभी श्रेष्ठ वानरोंको प्रणाम करके विभीषणसे भी उन्हें गले लगाकर मिले॥
इसके बाद वे दोनों राजकुमार श्रीराम और लक्ष्मण उन महौषधियोंकी सुगन्ध लेकर स्वस्थ हो गये। उनके शरीरसे बाण निकल गये और घाव भर गये। इसी प्रकार जो दूसरे-दूसरे प्रमुख वानर वीर वहाँ हताहत हुए थे, वे सब-के-सब उन श्रेष्ठ ओषधियोंकी सुगन्धसे रातके अन्तमें सोकर उठे हुए प्राणियोंकी भाँति क्षणभरमें नीरोग हो उठकर खड़े हो गये। उनके शरीरसे बाण निकल गये और उनकी सारी पीड़ा जाती रही॥
लङ्कामें जबसे वानरों और राक्षसोंकी लड़ाई शुरु हुई, तभीसे वानरवीरोंद्वारा रणभूमिमें जो-जो राक्षस मारे जाते थे, वे सभी रावणकी आज्ञाके अनुसार प्रतिदिन मरते-मरते ही समुद्रमें
फेंक दिये जाते थे। ऐसा इसलिये होता था कि वानरोंको यह मालूम न हो कि बहुत-से राक्षस मार डाले गये॥ ७५-७६ ॥
तत्पश्चात् प्रचण्ड वेगवाले पवनकुमार हनुमान्जीने पुनः ओषधियोंके उस पर्वतको वेगपूर्वक हिमालयपर ही पहुँचा दिया और फिर लौटकर वे श्रीरामचन्द्रजीसे आ मिले॥ ७७ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें चौहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ७४ ॥