श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
चौंसठवाँ सर्ग
चौंसठवाँ सर्ग
महोदरका कुम्भकर्णके प्रति आक्षेप करके रावणको बिना युद्धके ही अभीष्ट वस्तुकी प्राप्तिका उपाय बताना
अपनी भुजाओंसे सुशोभित होनेवाले विशालकाय एवं बलवान् राक्षस कुम्भकर्णका यह वचन सुनकर महोदरने कहा—॥ १ ॥
‘कुम्भकर्ण! तुम उत्तम कुलमें उत्पन्न हुए हो; परंतु तुम्हारी दृष्टि (बुद्धि) निम्नश्रेणीके लोगोंके समान है। तुम ढीठ और घमंडी हो, इसलिये सभी विषयोंमें क्या कर्तव्य है—इस बातको नहीं जान सकते॥ २ ॥
‘कुम्भकर्ण! हमारे महाराज नीति और अनीतिको नहीं जानते हैं, ऐसी बात नहीं है। तुम केवल अपने बचपनके कारण धृष्टतापूर्वक इस तरहकी बातें कहना चाहते हो॥ ३ ॥
‘राक्षसशिरोमणि रावण देश-कालके लिये उचित कर्तव्यको जानते हैं और अपने तथा शत्रुपक्षके स्थान, वृद्धि एवं क्षयको अच्छी तरह समझते हैं॥ ४ ॥
‘जिसने वृद्ध पुरुषोंकी उपासना या सत्संग नहीं किया है और जिसकी बुद्धि गँवारोंके समान है, ऐसा बलवान् पुरुष भी जिस कर्मको नहीं कर सकता—जिसे अनुचित समझता है, वैसे कर्मको कोर्इ बुद्धिमान् पुरुष कैसे कर सकता है ?॥ ५ ॥
‘जिन अर्थ, धर्म और कामको तुम पृथक्-पृथक् आश्रयवाले बता रहे हो, उन्हें ठीक-ठीक समझनेकी तुम्हारे भीतर शक्ति ही नहीं है॥ ६ ॥
‘सुखके साधनभूत जो त्रिवर्ग (धर्म, अर्थ एवं काम) हैं, उन सबका एकमात्र कर्म ही प्रयोजक है (क्योंकि जो कर्मानुष्ठानसे रहित है, उसका धर्म, अर्थ अथवा काम—कोर्इ भी पुरुषार्थ सफल नहीं होता)। इसी तरह एक पुरुषके प्रयत्नसे सिद्ध होनेवाले सभी शुभाशुभ व्यापारोंका फल यहाँ एक ही कर्ताको प्राप्त होता है (इस प्रकार जब परस्पर विरुद्ध होनेपर भी धर्म और कामका अनुष्ठान एक ही पुरुषके द्वारा होता देखा जाता है, तब तुम्हारा यह कहना कि केवल धर्मका ही अनुष्ठान करना चाहिये, धर्मविरोधी कामका नहीं, कैसे संगत हो सकता है?)॥ ७ ॥
‘निष्कामभावसे किये गये धर्म (जप, ध्यान आदि) और अर्थ (धनसाध्य यज्ञ, दान आदि) —ये चित्तशुद्धिके द्वारा यद्यपि निःश्रेयस (मोक्ष)-रूप फलकी प्राप्ति करानेवाले हैं तथापि कामना-विशेषसे स्वर्ग एवं अभ्युदय आदि अन्य फलोंकी भी प्राप्ति कराते हैं। पूर्वोक्त जपादिरूप या क्रियामय नित्य-धर्मका लोप होनेपर अधर्म और अनर्थ प्राप्त होते हैं और उनके रहते हुए प्रत्यवायजनित फल भोगना पड़ता है (परंतु काम्य-कर्म न करनेसे प्रत्यवाय नहीं होता, यह धर्म और अर्थकी अपेक्षा कामकी विशेषता है)॥ ८ ॥
‘जीवोंको धर्म और अधर्मके फल इस लोक और परलोकमें भी भोगने पड़ते हैं। परंतु जो कामनाविशे ोषके उद्देश्यसे यत्नपूर्वक कर्मोंका अनुष्ठान करता है, उसे यहाँ भी उसके सुख-मनोरथकी प्राप्ति हो जाती है। धर्म आदिके फलकी भाँति उसके लिये कालान्तर या लोकान्तरकी अपेक्षा नहीं होती है (इस तरह काम धर्म और अर्थसे विलक्षण सिद्ध होता है)॥ ९ ॥
‘यहाँ राजाके लिये कामरूपी पुरुषार्थका सेवन उचित है ही*। ऐसा ही राक्षसराजने अपने हृदयमें निश्चित किया है और यही हम मन्त्रियोंकी भी सम्मति है। शत्रुके प्रति साहसपूर्ण कार्य करना कौन-सी अनीति है (अतः इन्होंने जो कुछ किया है, उचित ही किया है)॥ १० ॥
‘तुमने युद्धके लिये अकेले अपने ही प्रस्थान करनेके विषयमें जो हेतु दिया है (अपने महान् बलके द्वारा शत्रुको परास्त कर देनेकी जो घोषणा की है) उसमें भी जो असंगत एवं अनुचित बात कही गयी है, उसे मैं तुम्हारे सामने रखता हूँ॥ ११ ॥
‘जिन्होंने पहले जनस्थानमें बहुत-से अत्यन्त बलशाली राक्षसोंको मार डाला था, उन्हीं रघुवंशी वीर श्रीरामको तुम अकेले ही कैसे परास्त करोगे?॥ १२ ॥
‘जनस्थानमें श्रीरामने पहले जिन महान् बलशाली निशाचरोंको मार भगाया था, वे आज भी इस लङ्कापुरीमें विद्यमान हैं और उनका वह भय अबतक दूर नहीं हुआ है। क्या तुम उन राक्षसोंको नहीं देखते हो?॥ १३ ॥
‘दशरथकुमार श्रीराम अत्यन्त कुपित हुए सिंहके समान पराक्रमी एवं भयंकर हैं, क्या तुम उनसे भिड़नेका साहस करते हो? क्या जान-बूझकर सोये हुए सर्पको जगाना चाहते हो? तुम्हारी मूर्खतापर आश्चर्य होता है!॥ १४ ॥
‘श्रीराम सदा ही अपने तेजसे देदीप्यमान हैं। वे क्रोध करनेपर अत्यन्त दुर्जय और मृत्युके समान असह्य हो उठते हैं। भला कौन योद्धा उनका सामना कर सकता है?॥ १५ ॥
‘हमारी यह सारी सेना भी यदि उस अजेय शत्रु का सामना करनेके लिये खड़ी हो तो उसका जीवन भी संशयमें पड़ सकता है। अतः तात! युद्धके लिये तुम्हारा अकेले जाना मुझे बिलकुल अच्छा नहीं लगता है॥ १६॥
‘जो सहायकोंसे सम्पन्न और प्राणोंकी बाजी लगाकर शत्रुओंका संहार करनेके लिये निश्चित विचार रखनेवाला हो, ऐसे शत्रुको अत्यन्त साधारण मानकर कौन असहाय योद्धा वशमें लानेकी इच्छा कर सकता है?॥
‘राक्षसशिरोमणे! मनुष्योंमें जिनकी समता करनेवाला दूसरा कोई नहीं है तथा जो इन्द्र और सूर्यके समान तेजस्वी हैं, उन श्रीरामके साथ युद्ध करनेका हौसला तुम्हें कैसे हो रहा है?’॥ १८॥
रोषके आवेशसे युक्त कुम्भकर्णसे ऐसा कहकर महोदरने समस्त राक्षसोंके बीचमें बैठे हुए लोकोंको रुलानेवाले रावणसे कहा—॥ १९॥
‘महाराज! आप विदेहकुमारीको अपने सामने पाकर भी किसलिये विलम्ब कर रहे हैं? आप जब चाहें तभी सीता आपके वशमें हो जायगी॥ २०॥
‘राक्षसराज! मुझे एक ऐसा उपाय सूझा है, जो सीताको आपकी सेवामें उपस्थित करके ही रहेगा। आप उसे सुनिये। सुनकर अपनी बुद्धिसे उसपर विचार कीजिये और ठीक जँचे तो उसे काममें लाइये॥ २१॥
‘आप नगरमें यह घोषित करा दें कि महोदर, द्विजह्व, संह्लादी, कुम्भकर्ण और वितर्दन—ये पाँच राक्षस रामका वध करनेके लिये जा रहे हैं॥ २२॥
‘हमलोग रणभूमिमें जाकर प्रयत्नपूर्वक श्रीरामके साथ युद्ध करेंगे। यदि आपके शत्रुओंपर हम विजय पा गये तो हमारे लिये सीताको वशमें करनेके निमित्त दूसरे किसी उपायकी आवश्यकता ही नहीं रह जायगी॥ २३॥
‘यदि हमारा शत्रु अजेय होनेके कारण जीवित ही रह गया और हम भी युद्ध करते-करते मारे नहीं गये तो हम उस उपायको काममें लायेंगे, जिसे हमने मनसे सोचकर निश्चित किया है॥ २४॥
रामनामसे अङ्कित बाणोंद्वारा अपने शरीरको घायल कराकर खूनसे लथपथ हो हम यह कहते हुए युद्धभूमिसे यहाँ लौटेंगे कि हमने राम और लक्ष्मणको खा लिया है। उस समय हम
आपके पैर पकड़कर यह भी कहेंगे कि हमने शत्रुको मारा है। इसलिये आप हमारी इच्छा पूरी कीजिये॥ २५-२६ ॥
‘पृथ्वीनाथ! तब आप हाथीकी पीठपर किसीको बिठाकर सारे नगरमें यह घोषणा करा दें कि भाई और सेनाके सहित राम मारा गया॥ २७ ॥
‘शत्रुदमन! इतना ही नहीं, आप प्रसन्नता दिखाते हुए अपने वीर सेवकोंको उनकी अभीष्ट वस्तुएँ, तरहतर हकी भोग-सामग्रियाँ, दास-दासी आदि, धन-रत्न, आभूषण, वस्त्र और अनुलेपन दिलावें। अन्य योद्धाओंको भी बहुत-से उपहार दें तथा स्वयं भी खुशी मनाते हुए मद्यपान करें॥ २८-२९ ॥
‘तदनन्तर जब लोगोंमें सब ओर यह चर्चा फैल जाय कि राम अपने सुहृदोंसहित राक्षसोंके आहार बन गये और सीताके कानोंमें भी यह बात पड़ जाय, तब आप सीताको समझानेके लिये एकान्तमें उसके वासस्थानपर जायें और तरह-तरहसे धीरज बँधाकर उसे धन-धान्य, भाँति-भाँतिके भोग और रत्न आदिका लोभ दिखावें॥
‘राजन्! इस प्रवञ्चनासे अपनेको अनाथ माननेवाली सीताका शोक और भी बढ़ जायगा और वह इच्छा न होनेपर भी आपके अधीन हो जायगी॥ ३२ ॥
‘अपने रमणीय पतिको विनष्ट हुआ जान वह निराशा तथा नारी-सुलभ चपलताके कारण आपके वशमें आ जायगी॥ ३३ ॥
‘वह पहले सुखमें पली हुई है और सुख भोगनेके योग्य है; परंतु इन दिनों दुःखसे दुर्बल हो गयी है। ऐसी दशामें अब आपके ही अधीन अपना सुख समझकर सर्वथा आपकी सेवामें आ जायगी॥ ३४ ॥
‘मेरे देखनेमें यही सबसे सुन्दर नीति है। युद्धमें तो श्रीरामका दर्शन करते ही आपको अनर्थ (मृत्यु)-की प्राप्ति हो सकती है; अतः आप युद्धस्थलमें जानेके लिये उत्सुक न हों, यहीं आपके अभीष्ट मनोरथकी सिद्धि हो जायगी। बिना युद्धके ही आपको सुखका महान् लाभ होगा॥ ३५ ॥
‘महाराज! जो राजा बिना युद्धके ही शत्रुपर विजय पाता है, उसकी सेना नष्ट नहीं होती। उसका जीवन भी संशयमें नहीं पड़ता, वह पवित्र एवं महान् यश पाता तथा दीर्घकालतक लक्ष्मी एवं उत्तम कीर्तिका उपभोग करता है’॥ ३६ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें चौंसठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ६४ ॥
* यहाँ महोदरने रावणकी चापलूसी करनेके लिये ‘कामवाद’ की स्थापना या प्रशंसा की है। यह आदर्श मत नहीं है। वास्तवमें धर्म, अर्थ और काममें धर्म ही प्रधान है; अतः उसीके सेवनसे प्राणिमात्रका कल्याण हो सकता है।