श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
चालीसवाँ सर्ग
चालीसवाँ सर्ग
श्रीरामकी आज्ञासे सुग्रीवका सीताकी खोजके लिये पूर्व दिशामें वानरोंको भेजना और वहाँके स्थानोंका वर्णन करना
तदनन्तर बल-वैभवसे सम्पन्न वानरराज राजा सुग्रीव शत्रुसेनाका संहार करनेवाले पुरुषसिंह श्रीरामसे बोले—॥ १ ॥
‘भगवन्! जो मेरे राज्यमें निवास करते हैं, वे महेन्द्रके समान तेजस्वी, इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले और बलवान् वानर-यूथपति यहाँ आकर पड़ाव डाले बैठे हैं॥
‘ये अपने साथ ऐसे बलवान् वानर योद्धाओंको ले आये हैं, जो बहुत-से युद्धस्थलोंमें अपना पराक्रम प्रकट कर चुके हैं और भयंकर पुरुषार्थ कर दिखानेवाले हैं। यहाँ ऐसे-ऐसे वानर उपस्थित हुए हैं, जो दैत्यों और दानवोंके समान भयानक हैं॥ ३ ॥
‘अनेक युद्धोंमें इन वानर वीरोंकी शूर-वीरताका परिचय मिल चुका है। ये बलके भण्डार हैं, युद्धसे थकते नहीं हैं—इन्होंने थकावटको जीत लिया है। ये अपने पराक्रमके लिये प्रसिद्ध और उद्योग करनेमें श्रेष्ठ हैं॥
‘श्रीराम! यहाँ आये हुए ये वानरोंके करोड़ों यूथ विभिन्न पर्वतोंपर निवास करनेवाले हैं। जल और थल—दोनोंमें समानरूपसे चलनेकी शक्ति रखते हैं। ये सब-के-सब आपके किंकर (आज्ञापालक) हैं॥ ५ ॥
‘शत्रुदमन! ये सभी आपकी आज्ञाके अनुसार चलनेवाले हैं। आप इनके गुरु—स्वामी हैं। ये आपके हितसाधनमें तत्पर रहकर आपके अभीष्ट मनोरथको सिद्ध कर सकेंगे॥ ६ ॥
‘दैत्यों और दानवोंके समान घोर रूपधारी ये सभी वानर-यूथपति अपने साथ भयंकर पराक्रम करनेवाली कई सहस्र सेनाएँ लेकर आये हैं॥ ७ ॥
‘पुरुषसिंह! अब इस समय आप जो कर्तव्य उचित समझते हैं, उसे बताइये। आपकी यह सेना आपके वशमें है। आप इसे यथोचित कार्यके लिये आज्ञा प्रदान करें॥ ८ ॥
‘यद्यपि सीताजीके अन्वेषणका यह कार्य इन सबको तथा मुझे भी अच्छी तरह ज्ञात है, तथापि आप जैसा उचित हो, वैसे कार्यके लिये हमें आज्ञा दें’॥ ९ ॥
जब सुग्रीवने ऐसी बात कही, तब दशरथनन्दन श्रीरामने दोनों भुजाओंसे पकड़कर उन्हें हृदयसे लगा लिया और इस प्रकार कहा— ॥ १० ॥
‘सौम्य! महाप्राज्ञ! पहले यह तो पता लगाओ कि विदेहकुमारी सीता जीवित है या नहीं तथा वह देश, जिसमें रावण निवास करता है, कहाँ है?॥ ११ ॥
‘जब सीताके जीवित होनेका और रावणके निवासस्थानका निश्चित पता मिल जायगा, तब जो समयोचित कर्तव्य होगा, उसका मैं तुम्हारे साथ मिलकर निश्चय करूँगा॥ १२ ॥
‘वानरराज! इस कार्यको सिद्ध करनेमें न तो मैं समर्थ हूँ और न लक्ष्मण ही। कपीश्वर! इस कार्यकी सिद्धि तुम्हारे ही हाथ है। तुम्हीं इसे पूर्ण करनेमें समर्थ हो॥ १३ ॥
‘प्रभो! मेरे कार्यका भलीभाँति निश्चय करके तुम्हीं वानरोंको उचित आज्ञा दो। वीर! मेरा कार्य क्या है? इसे तुम्हीं ठीक-ठीक जानते हो, इसमें संशय नहीं है॥ १४ ॥
‘लक्ष्मणके बाद तुम्हीं मेरे दूसरे सुहृद् हो। तुम पराक्रमी, बुद्धिमान्, समयोचित कर्तव्यके ज्ञाता, हितमें संलग्न रहनेवाले, हितैषी बन्धु, विश्वासपात्र तथा मेरे प्रयोजनको अच्छी तरह समझनेवाले हो’॥ १५ ॥
श्रीरामचन्द्रजीके ऐसा कहनेपर सुग्रीवने उनके और बुद्धिमान् लक्ष्मणके समीप ही विनत नामक यूथपतिसे, जो पर्वतके समान विशालकाय, मेघके समान गम्भीर गर्जना करनेवाले, बलवान् तथा वानरोंके शासक थे और चन्द्रमा एवं सूर्यके समान कान्तिवाले वानरोंके साथ उपस्थित हुए थे, कहा— ‘वानरशिरोमणे! तुम देश और कालके अनुसार नीतिका प्रयोग करनेवाले तथा कार्यका निश्चय करनेमें चतुर हो। तुम एक लाख वेगवान् वानरोंके साथ पर्वत, वन और काननोंसहित पूर्व दिशाकी ओर जाओ और वहाँ पहाड़ोंके दुर्गम प्रदेशों, वनों तथा सरिताओंमें विदेहकुमारी सीता एवं रावणके निवास-स्थानकी खोज करो॥ १६—१९ १/२ ॥
‘भागीरथी गङ्गा, रमणीय सरयू, कौशिकी, सुरम्य कलिन्दनन्दिनी यमुना, महापर्वत यामुन, सरस्वती नदी, सिंधु, मणिके समान निर्मल जलवाले शोणभद्र, मही तथा पर्वतों और वनोंसे सुशोभित कालमही आदि नदियोंके किनारे ढूँढ़ो॥ २०-२१ १/२ ॥
‘ब्रह्ममाल, विदेह, मालव, काशी, कोसल, मगध देशके बड़े-बड़े ग्राम, पुण्ड्रदेश तथा अङ्ग आदि जनपदोंमें छानबीन करो॥ २२ १/२ ॥
‘रेशमके कीड़ोंकी उत्पत्तिके स्थानों और चाँदीके खानोंमें भी खोज करनी चाहिये। इधर-उधर ढूँढ़ते हुए तुम सब लोगोंको इन सभी स्थानोंमें राजा दशरथकी पुत्रवधू तथा श्रीरामचन्द्रजीकी प्यारी पत्नी सीताका अन्वेषण करना चाहिये॥ २३-२४॥
‘समुद्रके भीतर प्रविष्ट हुए पर्वतोंपर, उसके अन्तर्वर्ती द्वीपोंके विभिन्न नगरोंमें तथा मन्दराचलकी चोटीपर जो कोर्इ गाँव बसे हैं, उन सबमें सीताका अनुसंधान करो॥ २५॥
‘जो कर्णप्रावरण (वस्त्रकी भाँति पैरतक लटके हुए कानवाले), ओष्ठकर्णक (ओठतक फैले हुए कानवाले) तथा घोरलोहमुख (लोहेके समान काले एवं भयंकर मुखवाले) हैं, जो एक ही पैरके होते हुए भी वेगपूर्वक चलनेवाले हैं, जिनकी संतानपरम्परा कभी क्षीण नहीं होती, वे पुरुष तथा जो बलवान् नरभक्षी राक्षस हैं, जो सूचीके अग्रभागकी भाँति तीखी चोटीवाले, सुवर्णके समान कान्तिमान्, प्रियदर्शन (सुन्दर), कच्ची मछली खानेवाले, द्वीपवासी तथा जलके भीतर विचरनेवाले किरात हैं, जिनके नीचेका आकार मनुष्य-जैसा और ऊपरकी आकृति व्याघ्रके समान है, ऐसे जो भयंकर प्राणी बताये गये हैं; वानरो! इन सबके निवासस्थानोंमें जाकर तुम्हें सीता तथा रावणकी खोज करनी चाहिये॥ २६—२८ १/२ ॥
‘जिन द्वीपोंमें पर्वतोंपर होकर जाना पड़ता है, जहाँ समुद्रको तैरकर या नाव आदिके द्वारा पहुँचा जाता है, उन सब स्थानोंमें सीताको ढूँढ़ना चाहिये॥ २९॥
‘इसके सिवा तुमलोग यत्नशील होकर सात राज्योंसे सुशोभित यवद्वीप (जावा), सुवर्णद्वीप (सुमात्रा) तथा रूप्यकद्वीपमें भी जो सुवर्णकी खानोंसे सुशोभित हैं, ढूँढ़नेका प्रयत्न करो॥ ३०॥
‘यवद्वीपको लाँघकर आगे जानेपर एक शिशिर नामक पर्वत मिलता है, जिसके ऊपर देवता और दानव निवास करते हैं। वह पर्वत अपने उच्च शिखरसे स्वर्गलोकका स्पर्श करता-सा जान पड़ता है॥ ३१॥
‘इन सब द्वीपोंके पर्वतों तथा शिशिर पर्वतके दुर्गम प्रदेशोंमें, झरनोंके आस-पास और जंगलोंमें तुम सब लोग एक साथ होकर श्रीरामचन्द्रजीकी यशस्विनी पत्नी सीताका अन्वेषण करो॥ ३२॥
‘तदनन्तर समुद्रके उस पार जहाँ सिद्ध और चारण निवास करते हैं, जाकर लाल जलसे भरे हुए शीघ्र प्रवाहित होनेवाले शोण नामक नदके तटपर पहुँच जाओगे। उसके तटवर्ती रमणीय
तीर्थों और विचित्र वनोंमें जहाँ-तहाँ विदेहकुमारी सीताके साथ रावणकी खोज करना॥ ३३-३४ ॥
‘पर्वतोंसे निकली हुईं बहुत-सी ऐसी नदियाँ मिलेंगी, जिनके तटोंपर बड़े भयंकर अनेकानेक उपवन प्राप्त होंगे। साथ ही वहाँ बहुत-सी गुफाओंवाले पर्वत उपलब्ध होंगे और अनेक वन भी दृष्टिगोचर होंगे। उन सबमें सीताका पता लगाना चाहिये॥ ३५॥
‘तत्पश्चात् पूर्वोक्त देशोंसे परे जाकर तुम इक्षुरससे परिपूर्ण समुद्र तथा उसके द्वीपोंको देखोगे, जो बड़े ही भयंकर प्रतीत होते हैं। इक्षुरसका वह समुद्र महाभयंकर है। उसमें हवाके वेगसे उत्ताल तरंगें उठती रहती हैं तथा वह गर्जना करता हुआ-सा जान पड़ता है॥ ३६॥
‘उस समुद्रमें बहुत-से विशालकाय असुर निवास करते हैं। वे बहुत दिनोंके भूखे होते हैं और छाया पकड़कर ही प्राणियोंको अपने पास खींच लेते हैं। यही उनका नित्यका आहार है। इसके लिये उन्हें ब्रह्माजीसे अनुमति मिल चुकी है॥ ३७॥
‘इक्षुरसका वह समुद्र काले मेघके समान श्याम दिखायी देता है। बड़े-बड़े नाग उसके भीतर निवास करते हैं। उससे बड़ी भारी गर्जना होती रहती है। विशेष उपायोंसे उस महासागरके पार जाकर तुम लाल रंगके जलसे भरे हुए लोहित नामक भयंकर समुद्रके तटपर पहुँच जाओगे और वहाँ शाल्मलीद्वीपके चिह्नभूत कूटशाल्मली नामक विशाल वृक्षका दर्शन करोगे॥ ३८-३९ ॥
‘उसके पास ही विश्वकर्माका बनाया हुआ विनतानन्दन गरुड़का एक सुन्दर भवन है, जो नाना प्रकारके रत्नोंसे विभूषित तथा कैलास पर्वतके समान उज्ज्वल एवं विशाल है॥ ४० ॥
‘उस द्वीपमें पर्वतके समान शरीरवाले भयंकर मंदेह नामक राक्षस निवास करते हैं, जो सुरासमुद्रके मध्यवर्ती शैल-शिखरोंपर लटकते रहते हैं। वे अनेक प्रकारके रूप धारण करनेवाले तथा भयदायक हैं॥ ४१ ॥
‘प्रतिदिन सूर्योदयके समय वे राक्षस ऊर्ध्वमुख होकर सूर्यसे जूझने लगते हैं, परंतु सूर्यमण्डलके तापसे संतप्त तथा ब्रह्मतेजसे निहत हो सुरा-समुद्रके जलमें गिर पड़ते हैं। वहाँसे फिर जीवित हो उन्हीं शैल-शिखरोंपर लटक जाते हैं। उनका बारंबार ऐसा ही क्रम चला करता है॥ ४२ १/२ ॥
‘शाल्मलिद्वीप एवं सुरा-समुद्रसे आगे बढ़नेपर (क्रमशः घृत और दधिके समुद्र प्राप्त होंगे। वहाँ सीताकी खोज करनेके पश्चात् जब आगे बढ़ोगे, तब) सफेद बादलोंकी-सी आभावाले
क्षीरसमुद्रका दर्शन करोगे॥ ४३ ॥
‘दुर्धर्ष वानरो! वहाँ पहुँचकर उठती हुई लहरोंसे युक्त क्षीरसागरको इस प्रकार देखोगे, मानो उसने मोतियोंके हार पहन रखे हों। उस सागरके बीचमें ऋषभ नामसे प्रसिद्ध एक बहुत ऊँचा पर्वत है, जो श्वेत वर्णका है॥
‘उस पर्वतपर सब ओर बहुत-से वृक्ष भरे हुए हैं, जो फूलोंसे सुशोभित तथा दिव्य गन्धसे सुवासित हैं। उसके ऊपर सुदर्शन नामका एक सरोवर है, जिसमें चाँदीके समान श्वेत रंगवाले कमल खिले हुए हैं। उन कमलोंके केसर सुवर्णमय होते हैं और सदा दिव्य दीप्तिसे दमकते रहते हैं। वह सरोवर राजहंसोंसे भरा रहता है॥ ४५ १/२ ॥
‘देवता, चारण, यक्ष, किन्नर और अप्सराएँ बड़ी प्रसन्नताके साथ जल-विहार करनेके लिये वहाँ आया करती हैं॥ ४६ १/२ ॥
‘वानरो! क्षीरसागर लाँघकर जब तुमलोग आगे बढ़ोगे, तब शीघ्र ही सुस्वादु जलसे भरे हुए समुद्रको देखोगे। वह महासागर समस्त प्राणियोंको भय देनेवाला है। उसमें ब्रह्मर्षि और्वके कोपसे प्रकट हुआ वडवामुख नामक महान् तेज विद्यमान है॥ ४७-४८ ॥
‘उस समुद्रमें जो चराचर प्राणियोंसहित महान् वेगशाली जल है, वही उस वडवामुख नामक अग्निका आहार बताया जाता है। वहाँ जो वडवानल प्रकट हुआ है, उसे देखकर उसमें पतनके भयसे चीखते-चिल्लाते हुए समुद्रनिवासी असमर्थ प्राणियोंका आर्तनाद निरन्तर सुनायी देता है॥ ४९ ॥
‘स्वादिष्ट जलसे भरे हुए उस समुद्रके उत्तर तेरह योजनकी दूरीपर सुवर्णमयी शिलाओंसे सुशोभित, कनककी कमनीय कान्ति धारण करनेवाला एक बहुत ऊँचा पर्वत है॥ ५० ॥
‘वानरो! उसके शिखरपर इस पृथ्वीको धारण करनेवाले भगवान् अनन्त बैठे दिखायी देंगे। उनका श्रीविग्रह चन्द्रमाके समान गौरवर्णका है। वे सर्प जातिके हैं; परंतु उनका स्वरूप देवताओंके तुल्य है। उनके नेत्र प्रफुल्ल कमलदलके समान हैं और शरीर नील वस्त्रसे आच्छादित है। उन अनन्तदेवके सहस्र मस्तक हैं॥
‘पर्वतके ऊपर उन महात्माकी ताड़के चिह्नसे युक्त सुवर्णमयी ध्वजा फहराती रहती है। उस ध्वजाकी तीन शिखाएँ हैं और उसके नीचे आधारभूमिपर वेदी बनी हुई है। इस तरह उस ध्वजकी बड़ी शोभा होती है॥ ५३ ॥
‘यही तालध्वज पूर्व दिशाकी सीमाके सूचक-चिह्नके रूपमें देवताओंद्वारा स्थापित किया गया है। उसके बाद सुवर्णमय उदयपर्वत है, जो दिव्य शोभासे सम्पन्न है॥ ५४ ॥
‘उसका गगनचुम्बी शिखर सौ योजन लंबा है। उसका आधारभूत पर्वत भी वैसा ही है। उसके साथ वह दिव्य सुवर्णशिखर अद्भुत शोभा पाता है॥ ५५ ॥
‘वहाँके साल, ताल, तमाल और फूलोंसे लदे कनेर आदि वृक्ष भी सुवर्णमय ही हैं। उन सूर्यतुल्य तेजस्वी दिव्य वृक्षोंसे उदयगिरिकी बड़ी शोभा होती है॥ ५६ ॥
‘उस सौ योजन लंबे उदयगिरिके शिखरपर एक सौमनस नामक सुवर्णमय शिखर है, जिसकी चौड़ाई एक योजन और ऊँचाई दस योजन है॥ ५७ ॥
‘पूर्वकालमें वामन अवतारके समय पुरुषोत्तम भगवान् विष्णुने अपना पहला पैर उस सौमनस नामक शिखरपर रखकर दूसरा पैर मेरु पर्वतके शिखरपर रखा था॥ ५८ ॥
‘सूर्यदेव उत्तरसे घूमकर जम्बूद्वीपकी परिक्रमा करते हुए जब अत्यन्त ऊँचे ‘सौमनस’ नामक शिखरपर आकर स्थित होते हैं, तब जम्बूद्वीपनिवासियोंको उनका अधिक स्पष्टताके साथ दर्शन होता है॥ ५९ ॥
‘उस सौमनस नामक शिखरपर वैखानस महात्मा महर्षि बालखिल्यगण प्रकाशित होते देखे जाते हैं, जो सूर्यके समान कान्तिमान् और तपस्वी हैं॥ ६० ॥
‘यह उदयगिरिके सौमनस शिखरके सामनेका द्वीप सुदर्शन नामसे प्रसिद्ध है; क्योंकि उक्त शिखरपर जब भगवान् सूर्य उदित होते हैं, तभी इस द्वीपके समस्त प्राणियोंका तेजसे सम्बन्ध होता है और सबके नेत्रोंको प्रकाश प्राप्त होता है (यही इस द्वीपके ‘सुदर्शन’ नाम होनेका कारण है)॥ ६१ ॥
‘उदयाचलके पृष्ठभागोंमें, कन्दराओंमें तथा वनोंमें भी तुम्हें जहाँ-तहाँ विदेहकुमारी सीतासहित रावणका पता लगाना चाहिये॥ ६२ ॥
‘उस सुवर्णमय उदयाचल तथा महात्मा सूर्यदेवके तेजसे व्याप्त हुई उदयकालिक पूर्व संध्या रक्तवर्णकी प्रभासे प्रकाशित होती है॥ ६३ ॥
‘सूर्यके उदयका यह स्थान सबसे पहले ब्रह्माजीने बनाया है; अतः यही पृथ्वी एवं ब्रह्मलोकका द्वार है (ऊपरके लोकोंमें रहनेवाले प्राणी इसी द्वारसे भूलोकमें प्रवेश करते हैं तथा
भूलोकके प्राणी इसी द्वारसे ब्रह्मलोकमें जाते हैं)। पहले इसी दिशामें इस द्वारका निर्माण हुआ, इसलिये इसे पूर्व दिशा कहते हैं॥ ६४ ॥
‘उदयाचलकी घाटियों, झरनों और गुफाओंमें यत्र-तत्र घूमकर तुम्हें विदेहकुमारी सीतासहित रावणका अन्वेषण करना चाहिये॥ ६५ ॥
‘इससे आगे पूर्व दिशा अगम्य है। उधर देवता रहते हैं। उस ओर चन्द्रमा और सूर्यका प्रकाश न होनेसे वहाँकी भूमि अन्धकारसे आच्छन्न एवं अदृश्य है॥ ६६ ॥
‘उदयाचलके आस-पासके जो समस्त पर्वत, कन्दराएँ तथा नदियाँ हैं, उनमें तथा जिन स्थानोंका मैंने निर्देश नहीं किया है, उनमें भी तुम्हें जानकीकी खोज करनी चाहिये॥ ६७ ॥
‘वानरशिरोमणियो! केवल उदयगिरितक ही वानरोंकी पहुँच हो सकती है। इससे आगे न तो सूर्यका प्रकाश है और न देश आदिकी कोऽइ सीमा ही है। अतः आगेकी भूमिके बारेमें मुझे कुछ भी मालूम नहीं है॥ ६८ ॥
‘तुमलोग उदयाचलतक जाकर सीता और रावणके स्थानका पता लगाना और एक मास पूरा होते-होतेतक लौट आना॥ ६९ ॥
‘एक महीनेसे अधिक न ठहरना। जो अधिक कालतक वहाँ रह जायगा, वह मेरे द्वारा मारा जायगा। मिथिलेशकुमारीका पता लगाकर अन्वेषणका प्रयोजन सिद्ध हो जानेपर अवश्य लौट आना॥ ७० ॥
‘वानरो! वनसमूहसे अलंकृत पूर्व दिशामें अच्छी तरह भ्रमण करके श्रीरामचन्द्रजीकी प्यारी पत्नी सीताका समाचार जानकर तुम वहाँसे लौट आओ। इससे तुम सुखी होओगे’॥ ७१ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें चालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४०॥