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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

ग्यारहवाँ सर्ग

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ग्यारहवाँ सर्ग

सुग्रीवके द्वारा वालीके पराक्रमका वर्णन— वालीका दुन्दुभि दैत्यको मारकर उसकी लाशको मतङ्गवनमें फेंकना, मतङ्गमुनिका वालीको शाप देना, श्रीरामका दुन्दुभिके अस्थिसमूहको दूर फेंकना और सुग्रीवका उनसे साल-भेदनके लिये आग्रह करना

श्रीरामचन्द्रजीका वचन हर्ष और पुरुषार्थको बढ़ानेवाला था, उसे सुनकर सुग्रीवने उसके प्रति अपना आदर प्रकट किया और श्रीरघुनाथजीकी इस प्रकार प्रशंसा की— ॥ १ ॥

‘प्रभो! आपके बाण प्रज्वलित, तीक्ष्ण एवं मर्मभेदी हैं। यदि आप कुपित हो जायँ तो इनके द्वारा प्रलयकालके सूर्यकी भाँति समस्त लोकोंको भस्म कर सकते हैं। इसमें संशयकी बात नहीं है॥ २ ॥

‘परंतु वालीका जैसा पुरुषार्थ है, जो बल है और जैसा धैर्य है, वह सब एकचित्त होकर सुन लीजिये। उसके बाद जैसा उचित हो, कीजियेगा॥ ३ ॥

‘वाली सूर्योदयके पहले ही पश्चिम समुद्रसे पूर्व समुद्रतक और दक्षिण सागरसे उत्तरतक घूम आता है; फिर भी वह थकता नहीं है॥ ४ ॥

‘पराक्रमी वाली पर्वतोंकी चोटियोंपर चढ़कर बड़े-बड़े शिखरोंको बलपूर्वक उठा लेता और ऊपरको उछालकर फिर उन्हें हाथोंसे थाम लेता है॥ ५ ॥

‘वनोंमें नाना प्रकारके जो बहुत-से सुदृढ़ वृक्ष थे, उन्हें अपने बलको प्रकट करते हुए वालीने वेगपूर्वक तोड़ डाला है॥ ६ ॥

‘पहलेकी बात है यहाँ एक दुन्दुभि नामका असुर रहता था, जो भैंसेके रूपमें दिखायी देता था। वह ऊँचाईमें कैलास पर्वतके समान जान पड़ता था। पराक्रमी दुन्दुभि अपने शरीरमें एक हजार हाथियोंका बल रखता था॥

‘बलके घमंडमें भरा हुआ वह विशालकाय दुष्टात्मा दानव अपनेको मिले हुए वरदानसे मोहित हो सरिताओंके स्वामी समुद्रके पास गया॥ ८ ॥

‘जिसमें उत्ताल तरंगें उठ रही थीं तथा जो रत्नोंकी निधि हैं, उस महान् जलराशिसे परिपूर्ण समुद्रको लाँघकर—उसे कुछ भी न समझकर दुन्दुभिने उसके अधिष्ठाता देवतासे कहा— ‘मुझे अपने साथ युद्धका अवसर दो’ ॥ ९ ॥

‘राजन्! उस समय महान् बलशाली धर्मात्मा समुद्र उस कालप्रेरित असुरसे इस प्रकार बोला—॥ १० ॥

‘‘युद्धविशारद वीर! मैं तुम्हें युद्धका अवसर देने— तुम्हारे साथ युद्ध करनेमें असमर्थ हूँ। जो तुम्हें युद्ध प्रदान करेगा, उसका नाम बतलाता हूँ, सुनो॥ ११ ॥

‘विशाल वनमें जो पर्वतोंका राजा और भगवान् शंकरका श्वशुर है, तपस्वी जनोंका सबसे बड़ा आश्रय और संसारमें हिमवान् नामसे विख्यात है, जहाँसे जलके बड़े-बड़े स्रोत प्रकट हुए हैं। तथा जहाँ बहुत-सी कन्दराएँ और झरने हैं, वह गिरिराज हिमालय ही तुम्हारे साथ युद्ध करनेमें समर्थ है। वह तुम्हें अनुपम प्रीति प्रदान कर सकता है॥ १२-१३ ॥

‘यह सुनकर असुरशिरोमणि दुन्दुभि समुद्रको डरा हुआ जान धनुषसे छूटे हुए बाणकी भाँति तुरंत हिमालयके वनमें जा पहुँचा और उस पर्वतकी गजराजोंके समान विशाल श्वेत शिलाओंको बारंबार भूमिपर फेंकने और गर्जना करने लगा॥ १४-१५ ॥

‘तब श्वेत बादलके समान आकार धारण किये सौम्य स्वभाववाले हिमवान् वहाँ प्रकट हुए। उनकी आकृति प्रसन्नताको बढ़ानेवाली थी। वे अपने ही शिखरपर खड़े होकर बोले—॥ १६ ॥

‘‘धर्मवत्सल दुन्दुभे! तुम मुझे क्लेश न दो। मैं युद्धकर्ममें कुशल नहीं हूँ। मैं तो केवल तपस्वी जनोंका निवासस्थान हूँ’॥ १७ ॥

‘बुद्धिमान् गिरिराज हिमालयकी यह बात सुनकर दुन्दुभिके नेत्र क्रोधसे लाल हो गये और वह इस प्रकार बोला—॥ १८ ॥

‘यदि तुम युद्ध करनेमें असमर्थ हो अथवा मेरे भयसे ही युद्धकी चेष्टासे विरत हो गये हो तो मुझे उस वीरका नाम बताओ, जो युद्धकी इच्छा रखनेवाले मुझको अपने साथ युद्ध करनेका अवसर दे’॥ १९ ॥

‘उसकी यह बात सुनकर बातचीतमें कुशल धर्मात्मा हिमवान्ने श्रेष्ठ असुरसे, जिसके लिये पहले किसीने किसी प्रतिद्वन्द्वी योद्धाका नाम नहीं बताया था, क्रोधपूर्वक कहा—॥ २० ॥

‘‘महाप्राज्ञ दानवराज! वाली नामसे प्रसिद्ध एक परम तेजस्वी और प्रतापी वानर हैं, जो देवराज इन्द्रके पुत्र हैं और अनुपम शोभासे पूर्ण किष्किन्धा नामक पुरीमें निवास करते हैं॥ २१ ॥

“वे बड़े बुद्धिमान् और युद्धकी कलामें निपुण हैं। वे ही तुमसे जूझनेमें समर्थ हैं। जैसे इन्द्रने नमुचिको युद्धका अवसर दिया था, उसी प्रकार वाली तुम्हें द्वन्द्वयुद्ध प्रदान कर सकते हैं॥ २२ ॥

“यदि तुम यहाँ युद्ध चाहते हो तो शीघ्र चले जाओ; क्योंकि वालीके लिये किसी शत्रुके ललकारको सह सकना बहुत कठिन है। वे युद्धकर्ममें सदा शूरता प्रकट करनेवाले हैं'॥ २३ ॥

‘हिमवान्‌की बात सुनकर क्रोधसे भरा हुआ दुन्दुभि तत्काल वालीकी किष्किन्धापुरीमें जा पहुँचा॥ २४ ॥

‘उसने भैंसेका-सा रूप धारण कर रखा था। उसके सींग बड़े तीखे थे। वह बड़ा भयंकर था और वर्षाकालके आकाशमें छाये हुए जलसे भरे महान् मेघके समान जान पड़ता था॥ २५ ॥

‘वह महाबली दुन्दुभि किष्किन्धापुरीके द्वारपर आकर भूमिको कँपाता हुआ जोर-जोरसे गर्जना करने लगा, मानो दुन्दुभिका गम्भीर नाद हो रहा हो॥ २६ ॥

‘वह आसपासके वृक्षोंको तोड़ता, धरतीको खुरोंसे खोदता और घमंडमें आकर पुरीके दरवाजेको सींगोंसे खरोंचता हुआ युद्धके लिये डट गया॥ २७ ॥

‘वाली उस समय अन्तःपुरमें था। उस दानवकी गर्जना सुनकर वह अमर्षसे भर गया और तारोंसे घिरे हुए चन्द्रमाकी भाँति स्त्रियोंसे घिरा हुआ नगरके बाहर निकल आया॥ २८ ॥

‘समस्त वनचारी वानरोंके राजा वालीने वहाँ सुस्पष्ट अक्षरों तथा पदोंसे युक्त परिमित वाणीमें उस दुन्दुभिसे कहा— ॥ २९ ॥

“महाबली दुन्दुभे! मैं तुम्हें अच्छी तरह जानता हूँ। तुम इस नगरद्वारको रोककर क्यों गरज रहे हो? अपने प्राणोंकी रक्षा करो'॥ ३० ॥

‘बुद्धिमान् वानराज वालीका यह वचन सुनकर दुन्दुभिकी आँखें क्रोधसे लाल हो गयीं। वह उससे इस प्रकार बोला—॥ ३१ ॥

“वीर! तुम्हें स्त्रियोंके समीप ऐसी बात नहीं कहनी चाहिये। मुझे युद्धका अवसर दो, तब मैं तुम्हारा बल समझूँगा॥ ३२ ॥

“अथवा वानर! मैं आजकी रातमें अपने क्रोधको रोके रहूँगा। तुम स्वेच्छानुसार कामभोगके लिये सूर्योदयतक समय मुझसे ले लो॥ ३३ ॥

“वानरोंको हृदयसे लगाकर जिसे जो कुछ देना हो दे दो; तुम समस्त कपियोंके राजा हो न! अपने सुहृदोंसे मिल लो, सलाह कर लो॥ ३४ ॥

“किष्किन्धापुरीको अच्छी तरह देख लो। अपने समान पुत्र आदिको इस नगरीके राज्यपर अभिषिक्त कर दो और स्त्रियोंके साथ आज जीभरकर क्रीडा कर लो। इसके बाद मैं तुम्हारा घमंड चूर कर दूँगा॥ ३५ ॥

“जो मधुपानसे मत्त, प्रमत्त (असावधान), युद्धसे भगे हुए, अस्त्ररहित, दुर्बल, तुम्हारे-जैसे स्त्रियोंसे घिरे हुए तथा मदमोहित पुरुषका वध करता है, वह जगतमें गर्भ-हत्यारा कहा जाता है'॥ ३६ ॥

'यह सुनकर वाली मन्द-मन्द मुसकराकर उन तारा आदि सब स्त्रियोंको दूर हटा उस असुरराजसे क्रोधपूर्वक बोला—॥ ३७ ॥

“यदि तुम युद्धके लिये निर्भय होकर खड़े हो तो यह न समझो कि यह वाली मधु पीकर मतवाला हो गया है। मेरे इस मदको तुम युद्धस्थलमें उत्साहवृद्धिके लिये वीरोंद्वारा किया जानेवाला औषधविशेषका पान समझो'॥ ३८ ॥

'उससे ऐसा कहकर पिता इन्द्रकी दी हुई विजयदायिनी सुवर्णमालाको गलेमें डालकर वाली कुपित हो युद्धके लिये खड़ा हो गया॥ ३९ ॥

'कपिश्रेष्ठ वालीने पर्वताकार दुन्दुभिके दोनों सींग पकड़कर उस समय गर्जना करते हुए उसे बारंबार घुमाया॥ ४० ॥

'फिर बलपूर्वक उसे धरतीपर दे मारा और बड़े जोरसे सिंहनाद किया। पृथ्वीपर गिराये जाते समय उसके दोनों कानोंसे खूनकी धाराएँ बहने लगीं॥ ४१ ॥

'क्रोधके आवेशसे युक्त हो एक-दूसरेको जीतनेकी इच्छावाले उन दोनों दुन्दुभि और वालीमें घोर युद्ध होने लगा॥ ४२ ॥

'उस समय इन्द्रके तुल्य पराक्रमी वाली दुन्दुभिपर मुक्कों, लातों, घुटनों, शिलाओं तथा वृक्षोंसे प्रहार करने लगा॥ ४३ ॥

'उस युद्धस्थलमें परस्पर प्रहार करते हुए वानर और असुर दोनों योद्धाओंमेंसे असुरकी शक्ति तो घटने लगी और इन्द्रकुमार वालीका बल बढ़ने लगा॥ ४४ ॥

'उन दोनोंमें वहाँ प्राणान्तकारी युद्ध छिड़ गया। उस समय वालीने दुन्दुभिको उठाकर पृथ्वीपर दे मारा, साथ ही अपने शरीरसे उसको दबा दिया, जिससे दुन्दुभि पिस गया॥ ४५ ॥

‘गिरते समय उसके शरीरके समस्त छिद्रोंसे बहुत-सा रक्त बहने लगा। वह महाबाहु असुर पृथ्वीपर गिरा और मर गया॥ ४६ ॥

‘जब उसके प्राण निकल गये और चेतना लुप्त हो गयी, तब वेगवान् वालीने उसे दोनों हाथोंसे उठाकर एक साधारण वेगसे एक योजन दूर फेंक दिया॥ ४७ ॥

‘वेगपूर्वक फेंके गये उस असुरके मुखसे निकली हुई रक्तकी बहुत-सी बूँदें हवाके साथ उड़कर मतंगमुनिके आश्रममें पड़ गयीं॥ ४८ ॥

‘महाभाग! वहाँ पड़े हुए उन रक्त-बिन्दुओंको देखकर मतंगमुनि कुपित हो उठे और इस विचारमें पड़ गये कि ‘यह कौन है, जो यहाँ रक्तके छींटे डाल गया है?॥ ४९ ॥

‘“जिस दुष्टने सहसा मेरे शरीरसे रक्तका स्पर्श करा दिया, यह दुरात्मा दुर्बुद्धि, अजितात्मा और मूर्ख कौन है?’॥ ५० ॥

‘ऐसा कहकर मुनिवर मतंगने बाहर निकलकर देखा तो उन्हें एक पर्वताकार भैंसा पृथ्वीपर प्राणहीन होकर पड़ा दिखायी दिया॥ ५१ ॥

‘उन्होंने अपने तपोबलसे यह जान लिया कि यह एक वानरकी करतूत है। अतः उस लाशको फेंकनेवाले वानरके प्रति उन्होंने बड़ा भारी शाप दिया—॥ ५२ ॥

‘“जिसने खूनके छींटे डालकर मेरे निवासस्थान इस वनको अपवित्र कर दिया है, वह आजसे इस वनमें प्रवेश न करे। यदि इसमें प्रवेश करेगा तो उसका वध हो जायगा॥ ५३ ॥

‘“इस असुरके शरीरको इधर फेंककर जिसने इन वृक्षोंको तोड़ डाला है, वह दुर्बुद्धि यदि मेरे आश्रमके चारों ओर पूरे एक योजनतककी भूमिमें पैर रखेगा तो अवश्य ही अपने प्राणोंसे हाथ धो बैठेगा॥ ५४ १/२ ॥

‘“उस वालीके जो कोई सचिव भी मेरे इस वनमें रहते हों, उन्हें अब यहाँका निवास त्याग देना चाहिये। वे मेरी आज्ञा सुनकर सुखपूर्वक यहाँसे चले जायँ। यदि वे रहेंगे तो उन्हें भी निश्चय ही शाप दे दूँगा॥ ५५-५६ ॥

‘“मैंने अपने इस वनकी सदा पुत्रकी भाँति रक्षा की है। जो इसके पत्र और अङ्कुरका विनाश तथा फल-मूलका अभाव करनेके लिये यहाँ रहेंगे, वे अवश्य शापके भागी होंगे॥ ५७ ॥

‘“आजका दिन उन सबके आने-जाने या रहनेकी अन्तिम अवधि है—आजभरके लिये मैं उन सबको छुट्टी देता हूँ। कलसे जो कोई वानर यहाँ मेरी दृष्टिमें पड़ जायगा, वह कई हजार

वर्षोंके लिये पत्थर हो जायगा'॥ ५८॥

‘मुनिके इस वचनको सुनकर वे सभी वानर मतंगवनसे निकल गये। उन्हें देखकर वालीने पूछा—॥ ५९॥

“मतंगवनमें निवास करनेवाले आप सभी वानर मेरे पास क्यों चले आये? वनवासियोंकी कुशल तो है न?”॥ ६०॥

‘तब उन सभी वानरोंने सुवर्णमालाधारी वालीसे अपने आनेका सब कारण बताया तथा जो वालीको शाप हुआ था, उसे भी कह सुनाया॥ ६१॥

‘वानरोंकी कही हुई यह बात सुनकर वाली महर्षि मतंगके पास गया और हाथ जोड़कर क्षमा-याचना करने लगा॥ ६२॥

‘किंतु महर्षिने उसका आदर नहीं किया। वे चुपचाप अपने आश्रममें चले गये। इधर वाली शाप प्राप्त होनेसे भयभीत हो बहुत ही व्याकुल हो गया॥ ६३॥

‘नरेश्वर! तबसे उस शापके भयसे डरा हुआ वाली इस महान् पर्वत ऋष्यमूकके स्थानोंमें न तो कभी प्रवेश करना चाहता है और न इस पर्वतको देखना ही चाहता है॥ ६४॥

‘श्रीराम! यहाँ उसका प्रवेश होना असम्भव है, यह जानकर मैं अपने मन्त्रियोंके साथ इस महान् वनमें विषाद-शून्य होकर विचरता हूँ॥ ६५॥

‘यह रहा दुन्दुभिकी हड्डियोंका ढेर, जो एक महान् पर्वतशिखरके समान जान पड़ता है। वालीने अपने बलके घमंडमें आकर दुन्दुभिके शरीरको इतनी दूर फेंका था॥ ६६॥

‘ये सात सालके विशाल एवं मोटे वृक्ष हैं, जो अनेक उत्तम शाखाओंसे सुशोभित होते हैं। वाली इनमेंसे एक-एकको बलपूर्वक हिलाकर पत्रहीन कर सकता है॥ ६७॥

‘श्रीराम! यह मैंने वालीके अनुपम पराक्रमको प्रकाशित किया है। नरेश्वर! आप उस वालीको समराङ्गणमें कैसे मार सकेंगे'॥ ६८॥

सुग्रीवके ऐसा कहनेपर लक्ष्मणको बड़ी हँसी आयी। वे हँसते हुए ही बोले—‘कौन-सा काम कर देनेपर तुम्हें विश्वास होगा कि श्रीरामचन्द्रजी वालीका वध कर सकेंगे'॥ ६९॥

तब सुग्रीवने उनसे कहा— ‘पूर्वकालमें वालीने सालके इन सातों वृक्षोंको एक-एक करके कई बार बींध डाला है। अतः श्रीरामचन्द्रजी भी यदि इनमेंसे किसी एक वृक्षको एक ही

बाणसे छेद डालेंगे तो इनका पराक्रम देखकर मुझे वालीके मारे जानेका विश्वास हो जायगा॥ ७०-७१ ॥

‘लक्ष्मण! यदि इस महिषरूपधारी दुन्दुभिकी हड्डीको एक ही पैरसे उठाकर बलपूर्वक दो सौ धनुषकी दूरीपर फेंक सकें तो भी मैं यह मान लूँगा कि इनके हाथसे वालीका वध हो सकता है’॥ ७२ ॥

जिनके नेत्रप्रान्त कुछ-कुछ लाल थे, उन श्रीरामसे ऐसा कहकर सुग्रीव दो घड़ीतक कुछ सोचविचार में पड़े रहे। इसके बाद वे ककुत्स्थकुलभूषण श्रीरामसे फिर बोले— ॥ ७३ ॥

‘वाली शूर है और स्वयं भी उसे अपने शौर्यपर अभिमान है। उसके बल और पुरुषार्थ विख्यात हैं। वह बलवान् वानर अबतकके युद्धोंमें कभी पराजित नहीं हुआ है॥ ७४ ॥

‘इसके ऐसे-ऐसे कर्म देखे जाते हैं, जो देवताओंके लिये दुष्कर हैं और जिनका चिन्तन करके भयभीत हो मैंने इस ऋष्यमूक पर्वतकी शरण ली है॥ ७५ ॥

‘वानरराज वालीको जीतना दूसरोंके लिये असम्भव है। उसपर आक्रमण अथवा उसका तिरस्कार भी नहीं किया जा सकता। वह शत्रुकी ललकारको नहीं सह सकता। जब मैं उसके प्रभावका चिन्तन करता हूँ, तब इस ऋष्यमूक पर्वतको एक क्षणके लिये भी छोड़ नहीं पाता हूँ॥ ७६ ॥

‘ये हनुमान् आदि मेरे श्रेष्ठ सचिव मुझमें अनुराग रखनेवाले हैं। इनके साथ रहकर भी मैं इस विशाल वनमें वालीसे उद्विग्न और शङ्कित होकर ही विचरता हूँ॥ ७७ ॥

‘मित्रवत्सल! आप मुझे परम स्पृहणीय श्रेष्ठ मित्र मिल गये हैं। पुरुषसिंह! आप मेरे लिये हिमालयके समान हैं और मैं आपका आश्रय ले चुका हूँ। (इसलिये अब मुझे निर्भय हो जाना चाहिये)॥ ७८ ॥

‘किंतु रघुनन्दन! मैं उस बलशाली दुष्ट भ्राताके बल-पराक्रमको जानता हूँ और समरभूमिमें आपका पराक्रम मैंने प्रत्यक्ष नहीं देखा है॥ ७९ ॥

‘प्रभो! अवश्य ही मैं वालीसे आपकी तुलना नहीं करता हूँ। न तो आपको डराता हूँ और न आपका अपमान ही करता हूँ। वालीके भयानक कर्मोंने ही मेरे हृदयमें कातरता उत्पन्न कर दी है॥ ८० ॥

‘रघुनन्दन! निश्चय ही आपकी वाणी मेरे लिये प्रमाणभूत है—विश्वसनीय है; क्योंकि आपका धैर्य और आपकी यह दिव्य आकृति आदि गुण राखसे ढकी हुई आगके समान आपके उत्कृष्ट तेजको सूचित कर रहे हैं’॥ ८१ ॥

महात्मा सुग्रीवकी यह बात सुनकर भगवान् श्रीराम पहले तो मुसकराये। फिर उस वानरकी बातका उत्तर देते हुए उससे बोले—॥ ८२ ॥

‘वानर! यदि तुम्हें इस समय पराक्रमके विषयमें हम लोगोंपर विश्वास नहीं होता तो युद्धके समय हम तुम्हें उसका उत्तम विश्वास करा देंगे’॥ ८३ ॥

ऐसा कहकर सुग्रीवको सान्त्वना देते हुए लक्ष्मणके बड़े भाई महाबाहु बलवान् श्रीरघुनाथजीने खिलवाड़में ही दुन्दुभिके शरीरको अपने पैरके अँगूठेसे टाँग लिया और उस असुरके उस सूखे हुए कङ्कालको पैरके अँगूठेसे ही दस योजन दूर फेंक दिया॥ ८४-८५ ॥

उसके शरीरको फेंका गया देख सुग्रीवने लक्ष्मण और वानरोंके सामने ही तपते हुए सूर्यके समान तेजस्वी वीर श्रीरामचन्द्रजीसे पुनः यह अर्थभरी बात कही—॥ ८६ ॥

‘सखे! मेरा भाई वाली उस समय मदमत्त और युद्धसे थका हुआ था और दुन्दुभिका यह शरीर खूनसे भीगा हुआ, मांसयुक्त तथा नया था। इस दशामें उसने इस शरीरको पूर्वकालमें दूर फेंका था॥ ८७ ॥

‘परंतु रघुनन्दन! इस समय यह मांसहीन होनेके कारण तिनकेके समान हलका हो गया है और आपने हर्ष एवं उत्साहसे युक्त होकर इसे फेंका है॥ ८८ ॥

‘अतः श्रीराम! इस लाशको फेंकनेपर भी यह नहीं जाना जा सकता कि आपका बल अधिक है या उसका; क्योंकि वह गीला था और यह सूखा। यह इन दोनों अवस्थाओंमें महान् अन्तर है॥ ८९ ॥

“तात! आपके और उसके बलमें वही संशय अबतक बना रह गया। अब इस एक सालवृक्षको विदीर्ण कर देनेपर दोनोंके बलाबलका स्पष्टीकरण हो जायगा॥ ९० ॥

‘आपका यह धनुष हाथीकी फैली हुई सूँड़के समान विशाल है। आप इसपर प्रत्यञ्चा चढ़ाइये और इसे कानतक खींचकर सालवृक्षको लक्ष्य करके एक विशाल बाण छोड़िये॥ ९१ ॥

‘इसमें संदेह नहीं कि आपका छोड़ा हुआ बाण इस सालवृक्षको विदीर्ण कर देगा। राजन्! अब विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है। मैं अपनी शपथ दिलाकर कहता हूँ, आप मेरा यह प्रिय कार्य अवश्य कीजिये॥ ९२ ॥

‘जैसे सम्पूर्ण तेजोंमें सदा सूर्यदेव ही श्रेष्ठ हैं, जैसे बड़े-बड़े पर्वतोंमें गिरिराज हिमवान् श्रेष्ठ हैं और जैसे चौपायोंमें सिंह श्रेष्ठ है, उसी प्रकार पराक्रमके विषयमें सब मनुष्योंमें आप ही श्रेष्ठ हैं’॥ ९३ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें ग्यारहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ११॥