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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

एक सौ सत्ताईसवाँ सर्ग

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एक सौ सत्ताईसवाँ सर्ग

अयोध्यामें श्रीरामके स्वागतकी तैयारी, भरतके साथ सबका श्रीरामकी अगवानीके लिये नन्दिग्राममें पहुँचना, श्रीरामका आगमन, भरत आदिके साथ उनका मिलाप तथा पुष्पकविमानको कुबेरके पास भेजना

यह परमानन्दमय समाचार सुनकर शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले सत्यपराक्रमी भरतने शत्रुघ्नको हर्षपूर्वक आज्ञा दी—॥ १ ॥

‘शुद्धाचारी पुरुष कुलदेवताओंका तथा नगरके सभी देवस्थानोंका गाजे-बाजेके साथ सुगन्धित पुष्पोंद्वारा पूजन करें॥ २ ॥

‘स्तुति और पुराणोंके जानकार सूत, समस्त वैतालिक (भाँट), बाजे बजानेमें कुशल सब लोग, सभी गणिकाएँ, राजरानियाँ, मन्त्रीगण, सेनाएँ, सैनिकोंकी स्त्रियाँ, ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा व्यवसायी संघके मुखियालोग श्रीरामचन्द्रजीके मुखचन्द्रका दर्शन करनेके लिये नगरसे बाहर चलें’॥ ३-४ १/२ ॥

भरतजीकी यह बात सुनकर शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले शत्रुघ्नने कई हजार मजदूरोंकी अलग-अलग टोलियाँ बनाकर उन्हें आज्ञा दी—‘तुमलोग ऊँची-नीची भूमियोंको समतल बना दो॥ ५-६ ॥

‘अयोध्यासे नन्दिग्रामतकका मार्ग साफ कर दो, आसपासकी सारी भूमिपर बर्फकी तरह ठंडे जलका छिड़काव कर दो॥ ७ ॥

‘तत्पश्चात् दूसरे लोग रास्तेमें सब ओर लावा और फूल बिखेर दें। इस श्रेष्ठ नगरकी सड़कोंके अगल-बगलमें ऊँची पताकाएँ फहरा दी जायँ॥ ८ ॥

‘कल सूर्योदयतक लोग नगरके सब मकानोंको सुनहरी पुष्पमालाओं, घनीभूत फूलोंके मोटे गजरों, सूतके बन्धनसे रहित कमल आदिके पुष्पों तथा पञ्चरंगे अलङ्कारोंसे सजा दें॥ ९ ॥

‘राजमार्गपर अधिक भीड़ न हो, इसकी व्यवस्थाके लिये सैकड़ों मनुष्य सब ओर लग जायँ।’ शत्रुघ्नका वह आदेश सुनकर सब लोग बड़ी प्रसन्नताके साथ उसके पालनमें लग गये॥ १० ॥

धृष्टि, जयन्त, विजय, सिद्धार्थ, अर्थसाधक, अशोक, मन्त्रपाल और सुमन्त्र—ये आठों मन्त्री ध्वजा और आभूषणोंसे विभूषित मतवाले हाथियोंपर चढ़कर चले॥ ११ १/२ ॥

दूसरे बहुत-से महारथी वीर सुनहरे रस्सोंसे कसी हुई हथिनियों, हाथियों, घोड़ों और रथोंपर सवार होकर निकले॥ १२ १/२ ॥

ध्वजा-पताकाओंसे विभूषित हजारों अच्छे-अच्छे घोड़ों और घुड़सवारों तथा हाथोंमें शक्ति, ऋष्टि और पाश धारण करनेवाले सहस्रों पैदल योद्धाओंसे घिरे हुए वीर पुरुष श्रीरामकी अगवानीके लिये गये॥ १३-१४ ॥

तदनन्तर राजा दशरथकी सभी रानियाँ सवारियोंपर चढ़कर कौसल्या और सुमित्राको आगे करके निकलीं तथा कैकेयीसहित सब-की-सब नन्दिग्राममें आ पहुँचीं॥ १५-१६ ॥

धर्मात्मा एवं धर्मज्ञ भरत मुख्य-मुख्य ब्राह्मणों, व्यवसायी वर्गके प्रधानों, वैश्यों तथा हाथोंमें माला और मिठाई लिये मन्त्रियोंसे घिरकर अपने बड़े भाईकी चरणपादुकाओंको सिरपर धारण किये शङ्खों और भेरियोंकी गम्भीर ध्वनिके साथ चले। उस समय बन्दीजन उनका अभिनन्दन कर रहे थे॥ १७-१८ ॥

श्वेत मालाओंसे सुशोभित सफेद रंगका छत्र तथा राजाओंके योग्य सोनेसे मढ़े हुए दो श्वेत चँवर भी उन्होंने अपने साथ ले रखे थे॥ १९ ॥

भरतजी उपवासके कारण दीन और दुर्बल हो रहे थे। वे चीरवस्त्र और कृष्णमृगचर्म धारण किये थे। भाईका आगमन सुनकर पहले-पहल उन्हें महान् हर्ष हुआ था॥ २० ॥

महात्मा भरत उस समय श्रीरामकी अगवानीके लिये आगे बढ़े। घोड़ोंकी टापों, रथके पहियोंकी नेमियों और शङ्खों एवं दुन्दुभियोंके गम्भीर नादोंसे सारी पृथ्वी हिलती-सी जान पड़ती थी। शङ्खों और दुन्दुभियोंकी ध्वनियोंसे मिले हुए हाथियोंके गर्जन-शब्द भी भूतलको कम्पित-सा किये देते थे॥ २१-२२ ॥

भरतजीने जब देखा कि अयोध्यापुरीके सभी नागरिक नन्दिग्राममें आ गये हैं, तब उन्होंने पवनपुत्र हनुमान्जीसे कहा— ॥ २३ ॥

‘वानर-वीर! वानरोंका चित्त स्वभावतः चञ्चल होता है। कहीं आपने भी उसी गुणका सेवन तो नहीं किया है—श्रीरामके आनेकी झूठी ही खबर तो नहीं उड़ा दी है; क्योंकि मुझे अभीतक

शत्रुओंको संताप देनेवाले ककुत्स्थकुलभूषण आर्य श्रीरामके दर्शन नहीं हो रहे हैं तथा इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले वानर भी कहीं दृष्टिगोचर नहीं हो रहे हैं?' ॥ २४ १/२ ॥

भरतजीके ऐसा कहनेपर हनुमान्‌जीने सार्थक एवं सत्य बात बतानेके लिये उन सत्यपराक्रमी भरतजीसे कहा— ॥ २५ १/२ ॥

'मुनिवर भरद्वाजजीकी कृपासे रास्तेके सभी वृक्ष सदा फूलने-फलनेवाले हो गये हैं और उनसे मधुकी धाराएँ गिरती हैं। उन वृक्षोंपर मतवाले भ्रमर निरन्तर गूँजते रहते हैं। उन्हें पाकर वानरलोग अपनी भूख-प्यास मिटाने लगे हैं॥ २६ १/२ ॥

'परंतप! देवराज इन्द्रने भी श्रीरामचन्द्रजीको ऐसा ही वरदान दिया था। अतएव भरद्वाजजीने सेनासहित श्रीरामचन्द्रजीका सर्वगुणसम्पन्न—साङ्गोपाङ्ग आतिथ्य-सत्कार किया है॥ २७ १/२ ॥

'किंतु देखिये, अब हर्षसे भरे हुए वानरोंका भयंकर कोलाहल सुनायी देता है। मालूम होता है इस समय वानरसेना गोमतीको पार कर रही है॥ २८ १/२ ॥

'उधर सालवनकी ओर देखिये, कैसी धूलकी वर्षा हो रही है? मैं समझता हूँ वानरलोग रमणीय सालवनको आन्दोलित कर रहे हैं॥ २९ १/२ ॥

'लीजिये, यह रहा पुष्पकविमान, जो दूरसे चन्द्रमाके समान दिखायी देता है। इस दिव्य पुष्पकविमानको विश्वकर्माने अपने मनके संकल्पसे ही रचा था। महात्मा श्रीरामने रावणको बन्धु-बान्धवोंसहित मारकर इसे प्राप्त किया है॥ ३०-३१ ॥

'श्रीरामका वाहन बना हुआ यह विमान प्रातःकालके सूर्यकी भाँति प्रकाशित हो रहा है। इसका वेग मनके समान है। यह दिव्य विमान ब्रह्माजीकी कृपासे कुबेरको प्राप्त हुआ था॥ ३२ ॥

'इसीमें विदेहराजकुमारी सीताके साथ वे दोनों रघुवंशी वीर बन्धु बैठे हैं और इसीमें महातेजस्वी सुग्रीव तथा राक्षस विभीषण भी विराजमान हैं'॥ ३३ ॥

हनुमान्‌जीके इतना कहते ही स्त्रियों, बालकों, नौजवानों और बूढ़ों—सभी पुरवासियोंके मुखसे यह वाणी फूट पड़ी—'अहो! ये श्रीरामचन्द्रजी आ रहे हैं।' उन नागरिकोंका वह हर्षनाद स्वर्गलोकतक गूँज उठा॥ ३४ ॥

सब लोग हाथी, घोड़ों और रथोंसे उतर पड़े तथा पृथ्वीपर खड़े हो विमानपर विराजमान श्रीरामचन्द्रजीका उसी तरह दर्शन करने लगे, जैसे लोग आकाशमें प्रकाशित होनेवाले चन्द्रदेवका दर्शन करते हैं॥ ३५ ॥

भरतजी श्रीरामचन्द्रजीकी ओर दृष्टि लगाये हाथ जोड़कर खड़े हो गये। उनका शरीर हर्षसे पुलकित था। उन्होंने दूरसे ही अर्घ्य-पाद्य आदिके द्वारा श्रीरामका विधिवत् पूजन किया॥ ३६ ॥

विश्वकर्माद्वारा मनसे रचे गये उस विमानपर बैठे हुए विशाल नेत्रोंवाले भगवान् श्रीराम वज्रधारी देवराज इन्द्रके समान शोभा पा रहे थे॥ ३७ ॥

विमानके ऊपरी भागमें बैठे हुए भाई श्रीरामपर दृष्टि पड़ते ही भरतने विनीतभावसे उन्हें उसी तरह प्रणाम किया, जैसे मेरुके शिखरपर उदित सूर्यदेवको द्विजलोग नमस्कार करते हैं॥ ३८ ॥

इतनेहीमें श्रीरामचन्द्रजीकी आज्ञा पाकर वह महान् वेगशाली हंसयुक्त उत्तम विमान पृथ्वीपर उतर आया॥

भगवान् श्रीरामने सत्यपराक्रमी भरतजीको विमानपर चढ़ा लिया और उन्होंने श्रीरघुनाथजीके पास पहुँचकर आनन्दविभोर हो पुनः उनके श्रीचरणोंमें साष्टाङ्ग प्रणाम किया॥ ४० ॥

दीर्घकालके पश्चात् दृष्टिपथमें आये हुए भरतको उठाकर श्रीरघुनाथजीने अपनी गोदमें बिठा लिया और बड़े हर्षके साथ उन्हें हृदयसे लगाया॥ ४१ ॥

तत्पश्चात् शत्रुओंको संताप देनेवाले भरतने लक्ष्मणसे मिलकर—उनका प्रणाम ग्रहण करके विदेहराजकुमारी सीताको बड़ी प्रसन्नताके साथ प्रणाम किया और अपना नाम भी बताया॥ ४२ ॥

इसके बाद कैकेयीकुमार भरतने सुग्रीव, जाम्बवान्, अङ्गद, मैन्द, द्विविद, नील, ऋषभ, सुषेण, नल, गवाक्ष, गन्धमादन, शरभ और पनका पूर्णरूपसे आलिङ्गन किया॥ ४३-४४ ॥

वे इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले वानर मानवरूप धारण करके भरतजीसे मिले और उन सबने महान् हर्षसे उल्लसित होकर उस समय भरतजीका कुशल-समाचार पूछा॥ ४५ ॥

धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ महातेजस्वी राजकुमार भरतने वानरराज सुग्रीवको हृदयसे लगाकर उनसे कहा— ॥

‘सुग्रीव! तुम हम चारोंके पाँचवें भाई हो; क्योंकि स्नेहपूर्वक उपकार करनेसे ही कोई भी मित्र होता है (और मित्र अपना भाई ही होता है)। अपकार करना ही शत्रुका लक्षण है’॥ ४७ ॥

इसके बाद भरतने विभीषणको सान्त्वना देते हुए उनसे कहा—‘राक्षसराज! बड़े सौभाग्यकी बात है कि आपकी सहायता पाकर श्रीरघुनाथजीने अत्यन्त दुष्कर कार्य पूरा किया है’॥ ४८ ॥

इसी समय वीर शत्रुघ्नने भी श्रीराम और लक्ष्मणको प्रणाम करके सीताजीके चरणोंमें विनय-पूर्वक मस्तक झुकाया॥ ४९ ॥

माता कौसल्या शोकके कारण अत्यन्त दुर्बल और कान्तिहीन हो गयी थीं। उनके पास पहुँचकर श्रीरामने प्रणत हो उनके दोनों पैर पकड़ लिये और माताके मनको अत्यन्त हर्ष प्रदान किया॥ ५० ॥

फिर सुमित्रा और यशस्विनी कैकेयीको प्रणाम करके उन्होंने सम्पूर्ण माताओंका अभिवादन किया, इसके बाद वे राजपुरोहित वसिष्ठजीके पास आये॥ ५१ ॥

उस समय अयोध्याके समस्त नागरिक हाथ जोड़कर श्रीरामचन्द्रजीसे एक साथ बोल उठे—‘माता कौसल्याका आनन्द बढ़ानेवाले महाबाहु श्रीराम! आपका स्वागत है, स्वागत है’॥ ५२ ॥

भरतके बड़े भाई श्रीरामने देखा, खिले हुए कमलोंके समान नागरिकोंकी सहस्रों अञ्जलियाँ उनकी ओर उठी हुई हैं॥ ५३ ॥

तदनन्तर धर्मज्ञ भरतने स्वयं ही श्रीरामकी वे चरणपादुकाएँ लेकर उन महाराजके चरणोंमें पहना दीं और हाथ जोड़कर उस समय उनसे कहा—॥ ५४ १/२ ॥

‘प्रभो! मेरे पास धरोहरके रूपमें रखा हुआ आपका यह सारा राज्य आज मैंने आपके श्रीचरणोंमें लौटा दिया। आज मेरा जन्म सफल हो गया। मेरा मनोरथ पूरा हुआ, जो अयोध्यानरेश आप श्रीरामको पुनः अयोध्यामें लौटा हुआ देख रहा हूँ॥ ५५-५६ ॥

‘आप राज्यका खजाना, कोठार, घर और सेना सब देख लें। आपके प्रतापसे ये सारी वस्तुएँ पहलेसे दसगुनी हो गयी हैं’॥ ५७ ॥

भ्रातृवत्सल भरतको इस प्रकार कहते देख समस्त वानर तथा राक्षसराज विभीषण नेत्रोंसे आँसू बहाने लगे॥ ५८ ॥

इसके पश्चात् श्रीरघुनाथजी भरतको बड़े हर्ष और स्नेहके साथ गोदमें बैठाकर विमानके द्वारा ही सेनासहित उनके आश्रमपर गये॥ ५९ ॥

भरतके आश्रममें पहुँचकर सेनासहित श्रीरघुनाथजी विमानसे उतरकर भूतलपर खड़े हो गये॥ ६० ॥

उस समय श्रीरामने उस उत्तम विमानसे कहा— ‘विमानराज! मैं तुम्हें आज्ञा देता हूँ, अब तुम यहाँसे देवप्रवर कुबेरके ही पास चले जाओ और उन्हींकी सवारीमें रहो’॥ ६१ ॥

श्रीरामकी आज्ञा पाकर वह परम उत्तम विमान उत्तर दिशाको लक्ष्य करके कुबेरके स्थानपर चला गया॥ ६२ ॥

राक्षस रावणने जिस दिव्य पुष्पकविमानपर बलपूर्वक अधिकार कर लिया था, वही अब श्रीरामचन्द्रजीकी आज्ञासे प्रेरित हो वेगपूर्वक कुबेरकी सेवामें चला गया॥ ६३ ॥

तत्पश्चात् पराक्रमी श्रीरघुनाथजीने अपने सखा पुरोहित वसिष्ठपुत्र सुयज्ञके (अथवा अपने परम सहायक पुरोहित वसिष्ठजीके) उसी प्रकार चरण छुए, जैसे देवराज इन्द्र बृहस्पतिजीके चरणोंका स्पर्श करते हैं। फिर उन्हें एक सुन्दर पृथक् आसनपर विराजमान करके उनके साथ ही दूसरे आसनपर वे स्वयं भी बैठे॥ ६४ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें एक सौ सत्ताईसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १२७ ॥