श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
एक सौ पाँचवाँ सर्ग
एक सौ पाँचवाँ सर्ग
दुर्वासाके शापके भयसे लक्ष्मणका नियम भङ्ग करके श्रीरामके पास इनके आगमनका समाचार देनेके लिये जाना, श्रीरामका दुर्वासा मुनिको भोजन कराना और उनके चले जानेपर लक्ष्मणके लिये चिन्तित होना
इन दोनोंमें इस प्रकार बातचीत हो ही रही थी कि महर्षि दुर्वासा राजद्वारपर आ पहुँचे। वे श्रीरामचन्द्रजीसे मिलना चाहते थे॥ १ ॥
उन मुनिश्रेष्ठने सुमित्राकुमार लक्ष्मणके पास जाकर कहा—'तुम शीघ्र ही मुझे श्रीरामचन्द्रजीसे मिला दो। उनसे मिले बिना मेरा एक काम बिगड़ रहा है'॥ २ ॥
मुनिकी यह बात सुनकर शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले लक्ष्मणने उन महात्माको प्रणाम करके यह बात कही—॥ ३ ॥
'भगवन्! बताइये, आपका कौन-सा काम है? क्या प्रयोजन है? और मैं आपकी कौन-सी सेवा करूँ? ब्रह्मन्! इस समय श्रीरघुनाथजी दूसरे कार्यमें संलग्न हैं; अतः दो घड़ीतक उनकी प्रतीक्षा कीजिये'॥ ४ ॥
यह सुनकर मुनिश्रेष्ठ दुर्वासा रोषसे तमतमा उठे और लक्ष्मणकी ओर इस प्रकार देखने लगे, मानो अपनी नेत्राग्निसे उन्हें भस्म कर डालेंगे। साथ ही उनसे इस प्रकार बोले—॥ ५ ॥
'सुमित्राकुमार! इसी क्षण श्रीरामको मेरे आगमनकी सूचना दो। यदि अभी-अभी उनसे मेरे आगमनका समाचार नहीं निवेदन करोगे तो मैं इस राज्यको, नगरको, तुमको, श्रीरामको, भरतको और तुमलोगोंकी जो संतति है, उसको भी शाप दे दूँगा। मैं पुनः इस क्रोधको अपने हृदयमें धारण नहीं कर सकूँगा'॥ ६-७ ॥
उन महात्माका यह घोर वचन सुनकर लक्ष्मणने उनकी वाणीसे जो निश्चय प्रकट हो रहा था, उसपर मन-ही-मन विचार किया॥ ८ ॥
'अकेले मेरी ही मृत्यु हो, यह अच्छा है; किंतु सबका विनाश नहीं होना चाहिये' अपनी बुद्धिद्वारा ऐसा निश्चय करके लक्ष्मणने श्रीरघुनाथजीसे दुर्वासाके आगमनका समाचार निवेदन किया॥ ९ ॥
लक्ष्मणकी बात सुनकर राजा श्रीराम कालको बिदा करके तुरंत ही निकले और अत्रिपुत्र दुर्वासासे मिले॥ १०॥
अपने तेजसे प्रज्वलित-से होते हुए महात्मा दुर्वासाको प्रणाम करके श्रीरघुनाथजीने हाथ जोड़कर पूछा— ‘महर्षे! मेरे लिये क्या आज्ञा है?’॥ ११॥
श्रीरघुनाथजीकी कही हुई उस बातको सुनकर प्रभावशाली मुनिवर दुर्वासा उनसे बोले— ‘धर्मवत्सल! सुनिये॥ १२॥
‘निष्पाप रघुनन्दन! मैंने एक हजार वर्षोंतक उपवास किया। आज मेरे उस व्रतकी समाप्तिका दिन है, इसलिये इस समय आपके यहाँ जो भी भोजन तैयार हो, उसे मैं ग्रहण करना चाहता हूँ’॥ १३॥
यह सुनकर राजा श्रीरघुनाथजी मन-ही-मन बड़े प्रसन्न हुए और उन्होंने उन मुनिश्रेष्ठको तैयार भोजन परोसा॥ १४॥
वह अमृतके समान अन्न ग्रहण करके दुर्वासा मुनि तृप्त हुए और श्रीरघुनाथजीको साधुवाद दे अपने आश्रमपर चले आये॥ १५॥
मुनिवर दुर्वासाके अपने आश्रमको चले जानेपर लक्ष्मणके बड़े भाई श्रीराम कालके वचनोंका स्मरण करके दुःखी हो गये॥ १६॥
भयंकर भावी भ्रातृवियोगके दृश्यको दृष्टिपथमें लानेवाले कालके उस वचनपर विचार करके श्रीरामके मनमें बड़ा दुःख हुआ। उनका मुँह नीचेको झुक गया और वे कुछ बोल न सके॥ १७॥
तत्पश्चात् कालके वचनोंपर बुद्धिपूर्वक सोचविचार करके महायशस्वी श्रीरघुनाथजी इस निर्णयपर पहुँचे कि ‘अब यह सब कुछ भी न रहेगा।’ ऐसा सोचकर वे चुप हो रहे॥ १८॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें एक सौ पाँचवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १०५॥