श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
एक सौ दसवाँ सर्ग
एक सौ दसवाँ सर्ग
रावणकी स्त्रियोंका विलाप
महात्मा श्रीरघुनाथजीके द्वारा रावणके मारे जानेका समाचार सुनकर शोकसे व्याकुल हुईं राक्षसियाँ अन्तःपुरसे निकल पड़ीं॥ १ ॥
लोगोंके बारम्बार मना करनेपर भी वे धरतीकी धूलमें लोटने लगती थीं। उनके केश खुले हुए थे और जिनके बछड़े मर गये हों, उन गौओंके समान वे शोकसे आतुर हो रही थीं॥ २ ॥
राक्षसोंके साथ लङ्काके उत्तर दरवाजेसे निकलकर भयंकर युद्धभूमिमें प्रवेश करके वे अपने मरे हुए पतिको खोजने लगीं॥ ३ ॥
‘हा आर्यपुत्र! हा नाथ!’ की पुकार मचाती हुईं वे सब-की-सब उस रणभूमिमें जहाँ बिना मस्तकके लाशें बिछी हुईं थीं तथा रक्तकी कीच जम गयी थी, सब ओर गिरती-पड़ती भटकने लगीं॥ ४ ॥
उनके नेत्रोंसे आँसुओंकी धारा बह रही थी। वे पतिके शोकसे बेसुध हो यूथपतिके मारे जानेपर हथिनियोंकी तरह करुण-क्रन्दन कर रही थीं॥ ५ ॥
उन्होंने महाकाय, महापराक्रमी और महातेजस्वी रावणको देखा, जो काले कोयलेके ढेर-सा पृथ्वीपर मरा पड़ा था॥ ६ ॥
रणभूमिकी धूलमें पड़े हुए अपने मृतक पतिपर सहसा दृष्टि पड़ते ही वे कटी हुईं वनकी लताओंके समान उसके अङ्गोंपर गिर पड़ीं॥ ७ ॥
उनमेंसे कोई तो बड़े आदरके साथ उसका आलिङ्गन करके, कोई पैर पकड़कर और कोई गलेसे लगकर रोने लगीं॥ ८ ॥
कोई स्त्री अपनी दोनों भुजाएँ ऊपर उठा पछाड़ खाकर गिरी और धरतीपर लोटने लगी तथा कोई मरे हुए स्वामीका मुख देखकर मूर्च्छित हो गयी॥ ९ ॥
कोई पतिका मस्तक गोदमें लेकर उसका मुँह निहारती और ओसकणोंसे कमलकी भाँति अश्रुबिन्दुओंसे पतिके मुखारविन्दको नहलाती हुईं रोदन करने लगी॥ १० ॥
इस प्रकार अपने पतिदेवता रावणको धरतीपर मरकर गिरा देख वे सब-की-सब आर्तभावसे उसे पुकारने लगीं और शोकके कारण नाना प्रकारसे विलाप करने लगीं॥ ११ ॥
वे बोलीं—‘हाय! जिन्होंने यमराज और इन्द्रको भी भयभीत कर रखा था, राजाधिराज कुबेरका पुष्पक विमान छीन लिया था तथा गन्धर्वों, ऋषियों और महामनस्वी देवताओंको भी रणभूमिमें भय प्रदान किया था, वे ही हमारे प्राणनाथ आज इस समराङ्गणमें मारे जाकर सदाके लिये सो गये हैं॥ १२-१३ ॥
‘हाय! जो असुरों, देवताओं तथा नागोंसे भी भयभीत होना नहीं जानते थे, उन्हींको आज मनुष्यसे यह भय प्राप्त हो गया॥ १४ ॥
‘जिन्हें देवता, दानव और राक्षस भी नहीं मार सकते थे, वे ही आज एक पैदल मनुष्यके हाथसे मारे जाकर रणभूमिमें सो रहे हैं॥ १५ ॥
‘जो देवताओं, असुरों तथा यक्षोंके लिये भी अवध्य थे, वे ही किसी निर्बल प्राणीके समान एक मनुष्यके हाथसे मृत्युको प्राप्त हुए’॥ १६ ॥
इस तरहकी बातें कहती हुई रावणकी वे दुःखिनी स्त्रियाँ वहाँ फूट-फूटकर रोने लगीं तथा दुःखसे आतुर होकर पुनः बारम्बार विलाप करने लगीं॥ १७ ॥
वे बोलीं—‘प्राणनाथ! आपने सदा हितकी बात बतानेवाले सुहृदोंकी बातें अनसुनी कर दीं और अपनी मृत्युके लिये सीताका अपहरण किया। इसका फल यह हुआ कि ये राक्षस मार गिराये गये तथा आपने इस समय अपनेको रणभूमिमें और हमलोगोंको महान् दुःखके समुद्रमें गिरा दिया॥ १८ ॥
‘आपके प्रिय भाई विभीषण आपको हितकी बात बता रहे थे तो भी आपने अपने वधके लिये उन्हें मोहवश कटु वचन सुनाये। उसीका यह फल प्रत्यक्ष दिखायी दिया है॥ १९ ॥
‘यदि आपने मिथिलेशकुमारी सीताको श्रीरामके पास लौटा दिया होता तो जड़-मूलसहित हमारा विनाश करनेवाला यह महाघोर संकट हमपर न आता॥ २० ॥
‘सीताको लौटा देनेपर आपके भाई विभीषणका भी मनोरथ सफल हो जाता, श्रीराम हमारे मित्र-पक्षमें आ जाते, हम सबको विधवा नहीं होना पड़ता और हमारे शत्रुओंकी कामनाएँ पूरी नहीं होतीं॥ २१ ॥
‘परंतु आप ऐसे निष्ठुर निकले कि सीताको बलपूर्वक कैद कर लिया तथा राक्षसोंको, हम स्त्रियोंको और अपने-आपको—तीनोंको भी एक साथ नीचे गिरा दिया—विपत्तिमें डाल दिया॥ २२ ॥
‘राक्षसशिरोमणे! आपका स्वेच्छाचार ही हमारे विनाशमें कारण हुआ हो, ऐसी बात नहीं है। दैव ही सब कुछ कराता है। दैवका मारा हुआ ही मारा जाता या मरता है॥ २३ ॥
‘महाबाहो! इस युद्धमें वानरोंका, राक्षसोंका और आपका भी विनाश दैवयोगसे ही हुआ है॥ २४ ॥
‘संसारमें फल देनेके लिये उन्मुख हुए दैवके विधानको कोई धनसे, कामनासे, पराक्रमसे, आज्ञासे अथवा शक्तिसे भी नहीं पलट सकता’॥ २५ ॥
इस प्रकार राक्षसराजकी सभी स्त्रियाँ दुःखसे पीड़ित हो आँखोंमें आँसू भरकर दीनभावसे कुररीकी भाँति विलाप करने लगीं॥ २६ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें एक सौ दसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ११० ॥