सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

एक सौ तेरहवाँ सर्ग

⬅ विषय-सूची (TOC)

एक सौ तेरहवाँ सर्ग

हनुमान्‌जीका सीताजीसे बातचीत करके लौटना और उनका संदेश श्रीरामको सुनाना

भगवान् श्रीरामका यह आदेश पाकर पवनपुत्र हनुमान्‌जीने निशाचरोंसे सम्मानित होते हुए लङ्कापुरीमें प्रवेश किया॥ १ ॥

पुरीमें प्रवेश करके उन्होंने विभीषणसे आज्ञा माँगी। उनकी आज्ञा मिल जानेपर हनुमान्‌जी अशोकवाटिकामें गये॥ २ ॥

अशोकवाटिकामें प्रवेश करके न्यायानुसार उन्होंने सीताजीको अपने आगमनकी सूचना दी। तत्पश्चात् निकट जाकर उनका दर्शन किया। वे स्नान आदिसे हीन होनेके कारण कुछ मलिन दिखायी देती थीं और सशङ्क हुईं रोहिणीके समान जान पड़ती थीं॥ ३ ॥

सीताजी आनन्दशून्य हो वृक्षके नीचे राक्षसियोंसे घिरी बैठी थीं। हनुमान्‌जीने शान्त और विनीतभावसे सामने जाकर उन्हें प्रणाम किया। प्रणाम करके वे चुपचाप खड़े हो गये॥ ४ ॥

महाबली हनुमान्‌को आया देख देवी सीता उन्हें पहचानकर मन-ही-मन प्रसन्न हुईं; किंतु कुछ बोल न सकीं। चुपचाप बैठी रहीं॥ ५ ॥

सीताके मुखपर सौम्यभाव लक्षित हो रहा था। उसे देखकर कपिश्रेष्ठ हनुमान्‌ने श्रीरामचन्द्रजीकी कही हुईं सब बातोंको उनसे कहना आरम्भ किया—॥ ६ ॥

‘विदेहनन्दिनि! श्रीरामचन्द्रजी लक्ष्मण और सुग्रीवके साथ सकुशल हैं। अपने शत्रु का वध करके सफलमनोरथ हुए उन शत्रुविजयी श्रीरामने आपकी कुशल पूछी है॥

‘देवि! विभीषणकी सहायता पाकर वानरों और लक्ष्मणसहित श्रीरामने बल-विक्रमसम्पन्न रावणको युद्धमें मार डाला है॥ ८ ॥

‘धर्मको जाननेवाली देवि सीते! मैं आपको यह प्रिय संवाद सुनाता हूँ और अधिक-से-अधिक प्रसन्न देखना चाहता हूँ। आपके पातिव्रत्य-धर्मके प्रभावसे ही युद्धमें श्रीरामने यह महान् विजय प्राप्त की है। अब आप चिन्ता छोड़कर स्वस्थ हो जायँ। हमलोगोंका शत्रु रावण मारा गया और लङ्का भगवान् श्रीरामके अधीन हो गयी॥ ९-१० ॥

‘श्रीरामने आपको यह संदेश दिया है—‘देवि! मैंने तुम्हारे उद्धारके लिये जो प्रतिज्ञा की थी, उसके लिये निद्रा त्यागकर अथक प्रयत्न किया और समुद्रमें पुल बाँधकर रावणवधके द्वारा

उस प्रतिज्ञाको पूर्ण किया॥ ११ ॥

‘अब तुम अपनेको रावणके घरमें वर्तमान समझकर भयभीत न होना; क्योंकि लङ्काका सारा ऐश्वर्य विभीषणके अधीन कर दिया गया है। अब तुम अपने ही घरमें हो। ऐसा जानकर निश्चिन्त होकर धैर्य धारण करो। देवि! ये विभीषण भी हर्षसे भरकर आपके दर्शनके लिये उत्कण्ठित हो अभी यहाँ आ रहे हैं’॥ १२-१३ ॥

हनुमान्जीके इस प्रकार कहनेपर चन्द्रमुखी सीतादेवीको बड़ा हर्ष हुआ। हर्षसे उनका गला भर आया और वे कुछ बोल न सकीं॥ १४ ॥

सीताजीको मौन देख कपिवर हनुमान्जी बोले— ‘देवि! आप क्या सोच रही हैं? मुझसे बोलती क्यों नहीं’॥ १५ ॥

हनुमान्जीके इस प्रकार पूछनेपर धर्मपरायणा सीतादेवी अत्यन्त प्रसन्न हो आनन्दके आँसू बहाती हुईं गद्गद वाणीमें बोलीं— ॥ १६ ॥

‘अपने स्वामीकी विजयसे सम्बन्ध रखनेवाला यह प्रिय संवाद सुनकर मैं आनन्दविभोर हो गयी थी; इसलिये कुछ देरतक मेरे मुँहसे बात नहीं निकल सकी है॥ १७ ॥

‘वानरवीर! ऐसा प्रिय समाचार सुनानेके कारण मैं तुम्हें कुछ पुरस्कार देना चाहती हूँ; किंतु बहुत सोचनेपर भी मुझे इसके योग्य कोई वस्तु दिखायी नहीं देती॥ १८ ॥

‘सौम्य वानरवीर! इस भूमण्डलमें मैं कोई ऐसी वस्तु नहीं देखती, जो इस प्रिय संवादके अनुरूप हो और जिसे तुम्हें देकर मैं संतुष्ट हो सकूँ॥ १९ ॥

‘सोना, चाँदी, नाना प्रकारके रत्न अथवा तीनों लोकोंका राज्य भी इस प्रिय समाचारकी बराबरी नहीं कर सकता’॥ २० ॥

विदेहनन्दिनीके ऐसा कहनेपर वानरवीर हनुमान्जीको बड़ा हर्ष हुआ। वे सीताजीके सामने हाथ जोड़कर खड़े हो गये और इस प्रकार बोले— ॥ २१ ॥

‘पतिकी विजय चाहनेवाली और पतिके ही प्रिय एवं हितमें सदा संलग्न रहनेवाली सती-साध्वी देवि! आपके ही मुँहसे ऐसा स्नेहपूर्ण वचन निकल सकता है (आपके इस वचनसे मैं सब कुछ पा गया)॥ २२ ॥

‘सौम्ये! आपका यह वचन सारगर्भित और स्नेहयुक्त है, अतः भाँति-भाँतिकी रत्नराशि और देवताओंके राज्यसे भी बढ़कर है॥ २३ ॥

‘मैं जब यह देखता हूँ कि श्रीरामचन्द्रजी अपने शत्रु का वध करके विजयी हो गये और स्वयं सकुशल हैं, तब मैं यह अनुभव करता हूँ कि मेरे सारे प्रयोजन सिद्ध हो गये—देवताओंके राज्य आदि सभी उत्कृष्ट गुणोंसे युक्त पदार्थ मुझे मिल गये’॥ २४ ॥

उनकी बात सुनकर मिथिलेशकुमारी जानकीने उन पवनकुमारसे यह परम सुन्दर वचन कहा —॥ २५ ॥

‘वीरवर! तुम्हारी वाणी उत्तम लक्षणोंसे सम्पन्न, माधुर्य गुणसे भूषित तथा बुद्धिके आठ* अङ्गों (गुणों)-से अलंकृत है। ऐसी वाणी केवल तुम्हीं बोल सकते हो॥ २६ ॥

‘तुम वायुदेवताके प्रशंसनीय पुत्र तथा परम धर्मात्मा हो। शारीरिक बल, शूरता, शास्त्रज्ञान, मानसिक बल, पराक्रम, उत्तम दक्षता, तेज, क्षमा, धैर्य, स्थिरता, विनय तथा अन्य बहुत-से सुन्दर गुण केवल तुम्हींमें एक साथ विद्यमान हैं, इसमें संशय नहीं है’॥ २७-२८ ॥

तदनन्तर सीताके सामने बिना किसी घबराहटके हाथ जोड़कर विनीतभावसे खड़े हुए हनुमान्‌जी पुनः हर्षपूर्वक उनसे बोले—॥ २९ ॥

‘देवि! यदि आपकी आज्ञा हो तो मैं इन समस्त राक्षसियोंको, जो पहले आपको बहुत डराती-धमकाती रही हैं, मार डालना चाहता हूँ॥ ३० ॥

‘आप-जैसी पतिव्रता देवी अशोकवाटिका में बैठकर क्लेश भोग रही थीं और ये भयंकर रूप एवं आचारसे युक्त अत्यन्त क्रूर दृष्टिवाली विकरालमुखी क्रूर राक्षसियाँ आपको बारम्बार कठोर वचनोंद्वारा डाँटती-फटकारती रहती थीं। रावणकी आज्ञासे ये जैसी-जैसी बातें आपको सुनाती थीं, उन सबको मैंने यहाँ रहकर सुना है॥ ३१-३२ ॥

‘ये सब-की-सब विकराल, विकट आकारवाली, क्रूर और अत्यन्त दारुण हैं। इनके नेत्रों और केशोंसे भी क्रूरता टपकती है। मैं तरह-तरहके आघातोंद्वारा इन सबका वध कर डालना चाहता हूँ॥ ३३ ॥

‘मेरी इच्छा है कि मुक्कों, लातों, विशाल भुजाओं—थप्पड़ों, पिण्डलियों और घुटनोंकी मारसे इन्हें घायल करके इनके दाँत तोड़ दूँ, इनकी नाक और कान काट लूँ तथा इनके सिरके बाल नोचूँ। यशस्विनि! इस तरह बहुत-से प्रहारोंद्वारा इन सबको पीटकर क्रूरतापूर्ण बातें करनेवाली इन अप्रियकारिणी राक्षसियोंको पटक-पटककर मार डालूँ। जिन-जिन भयानक रूपवाली राक्षसियोंने पहले आपको डाँट बतायी है, उन सबको मैं अभी मौतके घाट उतार दूँगा। इसके लिये आप मुझे केवल वर (आज्ञा) दे दें’॥ ३४—३६ १/२ ॥

हनुमान्‌जीके ऐसा कहनेपर करुणामय स्वभाववाली दीनवत्सला सीताने मन-ही-मन बहुत कुछ सोचविचार करके उनसे इस प्रकार कहा— ॥ ३७ १/२ ॥

‘कपिश्रेष्ठ! ये बेचारी राजाके आश्रयमें रहनेके कारण पराधीन थीं। दूसरोंकी आज्ञासे ही सब कुछ करती थीं, अतः स्वामीकी आज्ञाका पालन करनेवाली इन दासियोंपर कौन क्रोध करेगा? मेरा भाग्य ही अच्छा नहीं था तथा मेरे पूर्वजन्मके दुष्कर्म अपना फल देने लगे थे, इसीसे मुझे यह सब कष्ट प्राप्त हुआ है; क्योंकि सभी प्राणी अपने किये हुए शुभाशुभ कर्मोंका ही फल भोगते हैं, अतः महाबाहो! तुम इन्हें मारनेकी बात न कहो। मेरे लिये दैवका ही ऐसा विधान था॥ ३८—४० ॥

‘मुझे अपने पूर्वकर्मजनित दशाके योगसे यह सारा दुःख निश्चितरूपसे भोगना ही था; इसलिये रावणकी दासियोंका यदि कुछ अपराध हो भी तो उसे मैं क्षमा करती हूँ; क्योंकि इनके प्रति दयाके उद्रेकसे मैं दुर्बल हो रही हूँ॥ ४१ ॥

‘पवनकुमार! उस राक्षसकी आज्ञासे ही ये मुझे धमकाया करती थीं। जबसे वह मारा गया है, तबसे ये बेचारी मुझे कुछ नहीं कहती हैं। इन्होंने डराना-धमकाना छोड़ दिया है॥ ४२ ॥

‘वानरवीर! इस विषयमें एक पुराना धर्मसम्मत श्लोक है, जिसे किसी व्याघ्रके निकट एक रीछने कहा था*। वह श्लोक मैं बता रही हूँ' सुनो॥ ४३ ॥

‘श्रेष्ठ पुरुष दूसरेकी बुराऽइ करनेवाले पापियोंके पापकर्मको नहीं अपनाते हैं—बदलेमें उनके साथ स्वयं भी पापपूर्ण बर्ताव नहीं करना चाहते हैं, अतः अपनी प्रतिज्ञा एवं सदाचारकी रक्षा ही करनी चाहिये; क्योंकि साधुपुरुष अपने उत्तम चरित्रसे ही विभूषित होते हैं। सदाचार ही उनका आभूषण है' ॥ ४४ ॥

‘श्रेष्ठ पुरुषको चाहिये कि कोऽइ पापी हों या पुण्यात्मा अथवा वे वधके योग्य अपराध करनेवाले ही क्यों न हों, उन सबपर दया करें; क्योंकि ऐसा कोऽइ भी प्राणी नहीं है, जिससे कभी अपराध होता ही न हो॥ ४५ ॥

‘जो लोगोंकी हिंसामें ही रमते और सदा पापका ही आचरण करते हैं, उन क्रूर स्वभाववाले पापियोंका भी कभी अमङ्गल नहीं करना चाहिये’॥ ४६ ॥

सीताजीके ऐसा कहनेपर बातचीत करनेमें कुशल हनुमान्‌जीने उन सती-साध्वी श्रीरामपत्नीको इस प्रकार उत्तर दिया— ॥ ४७ ॥

‘देवि! आप श्रीरामकी धर्मपत्नी हैं; अतः आपका ऐसे सद्गुणोंसे सम्पन्न होना उचित ही है। अब आप अपनी ओरसे मुझे कोर्इ संदेश दें। मैं श्रीरघुनाथजीके पास जाऊँगा’॥ ४८ ॥

हनुमान्‌जीके ऐसा कहनेपर विदेहनन्दिनी जनकराजकिशोरी बोलीं—‘मैं अपने भक्तवत्सल स्वामीका दर्शन करना चाहती हूँ’॥ ४९ ॥

सीताजीकी यह बात सुनकर परम बुद्धिमान् पवनकुमार हनुमान्‌जी उन मिथिलेशकुमारीका हर्ष बढ़ाते हुए इस प्रकार बोले—॥ ५० ॥

‘देवि! जैसे शची देवराज इन्द्रका दर्शन करती हैं, उसी प्रकार आप पूर्णचन्द्रमाके समान मनोहर मुखवाले उन श्रीराम और लक्ष्मणको आज देखेंगी, जिनके मित्र विद्यमान हैं और शत्रु मारे जा चुके हैं’॥ ५१ ॥

साक्षात् लक्ष्मीकी भाँति सुशोभित होनेवाली सीतादेवीसे ऐसा कहकर महातेजस्वी हनुमान्‌जी उस स्थानपर लौट आये, जहाँ श्रीरघुनाथजी विराजमान थे॥ ५२ ॥

वहाँसे लौटते ही कपिवर हनुमान्‌जीने देवराज इन्द्रके तुल्य तेजस्वी श्रीरघुनाथजीसे जनकराजकिशोरी सीताजीका दिया हुआ उत्तर क्रमशः कह सुनाया॥ ५३ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें एक सौ तेरहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ११३ ॥


* शुश्रूषा श्रवणं चैव ग्रहणं धारणं तथा। ऊहापोहोऽर्थविज्ञानं तत्त्वज्ञानं च धीगुणाः॥

सुननेकी इच्छा, सुनना, ग्रहण करना, स्मरण रखना, ऊहा (तर्क-वितर्क), अपोह (सिद्धान्तका निश्चय), अर्थका ज्ञान होना तथा तत्त्वको समझना—ये आठ बुद्धिके गुण हैं।

*पहलेकी बात है—एक बाघने किसी व्याधका पीछा किया। व्याध भागकर एक वृक्षपर चढ़ गया। उस वृक्षपर पहलेसे ही कोर्इ रीछ बैठा हुआ था। बाघ वृक्षकी जड़के पास पहुँचकर पेड़पर बैठे हुए रीछसे बोला—‘हम और तुम दोनों ही वनके जीव हैं। यह व्याध हम दोनोंका ही शत्रु है; अतः तुम इसे वृक्षसे नीचे गिरा दो।’ रीछने उत्तर दिया—‘यह व्याध मेरे निवासस्थानपर आकर एक प्रकारसे मेरी शरण ले चुका है, इसलिये मैं इसे नीचे नहीं गिराऊँगा। यदि गिरा दूँ तो धर्मकी हानि होगी।’ ऐसा कहकर रीछ सो गया। तब बाघने व्याधसे कहा—‘देखो, इस सोये हुए रीछको नीचे गिरा दो। मैं तुम्हारी रक्षा करूँगा।’ उसके ऐसा कहनेपर व्याधने उस रीछको धक्का दे दिया; परंतु रीछ अभ्यासवश दूसरी डाल पकड़कर गिरनेसे बच गया। तब बाघने रीछसे कहा—‘यह व्याध तुमको गिराना चाहता था; अतः अपराधी है। इसलिये अब इसको नीचे ढकेल दो।’ बाघके इस प्रकार बारम्बार उकसानेपर भी रीछने उस व्याधको नहीं गिराया और ‘न परः पापमादत्ते’ इस श्लोकका गान करके उसे मुँहतोड़ उत्तर दे दिया। यह प्राचीन कथा है। (रामायणभूषण-टीकासे)